NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
“लोकतंत्र में किसी को इस तरह चुप कराया जा सकता है?” क्या यही सवाल सुप्रीम कोर्ट पर लागू नहीं होता
प्रशांत भूषण के मसले के दो दिन भी नहीं बीते हैं कि गहलोत-पायलट और राजस्थान सरकार से जुड़े विवाद में जस्टिस अरुण मिश्रा ख़ुद कहते हैं कि आलोचना की आवाज़ को दबा नहीं सकते हैं और पूछा कि क्या लोकतंत्र में किसी को इस तरह चुप कराया जा सकता है?
अजय कुमार
24 Jul 2020
प्रशांत भूषण
image courtesy : The Federal

कुछ आरोप खुद ही आरोपों के घेरे में आ जाते हैं। ऐसा ही कुछ प्रसिद्ध वकील और कार्यकर्ता प्रशांत भूषण पर लगाए गए 'न्यायालय की अवमानना' के आरोप का हाल है। कानून  के जानकार गौतम भाटिया इस मसले पर लिखते हैं, “प्रशांत भूषण से जुड़ी उस याचिका को देखा जिसके आधार पर प्रशांत भूषण पर 'कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट' यानी कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई है। यह याचिका ऐसी है जिस पर ठोस जवाब देने का कोई मतलब ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट खुद को शर्मिंदा कर रहा है और कहने के लिए कुछ भी नहीं है।”

IMG-20200724-WA0007.jpg

पर सवाल तो बनता ही है कि ऐसे आरोपों से फायदा किसका होता है। इसका जवाब सीधा है। बड़े ध्यान से देखा जाए तो ऐसे बेबुनियाद आरोपों का मतलब पहले से खींची गयी समाज में राजनीतिक लकीर को और तीखा करना होता है। समाज में चल रहे राजनीतिक बंटवारे की जमीन को और अधिक बांटना होता है। मौजूदा समय की राजनीति को बड़े ध्यान से देखा जाए तो वह लगातार भारतीय संस्थाओं का इस्तेमाल कर, समाज में उस लकीर को तीखा करती रहती है, जिस लकीर की एक तरफ भाजपा और भाजपा के समर्थक हैं तो दूसरी तरफ भाजपा की राजनीति के मुखर विरोधी।

अब आप सोचेंगे कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है? तो इसके लिए प्रशांत भूषण की अभिव्यक्ति से जुड़े उन दो ट्वीट को पढ़ना चाहिए जिसके आधार पर अदालत के मुताबिक अदालत की अवमानाना हुई बताते हैं। इसके साथ दायर की गई अवमानना की याचिका में निहित अदालत के अवमानना के आधारों से रूबरू होना चाहिए।

पहला ट्वीट- जब इतिहासकार भविष्य में पिछले 6 सालों की ओर मुड़ कर देखेंगे कि कैसे बिना इमरजेंसी लगाए भारत का लोकतंत्र नष्ट हो गया है तो वे विशेष तौर पर इस बर्बादी के लिए सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सवालिया निशान खड़ा करेंगे। और इसमें से भी विशेष तौर पर अंतिम चार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की भूमिका पर सवालिया निशान लगाएंगे।

IMG-20200724-WA0008.jpg
दूसरा ट्वीट- बिना मास्क और हेलमेट पहने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया नागपुर के भाजपा नेता की 50 लाख की मोटरसाइकिल की सवारी कर रहे हैं। जबकि इसी समय इन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर ताला लगा कर नागरिकों को अपने न्याय की पहुंच से जुड़े मौलिक अधिकार से वंचित कर रखा है।

संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को मन में रखते हुए इन दोनों ट्वीट को ध्यान से पढ़िए और सोचिये। इनमें से कौन सी ऐसी बात है जो नागरिकों को मिले आलोचना के अधिकार के तहत नहीं आती है? इनमें से कौन सी ऐसी बात है जो मौजूदा समय के सच के करीब नहीं पहुंचती है?

प्रशांत भूषण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में आधार दर्ज किया गया है कि प्रशांत भूषण का ट्वीट चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के संप्रभु कामों पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है। प्रशांत भूषण जैसे मशहूर वकील ने बिना honorable यानी सम्माननीय शब्द का इस्तेमाल किए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर सार्वजनिक जगह पर आरोप कैसे लगा दिया? यह प्रशांत भूषण के अभद्र व्यवहार को साबित करता है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और दूसरे जज अपनी छुट्टियों का मजा लेने की बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नागरिकों को न्याय दिलवाने के लिए काम कर रहे हैं। ऐसे में प्रशांत भूषण का आरोप पूरी तरह गलत है। सस्ता पब्लिक स्टंट है। एंटी इंडिया कैंपेन का हिस्सा है। इसलिए यह ट्वीट 'क्रिमिनल कंटेंप्ट' के दायरे में आते हैं।

इन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान ले लिया। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने प्रशांत भूषण के ट्वीट को न्यायालय की अवमानना करार दे दिया। प्रशांत भूषण और टि्वटर इंक को 5 अगस्त तक अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।

अजीब बात यह है कि इस मसले के दो दिन भी नहीं बीते थे कि गहलोत-सचिन पायलट और राजस्थान सरकार से जुड़े विवाद में जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि आलोचना की आवाज़ को दबा नहीं सकते हैं और पूछा कि क्या लोकतंत्र में किसी को इस तरह चुप कराया जा सकता है? कहने का मतलब यह है कि न्यायाधीश भी जानते हैं कि उनके द्वारा प्रशांत भूषण पर की जा रही कार्यवाही किसी भी तरह से न्याय संगत नहीं है। तो फिर ऐसा हुआ क्यों?

इस समय की राजनीति ने संस्थाओं को किस तरीके से बर्बाद किया है? इसका सबसे बढ़िया उदाहरण सुप्रीम कोर्ट की पिछले चार साल की कार्यवाहियां बता सकती हैं। इस कोरोना के दौरान प्रशांत भूषण और हर्ष मंदर ने प्रवासी मजदूरों की परेशानियो की जुडी जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट में दायर किया था। 62 दिनों तक इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। 62 दिनों के बाद इस पर सुनवाई करते हुए इसे खारिज कर दिया गया। दो ट्वीट के आधार पर तत्काल अदालत की अवमानना का नोटिस जारी कर दिया गया। इससे आप समझ सकते है कि कोरोना के समय में सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकताएं क्या थी?

अब जब मामला प्रशांत भूषण से जुड़ा है तो थोड़ा प्रशांत भूषण के कामों को भी समझ लेते हैं। आखिरकार प्रशांत भूषण ऐसा क्या करते हैं कि देर-सबेर भाजपा या कांग्रेस किसी भी निजाम के दौर में सुर्खियों का हिस्सा बन जाते हैं।

प्रशांत भूषण पेशे से वकील है। लेकिन अपने कामों से उन तमाम लोगों के बीच मौजूद वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने भारत में मौजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने पूरे दमखम से लड़ाई लड़ी है। कोयला ब्लॉक घोटाला, 2G स्पेक्ट्रम की नीलामी से जुड़ा घोटाला, गोवा में अवैध खनन से जुड़ा मसला, न्यूक्लियर पावर प्लांट की सुरक्षा से जुड़ा मसला से लेकर तकरीबन 450 से

अधिक जनहित याचिकाएं प्रशांत भूषण के जरिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जा चुकी हैं। इनमें से अधिकतर याचिकाएं ऐसी हैं जिन्होंने नेताओं और उद्योगपतियों के गठजोड़ से जन्मे आपसी भ्रष्टाचार को उजागर किया है। साल 2014 के बाद जस्टिस लाया केस, सुप्रीम कोर्ट को आरटीआई के दायरे में लाने से जुड़ा केस, मेडिकल घोटाले से जुड़ा केस जिसमें भूतपूर्व चीफ जस्टिस ऑफ़ इण्डिया दीपक मिश्रा का भी नाम शामिल है। अरुणाचल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री खलीकोपुल की आत्महत्या से जुड़ा मसला- ये सारे ऐसे मामले हैं जिनकी जनहित याचिकाओं में प्रशांत भूषण की भागीदारी है। ये सारे मामले ऐसे हैं जो यह बताते हैं कि प्रशांत भूषण वैसे वकील और कार्यकर्ता नहीं है जिसकी गोटी सरकार और अदलात के साथ फिट हो जाए। प्रशांत भूषण का जीवन व्हाइट कॉलर माफियाओ की धांधलियों को उजागर करने में जुझारू तौर पर लड़ता हुआ जीवन है।  

पत्रकार रवीश कुमार के साथ एक इंटरव्यू में प्रशांत भूषण कहते हैं कि किसी इंसान के पास दो चीज़ें हों तो वह दुनिया के भ्रष्टाचार से आसानी से लड़ सकता है। पहला वह आर्थिक तौर पर मजबूत हो दूसरा उसमें सच बोलने और बरतने का साहस हो। मेरे पास यह दोनों है, इसलिए मैं ये काम कर पाता हूँ। मुझे इस बात का डर नहीं है कि भ्रष्ट लोगों के खिलाफ लड़ते हुए मेरी वकालत की प्रैक्टिस ठप कर दी जायेगी। मेरे पास इतना है कि जिंदगी आसानी से गुजर सके। साथ में इस समाज में सुधार करने के लिए जोखिम तो उठाना ही पड़ता है। इसलिए इस बात का ज्यादा डर नहीं रहता है कि कोई मुझे मरवा देगा।''  

prashant bhushan
Supreme Court
democracy
Rajasthan
ashok gehlot
sachin pilot
Constitution of India

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है


बाकी खबरें

  • veto
    एपी/भाषा
    रूस ने हमले रोकने की मांग करने वाले संरा के प्रस्ताव पर वीटो किया
    26 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 और विपक्ष में एक मत पड़ा। चीन, भारत और संयुक्त अरब अमीरात मतदान से दूर रहे।
  • Gujarat
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!
    26 Feb 2022
    छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है।
  • Leander Paes and Rhea Pillai
    सोनिया यादव
    लिएंडर पेस और रिया पिल्लई मामले में अदालत का फ़ैसला ज़रूरी क्यों है?
    26 Feb 2022
    लिव-इन रिलेशनशिप में घरेलू हिंसा को मान्यता देने वाला ये फ़ैसला अपने आप में उन तमाम पीड़ित महिलाओं के लिए एक उम्मीद है, जो समाज में अपने रिश्ते के अस्तित्व तो लेकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022: किस तरफ होगा पूर्वांचल में जनादेश ?
    26 Feb 2022
    इस ख़ास बातचीत में परंजॉय गुहा ठाकुरता और शिव कुमार बात कर रहे हैं यूपी चुनाव में पूर्वांचाल की. आखिर किस तरफ है जनता का रुख? किसको मिलेगी बहुमत? क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पायेगी? जवाब ढूंढ रहे हैं…
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता
    26 Feb 2022
    ड्रग्स, अफस्पा, पहचान और पानी का संकट। नतीजतन, 5 साल की डबल इंजन सरकार को अब फिर से ‘फ्री स्कूटी’ का ही भरोसा रह गया है। अब जनता को तय करना है कि उसे ‘फ्री स्कूटी’ चाहिए या पीने का पानी?    
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License