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अर्थव्यवस्था
ज़बरदस्त गोता खाती भारतीय अर्थव्यवस्था 
आर्थिक विकास तक़रीबन 23% तक गिर गया है, इस गिरावट ने भारत को दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली अर्थव्यवस्था बना दिया है।
सुबोध वर्मा
01 Sep 2020
अर्थव्यवस्था 

शनिवार को जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, आठ तिमाहियों, यानी दो सालों बाद, पिछले साल की इसी तिमाही के मुक़ाबले इस साल अप्रैल-जून तिमाही में भारत की आर्थिक विकास में नाटकीय रूप से 22.8% की गिरावट आ गयी। पिछली जनवरी-मार्च तिमाही की तुलना में यह संकुचन 23.9% था।

कृषि को छोड़कर अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में यह गिरावट देखी गयी है। विनिर्माण में 39% की गिरावट, निर्माण कार्य में 50%, व्यापार, आतिथ्य और संचार में 47% और खनन और उत्खनन में 23% की गिरावट आयी है। रिकॉर्ड रबी की फ़सल और कोविड-19 की वजह से अचानक ऐलान हुए लॉकडाउन के दौरान फ़सल कटाई के कामकाज को लेकर देर से मिली छूट के बीच कृषि ने 3.4% की वृद्धि दर्ज की है।

जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट से पता चलता है कि आर्थिक विकास 2018 की शुरुआत से ही गिर रहा था और पिछली तिमाही (जनवरी-मार्च 2020) में यह 3.1% के उत्साहहीन स्तर तक कम हो गया था।

अप्रैल-जून की तिमाही में आयी यह गिरावट बिना सोच विचार और जैसे-तैसे लागू किये गये उस देशव्यापी लॉकडाउन का सीधा-सीधा नतीजा है, जो 25 मार्च से शुरू हुआ था और मई तक जारी रहा, जिसके बाद आंशिक ढील का दौर शुरू हुआ। ग़ौरतलब है कि लॉकडाउन को कोविड-19 महामारी के प्रसार पर अंकुश लगाने वाला माना गया था।

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इस गिरावट के साथ ही भारत सरकार को दुनिया की सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे बड़ी आर्थिक गिरावट वाले देश का गौरव भी हासिल हो गया है। जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट में दिखाया गया है, ऑस्ट्रेलिया, रूस और चीन को छोड़कर कुछ देशों के नवीनतम तिमाही आकड़े ज़्यादातर गिरावट को ही दर्शाते हैं। दिसंबर 2019 में पहली बार इस महामारी की चपेट में आने और मज़बूती के साथ इस महामारी से निपटने वाले चीन की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर एक अविश्वसनीय रूप से 3.2% की वृद्धि दर्ज करते हुए पटरी पर लौटते दिखी, जबकि बाकी दुनिया डूब रही थी। ये आंकड़े ओईसीडी से लिये गये हैं।

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लॉकडाउन से तबाह हुई देश की अर्थव्यवस्था

जिस समय लॉकडाउन लगाया गया था, उस समय पूरे देश में कोरोनावायरस के मामले 500 से भी कम थे। जिस तरह से लॉकडाउन लागू किया गया था, उससे साफ़-साफ़ दिख रहा था कि इसे लेकर राष्ट्रव्यापी प्रसारण के ज़रिये ख़ुद प्रधानमंत्री की तरफ़ से जो ऐलान किया गया था, उस ऐलान में 'झटके दिये जाने और चौंकाने' के अलावा कोई तैयारी तक नहीं थी।

इसका नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में सभी आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह अचानक ठप हो गयीं। गृह मंत्रालय को अचानक लगा कि पूरी की पूरी रबी फ़सल खेतों में खड़ी है, पकी हुई है और कटाई के लिए तैयार है, तो 27 मार्च को खेती-बाड़ी से जुड़े कार्यों को हड़बड़ी में फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी गयी। बाद में मछली पकड़ने जैसे कुछ दूसरे ख़ास-ख़ास कारोबार को भी अनुमति दे दी गयी। देर से मिली इन रियायतों ने कृषि क्षेत्र को इस तिमाही में 3.4% की वृद्धि दर्ज करने की स्थिति में ला दिया है।

इस आर्थिक गतिरोध ने सबसे बुरी तरह अनौपचारिक क्षेत्र को प्रभावित किया है। यह याद रखने वाली बात है कि 96% भारतीय इस क्षेत्र (कृषि सहित) में कार्यरत हैं। -23% की मौजूदा नाकारात्मक गिरावट के और नीचे जाने की संभावना इसलिए है, क्योंकि जानकारों के मुताबिक़ इन अनंतिम आंकड़ों में अनौपचारिक विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के आंकड़ों को अभी तक नहीं जोड़ा गया है।

आज का यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं पर भी चौंकाने वाले असर को दिखाता है। निजी ख़र्च में तक़रीबन 27% की कमी आयी है, जो यह दर्शाता है कि परिवार या तो बुनियादी चीज़ों पर ख़र्च करने की हालत में नहीं थे या फिर उनके पास ख़र्च करने के लिए पर्याप्त पैसे ही नहीं थे। यह इसलिए हैरत में डालने वाली बात नहीं है,क्योंकि ज़्यादातर भारतीयों के पास बहुत ही कम बचत होती है और ये लोग ज़िंदा रहने के लिए बहुत हद तक अपनी कमाई पर ही निर्भर होते हैं, हालांकि उनकी तादाद कम हो, ऐसा शायद ही दिखता हैं। क्योंकि निजी अंतिम खपत व्यय जीडीपी का 54.3% हिस्सा है और यह हिस्सा अर्थव्यवस्था का प्रमुख चालक है। पिछले साल की इसी तिमाही में यह ख़र्च जीडीपी का 56.4% था।

इस बीच पिछले वर्ष की इसी तिमाही में सरकारी ख़र्च में तक़रीबन 24% की बढ़ोत्तरी हुई थी। लेकिन, इस बढ़ोत्तरी के बाद भी यह सकल घरेलू उत्पाद का महज़ 18% थी, जो इस बात को दिखाता है कि सरकार ने बड़े पैमाने पर लोगों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था।

सरकार ने ख़र्च में बढ़ोत्तरी के ज़रिये इस संकट में निर्णायक रूप से हस्तक्षेप करने और लोगों के हाथों में पैसा डालने से इनकार कर दिया था, जबकि विकसित और विकासशील दुनिया की कई दूसरी अर्थव्यवस्थायें ऐसा ही कर रही थीं। यह भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली नरेंद्र मोदी सरकार की राजकोषीय नीति की वह आधारशिला है,जिसके नीचे अर्थव्यवस्था आख़िरकार ध्वस्त हो गयी है।

ग्रॉस फ़िक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन की तरफ़ से निवेश को लेकर जो मूल्यांकन किया गया है,जिसके मुताबिक़ इस तिमाही में होने वाले निवेश में क़रीब 48% की गिरावट आयी है, और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी लगभग 29% से घटकर लगभग 20% रह गयी है। पिछले साल के बाद से कॉर्पोरेट संस्थाओं को भारी रियायतें देना और उन्हें बैंक ऋण में ढील देना भी सरकार की नीति के पूर्ण दिवालियापन को दर्शाता है। पिछले साल के कॉरपोरेट टैक्स में कटौती किये जाने से बड़े कारोबारियों को 1 करोड़ 45 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा पहुंचने का अनुमान है। महामारी के दौरान भी इस नीति को जारी रखा गया था और लाखों करोड़ों की अधिकतम कर्ज़ सीमा को इस मासूम यक़ीन के साथ खोल दिया गया था कि होने वाले निवेश से ज़्यादा से ज़्यादा रोजगार पैदा होगा और इस प्रकार डूबती अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकेगा। लेकिन,जैसा कि जीडीपी आंकड़ा साफ़ तौर पर दिखाता है कि ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया है।

संभवतः निर्यात में भी 17% की गिरावट आयी है, जबकि आयात में क़रीब 39% की गिरावट आयी है। ये दोनों महामारी के वैश्विक प्रभाव का एक स्वाभाविक परिणाम हैं।

बेरोज़गारी दर

एक आवधिक नमूना सर्वेक्षण के आधार पर सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी या सीएमआईई की तरफ़ से जुटाये गये आंकड़ों के मुताबिक़, अप्रैल 2020 में बेरोज़गारी की दर लगभग 23% तक बढ़ गयी, जिसके बाद यह जून में लगभग 11% तक की रिकवरी पर पहुंच गयी और अगस्त के अंत में यह 8.3% पर है। यह यह रिकवरी इसलिए हो पायी थी, क्योंकि जून तक ख़रीफ़ सीज़न (ख़ास तौर पर धान) के लिए बुवाई शुरू हो गयी थी और इस तरह,कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को लगने वाले झटके को कम करने वाले क्षेत्र के तौर पर काम किया। चाहे कम ही पारिश्रमिक मिले हों,मगर इस क्षेत्र ने भारी संख्या में लौटे प्रवासी श्रमिकों और ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबों को रोज़गार मुहैया कराया। इससे ‘रोज़गार’में लगे लोगों की संख्या को बढ़ा दिया, हालांकि इससे लोगों के हाथ में ज़्यादा कमाई नहीं आयी। बेरोज़गारी की मौजूदा दर भले ही सामान्य दिखती हो, लेकिन आने वाले दिनों में वास्तव में यह दर बदतर ही होने वाली है।

एक नाउम्मीद वाला भविष्य

आने वाले महीनों के लिए जो संभावनायें दिख रही हैं, वह अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से ख़ुशनुमा नहीं हैं। मांग को फिर से पैदा करने को लेकर कोई नीतिगत बदलाव नहीं किया गया है। बेरोज़गारी पिछले साल के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बनी हुई है। कोई भी ताज़ा निवेश दूर की कौड़ी दिखता है। मझौले और छोटे स्तर के क्षेत्र को तबाह कर दिया गया है और कई महीनों तक यह पटरी पर लौटने से रहा। और जैसा कि इस समय कृषि पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव दिख रहा है, वह लम्बे समय तक चलने वाला नहीं है। 

इस बीच, महामारी भारत में व्यापक प्रभाव के साथ अपना पांव पसारना जारी रखे हुए है। इस समय संक्रमण के कुल 36 लाख से अधिक पुष्ट मामलों और 64,000 से अधिक मौतों के साथ भारत दुनिया में शीर्ष स्थान पर है। और इस सबके बीच या तो प्रचंड महामारी या फिर तबाह अर्थव्यवस्था से निपटने में असमर्थ सरकार अंधेरे में चारों तरफ़ अपने हाथ-पैर मार रही है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Indian Economy Falls of the Cliff

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OECD Data
Economy Shrinks

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