NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
इतवार की कविता: वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 
“वक़्त कम है/  फ़ैसलाकुन समय की दस्तक / अनसुनी न रह जाए...”  वरिष्ठ कवि शोभा सिंह अपनी कविताओं के जरिये हमें हमारे समय का सच बता रही हैं, चेता रही हैं। वाकई वक़्त कम है... “हिंदुत्व के बुलडोजर की/ रफ़्तार तेज़ है”।
न्यूज़क्लिक डेस्क
15 May 2022
kavita
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार गूगल

वरिष्ठ कवि शोभा सिंह ने हमारे समय को अपनी कविताओं में इस ढंग से पिरोया है कि वो कभी ‘स्तब्ध शाम’ के तौर पर हमारे ज़ेहनो-दिल पर उतरती हैं और कभी ‘पतझर’ की सूरत। लेकिन हर कविता उनकी यही मांग करती है कि— वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का। आपके दो कविता संग्रह ‘अर्द्ध विधवा’ और ‘ये मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। और आपकी लेखनी और तेज़ी से आगे बढ़ रही है। तो आइए इतवार की कविता में पढ़ते हैं शोभा सिंह की तीन नई कविताएं।  

तस्वीर, केवल सांकेतिक प्रयोग के लिए। साभार गूगल

वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 

 

वे कथकली  नृत्य का 

मुखौटा सा  लगाये 

हिंदुत्व गौरव कथाओं से 

मोहते बहु संख्यक 

छिड़कते भ्रम  के नशीले रंग 

मंत्रमुग्ध समूह में गर्वीला भाव 

आस्था सिद्ध करने की अपील दागते 

खोखले लफ़्ज़ों की कशीदाकारी 

शीशमहल जज़्बात के 

कोई भी जागरूक निगाह 

भांप लेती छद्म 

 ठहरे समाज की 

सम्मोहित जड़ता 

तोड़ने की कोशिश 

नाकाम होती 


कवि की ऊर्जा

हार नहीं मानती 

अलाव की आंच 

कश्मीर की कांगडी 

उसके रक्त को गर्म रखती 

लबादे में छुपी 

सुलगती यह  आंच 

उसे बांटनी है 

व्यापक समूह में 

और तोड़नी है 

अभिव्यक्ति की झिझक 

खोखले लफ़्ज़ों के गान का सम्मोहन 

भड़काऊ लशकारा मारते 

झूठ, नफ़रत 

जिसकी कीमत सत्य चुकाता है 

निश्चय ही 

इमारत कांच की  टूटेगी 

बस ज़ोरदार धमाके की ज़रूरत है 

लफ़्ज़ और मानी में 

वक़्त कम है  

फ़ैसलाकुन समय की दस्तक 

अनसुनी न रह जाए 

हिंदुत्व के बुलडोजर की 

रफ़्तार तेज़ है।

तस्वीर: मुकुल सरल

स्तब्ध शाम 

                 

स्तब्ध पत्तियों के पास  

 ठिठकी शाम  

उस दिन 

कैसे समेटा उसने 

अपने आप को 

सौंदर्य के समूचेपन में 

जो पसरी थी 

 

यह भी सच है 

अब 

कैसे रहे निर्लिप्त 

अलग समय चक्र की 

मूक गवाह 

बोझ भारी

 बांटा है उसे भी 

हिंदू शाम मुस्लिम शाम में 

ख़ूनी तलवारें

हवा में भांजते

जैसे शाम को चीरते 

नफ़रती  गर्जनाएं 

उन्मादी  हुंकारें

 

शोर से वहां का 

आकाश जड़ हुआ 

ज़मींदोज़ ख़ुशहाल आशियाने 

गर्द गुबार, बुलडोजर की मार 

दृष्टि बिंदु असहाय

 मछली की तड़पन - भीगी 


मानवता बौनी 

दुबक गई 

झुरमुट में 

गुमसुम शाम 

देखती है नरसंहार का तांडव 

झुलसा बसंत 

 

कवि की कायनात में

छाई रही

तलख़्तर सच्चाइयां 

उस दिन सब सुर्ख़ हुआ 

लहू  

रगों में खोलता हुआ 

प्रतिरोध में 

तनी  मुट्ठियां 

चीख़ें हैं 

जो अब 

गले में घुट कर 

नहीं रहेगी।

 

तस्वीर: मुकुल सरल

पतझर 

 

भीतर के तहख़ानों में 

जब पसरता है 

ठंडा सन्नाटा 

तब यूं ही 

स्मृति में उतर आते 

जागे से यायावरी हवा के हल्के थपेड़े 

ख़ुशदिली से दमकते खिले 

नन्हे बैजनी फूलों की झाड़ 

के आस पास कहीं यूहीं 

सधे  कदम आगे बढ़ते 

आह कैसे 

ख़ुदा हाफ़िज़ करते 

भूरे कत्थई पीले पत्ते 

पतझरी उदासी में भी 

पतझर इतना ख़ूबसूरत 

चिनार की बेअवाज़ पत्तियां झरती जाती 

 रंगीन फोहारों सी थिरकन लिए 

हवा का संग साथ पाकर उन्मुक्त 

 ख़ुशनुमा रास्ते ही नहीं

पूरी कायनात हसीन बनाते 

प्रकृति की

 गोया सिंफनी बजती 

दूर तक फैले पहाड़ों की गोद में 

बुरांश के पेड़ 

लाल दहक से खिला जंगल 

और बोझ नहीं कि  गुहार करते 

झर झर लाल ऊष्मा

सुनहरेपन की धज लिए 

धरती पर बिछे 

 पांवों तले चुर-मुर पत्ते 

लरजती हरी डाल पर 

लाल गुड़हल  

 पंच तत्व का बोध कराती पंखुड़ियां 

 

आभासी नदी से 

उठती धुंध में 

अलोप हो  जाते हंस युगल

प्रेम 

प्रकृति चुपके से 

हर लेती 

मन का सकल संताप 

मेरी आधी अधूरी दुनिया 

सवाल नहीं पूछती 

चुन लेती नन्हे फूलों के

कुमकुमी  सूर्यचक्र से 

ख़ुशियों के पल-छिन

अनमोल लम्हे 

सौंदर्य के नए प्रतिमान 

स्मृति  में दहक बन  

ख़ामोशी से दाख़िल हो

संजो लिए जाते 

गाढ़े वक्त के लिए।

 

-    शोभा सिंह 

(दिल्ली/लखनऊ)

Sunday Poem
kavita
Hindi poem
कविता
हिन्दी कविता
इतवार की कविता
Bulldozer Politics
Hindutva

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

...हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!

इतवार की कविता: जश्न-ए-नौरोज़ भी है…जश्न-ए-बहाराँ भी है

इतवार की कविता: के मारल हमरा गांधी के गोली हो

…सब कुछ ठीक-ठाक है


बाकी खबरें

  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: काम किसी का, नाम किसी का!
    13 Sep 2021
    यूपी की योगी सरकार विज्ञापन के जरिये अपनी छवि चमकाना चाहती है, लेकिन यह दांव उसपर उल्टा पड़ गया है। कार्टूनिस्ट इरफ़ान के मुताबिक अब तो शायद यूपी सरकार को हर विज्ञापन के साथ यह सूचना छापनी पड़े- “…
  • तालिबान ने झंडा फहराया, क्या हैं इसके मायने?
    एम. के. भद्रकुमार
    तालिबान ने झंडा फहराया, क्या हैं इसके मायने?
    13 Sep 2021
    इसमें कोई शक नहीं कि अफ़ग़ानिस्तान में झंडा फहराना तालिबान का उस सत्ता पर दावा है जिस दावे के ज़रिए उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने के 20 साल बाद वे सत्ताधारी अभिजात वर्ग के रूप में वापस लौट आए हैं, और यह एक…
  • भूपेंद्र पटेल
    अनिल सिन्हा
    गुजरातः ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ बचाने में जुटे हैं मोदी-आरएसएस 
    13 Sep 2021
    भूपेंद्र पटेल पहली बार के विधायक हैं। उन्हें कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है। उनकी एक ही ख़ासियत है कि वह पटेल समुदाय से आते हैं और अगले साल हो रहे विधानसभा चुनावों के लिए जाति-समीकरण साधने में काम आएंगे।
  • जतिन दास
    हर्षवर्धन
    जतिन दास से फादर स्टेन स्वामी तक: राजनैतिक क़ैदियों की दुर्दशा
    13 Sep 2021
    जतिन दास की शहादत आज से 92 साल पहले लाहौर जेल में राजनैतिक बंदियों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए हुई थी। निर्मम ब्रिटिश सरकार ने कपट से जतिन दास की हिरासत को मौत की सज़ा में बदल दिया था। आज़ाद भारत की…
  • दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच: बद से बदतर होती भ्रांतियां
    द लीफलेट
    दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच: बद से बदतर होती भ्रांतियां
    13 Sep 2021
    परसा वेंकटेश्वर राव जूनियर लिखते हैं कि दिल्ली पुलिस द्वारा  तैयार की गयी फ़रवरी 2020 के दिल्ली सांप्रदायिक दंगों से जुड़ी भ्रमित करने वाली घटिया एफ़आईआर और चार्जशीट केंद्रीय गृह मंत्री की ओर से की…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License