NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
आंदोलनजीवी, चंदाजीवी और दंगाजीवी
सरकार कानून ही ऐसे बनाती है जिनसे प्रभावित जनता आंदोलन पर उतर आये। और सरकार जी के अनुसार इन्हीं आंदोलनों से आंदोलनजीवियों को रोज़गार उपलब्ध होता है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
14 Feb 2021
cartoon click

सरकार जी भी अद्भुत हैं। बैठे बैठे ही नये नये रोजगार ईजाद कर देते हैं, वो भी बिना सोचे समझे। वैसे सोचने समझने का काम सरकार जी का नहीं है। सोचता समझता तो कोई और ही है। सरकार जी तो सिर्फ घोषणा कर देते हैं। उनको तो सिर्फ नई नई खोज करने से ही मतलब होता है, चाहे विज्ञान की करें या फिर रोजगार की। उनकी खोजों का क्या अर्थ या अनर्थ निकलता है, उससे उन्हें कोई मतलब नहीं है।

अब सरकार जी ने एक नया रोजगार ईजाद किया है, आंदोलनजीवी। पहले पकौड़े तलने का रोजगार ईजाद किया था जिसका आज तक मजाक उड़ाया जाता है, अब आंदोलनजीवी का ईजाद कर दिया है। माना कि पकौड़े तलने के रोजगार में सरकार की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी पर लोगों को आंदोलनजीवी नामक रोजगार प्रदान करने में सरकार का सीधा रोल है। सरकार  कानून ही ऐसे बनाती है जिनसे प्रभावित जनता आंदोलन पर उतर आये। और सरकार जी के अनुसार इन्हीं आंदोलनों से आंदोलनजीवियों को रोजगार उपलब्ध होता है। इसलिए आंदोलनजीवी नामक रोजगार के सृजन में सरकार की भूमिका बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती है। 

वैसे यह आंदोलनजीवी बहुत पुराना है पर इसे रोजगार के रूप में पहली बार सरकार जी ने ही पहचाना है। बताया जाता है कि राजा राम मोहन राय और ज्योतिबा फूले तथा उनकी पत्नी सावित्री फूले भी आंदोलनजीवी ही थे। महात्मा गांधी तो बहुत ही बड़े आंदोलनजीवी थे। शायद गांधी जी का पेट वकालत से नहीं भरता था तो दक्षिणी अफ्रीका में ही आंदोलनों के रोजगार में लग आंदोलनजीवी बन गये। फिर भारत में आ कर भी थोक में आंदोलनों का रोजगार शुरू कर दिया। उनसे आज तक विश्व के सभी आंदोलनजीवी प्रेरणा पाते हैं। वे भारत ही नहीं विश्व के सबसे बड़े आंदोलनजीवी थे, आंदोलनजीवी हैं और आंदोलनजीवी रहेंगे। 

कहा तो यह भी जाता है कि गांधी जी की हत्या भी आंदोलनजीवी होने के कारण ही की गई थी। बताया जाता है कि जिसने गांधी जी की हत्या की थी वह आज की सरकारी पार्टी की एक पूर्वज पार्टी हिंदू महासभा का ही एक सदस्य था। उसने गांधी जी की हत्या इसलिए की थी कि कहीं गांधी जी कोई और नया आंदोलन शुरू न कर दें। आखिर गांधी जी आंदोलनजीवी जो थे। 

स्वतंत्र भारत में आज से पहले भी आंदोलनजीवी हुए हैं। एक आंदोलनजीवी जेपी थे। जिनके आंदोलन से इंदिरा गांधी की सरकार गिरी और जनता पार्टी की आंदोलनभोगी सरकार बनी जिसमें जनसंघ भी भागीदार थी। एक और आंदोलनजीवी अन्ना हैं। उन्हीं के आंदोलन के बाद भाजपा की आंदोलनभोगी सरकार बनी। पर अन्ना अब आंदोलनजीवी नहीं रहे हैं। लगता है कि इस आंदोलनभोगी सरकार ने उनके रोजगार का कोई और बंदोबस्त कर दिया है। 

सरकार जी ने आंदोलनजीवी के अलावा और रोजगारों का जिक्र भी किया। श्रमजीवी बताया, परजीवी भी बताया पर अन्य कुछ रोजगारों का जिक्र करने से बचे। वे रोजगार हैं दंगाजीवी और चंदाजीवी। चंदाजीवी बड़ा अहिंसक सा रोजगार माना जाता रहा है। जो चंदा दे उसका भी भला और जो चंदा न दे उसका भी भला। पर हाल के वर्षों में जो चंदा दे उनकी रसीद तो काटी ही जाती है, जो चंदा न दे उनकी दूसरी रसीद काट दी जाती है। चंदाजीवी चंदे से अपना तो जीवन यापन करता ही है, जिस चीज के लिए चंदा इकट्ठा किया जा रहा है उस पर भी थोड़ा बहुत खर्च कर देता है। राजनीतिक दल भी चंदाजीवी होते हैं। जिस राजनीतिक दल की सरकार होती है वह अधिक बड़ा चंदाजीवी होता है। 

एक और रोजगार है जो रोजगारों की श्रेणी का अंतिम रोजगार है। यह रोजगार है दंगाजवी या फिर रक्तजीवी। वेदों-पुराणों में जिस रक्तबीज राक्षस का जिक्र है उसका आधुनिक रूप है यह दंगाजीवी। रक्तबीज नाम के राक्षस का रक्त जहाँ गिरता था वहीं एक नया राक्षस पैदा हो जाता था उसी तरह दंगाजीवी भी लहू बहने से अधिक बड़ा बनता जाता है। जितना लहू बहेगा, रक्तजीवी या दंगाजीवी उतना ही बड़ा होता जायेगा। ये दंगाजीवी बदलते रहते हैं। सन् चौरासी में दंगाजीवी अलग था तो वर्ष दो हजार दो में अलग। रक्त भले ही मुजफ्फरनगर के दंगों में लोगों का बहा हो या फिर पुलवामा की शहादत में सैनिकों का, यह दंगाजीवी हर बार अधिक बड़ा ही हुआ है। 

खैर, सरकार जी ने लोकसभा में इन रोजगारों के बारे में जो भी कुछ कहा हो या न कहा हो, उन्होंने एक बात अवश्य कही। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन पवित्र आंदोलन है। अब यह समझ में नहीं आ रहा है कि एक पवित्र आंदोलन की मांगें अपवित्र कैसे हो गयीं। और अगर मांगें भी पवित्र हैं तो फिर मानी क्यों नहीं जा रही हैं। सच ही तो है, मोदी जी हैं तभी तो मुमकिन है कि किसानों के पवित्र आंदोलन की पवित्र मांगें भी न मानी जायें। 

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Andolanjivi
Narendra modi
BJP

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कथित शिवलिंग के क्षेत्र को सुरक्षित रखने को कहा, नई याचिकाओं से गहराया विवाद

उर्दू पत्रकारिता : 200 सालों का सफ़र और चुनौतियां

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला

बना रहे रस: वे बनारस से उसकी आत्मा छीनना चाहते हैं

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...


बाकी खबरें

  • Neha Singh Rathore
    न्यूज़क्लिक टीम
    ‘यूपी में सब बा’ के जवाब में नेहा सिंह राठौर का ‘ यूपी में का बा’
    23 Jan 2022
    यूपी विधानसभा चुनाव में वोटरों को रिझाने के लिए सांसद और अभिनेता रवि किशन भाजपा की तारीफ़ में एक वीडियो लेकर आए, जिसके बोल हैं ‘ यूपी में सब बा’। भाजपा की उपलब्धियों का बखान वाला यह वीडियो घर-घर…
  • pm
    अजय कुमार
    दो टूक: मोदी जी, आप ग़लत हैं! अधिकारों की लड़ाई से देश कमज़ोर नहीं बल्कि मज़बूत बनता है
    23 Jan 2022
    75 वर्षों में हम सिर्फ़ अधिकारों की बात करते रहे हैं। अधिकारों के लिए झगड़ते रहे, जूझते रहे, समय भी खपाते रहे। सिर्फ़ अधिकारों की बात करने की वजह से समाज में बहुत बड़ी खाई पैदा हुई है: प्रधानमंत्री…
  • Ethiopia
    शिरीष खरे
    इथियोपिया : फिर सशस्त्र संघर्ष, फिर महिलाएं सबसे आसान शिकार
    23 Jan 2022
    इथियोपिया, अफ्रीका महाद्वीप का यह देश पिछले दो वर्षों से अधिक समय से सुखिर्यों में है, जहां नवंबर, 2020 से शुरू हुआ सशस्त्र संघर्ष अभी भी जारी है, जहां टिग्रे अलगाववादियों और उनके खिलाफ इथियोपियाई…
  • nehru and subhash
    एल एस हरदेनिया
    नेताजी की जयंती पर विशेष: क्या नेहरू ने सुभाष, पटेल एवं अंबेडकर का अपमान किया था?
    23 Jan 2022
    नरेंद्र मोदी का यह आरोप तथ्यहीन है कि नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस, डॉ. अंबेडकर और सरदार पटेल को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया।
  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    …सब कुछ ठीक-ठाक है
    23 Jan 2022
    "क्यों, क्या सब ठीक-ठाक नहीं हैं? क्या सब ख़ैरियत से नहीं है? क्या हम हिंदू राष्ट्र नहीं बन रहे हैं? ठीक है भाई! बेरोज़गारी है, महंगाई है, शिक्षा बरबाद हो रही है और अस्पताल बदहाल। पर देश में क्या…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License