NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
साहित्य-संस्कृति
राजनीति
चलो ख़ुद से मुठभेड़ करते हैं...
‘इतवार की कविता’ में पढ़ते हैं वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी शोभा सिंह की कविता- “अरबन-नक्सल”, जिसमें वह ख़ुद से मुठभेड़ के बहाने न केवल भीतर को टटोलती हैं, बल्कि बाहर को भी खंगालती हैं और ज्वलंत प्रश्न उठाती हैं। 
न्यूज़क्लिक डेस्क
07 Jun 2020
इतवार की कविता
प्रतीकात्मक तस्वीर : divyasandesh

अरबन-नक्सल 

 

निहायत छोटी बड़ी बातों से

बस यूं ही

सुखी दुखी होते

एक दिन सोचा

चलो ख़ुद से मुठभेड़ करते हैं

स्वत: सवाल  दगा

मुक्तिबोध के शब्दों में

“अब तक क्या किया

जीवन क्या जिया

ओ मेरे आदर्शवादी मन”

किसकी भेड़े चराईं

शोषण के विरुद्ध

कभी बिगुल बजाया

आवाज़ सुनी आपातकाल की

स्याह सन्नाटे को रौंदती

आग की चीख़

प्रतिरोध की कोई नई धुन

ईजाद की

चुनौती वक़्त की थी

ललकार-किसी सोती जागती चेतना को

और तुम

किसके व्यक्तित्व की छाप

ढोते रहे

तपते रेगिस्तान में

मार्क्स  लेनिन सर्वहारा

विचार से अभिभूत

वाम, अम्बेडकर धारा

जीवन का प्रस्थान बिंदु

प्रतिबद्धता-पीड़ित समुदाय के लिए

फिर क्यों

अस्पष्ट बुदबुदाहट रही

इंकलाब ज़िन्दाबाद की

पहुंच से दूर जाती हुई

अब

पास में है

बस एक टुकड़ा आसमान

भ्रमों का निवारण

कैसे हो

आज का सवाल सख़्त था

यूं -संवेदनाएं अभी बर्फ़ सी जमी नहीं

उसमें धड़कन थी

विस्तार था

हालात बद से बदतर

आक्रोश वाजिब

फिर जीवन संघर्ष के तमाम

मुखरित प्रश्नों के हथौड़े

माहौल की धधकन

फैलता निर्दोष रक्तिम रंग

जन-जन की असहमति

विरोध के स्वर

यह कैसा लोकतंत्र, किस किस्म का

ख़तरे की हद तक

जिसकी तोड़-मरोड़ जारी है

सत्ता से सवाल थे  यह

सवालों की नागवारी ने

चिह्नित किया

अर्बन नक्सल

भारी नाम से नवाजे गए वे

कारपोरेट घरानों की

निर्बाध लूट में, बाधक स्वरों पर

इल्ज़ाम लगा

देशद्रोही

प्रधान सेवक की हत्या के

षड्यंत्रकारी  का

आरोप चस्पां

गिरफ़्तारी,

नज़रबंदी में

लेखक, कवि, पत्रकार, वकील, पादरी

सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता

सच के सबल ज़मीनी यर्थाथ से जुड़े लोग

झूठ के ख़िलाफ़

लामबंद हुए

ख़ौफ़ की गिरफ़्त से बाहर

बने देश के प्रतिरोधी स्वर

बहरों ने क्या सुना

या

डराने की राजनीति करते रहे

प्रबुद्धजन का हुजूम

गले में तख़्तियां डाले

हां, हम अर्बन नक्सल

हम सब शहरी नक्सल

मी टू

हां हां हां

हम भी

ख़ौफ़ की परछाइयों को

ध्वस्त करती

आवाज़ें

-शोभा सिंह

 

इन्हें भी पढ़ें :

: सफ़ूरा ज़रग़र की अजन्मी बिटिया की ओर से... तुम कब जनमोगी अम्मा...मैं कब आज़ाद होउंगी!

: काश! ये आँखें धंस जातीं हमारे हुक्मरानों की आँखों में, उनके ज़ेहन में  

: हम बच तो जाएंगे, लेकिन कितना बच पाएंगे ?

: ...जैसे आए थे वैसे ही जा रहे हम

: …तब भूख एक उलझन थी, अब एक बीमारी घोषित हो चुकी है

: अब आप यहाँ से जा सकते हैं, यह मत पूछिए कि कहाँ जाएँ...

Sunday Poem
poem
Hindi poem
Urban-Naxalite
Unequal society
Racism

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

...हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

इतवार की कविता : "मुझमें गीता का सार भी है, इक उर्दू का अख़बार भी है..."

अपना बुटीक खोलने और अपनी ज़िंदगी खुलकर जीने के लिए हासिल की ट्रांस महिला की पहचान

महिला दिवस विशेष: क्या तुम जानते हो/ पुरुष से भिन्न/ एक स्त्री का एकांत

मानवता की राह में बाधक जाति-धर्म की दीवारें

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस: कहां हैं हमारे मानव अधिकार?

हर सभ्यता के मुहाने पर एक औरत की जली हुई लाश और...


बाकी खबरें

  • Hijab
    अजय कुमार
    आधुनिकता का मतलब यह नहीं कि हिजाब पहनने या ना पहनने को लेकर नियम बनाया जाए!
    14 Feb 2022
    हिजाब पहनना ग़लत है, ऐसे कहने वालों को आधुनिकता का पाठ फिर से पढ़ना चाहिए। 
  • textile industry
    एम.ओबैद
    यूपी चुनावः "कानपुर की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री पर सरकार की ग़लत नीतियों की काफ़ी ज़्यादा मार पड़ी"
    14 Feb 2022
    "यहां की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री पर सरकार की ग़लत नीतियों की काफ़ी ज़्यादा मार पड़ी है। जमीनी हकीकत ये है कि पिछले दो साल में कोरोना लॉकडाउन ने लोगों को काफ़ी परेशान किया है।"
  • election
    ओंकार पुजारी
    2022 में महिला मतदाताओं के पास है सत्ता की चाबी
    14 Feb 2022
    जहां महिला मतदाता और उनके मुद्दे इन चुनावों में एक अहम भूमिका निभा रहे हैं, वहीं नतीजे घोषित होने के बाद यह देखना अभी बाक़ी है कि राजनीतिक दलों की ओर से किये जा रहे इन वादों को सही मायने में ज़मीन पर…
  • election
    सत्यम श्रीवास्तव
    क्या हैं उत्तराखंड के असली मुद्दे? क्या इस बार बदलेगी उत्तराखंड की राजनीति?
    14 Feb 2022
    आम मतदाता अब अपने लिए विधायक या सांसद चुनने की बजाय राज्य के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के लिए मतदान करने लगा है। यही वजह है कि राज्य विशेष के अपने स्थानीय मुद्दे, मुख्य धारा और सरोकारों से दूर होते…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 34,113 नए मामले, 346 मरीज़ों की मौत
    14 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.12 फ़ीसदी यानी 4 लाख 78 हज़ार 882 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License