NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विज्ञान
भारत
नए अध्ययन के मुताबिक हड़प्पावासी न सिर्फ मांसाहारी थे, बल्कि गोमांस उनका पसंदीदा भोज्य पदार्थ था!
शोध टीम ने पाँच हड़प्पा के विभिन्न स्थलों से 172 मिट्टी से बने बर्तनों के टुकड़ों को बरामद कर उन पर मौजूद वसा अवशेषों का विश्लेषण किया है।
संदीपन तालुकदार
11 Dec 2020
नए अध्ययन के मुताबिक हड़प्पावासी न सिर्फ मांसाहारी थे, बल्कि गोमांस उनका पसंदीदा भोज्य पदार्थ था!
राखीगढ़ी। | चित्र साभार: अर्कियोलोजी.विकी 

एक हालिया जारी किये गए अध्ययन में कहा गया है कि सिन्धु घाटी के लोग मांस के शौक़ीन थे और यह उनके भोजन का एक बड़ा हिस्सा हुआ करता था। इससे भी बड़ी बात यह है कि घाटी के निवासियों के बीच में अन्य प्रकार के मांस से अधिक गोमांस के उपभोग को प्राथमिकता दी जाती थी। ये निष्कर्ष 9 दिसंबर को जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस में प्रकाशित एक नए अध्ययन में, जिसका शीर्षक ‘उत्तरपश्चिमी भारत में सिन्धु घाटी की सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों में वसा अवशेष’ है, में निकलकर आये हैं। 

जैसा कि इसके शीर्षक से पता चलता है, शोधकर्ताओं ने सिन्धु घाटी सभ्यता के दौरान इस्तेमाल में लाये जाने वाले मिट्टी के बर्तनों में मौजूद वसा (कोशिकाओं के तत्वों) के अवशेषों का अध्ययन किया था। इस कालखण्ड को विशेष रूप से विकसित हड़प्पा काल (2600/2500 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व) के तौर पर जाना जाता है। इस अध्ययन का मकसद वसा अवशेषों के विश्लेषण के जरिये हड़प्पा वासियों की भोजन की आदतों की गहराई से जाँच-पड़ताल करने से था।

यह अध्ययन भारत में बसे पांच गाँवों पर केन्द्रित था जो कि कभी इस सभ्यता के हिस्से के तौर पर थे, जिनमें आलमगीरपुर (यूपी), मसूदपुर (हरियाणा), लोहारी राघो (हिसार), खनक (भिवानी, हरियाणा), राखीगढ़ी (हरियाणा) और फरमाना (रोहतक, हरियाणा) थे। शोधकर्ताओं के दल ने इन इलाकों से 172 मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े बरमाद किये थे और उनपर मौजूद वसा अवशेषों के विश्लेषण को संचालित करने का काम किया था।

प्राचीन मानव की भोजन की आदतों का पता लगाने के लिए मिट्टी के बर्तनों में मौजूद वसा विश्लेषण का काम एक शक्तिशाली औजार साबित हुआ है, जिसे दुनियाभर में कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अध्ययनों में इस्तेमाल में लाया जाता है। अध्ययन के अनुसार “पुरातात्विक उत्खनन के दौरान प्राचीन एवं ऐतिहासिक दक्षिण एशियाई स्थलों की खुदाई से बरामद किये गये मिट्टी के बर्तन सर्वव्यापी प्राचीनतम कलाकृतियों में से एक हैं।”

इस अध्ययन में खेती करने के दौरान इस्तेमाल में लाये जाने वाले पौध उत्पादों की जैव विविधता एवं क्षेत्रीय भिन्नताओं को भी ध्यान में रखा गया है। इसके अनुसार इस काल में गर्मियों और सर्दियों में पैदा होने वाली दोनों ही प्रकार फसलों को उगाया जाता था।

यह अध्ययन उक्त अवधि में इन क्षेत्रों में रह रहे लोगों की खानपान की आदतों के एक महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालता है। इसमें कहा गया है कि “घरेलू पशुओं में से गाय-बैल/भैंस की संख्या काफी प्रचुर मात्रा में हुआ करती थी, क्योंकि औसतन 50% से 60% तक के बीच में जानवरों की हड्डियाँ इन्हीं जानवरों की पाई गईं, जबकि जानवरों के अवशेषों में भेड़/बकरियों का औसत 10% पाया गया था। गाय बैलों की हड्डियों का उच्च अनुपात समूचे सिन्धु आबादी में बीफ की खपत को लेकर एक सांस्कृतिक प्राथमिकता को रेखांकित करता है, जिसमें बकरे/भेड़ की खपत इसके पूरक के तौर पर थी। सिंधु घाटी की बस्तियों में पशुओं की हत्या की प्रथा से इस सामान्य पृवत्ति का खुलासा होता है कि गोजातीय एवं भेड़/बकरियों की प्रजातियों के लिए वृद्ध वयस्कों के बीच में माँस की भारी खपत के पूरक के तौर पर माध्यमिक-उत्पादों के उपभोग की पृवत्ति अपने व्यापक अस्तित्व में थी।

इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि खरगोश और पक्षियों को भी भोजन के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाता था, लेकिन इस बात के बेहद कम सबूत थे कि उनके भोजन में मुर्गियां भी शामिल थीं। इसमें कहा गया है कि बड़े आकार के मर्तबान और चार-कन्धों वाले मर्तबान का संबंध मदिरा और तेल जैसे तरल पदार्थों के भंडारण के लिए इस्तेमाल में लाया जाता रहा हो।

इस अध्ययन का नेतृत्व अक्षिता सूर्यनारायणन द्वारा अपनी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की पीएचडी के सिलसिले में एक हिस्से के तौर पर किया गया था। सूर्यनारायणन ने अपनी पीएचडी फरवरी में पूरी कर ली थी और वर्तमान में वे फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च में काम कर रही हैं। इस अध्ययन के सह-लेखन का कार्य पुणे के डेक्कन कॉलेज के पूर्व उप-कुलपति वसंत शिंदे और बीएचयू के प्रोफेसर रविन्द्र एन. सिंह द्वारा संपन्न किया गया।

अंग्रेजी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में सूर्यनारायणन ने कहा: “यह अध्ययन इस मामले में अनूठा है कि इसमें बर्तनों में मौजूद अवशेषों के अध्ययन का काम किया गया है। आम तौर पर बीजों या पौधों के अवशेष तक पहुँच बन पाती थी। लेकिन वसा अवशेषों के विश्लेषण के जरिये हम पूरे यकीन के साथ इस बात को कह सकते हैं कि गोमांस, बकरी, भेड़ और सुअर की खपत व्यापक स्तर पर की जाती थी, और विशेषकर गोमांस की।”

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

New Study Says Harappans ate Meat, Were Especially Fond of Beef

Indus Valley Beef
Indus Valley Cow
Indus Valley Civilisation
Indus Valley People Diet
Harappa
Rakhigarhi
Akshyeta Suryanarayanan
Lipid Residue Analysis on Ceramics of Indus Valley Civilisation

Related Stories

राखीगढ़ी कंकाल का डीएनए : सिन्धु घाटी के लोग ऋग्वैदिक आर्य नहीं हैं

पश्चिम की तरफ़ प्राचीन-भारतीय प्रवास का कोई जेनेटिक सुराग नहीं है : टोनी जोसफ़

कैसे जन्मी सिंधु घाटी सभ्यता में कृषि?


बाकी खबरें

  • Poem
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता: अक्टूबर के आरंभ की बरसती साँझ
    03 Oct 2021
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के सह प्राध्यापक और छत्तीसगढ़ के भिलाई नगर में जन्मे कवि बसंत त्रिपाठी ने ‘अक्टूबर के आरंभ की बरसती साँझ’ शीर्षक से क्या ख़ूब कविता कही है। वे कहते हैं- बरसो हे मेघ/…
  • GANDHI JI CARTOON
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: बापू मिले 'सरकार जी' से
    03 Oct 2021
    "तो बापू", सरकार जी ने कहा, "आप यहां आए किसलिए हैं। आप तो जानते ही हैं आपके और मेरे रास्ते जुदा जुदा हैं। आप सत्य के प्रयोगधर्मी और मैं असत्य को सत्य बनाने के प्रयोग में जुटा हूं। आप प्रेम के पुजारी…
  • The Country With a Burnt Post Office
    फ़राह बशीरी
    जले हुए डाकख़ाने वाला देश
    03 Oct 2021
    “रूमर ऑफ़ स्प्रिंग: अ चाइल्डहुड इन कश्मीर” 1990 के दशक में श्रीनगर में बितायी गयी फ़राह बशीर की किशोरावस्था का एक अविस्मरणीय वृत्तांत है।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    राजनीति के अति-महत्वाकांक्षियों की दास्तान और किसानों पर कोर्ट
    02 Oct 2021
    आकांक्षी होना अच्छी बात है लेकिन जन-हित, समाज-हित को दरकिनार कर किन्हीं निहित स्वार्थों के लिए अति-महत्वाकांक्षी होना बुरी बात है. राष्ट्रीय राजनीति में इस सप्ताह तीन अति-महत्वाकांक्षी लोग अलग-अलग…
  • Modi
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: राष्ट्रपिता (देश) से राष्ट्रपिता (विदेश) तक
    02 Oct 2021
    हमें नहीं लगता कि राष्ट्रपिता-(विदेश) ही रहने में बापू को कोई आपत्ति होगी। बल्कि उन्हें जानने वाले तो कहते हैं कि वह अब और राष्ट्रपिता रहना ही नहीं चाहते हैं। फिर अब मोदी जी तो हैं ही। बुजुर्ग का देश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License