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तालिबान के साथ अमेरिका के बदलते रिश्ते और पैकेज डील!
ऐसे मालूम होता है कि अमेरिका ने तालिबान के साथ एकमुश्त समझौता किया हुआ है, जहां एक मुमकिन भविष्य में काबुल में अमेरिकी दूतावास खोलना एक तार्किक निष्कर्ष होगा।
एम. के. भद्रकुमार
31 Aug 2021
US Army
प्रतीकात्मक तस्वीर (Image Courtesy: flickr)

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन ने सीबीएस के साथ “फेस दि नेशन” कार्यक्रम में दिए गए एक इंटरव्यू में वाशिंगटन एवं तालिबान के बीच विकसित संबंधों के बारे में बातचीत की है। उनके इस इंटरव्यू से तीन बातें निकलती हैं।

पहली, सुलिवन ने खुलासा किया कि अमेरिका आइएसआइएस के आतंकवादियों के खिलाफ अफगानिस्तान के बाहर “दिक्-दिगंत तक हमले जारी रखेगा” लेकिन उन्होंने लड़ाई अभियान की वापसी की संभावना से इनकार किया।

दूसरी, सुलिवन ने दावा किया कि 31 अगस्त को अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से पूरी तरह वापसी के बाद, “हम किसी भी अमेरिकी नागरिक को, वहां वैध तरीके से स्थायी तौर पर रह रहे बाशिंदे को” सुरक्षित रास्ता दिलाएंगे। उनके साथ ही, उन अफगानियों को भी सुरक्षित रास्ता दिलाएंगे, जिन्होंने यहां अमेरिकी हित में काम किया है।

उन्होंने कहा कि तालिबान ने “निजी एवं सार्वजनिक तौर पर कहा है कि वे अफगान छोड़ कर जाने वालों को सुरक्षित रास्ता देंगे” और वाशिंगटन यह सुनिश्चित करेगा कि तालिबानी अपने “उन किए गए वादों पर अमल करें”।

तीसरी बात, सबसे ज्यादा अहम है, जबकि काबुल में अमेरिकी राजदूतावास अभी तक बंद है, वह पहली सितम्बर से प्रभावी होगा, “हमारे पास वहां (काबुल में) राजनयिकों को रखने के साधन और तंत्र होंगे,  वे इन आवेदकों को संसाधित करने की प्रक्रिया को जारी रखने में सक्षम होंगे, हम अफगानिस्तान छोड़ कर जाने वाले लोगों को भी सुरक्षित रास्ता मुहैया कराने में समर्थ होंगे।”

इसके आगे सुलिवन ने जोड़ा: “और समय बीतने के साथ, यह निर्भर करता है कि तालिबान वहां क्या करते हैं, यहां से जाने वालों को सुरक्षित रास्ता देने के संदर्भ में अपनी जाहिर प्रतिबद्धताओं को वे किस तरह पूरी करते हैं, महिलाओं के साथ कैसा सलूक करते हैं, अफगानिस्तान को आतंकवाद का हलका न बनने देने की बाबत अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को किस तरह से पूरी कर पाते हैं, हम यहां से वापसी के बाद अपने राजनायिकों की उपस्थिति एवं अन्य मामलों, दोनों के ही संबंध में आगे निर्णय ले सकते हैं। लेकिन इन सबकी जिम्मेदारी तालिबान पर होगी कि वे अपनी जताई गई प्रतिबद्धताओं और उन दायित्वों का पालन करने की बाबत अपनी सदिच्छा साबित करें जो उन्होंने हमसे किए हैं और जिन्हें करने के लिए वे अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा बाध्य हैं।”

थोड़े में कहें, तो ऐसा मालूम होता है कि अमेरिका ने तालिबान के साथ एकमुश्त समझौता किया हुआ है, जहां एक मुमकिन भविष्य में काबुल में अमेरिकी दूतावास खोलना एक तार्किक निष्कर्ष होगा।

वॉइस ऑफ अमेरिका के काबुल/इस्लामाबाद डेटलाइन के साथ एक लंबे डिस्पैच में, जो एक “वरिष्ठ तालिबानी नेता के नाम न जाहिर करने की शर्त” पर दी गई ब्रीफिंग पर आधारित है, कहा गया है कि नई तालिबान सरकार के गठन की प्रक्रिया “अपने अंतिम चरण में” है, उसकी घोषणा होने ही वाली है। ऐसा लगता है कि यह घोषणा अगले हफ्ते की शुरुआत में ही हो सकती है।

मौजूदा सभी रहबरी शूरा या तालिबान परिषद के नेतृत्व को सरकार में शामिल करने को लेकर मुत्तमईन है लेकिन कैबिनेट में सब मिलाकर 26 से अधिक मंत्रियों को शामिल किया जा सकता है।

दिलचस्प है कि वायस ऑफ अमेरिका ने रिपोर्ट किया कि, “अपनी अंदरूनी बातचीत में, तालिबान  सिराजुद्दीन हक्कानी या मुल्ला याकूब (मुल्ला उमर के बेटे) को रईस उल वाजरा (प्रधानमंत्री के समकक्ष पद) बनाने की संभावना पर भी विचार कर रहे थे। और “अगर हक्कानी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उस सूरत में याकूब को रक्षा मंत्री बनाया जा सकता है, इसलिए कि वे फिलहाल तालिबान के सैन्य आयोग के मुखिया हैं।”

यह खासियत वाशिंगटन द्वारा एक तालिबान सरकार के गठन को एक बाध्यकारी वास्तविकता बना देने की स्वीकृति में निहित है। बयानबाजी को परे रख दें तो अमेरिका पहले ही तालिबान के साथ एक रचनात्मक भावना के साथ जुड़ चुका है। इस मामले में अमेरिका के जर्मन एवं फ्रांस जैसे बड़े सहयोगी देश भी यही कर रहे हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो तालिबान सरकार का बहिष्कार अब कोई विकल्प नहीं है- सिवाय तालिबान के पैकेज डील में की गई अपनी प्रतिबद्धताओं से मुकर जाने की स्थिति को छोड़कर, जिसकी अत्यधिक संभावना है।

तालिबान के नजरिए से, अमेरिका के साथ उसकी डील पूरी तरह संतोषप्रद है। वैसे भी तालिबान का अमेरिका से किए गए अपने वादों पर खरे उतरने का लगातार रिकॉर्ड रहा है। यहां तक कि फरवरी 2020 में दोहा समझौते के बाद जब चीजें गड़बड़ प्रतीत होने लगी, तालिबान, उस समझौते के तहत किए गए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आश्वासन पर कायम रहा, मुख्य रूप से अमेरिकी फौज पर हमला न करने के अपने वादे पर। 

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की नाल के आकार की मेज की हवा भी बदल गई है। दिलचस्प है कि काबुल में आतंकवादी हमलों की निंदा करते हुए, सुरक्षा परिषद द्वारा 27 अगस्त 2021 को जारी एक वक्तव्य से आतंकवादियों का समर्थन करने वाले अफगान समूहों की सूची में से तालिबान का नाम पहली बार हटा दिया गया है। इसकी जगह केवल यह कहा गया है कि “किसी भी अफगान समूह या व्यक्ति को किसी दूसरे देश की जमीन पर आतंकवादी गतिविधियों को संचालित करने का समर्थन नहीं करना चाहिए।”.

सच्चाई ये है कि जिस दिन तालिबान ने देश की हुकूमत पर अपना दखल जमाया, उसके एक दिन बाद 16 अगस्त को सुरक्षा परिषद ने कहा था: “सुरक्षा परिषद के सदस्य यह सुनिश्चित करने के लिए कि अफगानिस्तान की सरजमीं से किसी दूसरे देश के लिए खतरा बनने तथा उस पर आक्रमण करने से रोकने के लिए, अफगानिस्तान में आतंकवाद से लड़ाई को महत्व को फिर से रेखांकित करते हैं। और न तो तालिबान, न ही अन्य अफगान समूह या कोई व्यक्ति को अपने देश के भूभाग का दूसरे देश में आतंकवादी कार्रवाईयों के लिए इस्तेमाल करने का समर्थन नहीं करना चाहिए।”

हालांकि, इसके महज 11 दिन बाद, पिछले शुक्रवार को जारी वक्तव्य में तालिबान का आतंकवादी समूह के रूप में ज्यादा जिक्र तक नहीं किया गया, स्पष्ट है कि तालिबान के प्रति अमेरिका की रचनात्मक एवं सहयोगी वार्ताकार की उसकी नई सोच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को रगड़ रही है। यह कैपिटल “R” के साथ यथार्थवाद है। इसके आगे, जल्दी ही तालिबानी नेताओं पर लगे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को हटाने का रास्ता भी खुलना है।

यह सभी अवश्य ही नरेन्द्र मोदी सरकार को निगलने में एक कड़वी दवा साबित होगी, जब भारत को भी रोटेशन के तहत इस पूरे महीने सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करनी है।

समूची अफगान-गाथा में भारत अपने को उपेक्षित एवं पराजित महसूस कर रहा है। संभवतः उसके इस भाव को ताड़ते हुए और उसे संतोष दिलाने के लिए ही, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से शनिवार को बातचीत की थी।

विदेश मंत्रालय के जारी वक्तव्य में कहा गया है कि दोनों मंत्रियों ने “प्राथमिकताओं के व्यापक क्षेत्र, जिसमें अफगानिस्तान मसले पर एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ में...पर लगातार समन्वय जारी रखना भी शामिल है, उन विषयों पर बातचीत की। और अमेरिकी-भारत की साझेदारी को गहरा करने वाले साझा लक्ष्यों एवं प्राथमिकताओं के बारे में सघन समन्वय बनाए रखने पर सहमति जताई।”

राजनय को एक तरफ रखते हुए, बाइडेन प्रशासन मोदी सरकार से अपेक्षा करता है कि वह उसी तरह से उसके कैंप का निष्ठावान-अनुगामी बना रहे, तब भी जब वाशिंगटन लगातार स्व-हित की साधना करता रहे। प्रधानमंत्री मोदी का यह हालिया आकलन कि तालिबान का कोई भविष्य नहीं है, बाइडेन के व्हाइट हाउस पर कोई असर नहीं डाला है।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Reflections on Events in Afghanistan – X

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