NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
महामारी बनी बड़ी कंपनियों के मुनाफे का जरिया !
लगता है महामारी बड़ी कंपनियों के लिए मुनाफा कमाने का जरिया बन गई है। यह सब तब हो रहा है जब देश का मजदूर, किसान और छोटा व्यापारी गंभीर और घातक आर्थिक संकट से गुजर रहा है।
सुबोध वर्मा
20 Nov 2020
Translated by महेश कुमार
महामारी बनी बड़ी कंपनियों के मुनाफे का जरिया !

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) द्वारा जारी किए गए नए आंकड़ों के अनुसार, 2020 की तीसरी तिमाही में, भारत की सबसे बड़ी कंपनियों ने 1.33 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है, जो किसी भी अन्य तिमाही में सबसे अधिक है। यह मुनाफा इस वर्ष की पहली छमाही में छाई महामारी और इसके चलते लॉकडाउन के कारण उनकी आय में आई गिरावट के बावजूद है।

सीएमआईई के अनुसार, जून 2020 की तिमाही के अंत में इन कंपनियों की आय में 27 प्रतिशत की गिरावट आई थी, और सितंबर तिमाही के लिए जारी आंशिक डेटा भी लगभग 6 प्रतिशत  आय में गिरावट को दर्शाता है। फिर भी, उनके मुनाफे में तेजी आई है। यह आंकड़ा बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) में सूचीबद्ध 1,897 कंपनियों से संबंधित है। [नीचे चार्ट देखें]

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बड़ी कंपनियों ने अपने खर्चों में भारी कटौती की है। उन्होंने मजदूरों को या तो नौकरी से निकाल दिया या कम वेतन के अनुबंध के तहत काम पर रखा, जिससे उनके खर्च में भारी कटौती हुई। उन्होंने कच्चे माल, यूटिलिटीज़, और भंडारण पर भी खर्चों को कम कर दिया था। कुल मिलाकर यह सब इन कंपनियों के लाभ के मार्जिन को बनाए रखने में मदद करता रहा है।

ध्यान देने की बात है कि ये कंपनियां पिछले छह वर्षों में कुछ मौसमी उतार-चढ़ाव के साथ  लाभ कमा रही थी। इन कंपनियों ने जून 2020 की तिमाही में 44.1 हजार करोड़ रुपये और मार्च 2020 की तिमाही में 32 हजार करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। पिछली चार तिमाहियों में, इन कंपनियों का औसत लाभ 50.2 हजार करोड़ रुपये था। याद कीजिए कि यह वह दौर है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति काफी खेदजनक  स्थिति में थी और कॉरपोरेट जगत इन हालातों पर हो-हल्ला मचा रहे थे। अगर उनके इस मुनाफे पर गौर किया जाए तो लगता यह सब शोर-शराबा और रोष केवल अधिक लाभ न कमाने पाने के लिए था न कि नुकसान के लिए। 

ये इन कंपनियों के मजदूर और आम लोग हैं जो मंदी की मार की कीमत चुका रहे थे या चुका रहे हैं- जिसका असर बेरोजगारी, कम मजदूरी, कल्याणकारी कार्यक्रमों में सरकारी फंड की कमी, और अंत में परिवार के खर्च और खपत में कमी के रूप में देखने को मिला। निश्चित रूप से इस सब के चलते संकट गहरा गया क्योंकि मांग लगातार नीचे जाती रही और सरकार ने खर्च बढ़ाने से इंकार कर अर्थव्यवस्था को डूबने दिया। लेकिन सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, बड़े उद्योगपति और कारोबारी इस संकट को अपने बढ़े मुनाफे के साथ पार कर गए। 

ग्लोबल स्तर पर भी अमीर ऐश कर रहे हैं 

भारत एकमात्र ऐसा देश नहीं है जहाँ अर्थव्यवस्था की बड़ी शार्क मछलियाँ- जिनकी संख्या अक्सर एक प्रतिशत मानी जाती है- वे बेहतर स्थिति में हैं और ऐसे समय में भी उनके मुनाफे लगातार बढ़ रहे हैं जब वैश्विक जीडीपी डूब रही है, कई देश मंदी में धँसे हैं और महामारी अभी भी बेलगाम है।

स्विस बैंक यूबीएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल अप्रैल से जुलाई के बीच जब महामारी दुनिया को तबाह कर रही थी, अरबपतियों की संपत्ति 27.5 प्रतिशत बढ़ गई थी जो रिकॉर्ड 10.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी। इस दौरान अरबपतियों की संख्या बढ़कर 2,189 के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। यूबीएस विश्लेषण में कहा गया है कि इन बड़े-अमीर व्यक्तियों ने शेयर बाजारों में जूए के माध्यम से पैसा कमाया जो महामारी के दौरान औंधे मुह गिरे पड़े थे। 

न्यूजक्लिक के लिए लिखते हुए, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने इस घटना का विश्लेषण किया था और समझाया था कि यह पूंजी के केंद्रीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है। हर संकट, चाहे वह राजनीतिक, आर्थिक या वास्तव में स्वास्थ्य-संबंधी हो, वह धनी को ओर धनी बनाता है, पटनायक आगे समझाते हैं:

"वास्तव में, पूंजीवाद में अपरिहार्य है कि हर मानव त्रासदी जो इस प्रणाली में संकट को पैदा  करती है, वह इस तंत्र में पूंजी के केंद्रीकरण में वृद्धि का एक अवसर बन जाता है।"

यूबीएस और वैश्विक एकाउंट फर्म प्राइसवाटरहाउसकूपर (PwC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल और जुलाई के बीच भारतीय अरबपतियों की शुद्ध 35 प्रतिशत पूंजी की वृद्धि हुई और जो चौंका देने वाले 423 बिलियन डॉलर के निशान तक पहुँच गई थी, यह तब हुआ जब देश एक गंभीर लॉकडाउन से गुजर रहा था जिसने लाखों लोगों के जीवन को बर्बाद कर दिया था, और हालत को सुधारने के लिए महामारी को नियंत्रित करने में विफल रहा था।

प्रधानमंत्री मोदी सहित अक्सर कई लोग ये तर्क देते है कि शीर्ष व्यापारिक लोग और बड़े कॉरपोरेट "धन निर्माता" हैं, और उनका उद्यम और प्रतिभा हर किसी की मदद करती है, क्योंकि उसका लाभ गरीब लोगों को मिलता है। लेकिन आज के हालात में उपरोक्त कथन असत्य है।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सबसे अमीर तबका जो आबादी का एक प्रतिशत है के पास देश की लगभग 43 प्रतिशत संपत्ति है, जबकि सबसे नीचे के 50 प्रतिशत तबके के पास केवल 2.8 प्रतिशत संपत्ति है। इससे पता चलता है कि "2017 में जो धन उत्पन्न हुआ उसका 73 प्रतिशत हिस्सा सबसे अमीर 1 प्रतिशत के पास चला गया, जबकि 67 मिलियन सबसे गरीब भारतीयों के पास जो आबादी का आधा हिस्सा है, उनके धन में केवल 1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। स्पष्ट है कि सारा धन गैर-आनुपातिक तौर पर धनाढ्य वर्गों के पास जा रहा है।

काम करने वाले मजदूरों पर बढ़ता असहनीय बोझ 

दुनिया भर में पिछले महीनों में विभिन्न तीव्रता के साथ लागू हुए महामारी से संबंधित लॉकडाउन ने आम कामकाजी लोगों के जीवन को तबाह कर दिया है। भारत में 24 मार्च की रात को हृदय विदारक और गलत अनुमान से लगाए गए लॉकडाउन से नाटकीय रूप से असहाय प्रवासी श्रमिकों को सामूहिक रूप से दूर-दराज़ के गांवों में अपने घरों को वापसी करनी पड़ी थी क्योंकि अप्रैल और मई में उनकी नौकरियाँ और आय दोनों गायब हो गई थी।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल की पहली तिमाही में कामकाजी घंटों में 5.6 प्रतिशत की गिरावट आई थी, इसके बाद दूसरी तिमाही में 17.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज आई जो तीसरी तिमाही में 12.1 प्रतिशत की गिरावट के साथ जारी रही थी। यह 2019 में काम किए गए औसत घंटों की तुलना में है। सभी तीन तिमाहियों में, श्रमिकों ने नौ महीनों में 11.7 प्रतिशत काम के घंटे खो दिए थे- उनकी आय और जीवन स्तर पर यह एक क्रूर चोट थी। दक्षिण एशिया क्षेत्र में, जो मुख्य रूप से भारत है, तीनों तिमाहियों में काम के घंटे का नुकसान क्रमशः 3.1 प्रतिशत 27.3 प्रतिशत और 18.2 प्रतिशत था।

इन काम के घंटे की हानि को मजदूरी खोए जाने के रूप में परिवर्तित करने से इस विनाशकारी तबाही की एक साफ और सच्ची तस्वीर सामने आती है। जबकि दक्षिण एशिया (मुख्य रूप से भारत) में संयुक्त रूप से तीन तिमाहियों का आय में हानि 16.2 प्रतिशत थी जबकि विश्व औसत 10.7 प्रतिशत है। 

इन आंकड़ों की तुलना पहले दी गई तस्वीर से की जानी चाहिए कि दुनिया में अरबपतियों की संपत्ति कितनी बढ़ी है और भारतीय कंपनियों ने महामारी से कितना लाभ कमाया है।

भारत के विभिन्न छोटे सर्वेक्षणों ने भी यही दिखाया है कि मजदूरों ने अपनी कुल आय का 60 प्रतिशत हिस्सा पूर्ण लॉकडाउन के 2-3 महीनों में खो दिया था।

यह इसलिए कि एक ओर अमीर और उनके रास्ते के बीच अत्यधिक विरोधाभास था, और दूसरी तरफ गरीब जो इस सब से काफी दुखी था उसका शोषण बरकरार था, जिसके कारण दुनिया भर में और भारत में भी विरोध प्रदर्शन, आंदोलन और हड़ताल की कार्यवाई हुई है। 

बावजूद कड़े लॉकडाउन की स्थिति में इस साल अप्रैल में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन जारी हैं, ट्रेड यूनियनों के एक संयुक्त मंच ने अब 26 नवंबर को भारत में अमीर-हितैषी नीतियों को उलटने की मांग को लेकर आम हड़ताल का आह्वान किया है। 200 से अधिक किसान संगठनों के मंच द्वारा दो-दिवसीय विरोध प्रदर्शन के आह्वान का भी समर्थन इनके द्वारा किया जा रहा है।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Pandemic Is Good! Top Companies Show Record Profits

Economic Slump in India
Economy under Modi Government
Lockdown Impact on Indian Economy
economic crisis
COVID 19 Lockdown
UNEMPLOYMENT IN INDIA
Wages Lost in India
job loss
Rich getting richer

Related Stories

क्या भारत महामारी के बाद के रोज़गार संकट का सामना कर रहा है?

अमीरों के लिए आपदा में अवसर बनी कोरोना महामारी – ऑक्स्फ़ाम इन्टरनेशनल की रिपोर्ट

इस संकट की घड़ी में लोगों की मदद करने के लिए सरकार को ख़र्च बढ़ाना चाहिए

'हम कोरोना से बच भी गए तो ग़रीबी से मर जायेंगे' : जम्मू-कश्मीर के कामगार लड़ रहे ज़िंदा रहने की लड़ाई

'इस साल आर्थिक संकट ग्रामीण भारत तक फैल गया' - प्रणब सेन

कोविड-19 : मप्र में 94% आईसीयू और 87% ऑक्सीजन बेड भरे, अस्पतालों के गेट पर दम तोड़ रहे मरीज़

कोविड-19: लौट आए लॉकडाउन, क्या हुआ हमारी ‘V-आकार’ वाली रिकवरी का

टैंक रोड-करोल बाग़ : बाज़ारों की स्थिति ख़राब, करना होगा लम्बा इंतज़ार

महाराष्ट्र: सांस्कृतिक संस्थाओं के सामने भी आर्थिक संकट, कलाकार-कर्मचारी मुश्किल में

संसद सत्र: न महामारी की चर्चा, न बेरोज़गारी की बात, सिर्फ़ ख़तरनाक बिलों की बरसात


बाकी खबरें

  • Economic Survey
    वी श्रीधर
    आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22: क्या महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था के संकटों पर नज़र डालता है  
    01 Feb 2022
    हाल के वर्षों में यदि आर्थिक सर्वेक्षण की प्रवृत्ति को ध्यान में रखा जाए तो यह अर्थव्यवस्था की एक उज्ज्वल तस्वीर पेश करता है, जबकि उन अधिकांश भारतीयों की चिंता को दरकिनार कर देता है जो अभी भी महामारी…
  • muslim
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: मुसलमानों के नाम पर राजनीति फुल, टिकट और प्रतिनिधित्व- नाममात्र का
    01 Feb 2022
    देश की आज़ादी के लिए जितना योगदान हिंदुओं ने दिया उतना ही मुसलमानों ने भी, इसके बावजूद आज राजनीति में मुसलमान प्रतिनिधियों की संख्या न के बराबर है।
  • farmers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    केंद्र सरकार को अपना वायदा याद दिलाने के लिए देशभर में सड़कों पर उतरे किसान
    31 Jan 2022
    एक साल से अधिक तक 3 विवादित कृषि कानूनों की वापसी के लिए आंदोलन करने के बाद, किसान एक बार फिर सड़को पर उतरे और 'विश्वासघात दिवस' मनाया। 
  • Qurban Ali
    भाषा सिंह
    प्रयागराज सम्मेलन: ये लोग देश के ख़िलाफ़ हैं और संविधान के ख़ात्मे के लिए काम कर रहे हैं
    31 Jan 2022
    जिस तरह से ये तमाम लोग खुलेआम देश के संविधान के खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं और कहीं से भी कोई कार्ऱवाई इनके खिलाफ नहीं हो रही, उससे इस बात की आशंका बलवती होती है कि देश को मुसलमानों के कत्लेआम, गृह युद्ध…
  • Rakesh Tikait
    न्यूज़क्लिक टीम
    ख़ास इंटरव्यू : लोगों में बहुत गुस्सा है, नहीं फंसेंगे हिंदू-मुसलमान के नफ़रती एजेंडे में
    31 Jan 2022
    ख़ास इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे को ज़मीनी चुनौती देने वाले बेबाक किसान नेता राकेश टिकैत से लंबी बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि इन चुनावों में किसान…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License