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कोरोना वायरस ने आधुनिक समाज के भेदभाव से भरे चरित्र को उजागर कर दिया
कोरोना संक्रमण के दौरान पूरी दुनिया के आधुनिक समाज ने जिस तरह से अल्पसंख्यकों के साथ ज़हरीली नफ़रत दिखाई है, वह परेशान करने वाली है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 May 2020
अल्पसंख्यकों के साथ ज़हरीली नफ़रत
'प्रतीकात्मक तस्वीर' फोटो साभार : द डेली ऑरेंज

अमेरिका के डेमोक्रेटिक सांसदों के एक समूह ने सोमवार को कहा कि कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के बीच एशियाई मूल के अमेरिकियों के खिलाफ घृणा अपराध बढ़े हैं और ट्रंप प्रशासन से अनुरोध किया कि वह इसे रोकने के लिये ठोस कदम उठाए।

सहायक अटॉर्नी जनरल एरिक एस ड्रीबैंड को लिखे एक पत्र में कमला हैरिस समेत 16 सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से अनुरोध किया है कि इस भेदभाव से वैसे ही निपटा जाए जैसे पूर्व में किया गया था।

सांसदों ने कहा कि वैश्विक महामारी के दौरान एशियाई-अमेरिकियों और प्रशांत द्वीप (एएपीआई) के लोगों के खिलाफ घृणा अपराध और इन नस्ली तथा विदेशी लोगों से डर की वजह से किये जाने वाले हमलों के समाधान के लिये अपर्याप्त संघीय प्रतिक्रिया पूर्व में प्रशासन द्वारा किये गए प्रयासों से एकदम विपरीत है।

उन्होंने कहा कि एशियाई मूल के करीब दो करोड़ अमेरिकी और 20 लाख एएपीआई लोग कोविड-19 वैश्विक महामारी के खिलाफ स्वास्थ्य देखभालकर्मी, सुरक्षा एजेंटों और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों के तौर पर अग्रिम मोर्चे के काम में जुटे हैं।

सांसदों ने कहा, “यह महत्वपूर्ण है कि नागरिक अधिकार प्रभाग सुनिश्चित करे कि वैश्विक महामारी के इस वक्त में सभी अमेरिकियों के नागरिक और संवैधानिक अधिकार सुरक्षित हों।” उन्होंने कहा कि सिर्फ पिछले महीने में ही एशियाई-अमेरिकी संगठनों को देशभर से एशियाई लोगों के उत्पीड़न और भेदभाव की 1500 से ज्यादा घटनाओं की शिकायत मिली।

डेमोक्रेटिक सांसदों ने कहा कि यह मार्च में एफबीआई के उस आकलन के बाद हुआ है जिसमें आशंका जताई गई थी कि एशियाई अमेरिकियों के खिलाफ देश भर में अपराध की घटनाएं बढ़ सकती हैं जिससे एएपीआई समुदायों के लिये खतरा होगा।

यह सिर्फ अमेरिका का हाल नहीं है। कई यूरोपीय देशों और पकिस्तान एवं भारत में भी इस तरह की घटनाएं सामने आई हैं। भारत में पिछले दिनों सौ से अधिक पूर्व नौकरशाहों ने विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर देश के कुछ हिस्सों में मुसलमानों के ‘उत्पीड़न’ पर दुख प्रकट किया था।

उन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में बीते मार्च महीने में हुए तबलीगी जमात द्वारा कार्यक्रम आयोजित करने को ‘एक भटका हुआ एवं निंदनीय’ कृत्य करार दिया, लेकिन मुसलमानों के खिलाफ मीडिया के एक वर्ग द्वारा कथित तौर पर द्वेष फैलाने के कृत्य को बिल्कुल गैर जिम्मेदाराना एवं निंदनीय बताया।

पूर्व नौकरशाहों ने एक खुले पत्र में लिखा है कि इस महामारी के कारण उत्पन्न डर एवं असुरक्षा का उपयोग विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों को सार्वजनिक स्थानों से दूर रखने के लिए किया जाता है ताकि बाकी लोगों को कथित तौर पर बचाया जाए।

उन्होंने कहा है कि पूरा देश अप्रत्याशित सदमे से गुजर रहा है। पत्र के अनुसार, ‘इस महामारी ने हमें जो चुनौती दी है उससे हम एकजुट रहकर एवं एक दूसरे की मदद कर ही लड़ सकते हैं एवं उससे निजात पा सकते हैं।’

उन्होंने उन मुख्यमंत्रियों की सराहना की जो आमतौर पर और खासकर इस महामारी के संदर्भ में दृढतापूर्वक धर्मनिरपेक्ष बने रहे हैं। इन 101 पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि वे किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नहीं हैं।

चिट्ठी लिखने वालों में पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर, पूर्व आईपीएस ऑफिसर एएस दुलत और जुलियो रिबेरो, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग और पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त एसवाई कुरैशी आदि शामिल थे।

गौरतलब है कि कोरोना वायरस को लेकर तबलीगी जमात का मामला सामने आने बाद से सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही अफवाह और नफ़रत का असर देश के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिल रहा है।

कहीं मुसलमान होने की वजह से सब्जी वाले को गली में घुसने नहीं दिया जा रहा, कहीं उनसे आधार कार्ड मांगा जा रहा, कहीं जबरदस्ती लोगों ने मुस्लिमों की दुकानें बंद करा दीं तो कहीं हिंदू फेरी वालों के ठेले पर भगवा झंडा लगा दिया जा रहा है, ताकि उसकी पहचान की जा सके।

इसे लेकर इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपने एक लेख में लिखते हैं कि महामारियां तो बदल रही हैं लेकिन उनमें होने वाला भेदभाव सदियों से वैसा ही है। उन्होंने लिखा, '14वीं सदी में ब्यूबॉनक प्लेग नाम की एक महामारी ने यूरोप और एशिया के एक बड़े हिस्से को तबाह कर दिया था। इतिहास में यह महामारी ब्लैक डैथ यानी काली मौत के नाम से दर्ज है। यह समाज के लिए असाधारण कष्ट का कारण तो बनी ही, इस दौरान इंसानी पूर्वाग्रहों का बर्बर रूप भी दिखा।'

अपने लेख में अभी होने वाले भेदभाव को लेकर वो टिप्पणी करते हैं, 'कोरोना संकट के दौरान खुद को लोकतांत्रिक कहने वाली हमारी सरकार गरीबों के प्रति उतनी ही निर्मम रही है जितनी ब्रिटिश राज के वक्त की निरंकुश सरकारें रहा करती थीं। उधर, कथित रूप से आधुनिक हमारे समाज ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए जिस तरह की जहरीली नफरत दिखाई है वह वैसी ही है जो एक समय में मध्ययुगीन यूरोप की पहचान थी।'

गौरतलब है कि बिना समानुभूति और करुणा के हम किसी महामारी से नहीं निपट सकते हैं। लेकिन हमारे आधुनिक होते समाज को भेदभाव की महामारी ने जकड़ लिया है। दुनिया के हर कोने से यह भेदभाव उजागर हो रहा है। ऐसे में कोरोना के साथ एक लड़ाई इस भेदभाव भरे व्यवहार से भी लड़नी होगी।

हमें इस मामले में सरकार द्वारा फोन के कॉलरट्यून पर जारी संदेश को ध्यान से सुनना चाहिए। आजकल हमें जो संदेश किसी को फोन करने पर सुनाई दे रहा है वह कुछ यूं है, 'कोरोना वायरस से आज पूरा देश लड़ रहा है पर याद रहे कि हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं, उनसे भेदभाव न करें और उनकी देखभाल करें। इस बीमारी से बचने के लिए जो हमारे ढाल है, जैसे हमारे डॉक्टर्स, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी और सफाईकर्मी, उनका सम्मान करें और उनका पूरा सहयोग करें।'

हमें यह याद रखना होगा भेदभाव के साथ कोई लड़ाई जीती नहीं जा सकती। 

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