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लम्बे सूर्यास्त की तरफ़ बढ़ता G-7 
जब सदस्य देश अपने ही तरीक़े से अपनी राह चलने लग जाते हैं, तो ये संगठन बिना पतवार की नाव की तरह हो जाते हैं, मझधार में डांवाडोल होने लगते हैं।
एम. के. भद्रकुमार
08 Jun 2020
G-7 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विरासत में मिली विदेश नीति के साथ अपना पहला कार्यकाल पूरा करेंगे, जिसे लेकर आलोचकों को भी स्वीकार करना होगा कि यह कार्यकाल विश्व राजनीति के खेल को बदल रहा है। ट्रंप को उनके अनेक अहम फ़ैसले के लिए याद किया जायेगा है, ये अहम फ़ैसले हैं- जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते, ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट, जेसीपीओएए, विश्व स्वास्थ्य संगठन और इसी तरह के दूसरे और फ़ैसले। 

मौजूदा इतिहास में ट्रंप द्वारा ट्रान्साटलांटिक गठबंधन प्रणाली का ख़ात्मा उनकी सबसे निर्णायक विरासत के रूप में बना रहेगा। लेकिन, कनाडा के फेयरमोंट ले मनेरोर रिचेलियू (8-9 जून, 2018) में हुई समूह की शिखर बैठक के बाद से G-7 उनकी चर्चा का मुख्य विषय रहा है, जहां वह इस बैठक के औपचारिक समापन से पहले ही बैठक से बाहर निकल गये थे, इसकी शासकीय सूचना को ख़ारिज कर दिया था और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो  को "बहुत बेईमान और कमज़ोर” कहते हुए सार्वजनिक रूप से अपने मेजबान का अपमान किया था।

तक़रार की शुरुआत हर दूसरे जी-7 सदस्य पर लगाये गये उस स्टील और एल्युमीनियम टैरिफ़ को लेकर हुई थी, जिसे ट्रंप ने थोपा था। (“हम उस गुल्लक की तरह हैं, जिसे हर कोई लूट लेता है और एक दिन वह समाप्त हो जाता है।”) ट्रूडो ने शांति से अपनी बात को साफ़ करते हुए कहा था, “कनाडाई के रूप में हम विनम्र हैं, हम तर्कसंगत हैं, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम पर धौंस जमाई जाय।” वहां जो कुछ नाटक चला, उसे भुला पाना कठिन है और बहुत साफ़ था कि G-7 के लिए घंटी बजनी शुरू हो गयी थी।

ट्रंप की शिकायत यही थी कि G-7 ने अमेरिकी हितों का ख़्याल नहीं रखा है, हाल ही में जब विदेश मंत्री, माइक पोम्पिओ ने 25 मार्च को G-7 के विदेश मंत्रियों की बैठक में कोविड-19 महामारी के संदर्भ में चीन पर दोषारोपण करने के मामले को रखते हुए सदस्य राज्यों से आह्वान किया कि इस वायरस को "वुहान वायरस" के रूप में पुकारा जाय, तो विदेश मंत्रियों ने ऐसा कहने से इन्कार कर दिया था और वह बैठक एक संयुक्त बयान जारी करने में नाकाम रही थी।

इसलिए, ट्रंप ने अपने इस सुझाव के साथ इस मुद्दे को लेकर सदस्य देशों को मजबूर कर दिया है कि जून के अंत में होने वाले G-7 के वार्षिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी वीडियोकॉंफ़्रेसिंग के ज़रिये करने के बजाय व्यक्तिगत तौर पर मौजूद होकर की जायेगी। ट्रंप ने ट्वीट किया, “अब जबकि हमारा देश महानता की राह पर लौट रहा है,’ मैं उसी तरह या उसी तारीख पर वाशिंगटन डीसी स्थित  मशहूर कैंप डेविड में G-7 की संरचना को फिर से नये सिरे से निर्धारित करने पर विचार कर रहा हूं। अन्य सदस्य भी अपनी वापसी की शुरुआत कर रहे हैं। यह सभी के लिए सामान्यीकरण का एक बड़ा संकेत होगा !”

ट्रंप के प्रवक्ता, कायले मैकनेनी ने संवाददाताओं से कहा कि आमने-सामने बैठकर होने वाला यह शिखर सम्मेलन "शक्ति और आशावाद का एक प्रदर्शन" होगा, जहां नेता इस महामारी से निपटने के दौरान हमेशा की तरह अपने कारोबार को भी आगे बढ़ायेंगे।”

लेकिन G-7 के दूसरे नेता इसे इस तरह से नहीं देखते हैं। 2018 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाले ट्रूडो ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी भी व्यक्ति को यहां व्यक्तिगत मौजूदगी के अहसास कराने के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी, “हम निश्चित रूप से इस बात पर एक नज़र रखेंगे कि अमेरिका G-7 के मेजबान के तौर पर क्या कुछ प्रस्तावित कर रहा है, हमारी इस बात पर नज़र रहेगी कि लोगों को सुरक्षित रखने के लिए किस तरह के उपाय किये जायेंगे, हमारी नज़र इस बात पर होगी कि विशेषज्ञ जिस तरह की सिफ़ारिशें कर रहे हैं,उसे किस तरह से अमल में लाया जा सकता है।”

पेरिस की तरफ़ से एक अपेक्षाकृत सकारात्मक प्रतिक्रिया आयी, जिसमें एलिसी के एक अधिकारी ने कहा कि अगर राष्ट्रपति मैक्रोन का "स्वास्थ्य ठीक रहता है, तो वे कैंप डेविड जाने के लिए तैयार हैं।" जर्मन चांसलर, एंजेला मर्केल का रुख़ एकदम साफ़ था,“ G-7 बैठक का रूप चाहे वीडियो सम्मेलन वाला हो या कुछ और हो, लेकिन मैं निश्चित रूप से बहुपक्षवाद के पक्ष में लड़ूंगी।”

मर्केल ने एक दिन बाद ही ट्रंप के निमंत्रण को नामंज़ूर कर दिया। जर्मन सरकार के प्रवक्ता ने बताया, “फ़ेडरल चांसलर ने वाशिंगटन में जून के अंत में होने वाले G-7 के शिखर सम्मेलन में भाग लेने को लेकर ट्रंप से मिले निमंत्रण के लिए राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद दिया है। कुल मिलाकर आज महामारी की जो स्थिति है, उसे देखते हुए वह वाशिंगटन की यात्रा में अपनी व्यक्तिगत भागीदारी के लिए सहमत नहीं हो सकती हैं।” 

ट्रंप के इस निमंत्रण को मर्केल का नकारा जाना दोनों नेताओं के बीच के जटिल रिश्तों को दर्शाता है। बर्लिन के व्यापार अधिशेष से लेकर अपने रक्षा ख़र्च तक के मुद्दों पर, जर्मनी और विशेष रूप से मर्केल को लेकर ट्रंप सतर्क रहे हैं। मर्केल ने जलवायु परिवर्तन से लेकर ईरान के परमाणु समझौते तक के विदेश नीति के मुद्दों के बारे में ट्रंप प्रशासन के एकपक्षीय रुख़ का भी मुद्दा उठाया है।

सप्ताह की शुरुआत में ट्रंप और मर्केल के बीच फ़ोन से हुई बातचीत में दोनों नेताओं ने कथित तौर पर नाटो, रूस और जर्मनी के बीच नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन और चीन के साथ सम्बन्धों सहित कई विषयों पर "ज़बरदस्त असहमति" सामने आयी थी।

मगर, ट्रंप भी ऐसे लोगों में से नहीं हैं, जो इसे हल्के में लें। तब से ट्रंप यह कहते रहे हैं कि सितंबर में होने वाले G-7 के शिखर सम्मेलन में इस समूह की संरचना में बदलाव किया जायेगा, और उन्होंने इस बात के लिए सचेत भी किया कि इस समूह का इस क़दर विस्तार हो सकता है कि इसमें रूस भी शामिल हो। ट्रंप ने ज़ोर देकर कहा कि रूस को G-7 में फिर से आमंत्रित करना एक "सामान्य बोध" की बात है, क्योंकि यदि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को समूह में फिर से शामिल कर लिया जाता है, तो कई मुद्दों को सुलझाने में बहुत आसानी होगी।

तब से कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ रूस को G-7 समूह में फिर से शामिल किये जाने पर ज़ोरदार आपत्ति जताते रहे हैं; इस मुद्दे पर जापान, फ़्रांस और इटली के रूख़ का पता चल पाना अभी बाक़ी है; जर्मनी ने यह कहना शुरू कर दिया है कि मौजूदा वैश्विक परिवेश G-7 के ढांचे को बदलने का सही वक्त नहीं है। बहरहाल, ट्रंप इस बारे में पुतिन को फ़ोन करते रहे हैं और व्यक्तिगत रूप से इसके विस्तार को लेकर बताते भी रहे हैं।

अनुमान है कि ट्रंप, पुतिन को (ऑस्ट्रेलिया, इज़राइल और भारत के साथ) "पर्यवेक्षक" के रूप में G-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। वास्तव में यह एक "G-7 प्लस" जैसा कुछ होगा और मेजबान देश निमंत्रण देने के लिए स्वतंत्र है।

लेकिन, क्योंकि रूस किसी समय इस समूह का पूर्ण सदस्य था और इस समूह से बाहर किये जाने के बाद फिर से इसे "पर्यवेक्षक" के रूप में वापस आमंत्रित किया जाना रूस के लिए एक कड़वी दवा निगलने की तरह होगा। लेकिन, पुतिन फिर भी ट्रंप से मिलने के लिए उत्सुक हैं। हथियार नियंत्रण जैसे दबाव बनाने वाले ऐसे मुद्दे हैं, जिसे लेकर कोई भी प्रगति केवल ट्रंप के हस्तक्षेप से ही संभव है । 5 फ़रवरी 2021 को START (Strategic Arms Reduction Treaty) का नवीनीकरण होना है।

रूसी जानकारों का अनुमान है कि ट्रंप का फिर से निर्वाचित होना तय है और रूसी-अमेरिकी रिश्तों को सुधारने के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर हो सकता है। असल में यह ठीक वही बात है, जिसे लेकर दूसरे G-7 नेता डरे हुए हैं कि सितंबर में होने वाले G-7 शिखर सम्मेलन की समाप्ति को वे यूएस-रूस रिश्तों के पुनरुत्थान के मूक गवाह बनते हुए देख सकते हैं, जो निश्चित रूप से केवल उनके हितों की क़ीमत पर होगी।

ट्रंप पहले ही सितंबर तक जर्मनी स्थित अड्डों से 9,500 अमेरिकी सैनिकों को वापसी की योजना को मंज़ूरी देकर जर्मनी को संकेत दे चुके हैं। अमेरिकी सैनिकों की यह संख्या जर्मनी में मौजूद अमेरिकी सेना का लगभग एक तिहाई है। (जर्मनी इस समय यूरोप स्थित अमेरिकी सेनाओं की सबसे बड़ी संख्या का मेजबान बना हुआ।)

ट्रंप का यह फ़ैसला नाटो के भीतर एकजुटता के लिए एक झटका है। असल में अमेरिका, यूरोपीय संघ और नाटो द्वारा चीन पर अमेरिका के क़दमों के अनुसरण किये जाने से इनकार के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई कर रहा है।

कोई शक नहीं कि बीजिंग इस पर नज़र रखे हुए है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस हफ़्ते के हर दिन मैर्केल और मैक्रॉन को लगातार फ़ोन किया है।

ट्रंप की तरफ़ से पुतिन को मिले निमंत्रण से बीजिंग हैरत में है। बीजिंग को यह उम्मीद बिल्कुल ही नहीं थी कि यूएस-रूस तनाव इतनी जल्द कम हो पायेगा। पिछले मंगलवार को विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाख़ारोवा की तरफ़ से की गयी टिप्पणी के हवाले से मॉस्को ने चीन के दिमाग़ में चल रही खलबली को शांत करने का प्रयास करते हुए कहा है कि G-7 शिखर सम्मेलन का विस्तार करने को लेकर ट्रंप का प्रस्ताव "सही दिशा में एक क़दम तो है", लेकिन यह "सही मायने में विश्वव्यापी प्रतिनिधित्व प्रदान करने में नाकाम होगा।"

ज़ख़ारोवा ने कहा, "चीन की भागीदारी के बिना वैश्विक महत्व के गंभीर प्रयासों को लागू कर पाना मुश्किल है।"

रूस ख़ुद को G-7 में फिर से शामिल किये जाने से सम्मोहित बिल्कुल ही नहीं दिखता और शायद उसे इस बात को लेकर कोई भ्रम भी नहीं है कि वाशिंगटन इस समय या कभी भी उसके साथ बरबारी का भाव नहीं रख पायेगा। रूस इस बात को अच्छी तरह समझता है कि ट्रंप का यह निमंत्रण चीन को अलग-थलग करने की एक सोची समझी चाल है और एक दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में मॉस्को के साथ रिश्तों को फिर से स्थापित करने को लेकर यह अमेरिका की किसी सुसंगत रणनीति का कोई हिस्सा नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप द्वारा पुतिन को G-7 में आमंत्रित किए जाने के अगले ही दिन, पुतिन ने अपने उस उन्नत परमाणु सिद्धांत के शासनादेश पर हस्ताक्षर कर दिये थे, जो अमेरिका द्वारा पारंपरिक हमले के जवाब में परमाणु हथियारों के उपयोग की अवधारणा पर आधारित है। यह कहते हुए कि पश्चिमी गठबंधन प्रणाली को उजागर करना मॉस्को का एक ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है और अब द्विपक्षीय स्तर पर यूरोपीय देशों के साथ सम्बन्धों के एक नये स्वरूप के लिए दरवाज़ा खुल गया है।

हालांकि, मास्को को पिछले हफ़्ते भी यह बात याद दिलायी गयी है कि यूरोप के साथ उसके रिश्ते में अमेरिकी हस्तक्षेप जारी है, यह इन रिश्तों के बीच की एक बड़ी सच्चाई है। एक प्रस्तावित नये अमेरिकी क़ानून का मक़सद रूस से जर्मनी तक के लिए निर्माणाधीन मेगा नॉर्ड स्ट्रीम 2 प्राकृतिक गैस पाइपलाइन पर प्रतिबंधों का विस्तार करना है और इसके साथ यह भी सच्चाई है कि पाइप-बिछाने वाले रूसी पोत, अकादमिक चर्सकी इस परियोजना को पूरा करने के लिए मुकरान में जर्मन लॉजिस्टिक हब के पास स्थित है।

इसी तरह यह बेहद नामुमिकन सी बात लगती है कि मॉस्को, चीन के साथ अपने गहरे सम्बन्ध को किसी जोखिम के हवाले करेगा। आख़िर में कहा जा सकता है कि रूस और चीन दोनों ही G-7 के समाप्त होने का फ़ायदा उठाने के लिए एक दूसरे के साथ खड़े हैं और अगर ऐसा होता है,तो "पश्चिम" की अवधारणा समकालीन विश्व व्यवस्था में अपने आप ही समाप्त हो जायेगी।

यह कहना काफ़ी होगा कि G-7 का सूरज अस्त होने वाला है। लेकिन, यह सूर्यास्त भी लंबा होगा। इस समूह के शिखर सम्मेलन में लिये जाने वाले अहम फ़ैसले से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और निश्चित रूप से नाटो जैसे दूसरे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की दशा और दिशा दोनों निर्धारित होंगे।

G-7 शिखर सम्मेलन ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों और वित्तीय संस्थानों से सबकुछ एक ही स्थान पर सत्ता को प्रभावित करने वालो के साथ-साथ व्यापार मंच भी प्रदान किया है, जो अपेक्षाकृत कम समय में वास्तविक कामयाबियों को जन्म दे सकता है।

जब सदस्य देश अपने ही तरीक़े से अपनी राह चलने लग जाते हैं, तो ये संगठन बिना पतवार की नाव की तरह हो जाते हैं, मझधार में डांवाडोल होने लगते हैं।

इस पूरे मामले को अलग रखें, तो ट्रंप भी नहीं चाहते कि जी-7 का सूर्यास्त हो, क्योंकि इस सूर्यास्त का साया विश्व मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर पर भी पड़ेगा।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

G7 Walks Towards a Long Sunset

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