NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
झारखंड : 1 जनवरी को आज भी शोक दिवस के रूप में मनाते हैं कोल्हान के आदिवासी
आज के दिन आदिवासी समाज के लोग अपने अपने घरों और खरसांवां शहीद स्मारक पर इकट्ठे होकर इस दिन हुए सभी शहीदों की स्मृति को नमन  करते हैं।
अनिल अंशुमन
01 Jan 2021
झारखंड

 .... 2021 के 1 जनवरी को इस बार भी झारखंड प्रदेश स्थित कोल्हान क्षेत्र ( पुराना दक्षिण छोटानागपुर ) के आदिवासी समाज के लोग एक दूसरे से न तो ‘ हैप्पी न्यू ईयर’ कह रहे हैं और ना ही कोई जश्न मना रहे हैं। 1 जनवरी भले ही देश – दुनिया के लोगों के लिए उमंग और उत्साह का दिन होता है लेकिन उनके लिए यह भारी शोक का दिवस होता है।

कोल्हान क्षेत्र स्थित खरसांवां – सरायकेला के आलवे पूर्वी व पश्चिम सिंहभूम तथा चाईबासा जिलों के सभी आदिवासी समाज के लोग अपने अपने घरों और खरसांवां शहीद स्मारक पर इकट्ठे होकर इस दिन हुए सभी शहीदों की स्मृति को नमन  करते हैं। हालांकि यह पूरा इलाका हो आदिवासी बाहुल्य है लेकिन यहाँ कई छोटे आदिम जनजाति समुदायों समेत मुंडा – संताल – उरांव आदिवासी समुदाय के सारे आदिवासी 1 जनवरी पूरी सामाजिक एकजुटता के साथ शोक दिवस मनाते हैं । 

सनद रहे कि 1 जनवरी 1948 के दिन ही खरसांवा हाट बाज़ार में आज़ाद देश का पहला भयावह जनसंहार - गोलीकांड हुआ था। जिसमें बच्चे – बूढ़े और महिलाओं समेत सैकड़ों निहत्थे आदिवासियों को आज़ाद देश की पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर मार डाला था । इसे आज़ाद भारत का पहला जलियाँवाला बाग कांड भी सम्बोधन दिया जाता है ।    

 जानकारों के अनुसार उस समय आज़ाद देश में नए सिरे से राज्यों का पुनर्गठन किया जा रहा था और कोल्हान क्षेत्र के खरसांवा – सरायकेला इलाके में बसनेवाले तमाम आदिवासी इस पूरे इलाके को ओड़ीसा राज्य में विलय किए जाने का तीखा विरोध कर रहे थे । पूरा इलाका आदिवासी बाहुल्य होने के कारण उनकी मांग थी कि उन्हें भी एक स्वायत्त अथवा अलग राज्य दिया जाये । बताया जाता है कि उस समय भी अलग झारखंड राज्य का नारा गूंजा था । लेकिन खरसांवा और सरायकेला स्थानीय रियासतों के तत्कालीन राजाओं तथा वहाँ बसे रसूखदार और गैर आदिवासी ओड़िया भाषी समूहों तथा ओड़ीसा सरकार की साँठगांठ से इस पूरे इलाके को जबरन ओड़ीसा राज्य के अंतर्गत शामिल करा लिया । फलतः समस्त आदिवासी समुदाय में इसके खिलाफ तीखा आक्रोश व्याप्त हो गया । वे इसका मुखर विरोध कर तत्कालीन बिहार राज्य में ही रहने अथवा अपने लिए अलग से पृथक राज्य की मांग को लेकर आंदोलित हो उठे । केंद्र तथा ओड़ीसा सरकार के इस फैसले के विरोध में जगह जगह छोटी – बड़ी सभाओं का आयोजन कर गाँव गाँव से लोगों को लामबंद किया जाने लगा।

उसी क्रम में तय हुआ कि जिस 1 जनवरी से ये फैसला लागू होना है उसी दिन खरसांवा हाट में सभी लोग इकट्ठे होकर सभा करेंगे। जिसे विशेष तौर से उस समय देश के प्रख्यात हॉकी खिलाड़ी और आदिवासियों की मुखर आवाज़ जयपाल सिंह मुंडा संबोधित करेंगे । जिसने व्यापक आदिवासियों को इस कदर आंदोलित किया कि कोल्हान क्षेत्र के अलावे आस पास के कई अन्य क्षेत्रों के आदिवासी भी अपने पारंपरिक हथियरों और नगाड़ा – माँदर लेकर हजारों की तादाद में जुटने लगे।

उस दिन खरसांवा का साप्ताहिक हाट बाज़ार भी था। हाट से सटे मैदान में लोग शांतिपूर्ण तरीके से आ आकार सभा में शामिल हो रहे थे। सभा के मंच से आदिवासी गीत – नृत्य और भाषणों का कार्यक्रम जारी था। लेकिन कार्यक्रम के दो दिन पहले से ही खरसांवा राजा के बुलावे पर यहाँ पहुंचे ओड़ीसा सैन्य पुलिस की टुकड़ियों ने पूरे इलाके को छवानी में तब्दील कर पूरे माहौल को तनावपूर्ण बना रखा था।

बताया जाता है कि खरसांवा राजमहल जाने वाले जुड़े मुख्य मार्ग के बीचो बीच स्टेनगन रखकर उसके आगे एक सफ़ेद रखा खींच दी गयी थी और किसी के भी उधर आने जाने पर प्रतिबंध लगा से दिया गया था। हालांकि स्थानीय पुलिस मामले की नज़ाकत और आदिवासियों के मिजाज को जानने समझने के कारण चुपचाप थी और सबकुछ शांतिपूर्वक चल रहा था। लेकिन अचानक ओड़ीसा पुलिस सैन्यबल ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के सभा में जुटी हजारों आदिवासियों की भीड़ पर मशीनगनों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। जिससे देखते ही देखते पूरा हाट बाज़ार निहत्थे आदिवासियों की लाशों और घायलों से पट गया। पूरे इलाके की नाकेबंदी कर गोली से घायल हुए लोगों को इलाज़ तक के लिए नहीं ले जाने दिया गया । यह भी बताया जाता है कि हाट – बाज़ार के बीच में बने विशाल कुंए में ही सभी लाशों और घायलों को डालकर उसे मिट्टी से पाट दिया गया । बाद में लोगों ने इसी कुंआ पर शहीद स्मारक बनाया। जानकार यह भी बताते हैं कि आज़ाद देश में सबसे पहली बार कर्फ़्यू यहीं लगा। इस कांड के विरोध में तत्कालीन संसद में जोरदार हंगामे के कारण सरकार ने एक उच्चस्तरीय जांच कमेटी की घोषणा की थी लेकिन उस कमेटी ने क्या जांच की अथवा क्या निष्कर्ष रिपोर्ट दिया आज तक किसी को कुछ पता नहीं है।

आदिवासी समुदाय में आज भी इस बात का गहरा दर्द है कि जालियाँवाला बाग कांड के दोषी जनरल डायर को तो सामाजिक निंदा और सज़ा तो मिली लेकिन इस कांड के ‘ डायर ’ को साफ बचा लिया गया।                             

आदिवासी भाषा – संस्कृति की वरिष्ठ शोधार्थी इंदिरा बिरुआ भी 1 जनवरी के दिन को अपने समाज के लिए एक काला दिवस मानते हुए मुख्यधारा के इतिहास में खरसांवा गोली कांड के शहीद आदिवासियों का वास्तविक इतिहास नहीं दर्ज़ किए जाने को आदिवासीविरोधी और मानुवादि सोच का परिचायक कहतीं है । उनकी कड़ी आलोचना है कि आज तक किसी भी सरकार ने नयी पीढ़ी के आदिवासी छात्र – युवाओं को उनके पुरखों की संघर्ष गाथा जानने – पढ़ने लायक कोई पुस्तक तक नहीं प्रकाशित कर सकी है ।

1 जनवरी को इस बार भी खरसांवा शहीद स्मारक पर सुबह से शाम तक लोगों का जमावड़ा लगा रहेगा। जहां आकर सभी अश्रुपूरित मन से अपने पुरखा शहीदों को नमन करते हुए फूल और तेल अर्पित करते हैं।

इस बार भी राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यहाँ आकर खरसांवा के शहीदों को श्रद्धांजली दी है। 2017 में तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री रघुवर दास के इस यहाँ आने पर आदिवासी समाज ने भारी विरोध प्रदर्शित करते हुए उन्हें जूते दिखाये थे तो यह स्थल आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया था। लेकिन हेमंत सोरेन सरकार आने के पर पुनः यह स्मारक खोल दिया गया। 

1 जनवरी खरसांवा शहादत दिवस को याद करते हुए इसी क्षेत्र के निवासी तथा झारखंड आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के वरिष्ठ आदिवासी प्रवक्ता प्रेमचंद मुर्मू जी की वर्तमान की हेमंत सरकार से भी काफी पीड़ा है। उनका कहना है कि भले ही झारखंड के आदिवासियों ने पिछली आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार को राज्य की सत्ता से हटा दिया है। लेकिन हेमंत सरकार ने अपने एक बरस शासन के बाद भी आदिवासी समाज के अबुआ राज की आकांक्षाओं को पूरा करने का कोई ऐसा उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है जिससे विश्वास कायम हो। आज भी शासन – प्रशासन का आदिवासी विरोधी नज़रिया और रवैया बदस्तूर जारी है। ऐसे में 1 जनवरी का खरसांवा शहीद कांड तो हमारे पुराने ज़ख़्मों को ही फिर से ताज़ा ही कर जाता है ..... !

Jharkhand
aadiwasi
tribals
Tribal community
Kharsawa Martyr Memorial

Related Stories

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

अमित शाह का शाही दौरा और आदिवासी मुद्दे

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

बाघ अभयारण्य की आड़ में आदिवासियों को उजाड़ने की साज़िश मंजूर नहीं: कैमूर मुक्ति मोर्चा


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License