NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
झारखंड-बिहार: स्थानीय भाषा को लेकर विवाद कहीं महज़ कुर्सी की राजनीति तो नहीं?
“किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति होना संदेह पैदा करता है कि कहीं ये विवाद भी कोई सांप्रदायिक ध्रुविकरण करा कर बुनियादी सवालों को दरकिनार करने के लिए तो नहीं हैं?”
अनिल अंशुमन
22 Sep 2021
Hemant Soren

हाल ही में झारखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा राज्य की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता दिए जाने के सन्दर्भ में भोजपुरी और मगही भाषाओं को लेकर दिए गए बयान पर भाजपा के कड़े ऐतराज के बाद से भाषा विवाद ने सियासी रंग ले लिया है। राज्य सरकार अपने क़दम को ऐतिहासिक बता रही है तो भाजपा इसे राज्य हित के खिलाफ करार दे रही है।  

बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार द्वारा इस सन्दर्भ में की गयी टिप्पणी ने इस भाषा विवाद को और सरगर्म बना दिया है। 20 सितम्बर को पटना में जनता दरबार के बाद पत्रकारों से बात करने के क्रम में उन्होंने हेमंत सोरेन के उक्त बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “बिहार और झारखण्ड एक ही परिवार के सदस्य हैं। दोनों का आपस में गहरा सम्बन्ध है फिर भी पता नहीं कुछ लोग पॉलिटिकली क्या बोलते रहते हैं, समझ में नहीं आता। अगर किसी को इससे लाभ मिलता है, तो वे लाभ लेते रहें लेकिन भाषाओं को सरहदों में ना बांटने का काम ना करें।"

स्थानीय भाषा को लाकर विवाद तब से शुरू हुआ जब पिछले अगस्त माह में हेमंत सोरेन सरकार ने कैबिनेट के फैसले से प्रदेश में तीसरे और चतुर्थ श्रेणी की सभी सरकारी बहालियों के लिए नयी निति लागू करने का ऐलान किया। जिसके तहत इन बहालियों के लिए झारखण्ड स्टॉफ सलेक्शन कमीशन (जेसएससी ) द्वारा ली जानेवाली सभी परीक्षाओं में प्रदेश की 9 जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं के साथ उर्दू, बंगाली और ओड़िया भाषा में कम से कम 30 % नम्बरों को मेरिट लिस्ट में आने के लिए अनिवार्य बनाया गया है। हिंदी और संस्कृत को इससे बाहर रखा गया है। जिसका विरोध इस क़दर बढ़ा है कि पूरा मामला अब ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ विवाद का रूप ले लिया है।

राज्य सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए प्रदेश में रहने वाले भोजपुरी और मगही भाषियों ने अपनी भाषाओं को भी स्थानीय में शामिल करने की मांग उठायी है। तर्क दिया जा रहा है कि राज्य के पश्चिमी क्षेत्र में यूपी और बिहार की सीमा से सटे पलामू प्रमंडल के जिलों के अधिकांश स्थानीय निवासियों की भाषा भोजपुरी है तथा उत्तरी छोटानागपुर के कई जिलों में बहुत से स्थानीय लोग मगही बोलते हैं। 

हेमंत सोरेन सरकार के इस फैसले का प्रदेश भाजपा शुरू से ही विरोध कर रही है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता ने हिंदी व संस्कृत को हटाये जाने तथा उर्दू को शामिल किये जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि नयी नीति एक समुदाय के तुष्टिकरण को बढ़ावा देती है और एक समुदाय के साथ भेदभाव दर्शाती है। जबकि वरिष्ठ भाजपा नेता व पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार के फैसले को झारखण्ड विरोधी करार दिया है।

भोजपुरी और मगही को झारखण्ड की स्थानीय भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग ने इस क़दर तूल पकड़ा है कि अन्ततोगत्वा हेमंत सोरेन को मीडिया के माध्यम से कहना पड़ा है कि भोजपुरी और मगही झारखण्ड की स्थानीय नहीं बाहर से लायी गयीं और बिहार की भाषाएं हैं। जो लोग ये भाषाएं बोलते हैं वे दबंग व्यक्तित्व के निवासी हैं और यहां के स्थानीय लोग बहुत कमज़ोर हैं। इसलिए बहुत स्वाभाविक है कि जो मजबूत होता है उसके पैर के नीचे सभी को रहना पड़ता है। सो इनके प्रभाव में आकर तथा इनके जैसा बनने के चक्कर में कुछ लोग इनकी भाषा भी बोलने लागे है। लेकिन पूरे ग्रामीण क्षेत्रों में व गांवों में ये भाषाएं कहीं भी अस्तित्व में नहीं हैं। ये बिहार की भाषाएं हैं, झारखण्ड की नहीं तो अब झारखण्ड का बिहारीकरण क्यों ? भावुक अंदाज़ में हेमंत सोरेन ने तो यह भी कह डाला है कि जब झारखण्ड अलग राज्य गठन का आन्दोलन होता था तो उस समय आन्दोलनकारियों की छाती पर पैर रखकर और महिलाओं की इज्ज़त लूटते समय भोजपुरी भाषा में गालियां दी जाती थीं। जो आज भी यहां के आन्दोलनकारी और प्रत्यक्ष भुक्तभोगी रहे हैं, भूले नहीं हैं। झारखण्ड अलग राज्य की जंग भोजपुरी अथवा मगही भाषा की बदौलत नहीं बल्कि यहां की आदिवासी और क्षेत्रीय झारखंडी भाषाओं की बदौलत लड़ी गयी थी।

हालांकि हेमंत सोरेन ने यह भी सफाई दी है कि हम भोजपुरी और मगही की कोई उपेक्षा नहीं कर रहें हैं।  बल्कि जिलावार ढंग से स्थानीय तौर पर मान्यता देने का फैसला ले चुके हैं। इसे लेकर भाजपा अथवा अन्य किसी की अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। 

दूसरी ओर, बिहार में इस प्रकरण में काफी तीखी प्रतिक्रयायें आ रहीं हैं। 17 सितम्बर को पटना में जदयू के एक वरिष्ठ सांसद की अध्यक्षता में हुई भोजपुरी व मगही साहित्यकारों तथा समाजसेवियों की बैठक में हेमंत सोरेन के विवादित बयान पर गहरी आपत्ति जताई गयी है। 

स्थानीय भाषा को लेकर जारी सियासी जंग में झारखण्ड के जनजातीय व क्षेत्रीय भसहोन के साहित्यकार और बौद्धिक जन हेमंत सोरेन के क़दम की तो पुरज़ोर सराहना कर रहें हैं, लेकिन राज्य गठन के 20 बरस बीत जाने के बाद भी यहां की स्थानीय भाषाओं की निरंतर हो रही उपेक्षा से भी काफी क्षुब्द्ध हैं। 

प्रदेश की प्रमुख क्षेत्रीय भाषा खोरठा के वरिष्ठ शिक्षाविद और रचनाकार डा. बी एन ओहदार ने बेहद क्षोभ भरे अंदाज़ में कहना है कि पिछले 40 वर्षों से यहां सिर्फ भाषा के नाम पर वोट की राजनीति होती रही है। हर सत्ताधारी दल और उसके नेता स्थानीय भाषाओं का मुद्दा उछालकर अपनी कुर्सी हासिल करने का मुहरा बनाते हैं। जैसे बिहार के सत्तासीन दल व नेताओं को वहां की भोजपुरी व मगही आदि भाषाओं की कोई चिंता नहीं रहती है, तो इधर झारखंड में भी यहां के सत्ताधारी दल व नेताओं को भी यहां की जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं की कभी चिंता नहीं रही है। इनके व्यापक पठन पाठन और विकास के लिए आज तक कोई ठोस कार्ययोजना तक नहीं बनायी जा सकी है। ये तो हमारा दुर्भाग्य ही है जैसे बंगाल में बंगला और पंजाब में गुरुमुखी भाषायें अपने राज्य की पहचान बनी हुए हैं, झारखण्ड में आज तक किसी भाषा को वह सम्मान नहीं मिल सका है। झारखंडी स्थानीय भाषाओं की दुर्गति का एक नमूना ही है कि झारखण्ड राज्य  गठन के आन्दोलन का बौद्धिक केंद्र माना जानेवाले रांची विश्वविद्यालय स्थित पीजी टीआरएल विभाग, जहां 9 झारखंडी भाषाओं की एकसाथ पढ़ाई होती थी, भजापा शासन में उसे तोड़कर हर भाषा को अलग अलग कर दिया गया है। पिछले 25 वर्षों से यहां की भाषाओं के शिक्षकों की स्थायी बहाली तक नहीं हो सकी है।

झारखण्ड जन संस्कृति मंच के प्रदेश संयोजक और युवा आदिवासी चिन्तक जेवियर कुजूर का कहना है कि किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति होना संदेह पैदा करता है कि कहीं ये विवाद भी कोई सांप्रदायिक ध्रुविकरण करा कर बुनियादी सवालों को दरकिनार करने के लिए तो नहीं हैं?

Hemant Soren
Jharkhand government
Nitish Kumar
Bihar

Related Stories

बिहार: "मुख्यमंत्री के गृह जिले में दलित-अतिपिछड़ों पर पुलिस-सामंती अपराधियों का बर्बर हमला शर्मनाक"

बिहारः भूमिहीनों को ज़मीन देने का मुद्दा सदन में उठा 

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध

झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना

शर्मनाक: वोट नहीं देने पर दलितों के साथ बर्बरता!

नीतीश सरकार ने एससी-एसटी छात्रवृत्ति फंड का दुरूपयोग कियाः अरूण मिश्रा

झारखंड:  टाना भगत आदिवासियों ने राजभवन पर किया प्रदर्शन, सरकार पर लगाया उपेक्षा का आरोप

जातीय जनगणना: जलता अंगार

विश्व आदिवासी दिवस पर उठी मांग, ‘पेसा कानून’ की नियमावली जल्द बनाये झारखंड सरकार

बिहार: मुखिया के सामने कुर्सी पर बैठने की सज़ा, पूरे दलित परिवार पर हमला


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License