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भारत
राजनीति
मखौल बनाना काफ़ी नहीं, झूठ के सांड़ को सींग से पकड़ना होगा!
असल मुद्दा इस झूठ की मारकता और उसके असर की सांघातिकता है। इसे महज़ मज़ाक बनाकर या कुछ समझदारों के बीच बैठ, झूठ बोलने वाले की खिल्ली उड़ाकर या उसकी लफ़्फ़ाज़ी और थेथरई पर अपना सर पीटकर, अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसके बहुत खतरनाक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। 
बादल सरोज
22 Jul 2021
Modi and Shah

"ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई" सरकार ने संसद में सीना तानकर बोला। "पेगासस से जासूसी! हमे नहीं पता कब, किसने, क्यों और किसकी कराई," सरकार का हर बड़कू और छुटकू नेता यही जवाब रटने में लगा है। इस जासूसी के कालखण्ड में सूचना प्रौद्योगिकी के मंत्री रहे नकफुले जी ने कहा कि "आतंकवाद से बचाव के लिए किये गए उपायों पर संसद में चर्चा करना देशहित में नहीं!" मतलब? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज, खुद मोदी के मंत्री, दो चार महामहिम और गोगोई पर यौन दुराचरण का आरोप लगाने वाली स्त्री आतंकवादी मामलों में संदिग्ध थे?

आप चौंकते रहिये इन झूठों पर - उन्हें इनकी कारगरता पर पक्का भरोसा है। तभी तो ज़रा सी बारिश में ही घुटनों-घुटनों डूबी वाराणसी में मोदी जी "यूपी के यशस्वी, ऊर्जावान और कर्मठ मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ जी" का गुणगान और स्तुति करते हुए उनकी ऐसी-ऐसी "उपलब्धियां" गिना रहे थे कि बेचारे बाबा जी खुद शर्मा के लालमुखी हो जाएं। 

झूठ की पैदावार अपरम्पार है; ताज्जुब नहीं होगा यदि इन हजार-आठ सौ शब्दों के लिखे जाने के दौरान ही दर्जन भर नये झूठों की खरपतवार उग आये।

अमरीका ने जिस तरह ट्रम्प के झूठों की फेहरिश्त बनाई थी, उस तरह की कोशिश यदि इनके सर्वेसर्वा मोदी जी और उनके वैचारिक कुल कुटुम्ब के मामले में की जाए तो एक भरापूरा विश्वकोश— एनसाइक्लोपीडिया— तैयार किया जा सकता है। मोदी जी का एक बड़ा योगदान झूठ की श्रेणियों में एक नयी श्रेणी जोड़ने का है। प्रचलित मुहावरों में अब तक झूठ की तीन बड़ी श्रेणियां हुआ करती थीं; झूठ, सफ़ेद झूठ और आंकड़ों का झूठ- सत्ता पर बैठे मौजूदा गिरोह ने चौथी और नयी श्रेणी जोड़ी है; मोदी झूठ । जब भी सम्बोधन करते हैं तो बिना कोई झूठ बोले उसे खत्म नहीं करते हैं। मौके की नजाकत को देखकर उसका आकार प्रकार भले कम ज्यादा या ज़्यादा ही ज्यादा हो जाये मगर झूठ के बिना उन्होंने आज तक कोई भी भाषण नहीं दिया। वैसे असल में तो मुद्दा यह नहीं है। 

मुद्दा यह भी नहीं है कि कोई इतने धड़ल्ले से झूठ कैसे बोल सकता है। वह झूठों और अर्ध झूठों की नयी नयी किस्मों की खोज में सिद्धहस्त और माहिर हैं। दुनिया में उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता है। अक्सर इनके इस हुनर की तुलना गोयबल्स जैसे इनके उस्तादों से की जाती रही है- मगर अब गुरु गुड़ ही रह गए चेले शक्कर हो गए हैं। 

असल मुद्दा इस झूठ की मारकता और उसके असर की सांघातिकता है। इसे महज मजाक बनाकर या कुछ समझदारों के बीच बैठ, झूठ बोलने वाले की खिल्ली उड़ाकर या उसकी लफ़्फ़ाज़ी और थेथरई पर अपना सर पीटकर, अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसके बहुत खतरनाक प्रभाव होते हैं। 

कहते हैं कि सच जब तक अपने जूतों के फीते ही बांध रहा होता है तब तक झूठ आधी दुनिया तय कर चुका होता है। ख़तरा सिर्फ यह नहीं है कि कुछ समय के लिए लोग झूठ को ही सच समझ लेते हैं। ज्यादा बड़ा खतरा यह है कि इसकी बारम्बारता और निरंतरता के चलते धीरे-धीरे लोग झूठ की पहचान करने का शऊर और विवेक ही खो बैठते हैं। भारतीय समाज के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है किन्तु अब तक के लिखित इतिहास में सम्पूर्ण समाज के विवेक पर झूठ का इतना तेज, सुसंगठित और सुनियोजित, चौबीस घंटा सातों दिन बिना रुके बिना थके चलने वाला हमला इसके पहले कभी नहीं हुआ। कारपोरेट के साथ साझेदारी के चलते इसकी गति और वाचालता ही नहीं संहारक रेडियोधर्मिता भी बढ़ी है और जैसा कि हिरोशिमा, नागासाकी बरास्ते भोपाल से चेर्नोबिल तक के प्रभावों में दुनिया ने देखा है; रेडियोधर्मिता जब निर्बाध गति से फैलती है तो उसके दुष्प्रभाव वर्तमान के भुक्तभोगियों तक सीमित नहीं रहते। इसके नतीजे अगली कुछ पीढ़ियों को भी भुगतने पड़ते हैं; लम्हों की खता के लिए सदियों को सजा सहनी पड़ती है। 

हाल के दिनों में इस झूठ को अत्यंत व्यवस्थित रूप से देश भर में फैलाने के लिए सिर्फ गोदी मीडिया को ही भेड़िया नहीं बनाया गया, आईटी सैल नाम का सर्वभक्षी डायनॉसोरास भी पालपोस कर बड़ा किया गया। गली मोहल्ले और गांव बस्ती तक पूजास्थलों से लेकर संस्थानों तक विराजे निकर से फुलपैंट हुए लोग इस झूठ की होम डिलीवरी के काम में मुस्तैदी से डटे हैं। यह मानकर चलना कि इस सबका कोई असर नहीं होता और अंतिम विजय तो सत्य की होगी, यह अपने आपको धोखा देना है। जहर का असर बहुत धीमा होता है। यह तो विषाक्तता की जबर डोज है; इसका असर होना था और हुआ है। इस झूठे और गढ़े हुए नैरेटिव ने असली मुद्दों को पीछे धकेला है। जनता के बड़े हिस्से, मध्यमवर्गीय तबकों को खासकर, विवेकहीन बनाया है। सामाजिक सरोकारों के मायने और मानवीय मूल्य तथा संवेदनाएं यहां तक बदल दी कि इन्ही शासकों की नीतियों से बर्बादी और विनाश झेल रहे उत्पीड़ितों के हिस्से भी इस सत्ता समूह के झूठे नैरेटिव के समूह गान के कोरस का हिस्सा बना चुके हैं। 

इसे किसी शायर के कलम "दोपहर तक बिक गया बाज़ार का हर एक झूठ और मैं एक सच को लेकर शाम तक बैठा रहा" जैसी नियति मानकर चलना कतई ठीक नहीं होगा। इसका मुकाबला करना होगा - पूरी शिद्दत और जिद के साथ झूठ और कुत्सा के इस सांड़ को पूंछ से नहीं बल्कि सींगों से पकड़ना होगा। सिर्फ खंडन करने से यह काम नहीं होगा - सिर्फ डीटॉक्सीफिकेशन करना काफी नहीं होगा। खंडन के साथ उन मूल्यों और सरोकारों का मंडन भी करना होगा जिनसे विवेक की बहाली होती है। समझने और विश्लेषण करने की प्रतिरोधात्मक क्षमता विकसित होती है। यह काम अलग से फुरसत में किया जाने वाला काम नहीं है। यह प्राथमिकता से और साथ-साथ किया जाने वाला काम है। 

क्या इसे किया जा सकता है? 

निस्संदेह किया जा सकता है। झूठ की महाकायता, कारपोरेटजीविता के चलते उसकी बढ़ी-चढ़ी सामर्थ्य का भी मुकाबला संभव है। जिस तरह पूंजी के सर्वग्रासी सर्वनाशी केन्द्रीकरण का मुकाबला मेहनतकश जनता की बिखरी और विभाजित, असंबद्ध और कमजोर दिखती अनेकानेक धाराओं को आपस में संयुक्त करके किया जाता है वैसे ही इस कार्पोरेटी हिन्दुत्व के झूठ की अश्वमेध यात्रा के घोड़ों को नाथा जा सकता है। इतिहास में ऐसा हुआ है। यह कहानी भर नहीं है कि एक नादान बच्चा तक राजा को नंगा साबित कर सकता है। इस प्रसंग में सिर्फ दो ही उदाहरण काफी हैं; सत्तर के दशक में जब भारतीय लोकतंत्र पर पहला बड़ा ग्रहण पड़ा था तब बाकी सब कुछ के साथ छोटी छोटी पत्रिकाओं ने उसे खण्डित कर विमर्श का मुख मोड़ा था। इमर्जेन्सी के काल में हाथ से लिखकर साइक्लोस्टाइल कराये गए पर्चों ने सन्नाटा तोड़ा था। अस्सी और नब्बै के दशक में जब धर्मान्धता की चादर ओढ़ कर साम्प्रदायिकता की विषबेल पनपी थी तब बाकी सबके अलावा सहमत जैसे संगठनों ने उसकी बढ़त का प्रतिवाद करने में अहम भूमिका निभाई थी। इन दिनों, जिस जगह आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं उस सहित अनेक वेबसाइट्स खण्डन-मण्डन का यही काम कर रहे हैं। 

भविष्य में भी ऐसा होगा, मगर अपने आप नहीं होगा। करना पड़ेगा। 

हाल के दिनों में, खासकर पिछले 8 महीनो में किसान आंदोलन ने इसे बहुत खूबी से किया है। मजदूरों, खेत मजदूरों सहित मेहनतकश जनता के बाकी हिस्सों को भी इस किसान आंदोलन ने ऊर्जा दी है। उन्हें आपस में जोड़कर ऊर्जापुंज बनाने की ओर कदम बढ़ाये हैं। किन्तु सिर्फ इतना पर्याप्त नहीं है। इसे और तेज तथा विकेन्द्रित करने की जरूरत है - ख़ुशी की बात है कि छात्र, युवा, महिला और बौद्धिक समुदायों के एक बड़े हिस्से ने रणभूमि में हुए इस बदलाव का संज्ञान लिया है और उसके मुताबिक़ अपनी जद्दोजहद को भी अद्यतन किया है। उसकी तासीर निखारी है, तेवर बदले हैं। 

सच है कि झूठ के पांव नहीं होते मगर ज्यादा बड़ा सच यह है कि बड़े से बड़ा झूठ भी रोशनी की छोटी से छोटी किरण से घबराता है। तीली सुलगाइये, शमा जलाइये, जुगनू बनिये, अंधेरा भाग खड़ा होगा। 

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