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महामारी की छाया में रूस-चीन के बीच गहराता रिश्ता
विश्व अर्थव्यवस्था मंदी का सामना कर रही है और 1930 के दशक के महामंदी के बाद से अमेरिका के सामने इस समय अब तक के सबसे बड़े संकट का ख़तरा मंडरा रहा है।
एम. के. भद्रकुमार
05 May 2020
 रूस-चीन

2014 में यूक्रेन में एक के बाद एक हुए बड़े घटनाक्रमों के बाद से रूसी-चीनी रिश्ते हाल के दौर में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सबसे अहम शक्ल में से एक के रूप में उभरा है। उन्हीं घटनाक्रमों के चलते मॉस्को के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंध लगा दिये गये। इस घटनाक्रम ने आगे चलकर मॉस्को को 'एशिया की धुरी' के रूप में मज़बूत कर दिया है।

कोरोनोवायरस महामारी से प्रेरित क्षेत्रीय और वैश्विक रिश्ते में हो रहे इस बदलाव को देखते हुए हाल तक एक औपचारिक गठबंधन से भी कम महत्व रखने वाला यह रिश्ता अहम होता जा रहा है। विश्व अर्थव्यवस्था मंदी का सामना कर रही है और 1930 के दशक के महामंदी के बाद से अमेरिका के सामने अबतक का सबसे बड़े संकट का ख़तरा है। बेरोज़गारी भत्ता के लिए दरख्वास्त देने वाले अमेरिकियों की संख्या 3 करोड़ से भी ज़्यादा हो गयी है।

वैश्विक शक्ति के रूप में अमेरिका की हैसियत में तेज़ी से गिरावट आ रही है। लेकिन,अमेरिका इस भू-राजनीतिक वास्तविकता से स्वीकार नहीं कर रहा है और स्तिथि चाहे जैसी भी हो,वह वैश्विक क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बनाये रखने को लेकर अड़ा हुआ है। भले ही छोटी अवधि में ही सही, मगर ख़ास तौर पर अमेरिका-चीन रिश्तों में तनाव तो बढ़ेगा।

पिछले हफ़्ते ख़बर आयी थी कि अमेरिका,रूस की सीमाओं के पास उस मिसाइल रक्षा प्रणाली को तैनात कर रहा है, जिसमें एक अप्रत्याशित परमाणु हमला करने की क्षमता है। रूसी जनरल स्टाफ के मुख्य संचालन विभाग के प्रथम उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल विकिवनिक के हवाले से टैस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका ने पूर्व प्रक्षेपण अवरोधन के विचार को विकसित कर लिया है और रूस, चीन और अन्य देशों की अंतर्महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करने की योजना बना ली है,जबकि इन देशों के हथियार अब भी लांचर में ही हैं।

यह कहना काफ़ी होगा कि यह रूस और चीन के सामान्य हित में होगा कि अमेरिका के साथ उनके बढ़ते टकराव के समय वे एक-दूसरे के साथ खड़े हों और एक-दूसरे का समर्थन करें। इस बात को लेकर हर तरह के संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद दुनिया के मौजूदा हालात में और भी ज़्यादा हिंसक होगा और इसका चरित्र और भी दमनकारी होगा।

रूस-चीन के बीच का रिश्ता उनके नेतृत्व स्तर से ही संचालित है। मार्च-अप्रैल के दरम्यान एक महीने की अवधि के भीतर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच महामारी और इसके असर पर चर्चा करने के साथ-साथ आगामी चुनौतियों का सामना करने के लिए ज़रूरी उपायों को लेकर दो टेलीफोनिक वार्तायें हुई हैं।

चीनी दस्तावेज़ों में इस बात को रेखांकित किया गया है कि पुतिन "किसी देश (अमेरिका) की तरफ़ से होने वाले उकसावे और दोष मढ़ने" और "कुछ देशों की तरफ़ से वायरस की उत्पत्ति के सवाल पर चीन को घसीटने का प्रयास" करने को लेकर आलोचनात्मक रुख़ अख़्तियार करते रहे हैं। पुतिन ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि COVID-19 की शुरुआत से ही रूस और चीन "साथ-साथ खड़े हैं और एक दूसरे का समर्थन ज़ोर-शोर से करते रहे हैं, जो उनके रिश्ते की रणनीतिक प्रकृति और उच्च गुणवत्ता का सुबूत है"।

रूस और चीन एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं और दोनों असरदार ढंग से अमेरिका को पीछे धकेलने के लिए अपनी जगह बना रहे हैं। इस सप्ताह के शुरू में 29 अप्रैल को, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हाल के वर्षों में पूर्व सोवियत संघ के देशों में बीमारी के हथियार बनाने को लेकर पैंटागन की प्रयोगशालाओं की मौजूदगी पर मास्को की तरफ़ से व्यक्त की गयी चिंता का समर्थन किया था।

रूसियों का दावा है कि यूक्रेन में पेंटागन की तरफ़ से विकसित की गयीं ऐसी 11 प्रयोगशालायें हैं। उनका कहना है कि जब क्रीमिया ने 2014 में रूस के साथ फिर से हाथ मिला लिया था, तो उन्हें पता चला था कि सिम्फ़ेरोपोल में एक ऐसी प्रयोगशाला थी, जो साफ़ तौर पर सामग्री इकट्ठा करने और उन्हें यूरोप भेजने का एक केंद्र थीं, जिसमें वाह्यपरजीवी के 104 पूल, चूहा-गिलहरी जैसे कुतरने वाले प्राणियों के आंतरिक अंगों के 46 नमूने और मानव रक्त सीरम के 105 नमूने को यहां से भेजे जाने के लिए तैयार पाया गया था।

मॉस्को ने आरोप लगाया है कि ये प्रयोगशालायें ख़तरनाक बीमारियों पर अध्ययन करते हैं, विशिष्ट जातीय समूहों को निशाना बनाते हैं, और इनमें वे परियोजनायें तक शामिल हैं, जो ख़ुद यूएस के भीतर प्रतिबंधित हैं। 29 अप्रैल को बीजिंग में एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान चीनी प्रवक्ता ने कहा, “हमने रूसी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की टिप्पणियों और सम्बन्धित रिपोर्टों पर ध्यान दिया है। अमेरिका ने पूर्व यूएसएसआर के देशों में कई जैविक प्रयोगशालाओं की स्थापना की हुई है, लेकिन प्रयोगशालाओं के कार्यों, उद्देश्यों और उनकी सुरक्षा को लेकर अपना मुंह बंद रखे हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों और आसपास के देशों में गहरी चिंतायें हैं। जैसा कि हमें मालूम है कि कुछ स्थानीय लोग इन प्रयोगशालाओं को बंद करने को लेकर डटकर मांग कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि अमेरिका ज़िम्मेदाराना तरीक़े से कार्य करेगा, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं को ध्यान में रखेगा, स्थानीय लोगों की सेहत और हिफ़ाज़त को अहमियत देगा, और किसी भी तरह के संदेह को ख़त्म करने के लिए ठोस क़दम उठायेगा।”

सोवियत संघ के क़ानूनी उत्तराधिकारी के रूप में रूस ने 1992 में हुए जिनेवा प्रोटोकॉल और जैविक एवं टॉक्सीन हथियार सम्मेलन (बीडब्ल्यूसी) के एक पक्ष के रूप में अपनी हैसियत विरासत में पायी है। 1984 में चीन ने भी बीडब्ल्यूसी को मान लिया था। सभी एशियाई देश बीडब्ल्यूसी के हस्ताक्षरकर्ता हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि अमेरिका ने भी 1975 में इस प्रोटोकॉल की पुष्टि की थी।

हालांकि अमेरिकी सरकार ने आधिकारिक तौर पर चीन पर जानबूझकर एक जैविक हथियार के रूप में COVID-19 को विकसित करने का आरोप अबतक नहीं लगाया है, लेकिन ट्रम्प इस बात को लेकर लागातर ताना मारते रहते हैं। अमेरिकी ख़ुफ़िया संस्थाओं के आकलन के मुताबिक, यह वायरस मानव निर्मित या आनुवंशिक रूप से संशोधित नहीं था। लेकिन, ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने वुहान की विषाणु-विज्ञान से जुड़ी एक प्रयोगशाला में पैदा किये किये नोवल कोरोनोवायरस के सुबूत जैसा कुछ देखा है,हालांकि वह अपने उस दावे का समर्थन में कोई सबूत नहीं दे सके हैं।

चीन ने ट्रम्प के इस प्रहार पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है,जबकि रूस चीन के इस रुख का समर्थन किया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में कुछ यूरोपीय देशों में बीजिंग से "विश्व समुदाय को समय पर सूचित करने में नाकाम" रहने के लिए मुआवजे की मांग और ख़ुद ट्रम्प की तरफ़ से इसी तरह के "अरबों अमेरिकी डॉलर से कहीं अधिक रक़म के अमेरिकी दावों” का मज़ाक उड़ाया था।

वास्तव में, अगर ट्रम्प चीन को लेकर दंडात्मक रणनीति अपनाते हैं,तो यह गंभीर मामला बन सकता है। गुरुवार को वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा, "निजी तौर पर, ट्रम्प और सहयोगियों ने चीन से संप्रभु प्रतिरक्षा(इम्यूनिटी) को छीनने को लेकर चर्चा की है, जिसका मक़समद इससे हुए नुकसान के लिए 'अमेरिकी सरकार या पीड़ितों को चीन पर मुकदमा चलाने में सक्षम बनाना है।"

मौजूदा परिदृश्य में रूस उस चीनी धारणा से सहमत है कि ट्रम्प प्रशासन महामारी का मुक़ाबला करने में अपनी नाकामी से जनता का ध्यान भटकाने के लिए कोविड-19 पर बेतूकी बयानबाज़ी कर रहा है। लेकिन, अगर आने वाले महीनों में ट्रम्प के साथ तक़रार होने की स्थिति बनती है,तो बीजिंग के लिए रूस का समर्थन अहम हो जायेगा।

अब तक, न तो रूस और न ही चीन ने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय रिश्तों पर बातचीत करते हुए एक-दूसरे से मदद मांगी है। यहां एक आमूलचूल बदलाव होता दिख रहा है, यह बदलाव चीन और रूस दोनों के बीच विश्वास को ज़बरदस्त तौर पर बढ़ा सकता है और साथ ही साथ यह बदलाव दोनों के रिश्ते को एक नये गुणात्मक चरण में भी ले जा सकता है, जो अब तक आम चिंता के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर केंद्रित रहा है।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

Russia-China Entente Deepens in the Shadow of the Pandemic

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