NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
शहीद रामप्रसाद बिस्मिल : वो क्रन्तिकारी जो शोषण और गैर बराबरी के खिलाफ अंत तक लड़ता रहा 
बिस्मिल अपने लेख में एक मार्मिक प्रश्न सामने रखते हैं कि जिस देश में लाखों लोग अछूत हों वो कैसी आज़ादी की कामना करता है?
अंकुर गोस्वामी
11 Jun 2021
शहीद रामप्रसाद बिस्मिल
Image courtesy : The Indian Express

हम उस दौर में जी रहे हैं जब बाहरी आवरण और स्वरूप , भीतरी गुण और भाव से अधिक महत्व पाते हैं। महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को उनकी समस्त राजनैतिक विरासत को परे रख, तिलकधारी आक्रामक युवा के रूप में देखा जाता है।

गहराई से देखने पर हम बिस्मिल को उनकी हिन्दुत्ववादी छवि के विपरीत वास्तविक रूप में देख पाते हैं। अक्सर ही उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि दिखाने हेतु, उन्हें अशफाकुल्लाह के अभिन्न मित्र स्वरूप पेश किया जाता है, परन्तु यह भी दोनों क्रांतिकारियों की विरासत को दरकिनार कर सिर्फ ऊपरी तौर पर उन्हें याद रखना है।

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून को मौजूदा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक गरीब परिवार में हुआ । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही पिता द्वारा हुई और उर्दू की शिक्षा एक मौलवी से प्राप्त की। 

सामाजिक रूढ़िवाद से खिन्न होकर बिस्मिल कम उम्र में ही आर्य समाज से जुड़ गए, और अपने गुरु सोमदेव की प्रेरणा से साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार के संघर्ष में शामिल हो गए। 

1916 में लखनऊ में हुए कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान उनकी पहचान क्रन्तिकारी संगठन मातृवेदी से हुई. इस संगठन में रहते ही उन्होंने अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली? नामक अपनी पहली पुस्तक लिखी , जिसमें भारत की आज़ादी हेतु हथियारबंद विद्रोह पर ज़ोर दिया।

1918 में मैनपुरी षड़यंत्र में भगोड़ा घोषित रहने के दौरान ‘देशवासियों के नाम संदेश’ नामक पर्चा लिखा , जिसमें आज़ादी के लिए सभी समुदायों को साथ आने के लिए अपील की गई।

1920 में सभी राजनैतिक कैदियों को छूट और माफ़ी मिलने के साथही बिस्मिल पुनः खुल कर काम करने लगे, और रूसी क्रांति पर पुस्तक ‘बोल्शेविकों की करतूत’ लिखी। जल्दी ही वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन से जुड़ गए और 1925 की काकोरी डकैती में अहम भूमिका निभाई, जिसके लिए ही उन्हें 19 दिसंबर 1927 को फांसी हुई। जेल में रहते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा एवं क्रन्तिकारी आंदोलन और उसके भविष्य पर कई महत्वपूर्ण लेख व पर्चे लिखे।

साम्राज्यवाद और बिस्मिल   

आर्य समाज का सदस्य होते हुए भी उनके विचार एवं राजनीती पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष थी। 1920 में संयुक्त प्रान्त (मौजूदा आज का उत्तर प्रदेश) के राजनैतिक परिवेश में तीन मुख्य धाराएं थी हिंदूवादी , धर्मनिरपेक्ष (स्वराज पार्टी) और ‘एच.आर.ए’. रुपी क्रन्तिकारी दल। 1925 के नगरपालिका चुनावमें हिंदूवादी खेमे के विजयी रहने से क्षेत्र में साम्प्रदायिक तनाव में बढ़ोतरी हुई, बिस्मिल स्वराज पार्टी की तरफ से सहारनपुर के उम्मीदवार थे। ततपश्चात उन्होंने अपने मित्र अशफ़ाक़ुल्लाह खान के साथ दंगा पीड़ित रोहिलखण्ड इलाके का दौरा कर लोगों से शांति और आपसी सौहार्द बनाये रखने की अपील की।

बिस्मिल अपने राजनैतिक जीवन में एक साम्प्रदायिकता विरोधी एवं धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में उभर कर आते हैं , अपने एक लेख में वे साम्प्रदायिकराजनीती करने वालों को मृत्युदंड देने की बात तक करते हैं। अपनी आत्मकथा में वे अपने प्रारंभिक साम्प्रदायिक विचारों को सहजता से स्वीकारते हुए ,खुद में लाये बदलाव एवं सुधार का ज़िक्र करते हैं।

जातिभेद - लिंगभेद पर बिस्मिल के विचार

बिस्मिल राजनैतिक सूझबूझ के साथ ही, काफी प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे. जाति एवं लिंगभेद पर बिस्मिल की सोच आर्य समाज की शिक्षा और उनके अपने परिवार से उपजी थी, खास कर अपनी माँ एवं दादी से। रूसी क्रांति और उसमें रहे महिलाओं के योगदान की समझ बिस्मिल के लिए भारत के सामाजिक परिवेश को समझने में सहायक रही. अपनी आत्मकथा में बिस्मिल कन्या भ्रूण हत्या , विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार , पर्दा प्रथा और जाति हिंसा की भर्त्सना करते हैं। उनके अनुसार इस हिंसा का उद्भव ज़मींदारों में जातिय श्रेष्ठता के भाव से था। बिस्मिल अपने लेख में एक मार्मिक प्रश्न सामने रखते हैं कि, "जिस देश में लाखों लोग अछूत हों वो कैसी आज़ादी की कामना करता है ?" 
वे अछूत समझे जाने वाले लोगों को शिक्षित करने और उन्हें आर्थिक सामाजिक बराबरी प्रदान करने के ठोस कदम उठाने की बात कहते हैं । वे उन सभी मान्यताओं को खारिज करते हैं जो महिलाओं को दोयम दर्जे पर कायम रखती हैं। यहाँ बिस्मिल रशियन नेत्री कैथरीन ब्रेशोवस्की से प्रभावित दिखते हैं। उन्होंने उनकी पुस्तक द लिटिल ग्रैंडमदर ऑफ रशियन रेवोल्यूशन का अनुवाद किया, और उस से प्रेरित तरीके भारत में जन आंदोलन खड़ा करने हेतु प्रयोग करने की बात लिखी।

क्रांति और बिस्मिल 

हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि बिस्मिल के लिए आज़ादी का क्या अर्थ था। उनके अनुसार सरकार को अमीर ज़मींदारों का समर्थन प्राप्त रहता है। और चूंकि क्रांति द्वारा लाए गए समाजिक परिवर्तन से उनकी ताकत छिन जाती इसलिए ब्रिटिश सरकार और जमींदार क्रांति विरोधी थे। बिस्मिल के लिए क्रांति का अर्थ सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूक परिवर्तन लाना था।

फाँसी माफी पर बिस्मिल और सावरकर की तुलना

अक्सर हिंदुत्व समर्थक सावरकर के अंग्रेज़ों को लिखे माफीनामे को उचित सिद्ध ठहराने हेतु करते हैं।
यह सही है कि बिस्मिल ने काकोरी केस के दौरान माफीनामे लिखे, जिसका अशफाकुल्लाह ने काफी विरोध किया, परंतु अपने परम मित्र के सामने उन्हें झुकना पड़ा।

 यहां सावरकर और बिस्मिल में एक फर्क यह है कि जहाँ सावरकर माफीनामा स्वीकार होने के पश्चात सरकार विरोधी गतिविधियों से दूर रहे वहीं बिस्मिल मैनपुरी षड्यंत्र से मुक्त होने के पश्चात और भी तेज़ी से क्रांतिकारी आंदोलन में जुट गए।

 ऐसा ही हमें शचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ भी देखने मिलता है। वे भी अपने खिलाफ केस बन्द होने के बाद क्रांतिकारी संगठन में लगे रहे। काकोरी केस में गिरफ्तार होने के पश्चात ऐसे कई मौके आए जब पुलिसिया लापरवाही के चलते उनके पास भागने के मौके थे। वे अपनी आत्मकथा में लिखते है कि उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि उन निरीह सिपाहियों को सरकार के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ता।

बिस्मिल और क्रांतिकारियों की तरह ही अपना जीवन रहने तक निरन्तर अंग्रेजी सरकार की खिलाफत में लिखते रहे, उन्होंने क्रांति का रास्ता छोड़ जीवन जीने की लालसा नहीं रखी।

(लेखक जवाहर लाल नेहरू विशवविद्यालय के शोध छात्र हैं)

Ram Prasad Bismil
freedom fighter

Related Stories

ख़ान और ज़फ़र के रौशन चेहरे, कालिख़ तो ख़ुद पे पुती है

'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला

भगत सिंह झुग्गियाँ- वह स्वतंत्रता सेनानी जो सदा लड़ते रहे

आज़ादी का पहला नायक आदिविद्रोही– तिलका मांझी

शहीद भगत सिंह : ट्रोल आर्मी का झूठ और इतिहास की सच्चाई

भगत सिंह : “एक ना एक शम्मा अंधेरे में जलाये रखिये, सुब्ह होने को है माहौल बनाये रखिये”

गोलवलकर और सावरकर की गहन असहमति थी हमारे स्वाधीनता संग्राम से

शहीद भगत सिंह : ट्रोल आर्मी का झूठ और इतिहास की सच्चाई

विशेष : नेहरू का गुनाह और नेहरू के गुनाहगार

अम्मू की कहानी


बाकी खबरें

  • sc
    भाषा
    वकीलों को वरिष्ठ का दर्जा देने संबंधी याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा उच्चतम न्यायालय
    23 Aug 2021
    “वकीलों का दर्जा निर्दिष्ट समिति द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर तय होना चाहिए और मतदान का सहारा केवल तब लिया जाना चाहिए जब कोई और रास्ता न हो। उच्च न्यायालय मतदान एक अपवाद के रूप में नहीं बल्कि एक…
  • सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी विचारों के ख़िलाफ़ खड़े होने का समय: विजयन
    भाषा
    सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी विचारों के ख़िलाफ़ खड़े होने का समय: विजयन
    23 Aug 2021
    समाज सुधारक एवं धार्मिक नेता श्री नारायण गुरू की 167वीं जयंती के अवसर पर फेसबुक पर एक पोस्ट में विजयन ने लिखा, ‘‘यह समय भाईचारा और समानता को कमजोर करने वाली सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी…
  • तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
    बी. सिवरामन
    तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
    23 Aug 2021
    हाल ही में लाए गए सिनेमैटोग्राफ़ संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में दो ध्रुवों पर खड़े कमल हासन और सूर्या एक साथ आ गए, इस घटना ने तमिल फिल्म जगत में चेतना की एक लहर दौड़ा दी है।
  • "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" विकसित करने का कर्तव्य
    प्रशांत पद्मनाभन
    "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" विकसित करने का कर्तव्य
    23 Aug 2021
    तर्कवादी सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की 8वीं पुण्यतिथि के बाद प्रशांत पद्मनाभन ने उनकी विरासत को याद करते हुए लिखा है कि "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" क्या होती है और कैसे इसका विकास किया जा सकता है।
  • Kalyan Singh
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    पिछड़ों के सांप्रदायीकरण की योजना और दुविधा के प्रतीक थे कल्याण सिंह
    23 Aug 2021
    वास्तव में कल्याण सिंह पिछड़ा वर्ग की उस दुविधा के प्रतीक थे जिसके तहत कभी वह जाति के अपमान से छूटने और सत्ता पाने के लिए सांप्रदायिक होने को तैयार हो जाता है तो कभी हिंदुत्व की ब्राह्मणवादी योजना से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License