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भारत
राजनीति
उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने शांति वार्ता को लेकर केन्द्र सरकार की ‘‘ईमानदारी’’ पर उठाया सवाल
वार्ताकार समर्थक वरिष्ठ उल्फा नेता मृणाल हजारिका ने कहा, ‘‘ सरकार में ईमानदारी की कमी नजर आ रही है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में वार्ता लगभग पूरी हो चुकी थी और अंतिम चरण में पहुंच गई थी, लेकिन नरेंद्र मोदी नीत सरकार के सत्ता में आने के बाद से कुछ खास प्रगति नहीं हुई है।’’
भाषा
03 Jan 2022
ulfa

डिब्रूगढ़ (असम): उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने उसके साथ एक दशक से चली आ रही शांति वार्ता को आगे बढ़ाने में केन्द्र सरकार की ‘‘ईमानदारी’’ पर संदेह व्यक्त करते हुए दावा किया कि पिछले दो वर्ष में कोई वार्ता नहीं हुई और वर्तमान में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कोई सरकारी वार्ताकार नहीं है।

 गुट ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत सरकार के सत्ता में आने के बाद से उसके साथ शांति वार्ता में ‘‘ज्यादा प्रगति’’ नहीं हुई है, हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान बातचीत अंतिम चरण में पहुंच गई थी।

उसने यह भी कहा कि कट्टरपंथी उल्फा (आई) के प्रमुख परेश बरुआ के तब तक वार्ता के लिए आगे आने की संभावना नहीं है, जब तक कि वार्ता समर्थक गुट के साथ बातचीत पूरी नहीं हो जाती।

गुट ने ये आरोप ऐसे समय में लगाए हैं, जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा संगठन के सभी गुटों के साथ समझौता करने के वास्ते बरुआ को बातचीत के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे हैं।

उल्फा के पूर्व स्वयंभू महासचिव एवं वार्ता समर्थक गुट के नेता अनूप चेतिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ सरकार के साथ आखिरी दौर की वार्ता जनवरी 2020 में हुई थी। सरकारी वार्ताकार का कार्यकाल उस वर्ष मार्च में समाप्त हो गया था। उसके बाद से, हमसे कोई सम्पर्क नहीं किया गया। अब भी, हमें उम्मीद है कि सरकार हमारे मुद्दों पर गौर करेगी और उन्हें हल करेगी।’’

 इस बात पर जोर देते हुए कि उग्रवादी संगठन की तुलना में सरकार शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए ‘‘अधिक जिम्मेदार’ है, चेतिया ने कहा, ‘‘ हमारे पास सरकार की ईमानदारी पर संदेह करने के कई कारण हैं।’’

वार्ताकार समर्थक वरिष्ठ उल्फा नेता मृणाल हजारिका ने कहा, ‘‘ सरकार में ईमानदारी की कमी नजर आ रही है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में वार्ता लगभग पूरी हो चुकी थी और अंतिम चरण में पहुंच गई थी, लेकिन नरेंद्र मोदी नीत सरकार के सत्ता में आने के बाद से कुछ खास प्रगति नहीं हुई है।’’

उन्होंने कहा कि उल्फा समर्थक वार्ता गुट की मांगों को हल करने में सरकार देरी के करने के लिए हथकंडे अपना रही है। ये मांगे मोटे तौर पर असम के मूल लोगों के लिए आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और भाषाई सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने पर आधारित थी।

हजारिका ने कहा, ‘‘ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की नीति का समर्थन करती है, जिसके माध्यम से वे सभी को एक ही रंग में रंगना चाहती है। इसलिए वो हमें सुरक्षा प्रदान करने में देरी कर रही है।’’

परेश बरुआ को बातचीत के लिए बुलाने के सरकार के प्रस्ताव पर, चेतिया ने कहा, ‘‘ मैंने बरुआ को मीडिया से यह कहते सुना है कि वह चाहते हैं कि सरकार पहले हमारे साथ बातचीत पूरी करे। उन्हें भी शायद यही डर है कि उनकी हालत हमारी जैसी हो जाएगी और सभी मुद्दों के वास्तविक समाधान की दिशा में कोई प्रगति नहीं होगी।’’

हजारिका ने भी इससे सहमति व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘ परेश बरुआ गुट और हमारे गुट के लिए बातचीत के वास्ते एक साथ आना संभव नहीं होगा। हमारी मांगें नागरिक समाज की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब हैं, जबकि उनकी संप्रभुता का एक सूत्री एजेंडा है।’’

उल्फा और सरकार के बीच वार्ता की जानकारी रखने वाले असम पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस वार्ता की प्रक्रिया में कुछ ‘‘गतिहीनता’’ रही है।

उन्होंने कहा, ‘‘सरकारी वार्ताकार की नियुक्ति अभी की जानी है। कुछ गतिहीनता रही है, लेकिन इसके लिए कई तथ्य जिम्मेदार हैं।’’

अधिकारी ने कहा कि सरकार और शीर्ष पदों में बदलाव से भी ऐसी शांति वार्ताओं में देरी होती है।

Assam
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