NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
व्यंग्य
भारत
राजनीति
थैंक यू मोदी जी--हम कम से कम एशिया गुरु तो हुए!
कटाक्ष: वैसे ऐसा भी नहीं है कि हम हर मामले में एशिया गुरु के कुर्सी पर ही अटके हुए हों। और भी नंबर वन हैं दुनिया में कोविड की मौतों या दौलतवालों के नंबर वन के सिवा।
राजेंद्र शर्मा
06 Feb 2022
modi

विपक्ष वालों ने ये क्या हद्द ही नहीं कर दी। मोदी जी के विरोध के चक्कर में अब क्या भारत के पिछड़ने का भी जश्न मनाया जाएगा। बेचारे भगवाइयों ने गांधी जी को गोली लगने पर जरा सी मिठाइयां वगैरह क्या बांट दी थीं, सत्तर-पहचत्तर साल बाद भी बेचारों को ताने सुनने पड़ते हैं। हरेक 30 जनवरी को तो खासतौर पर। तब राष्ट्र के पिछड़ने पर हंसी-ठट्ठा करने वालों को, देशभक्त दिल से कैसे माफ कर पाएंगे!
 बताइए, कोविड से मौतों की सरकारी गिनती पांच लाख के पार होने पर, बेचारी सरकार ने न सिर्फ अपने देश की गिनती बतायी बल्कि यह भी बताया कि पांच लाख से ऊपर के क्लब में हम अकेले नहीं हैं-- ब्राजील और अमरीका भी हमारे साथ हैं। 

पर बाकी हर चीज में डाटा नहीं है कहने वाली मोदी सरकार ने इस मामले में बिना किसी के मांगे, अपने मन से अपना तो अपना, दूसरे देशों का भी डाटा दे दिया, तब भी उसका थैंक यू करना तो दूर, उल्टे भाई लोग उसकी हंसी उड़ा रहे हैं। कहते हैं कि उसने खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली। मरे दस, गिना एक के चक्कर में इंडिया को खुद ही ब्राजील और अमरीका से नीचे कर दिया और अपना बना-बनाया विश्व रिकार्ड दूसरों के हवाले कर दिया। गंगा में तैरतीं और नदी किनारे रेत में सोयी लाशों को ही गिनती में ले लेते, तो ये दिन नहीं देखने पड़ते। अब अपना रिकार्ड दुरुस्त करने के लिए कहें भी तो किस मुंह से? बनने चले थे विश्व गुरु और रह गए सिर्फ एशिया गुरु होकर! पर हम कहते हैं कि माना कि विश्व गुरु बनने का चांस था, पर एशिया गुरु की हमारी कुर्सी भी कोई छोटी तो नहीं है। बी पॉजिटिव। एशिया गुरु बनने की कामयाबी भी तो देखो। वैसे भी इक्कीसवीं सदी तो कहते हैं कि हमारे एशिया की ही सदी है।

फिर, एशिया गुुरु का हमारा दर्जा कोई कोविड की मौतों तक ही सीमित नहीं है। एकदम गर्मागर्म खबर यह है कि अडानी जी का एशिया के सबसे मालदार बंदे का और इंडिया का एशिया गुरु का दर्जा अब पक्का हो गया है। अडानी जी ने चीन-जापान वगैरह के सबसे मालदारों को तो पछाड़ा ही है, अपने गुजराती भाई मुकेश अंबानी को भी आखिरकार पछाड़ ही दिया। यह दूसरी बात है कि मुकेश भाई भी, अडानी जी से ही पीछे हैं, वर्ना एशिया में दूसरा नंबर उनका ही है। जो एशिया को दौलतमंद नंबर एक और दौलतमंद नंबर दो, दोनों दिलाए, वह एशिया गुरु कैसे नहीं कहलाए! फिर यह मानना भी तो सही नहीं होगा कि हमारे बंदे एशिया के दौलतमंद नंबर वन और नंबर टू सिर्फ अपने पुरुषार्थ से बन गए हैं। मोदी जी को इसका श्रेय नहीं चाहिए, पर मां भारती को तो अपने पुत्रों की इस सफलता का पूरा श्रेय मिलना ही चाहिए। नया इंडिया अगर कोविड की आपदा में अवसर खोजने और अवसर दिलाने में चूक जाता, तो क्या हमारे दो में से कोई भी एशिया में धनपति नंबर-1 बन पाता? नंबर वन बनने के लिए अडानी जी को कोविड के दूसरे साल में ही अपनी दौलत, दुगनी करनी पड़ी है। आपदा को अवसर बनाने में अडानी जी से ही पिछड़ गए, वर्ना आपदा को अवसर तो अंबानी जी ने भी बनाया था। पर कहां आपदा के दूसरे साल में दौलत का दोगुना होना और कहां सिर्फ दस फीसद का इजाफा। पर नंबर वन भी हमारा, नंबर टू भी हमारा, न्यू इंडिया हर हाल में एशिया गुरु।

वैसे ऐसा भी नहीं है कि हम हर मामले में एशिया गुरु के कुर्सी पर ही अटके हुए हों। और भी नंबर वन हैं दुनिया में कोविड की मौतों या दौलतवालों के नंबर वन के सिवा। बाकी छोडि़ए उस अमृत काल को ही ले लीजिए, जो नये इंडिया में अभी-अभी लगा है। पच्चीस साल न सही, पर अभी कुछ समय सब अमृतकालमय रहेगा, जैसे पहले अच्छेदिनमय रहा था और फिर नया इंडियामय। 

अब तो अमृतकालमय बजट भी  आ  गया, जो एक साथ बजट भी है और सपना भी है। पचहत्तर साल तो दुनिया में बहुतों के हुए होंगे, पर क्या पचहत्तरवें साल से कोई देश अब तक सीधे अमृतकाल में गया है? नहीं ना। हम जा चुके हैं। अमृतकाल, अमृतकाल का मंत्रजाप करते-करते अब तक किसी ने सालाना बजट को पच्चीस साल लंबा किया है? नहीं ना। हमने अभी-अभी किया है। किसी ने बजट को करीब-करीब आंकड़ा-मुक्त किया है? आंकड़ा-मुक्त सरकार का, आंकड़ा-मुक्त बजट या बजट-मुक्त बजट। हमने किया है। विश्व गुरु के आसन के लिए हम किसी कोविड, किसी धनपति के मोहताज नहीं हैं। अपने अमृतकाल के मैदान में तो हम ही हैं नंबर वन।

और सिर्फ अमृतकाल के मैदान में ही थोड़े ही। त्याग के मैदान में भी कौन है जो हमसे होड़ लेेगा। देखा नहीं, योगी जी का सर्वस्व त्याग कैसे चुनाव आयोग के सामने उनकी पर्चा भरने के समय की घोषणा में एकदम छलक  कर सामने आ गया है। त्याग के मामले में तो योगी जी, अपने मोदी जी से भी दो-चार कदम आगे ही बैठेंगे। न जोरू न जांता डायरेक्ट रामलला से नाता। न कोठी न बंगला। न कार, न थार। और तो और वार्डरोब भी एकदम सिंपल--भगवा वेश। नकदी के नाम पर बैंकों में बस कुछ चिल्लर और कुल डेढ़ करोड़ की जमा राशि। और तो और पहले बाबा जी के पास डेढ़-दो दर्जन केस-वेस थे भी, सीएम बनने के बाद बंदे ने सारे केसों का भी त्याग कर दिया और केसों का जमा-खाता शून्य कर दिया। बस उन सब मामलों के स्मृति चिन्ह के रूप में, एक लाख रुपए की एक रिवाल्वर बची है। चाहेें तो उसे ही योगी जी की संपत्ति कह सकते हैं। और बाबा ने पांच साल में बहुतेरे नाम बदले हैं, उनका नाम बदलकर रिवाल्वर बाबा कर सकते हैं। खैर! बाबा का नाम अपनी जगह, रिवाल्वर वाले बाबा के बाद इंडिया के विश्व गुरु होने पर किसी को शक रह सकता है क्या? है किसी में हिम्मत! 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं। 

sarcasm
Satire
Political satire
Narendra modi
Modi government

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

तिरछी नज़र: 2047 की बात है

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कटाक्ष: एक निशान, अलग-अलग विधान, फिर भी नया इंडिया महान!

तिरछी नज़र: हम सहनशील तो हैं, पर इतने भी नहीं


बाकी खबरें

  • नागरिकता और संविधान
    गौतम भाटिया
    नागरिकता और संविधान
    16 Aug 2021
    ऑन सिटिजनशिप नामक किताब में भारत के चार बेहतरीन बुद्धिजीवी भारत में नागरिकता का गठन करने वाले प्रमुख पहलुओं में गहराई से उतरते हैं। नागरिकता को लेकर सत्तारूढ़ सरकार की तरफ़ से लिए गए हालिया…
  • प्रधानमंत्री मोदी के गोद लिए गांव जयापुर का हाल।
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: प्रधानमंत्री के गोद लिए गांव जयापुर में ‘मोदी चरखे’ ने पहाड़ बना दी औरतों की ज़िंदगी
    16 Aug 2021
    "पांच-सात साल में बहुतै मीडिया वाले अइलन। पहिले टीवी पर जयापुर रोज दिखत रहल। अब अखबार और टीवी से जयापुर ओझल हो गइल। तनिक दू मिनट बदे हमरे घरे भी चला। घूम के देख ला, तोहके सच पता चल जाई। हम लोगन…
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: पूछता है भारत- क्या बेरोज़गारों के हिस्से में ‘लॉलीपॉप’ के अलावा भी कुछ और है?
    16 Aug 2021
    यह बेहद खुशी की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को अपने आवास पर भारत के ओलंपिक दल से नाश्ते पर मुलाकात की। लेकिन देश के किसान भी पूछ रहे हैं कि उनसे कब मुलाकात होगी। और बेरोज़गार पूछ रहे हैं कि…
  • काबुल में तालिबान, दुनिया भूल गयी अफ़ग़ानिस्तान
    न्यूज़क्लिक टीम
    काबुल में तालिबान, दुनिया भूल गयी अफ़ग़ानिस्तान
    16 Aug 2021
    काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया है। एक बार फिर 1996 -2001 के दौर की याद आ गयी है जब तालिबान के राज में महिलाओं और आम इंसानों के हक़ों को कुचला जाता था। मगर सबसे चिंताजनक ये के न भारत सरकार के पास…
  • ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन की एक नेता ने कैसे बच्चों के लिए ‘फ्रीडम स्कूल’ समर कार्यक्रम की शुरुआत की  
    सोनाली कोल्हटकर
    ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन की एक नेता ने कैसे बच्चों के लिए ‘फ्रीडम स्कूल’ समर कार्यक्रम की शुरुआत की  
    16 Aug 2021
    जैस्मिन रिचर्ड्स का मानना है कि उनके समुदाय में युवा अश्वेत और भूरे बच्चों के बीच शिक्षा एवं सशक्तिकरण का काम भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि नस्लवादी पुलिसिया क्रूरता के खिलाफ संघर्ष करना।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License