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लाइफ लाइन बनी डेंजर लाइन, श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में 48 घंटे में नौ लोगों की मौत
सरकार भले ही यात्रियों को ज़रूरी सुविधाओं के साथ अपने गृह नगर लाने का दावा कर रही हो, लेकिन इन रेलगाड़ियों में सफ़र कर रहे लोग कई दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, प्रवासी श्रमिकों की मौत का सिलसिला लगातार जारी है।
सोनिया यादव
28 May 2020
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‘देश की लाइफ लाइन’ कहे जानी वाली भारतीय रेल फिलहाल प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षित घर वापसी में एक चुनौती बनी हुई है। कभी रास्ता भटक जाना तो कभी यात्रा के दौरान हो रही मौतें लगातार रेल प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। ख़बरों के मुताबिक लगभग 40 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें अपने गंतव्य स्थान की बजाय कहीं और पहुंच गई तो वहीं पिछले 48 घंटों में इन ट्रेनों में सफर कर रहे कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई। हालांकि इस संबंध में रेलवे का कहना है कि जिन लोगों की मौत हुई है उसमें ज़्यादातर लोग गंभीर बीमारियों से ग्रसित थे और बड़े शहरों में इलाज कराने गए थे।

क्या था पूरा मामला?

अलग-अलग राज्यों में फंसे हुए लाखों प्रवासी मज़दूरों को सरकार स्पेशल ट्रेन के जरिये जरूरी सुविधाओँ के साथ अपने गृह नगर लाने का दावा कर रही है, लेकिन इन रेलगाड़ियों में प्रवासी श्रमिकों की मौत का सिलसिला लगातार जारी है।

बुधवार 27 मई को आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव के सहयोगी संजय यादव ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा कि “छोटे बच्चे को मालूम नहीं की जिस चादर के साथ वो खेल रहा है वो हमेशा के लिए मौत की गहरी नींद सो चुकी उसकी मां का कफ़न है। चार दिन ट्रेन में भूखे-प्यासे रहने के कारण इस मां की मौत हो गई। ट्रेनों में हुई इन मौतों का जिम्मेवार कौन?”

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मासूम बच्चे का दिल दहला देने वाला वीडियो

संजय यादव द्वारा ट्वीट किए वीडियो में एक मृत महिला का शव पड़ा दिखाई रहा है और दो साल का बच्चा उस मृत शरीर पर पड़ी चादर हटा कर उससे खेल रहा है। ये वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। जिसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, वीडियो लिए जाने तक इस महिला की मौत हो चुकी थी। उनका नाम अरवीना खातून (35) था और वह कटिहार की रहने वाली थीं। अरवीना खातून 23 मई को अहमदाबाद से अपने दो बच्चों और बहन-बहनोई के साथ कटिहार के लिए निकली थीं। सोमवार दोपहर करीब 12 बजे ट्रेन में उन्होंने दम तोड़ दिया।

ट्रेन मुजफ्फरपुर जंक्शन पर दोपहर लगभग तीन बजे पहुंची तब रेलवे पुलिस ने महिला का शव ट्रेन से उतारा। महिला के शव को जब प्लेटफॉर्म पर रखा गया तब उनका ढाई साल का बच्चा शव से चादर खींचते हुए उन्हें जगाने की कोशिश करने लगा।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में महिला के भूख प्यास से मरने की ख़बर सामने आने के बाद, PIB ने अपनी पड़ताल में बताया कि ये दावे झूठे हैं। पीआईबी ने बताया कि महिला बीमार थी और इस वजह से उसकी मौत हुई है, भूख-प्यास से नहीं।

रेलवे ने भी भूख से मौत होने की बात से इनकार किया है। जीआरपी के डिप्टी एसपी रमाकांत उपाध्याय ने कहा, ‘यह घटना 25 मई की है। महिला अहमदाबाद से आ रही थी। महिला की मधुबनी में मौत हो गई। उसकी बहन ने बताया कि अचानक ही महिला की मौत हो गई।’

लगातार हो रही मौतें

भीषण गर्मी और खाना नहीं मिलने से बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर स्टेशन पर सोमवार, 25 मई को ही एक और ढाई साल के एक बच्चे की मौत का मामला भी सामने आया है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, मृतक बच्चे के परिजनों का कहना है कि भीषण गर्मी के कारण और ट्रेन में खाना-पानी नहीं मिलने के कारण बच्चे की हालत काफी बिगड़ गई और उसने स्टेशन पर ही दम तोड़ दिया।

मकसूद आलम का आरोप है कि उन्होंने मदद के लिए पुलिस और स्टेशन पर मौजूद जिला प्रशासन के अधिकारियों से संपर्क कर बच्चे के इलाज की गुहार लगाई लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी।

उनका कहना है कि वह स्टेशन पर चार घंटे तक मदद के लिए भटकते रहे लेकिन घर जाने के लिए गाड़ी के साधन की भी किसी ने जानकारी नहीं दी और आखिरकार उनके बच्चे ने स्टेशन पर ही दम तोड़ दिया।

बिहार पहुंची ट्रेन में दो लोगों की मौत

कटिहार के उरेश खातून की मौत सूरत-पूर्णिया ट्रेन में हुई। उनका शव बिहार के मानसी में ट्रेन से उतारा गया। उरेश खातून की मौत पर रेलवे ने कहा, ‘हार्ट ऑपरेशन के बाद 22 मार्च को इन्हें पेसमेकर लगा था और अस्पताल से ये 24 मई को घर आई थीं। ट्रेन जब बेगुसराय में थी तब ये मृत मिली थीं।’

इसके बाद बिहार के ही दानापुर में 70 वर्षीय वशिष्ठ महतो का शव मुंबई-दरभंगा ट्रेन से उतारा गया। उन्हें दिल की बीमारी थी। महतो मुंबई में उपचार के बाद अपने परिवार के साथ लौट रहे थे। मैहर और सतना के बीच उनकी मौत हो गई।

वाराणसी रेलवे स्टेशन पर मृत पाए गए दो प्रवासी श्रमिक

बुधवार, 27 मई सुबह वाराणसी रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन में दो प्रवासी श्रमिक मृत पाए गए। उत्तर-पूर्वी रेलवे के प्रवक्ता अशोक कुमार के अनुसार ट्रेन मुंबई में लोकमान्य तिलक टर्मिनस से वाराणसी के मंडुआडीह स्टेशन पहुंची थी। उनमें से एक की पहचान उत्तर प्रदेश के जौनपुर निवासी दशरथ प्रजापति (30) के तौर पर हुई। वे दिव्यांग थे और मुंबई में किडनी संबंधी परेशानी का उन्होंने उपचार कराया था।
मीडिया खबरों के मुताबिक मृत दिव्‍यांग दशरथ जौनपुर के बदलापुर निवासी थे। वह अपने भाई लालमणि प्रजा‍पति के साथ मुंबई में पैसे कमाने के लिए गए थे। भाई के साथ घर वापसी के दौरान भीषण गर्मी व भूख-प्‍यास के चलते प्रयागराज में उसकी तबीयत बिगड़ गई थी। ट्रेन के मंडुआडीह स्‍टेशन पहुंचने पर भाई ने दशरथ को जगाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं उठे।

वाराणसी जीआरपी ने दोनों मृत व्यक्तियों की पहचान दशरथ प्रजापति और रामरतन रघुनाथ के तौर पर की। पुलिस ने बताया कि दशरथ प्रजापति को किडनी की दिक्कत थी और रघुनाथ को कई बीमारियां थीं।

बलिया और कानपुर में भी उतारा गया शवों को

बिहार के सारण में रहने वाले भूषण सिंह की मौत बलिया पहुंचने पर हुई। भूषण सूरत से ट्रेन पर सवार हुए थे। कानपुर पहुंची झांसी-गोरखपुर ट्रेन में भी दो लोग मृत पाए गए। अधिकारियों ने इनमें से एक व्यक्ति की पहचान राम अवध चौहान के रूप में की है।

क्या कहना है रेलवे का?

रेलवे प्रवक्ता ने ट्वीट कर कहा कि ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में कुछ मौतें सामने आई हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग गंभीर बीमारियों से ग्रसित थे और बड़े शहरों में इलाज कराने गए थे।’

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गौरतलब है कि रेलमंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक वीडियो को ट्वीट करते हुए लिखा कि देखिए भारतीय रेलवे प्रवासियों का समर्थन करने के लिए ट्रेन संचालन के दौरान कैसे विशेष ध्यान रख रहा है। सोशल डिसटेंसिंग, थर्मल स्कैनिंग, खाद्य पैकेट वितरित करने से लेकर स्वच्छता बनाए रखने तक रेलवे सभी के लिए एक आरामदायक और सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित कर रहा है। लेकिन लगातार परेशानियों कर सामना कर रहे श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में सवार लोग कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में सवार लोग क्या कहते हैं?

इन ट्रेनों में सफर कर रहे लोगों का कहना है कि खाने-पीने के सामान के साथ ही ट्रेन की बोगियों में साफ-सफाई की भी तमाम दिक्कतें सामने आ रही है। शिकायत के बावजूद प्रशासन किसी प्रकार के सहयोग को तैयार नहीं है तो वहीं ट्रेनों के कई-कई घंटे देरी से चलने की वजह से लोगों का हाल इस गर्मी में बेहाल हो गया है।

दिल्ली से बलिया पहंचे एक श्रमिक यात्री ने न्यूज़क्लिक को बताया, “ट्रेन में चढ़ते समय हमें पानी की बोतले दी गईं और कहा गया की कानपुर के आगे खाने की व्यवस्था होगी। लेकिन कानपुर बीत गया मगर खाने को कुछ नहीं मिला, इसके बाद कहा गया कि इलाहाबाद में खाना मिलेगा, वहां सिर्फ बिस्कुट बांट दिए गए। इतनी गर्मी में पानी सिर्फ एक बार मिला ट्रेन में। इसके अलावा बहुत शोर मचाने पर बनारस में पूड़ी-सब्जी मिली लेकिन वो भी सभी को नहीं मिल पाई। भूखे-प्यासे हालत खराब हो गई हमारी।”

एक अन्य यात्री बताते हैं, “हमारी ट्रेन को स्टेशन के ऑउटर पर घंटों रोक-रोक कर लाया गया। 18-19 घंटे के सफर में लगभग 50 घंटे का समय लग गया। ऊपर से बाथरूम की हालत भी बहुत खराब थी। हमें नहीं लगता की कहीं बीच में रोककर कोई सफाई हुई होगी। गर्मी में कई-कई बोगियों के पंखे तक नहीं चल रहे। मज़बूरी न होती तो इस हालत में कभी न आते।”

मज़दूरों को इस हालात के लिए मजबूर किया गया

सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार ऋचा सिंह कहती है “जब लॉकडाउन शुरू हुआ था, तब सरकार की कोई तैयारी नहीं थी। सरकार को शायद ये तक पता नहीं था कि हमारे देश में कितने प्रवासी मज़दूर हैं। इसलिए जब इन लोगों के पास थोड़े पैसे थे और संक्रमितों की संख्या कम थी तब सरकार ने इनके लिए कोई खास व्यवस्था नहीं की लेकिन अब जब मामले बढ़ गए हैं, इनके पास कोई पैसा नहीं बचा तो जाहिर है इंसान के सब्र का बांध टूट ही जाएगा। तो बस अब सरकार इन्हें भेज रही है। हालांकि अभी भी कोई ठोस प्लान नहीं है सरकार के पास, सियासत ज्यादा है। आज मज़दूरों के जो हालत हैं, वो भूखे-प्यासे हैं, बिमारियों से जुझ रहे हैं तो इसके लिए सरकार जिम्मेवार है जिसने उन्हें इस हालात के लिए मजबूर किया है।”

इसे भी पढ़ें : कोरोना संकट: प्रवासी मज़दूरों का कोई देस नहीं है महाराज!

बता दें कि बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है यानी 25 मार्च 2020 से लेकर 20 मई तक रोज औसतन चार मज़दूरों की मौत हो रही है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार लॉकडाउन के बाद सड़क हादसों और सेहत बिगड़ जाने से 20 मई तक कुल 208 मज़दूरों की मौत हो चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स से पता चला है कि लॉकडाउन के बाद से 42 सड़क हादसे, 32 मेडिकल इमर्जेंसी और पांच ट्रेन हादसे हुए हैं जिनमें सैकड़ों मज़दूरों की जान गई। ये आंकड़े वो हैं जो रिपोर्ट किए गए हैं। इसके अलावा पता नहीं कितने ऐसे मामले होंगे जो रिपोर्ट ही नहीं हो पाए हैं।

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