NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
बेहतरीन कलाकार, कैफ़ी आज़मी की हमसफ़र और शबाना आज़मी की मां शौक़त कैफ़ी आज़मी को याद करते हुए ‘इतवार की कविता’  में आज पढ़ते हैं कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘औरत ’।
न्यूज़क्लिक डेस्क
24 Nov 2019
shaukat Azmi kaifi Azmi
फोटो : साभार 

बेहतरीन कलाकार, कैफ़ी आज़मी की हमसफ़र और शबाना आज़मी की मां शौक़त कैफ़ी आज़मी को याद करते हुए ‘इतवार की कविता ’  में आज पढ़ते हैं कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘औरत ’। किस्सा है कि इस नज़्म को सुनकर शौक़त ने अपनी मंगनी तोड़ दी और कहा कि मुझे तो इसी आदमी (कैफ़ी आज़मी) से शादी करनी है। शौक़त आज़मी ने अभी 22 नवंबर, 2019 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। वे 91 वर्ष की थीं। 

 

औरत

 

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज

हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज

आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज

हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज

 

जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार

तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार

तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार

ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसार

 

कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है

तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है

पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है

 

ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं

नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं

उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं

जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

 

उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए

फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए

क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए

ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए

 

रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं

तुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं

तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

 

अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल

ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल

नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल

क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल

 

राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़

तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़

तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़

तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़

 

बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

तू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवीं

तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं

हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं

मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं

 

लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

कैफ़ी आज़मी

इसे भी पढ़े: इतवार की कविता : ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं

इसे भी पढ़े: इतवार की कविता : 'तुम अपने सरकार से ये कहना, ये लोग पागल नहीं हुए हैं!'

इसे भी पढ़े: इतवार की कविता : सस्ते दामों पर शुभकामनायें

poem
hindi poetry
Shaukat Azmi
kaifi azmi
Shabana Azmi
Theater and Film Actress
कविता
इतवार की कविता
literature
literature festival
Sunday Poem

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

इतवार की कविता: वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

फ़ासीवादी व्यवस्था से टक्कर लेतीं  अजय सिंह की कविताएं

सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो

देवी शंकर अवस्थी सम्मान समारोह: ‘लेखक, पाठक और प्रकाशक आज तीनों उपभोक्ता हो गए हैं’

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!


बाकी खबरें

  • मोदी संग योगी: काशी का अनुष्ठान छवियों के अंत का अनुष्ठान साबित हुआ
    सत्यम श्रीवास्तव
    मोदी संग योगी: काशी का अनुष्ठान छवियों के अंत का अनुष्ठान साबित हुआ
    16 Jul 2021
    बनारस में नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह एक राजनीतिक दल यानी भाजपा के ही प्रधानमंत्री के तौर पर नज़र आए जिन्होंने अपनी विराट असफलताओं में योगी की असफलताओं को भी झूठ की कई परतों में लपेट लिया।
  • कोविड-19 और स्कूली शिक्षा का संकट: सब पढ़ा-लिखा भूलते जा रहे हैं बच्चे
    डॉ. राजू पाण्डेय
    कोविड-19 और स्कूली शिक्षा का संकट: सब पढ़ा-लिखा भूलते जा रहे हैं बच्चे
    16 Jul 2021
    बतौर नागरिक हम इनके लिए बहुत कुछ कर सकते हैं किंतु शायद हम इसलिए चुप हैं कि हमारी संतानें उन अभागे बालक-बालिकाओं में शामिल नहीं हैं जो शिक्षा की मुख्य धारा से बाहर निकल गए हैं। बतौर सरकार शायद हम…
  • Surekha Sikri
    भाषा
    राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री सुरेखा सीकरी नहीं रहीं
    16 Jul 2021
    सीकरी ने थिएटर, फिल्म से लेकर टेलीविजन तक सभी मंचों पर अपने शानदार अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने ‘तमस’, ‘मम्मो’, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’, ‘ज़ुबेदा’, ‘बधाई हो’ जैसी फिल्में की और धारावाहिक ‘बालिका वधू’…
  • चुनाव 2022: सामाजिक शक्तियों का संतुलन ही उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की नई इबारत लिखेगा
    लाल बहादुर सिंह
    चुनाव 2022: सामाजिक शक्तियों का संतुलन ही उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की नई इबारत लिखेगा
    16 Jul 2021
    सामाजिक शक्तियों का संतुलन निर्णायक तौर पर विनाशकारी योगी-राज के ख़िलाफ़ होता जा रहा है। ज़ाहिर है सरकारी मशीनरी और गुंडा-वाहिनी के बल पर जनता के मताधिकार और जनादेश का अपहरण कर पाना आसान नहीं होगा,…
  • सीतामढ़ी में खुदरा विक्रेता प्रदर्शन करते हुए
    राहुल कुमार गौरव
    बिहार : किसानों को नहीं मिल रहा उचित दाम पर यूरिया खाद, खुदरा व्यापारी भी ऊंची कीमत पर बेचने को विवश
    16 Jul 2021
    बिहार कृषि सचिव और निदेशक बारम्बार कालाबाजारी पर अंकुश लगाने की लगातार चेतावनी दे रहे हैं और छापेमारी करने का भी निर्देश है। इसके बावजूद 266 वाली यूरिया की बोरी 350 रुपए में बिक रही है। जानते हैं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License