NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
उत्तराखंड: जलते जंगल को बचाने के लिए समुदाय को देना होगा जंगल पर अधिकार
“अगर जंगल पर अब भी समुदाय का हक होता तो जंगल की आग की इतनी भीषण स्थिति नहीं होती। समूचे जंगलात को एक महकमे के हवाले कर दिया गया कि ये जंगल का ख्याल रखेंगे। वनों की तुलना में ये महकमा एक तिनके के बराबर है। जंगल के इतने मुद्दे हैं कि वो एक विभाग के बस की बात नहीं है।”
वर्षा सिंह
05 Apr 2021
गर्मी बढ़ने के साथ ही बेकाबू हो गई है उत्तराखंड के जंगलों की आग। फोटो साभार: Hindustan times
गर्मी बढ़ने के साथ ही बेकाबू हो गई है उत्तराखंड के जंगलों की आग। फोटो साभार: Hindustan times

चमोली के गैरसैंण में परवारी वन पंचायत के आसपास के जंगलों में भी आग की स्थिति बनी हुई है। यहां के सरपंच गोपाल सिंह बताते हैं “हमने जंगल की सुरक्षा के लिए चौकीदार रखे हैं ताकि आग लगने की सूचना तत्काल मिल सके। लोग जानबूझ कर भी जंगल में आग लगा देते हैं। या फिर जलती बीड़ी-सिगरेट फेंक देते हैं। हम हर समय तैयारी रखते हैं कि जंगल की आग को लेकर कोई आवाज़ लगाए तो तुरंत दौड़ पड़ें।”

टिहरी के जौनपुर ब्लॉक की सकलाना पट्टी में वृक्ष-मानव के नाम से प्रख्यात स्वर्गीय विश्वेश्वर दत्त सकलानी के उगाए जंगल भी इस वर्ष की जंगल की आग में नहीं बचे। वह कहते थे, “तीन किलो की कुदाल मेरी कलम है, धरती मेरी किताब है, पेड़-पौधे मेरे शब्द हैं, मैंने इस धरती पर हरित इतिहास लिखा है”। तेज़ हवा के साथ उठ रहे दावानल में ये हरित इतिहास भी राख में तब्दील हो गया।

टिहरी के सकलाना पट्टी में वृक्ष मानव कहे जाने वाले विश्वेश्वर दत्त सकलानी के जंगल भी जल गए। फोटो साभार: संतोष सकलानी

विश्वेश्वर दत्त सकलानी के बेटे संतोष सकलानी बताते हैं “यहीं से (सकलाना पट्टी) सौंग नदी का उद्गम होता है। नदी को पुनर्जीवित करने के लिए ही विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने पौधे लगाने शुरू किये। करीब 1200 हेक्टेअर क्षेत्र में बोए गए लाखों पौधे पेड़ बन गए थे। ये बांज, देवदार, बुरांश, भीमल, मेरू, काफल जैसे जंगली पेड़ों का जंगल था। कई जगह पूरे-पूरे पेड़ जल गए। हमारे परिवार और गांव के लोग रातभर जंगल की आग बुझाने में लगे रहे। अपनी जान को दाव पर लगाते हुए। लेकिन जब दावानल फैल जाता है तो बहुत मुश्किल होता है”।

फोटो साभार: वन विभाग

उत्तराखंड के जंगल की आग बुझाने के लिए हेलिकॉप्टर की मदद

पूरे उत्तराखंड के जंगल इस समय आग में धधक रहे हैं। स्थिति बेकाबू होती देख रविवार को मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बात की। जिसके बाद केंद्र ने उत्तराखंड जंगल की आग को नियंत्रित करने के लिए एनडीआरएफ की टीम और दो हेलिकॉप्टर भेज दिए हैं। इसमें से एक हेलिकॉप्टर ने आज सुबह टिहरी झील से पानी भरकर जंगल के संवेदनशील हिस्से पर पानी का छिड़काव किया। हेलिकॉप्टर से लगे बाम्बी बकेट (Bambi Bucket) में 3000-5000 लीटर तक पानी एक बार में आता है। दूसरा हेलिकॉप्टर नैनीताल के भीमताल झील से पानी लेकर आग बुझाने का काम कर रहा है।

1 अक्टूबर 2020 से 4 अप्रैल 2021 तक उत्तराखंड के 1359.83 हेक्टेअर क्षेत्र में फैले जंगल आग में नष्ट हो चुके हैं। जिसका आर्थिक मूल्यांकन 39,46,986 रुपये में किया गया है। आधिकारिक तौर पर इस आग में चार लोगों की मौत हो चुकी है, 2 लोग घायल हुए हैं। जबकि 7 वन्यजीवों की मौत हुई है और 22 पशु घायल हैं।

मार्च के आखिरी हफ्ते से अप्रैल के शुरुआती दिनों में गर्मी तेज़ होने और तेज़ हवाएं चलने की वजह से आग की घटनाओं में इजाफ़ा हुआ। 4 अप्रैल को राज्य के 68.7 हेक्टेअर क्षेत्र के जंगल जले। 3 अप्रैल को 62.55 हेक्टेअर, 2 अप्रैल को 13.5 हेक्टेअर और 1 अप्रैल को 52.1 हेक्टेअर क्षेत्र जंगल में आग लगी।

जंगल की आग की सूचना मिलने और वन विभाग की टीम के पहुंचने के बीच इतना समय गुजर जाता है कि आग आसपास के इलाके में फैल जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में आना जाना आसान भी नहीं और समय भी अधिक लगता है। वन विभाग के पास इतने संसाधन भी नहीं कि जंगल की आग पर काबू पाया जा सके। बारिश ही जंगलों को राहत पहुंचाती है। देहरादून मौसम विज्ञान केंद्र ने उत्तराखंड में 5 से 7 अप्रैल तक कहीं-कहीं बारिश का अनुमान जताया है।

पौड़ी के जंगलों में आग। फोटो : वर्षा सिंह

समुदाय को देना होगा जंगल पर अधिकार

जंगलों में आग हमेशा से लगती रही है लेकिन पिछले एक दशक में आग का दायरा लगातार बढ़ रहा है। बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन को तो हम इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराते ही हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर क्या वजहें बन रही हैं।

अल्मोड़ा में वन पंचायत सरपंच संगठन के प्रांतीय संरक्षक ईश्वर दत्त जोशी इसके कई कारण गिनाते हैं। वह कहते हैं पिछले 20 सालों में उत्तराखंड में परिस्थितियां बदली हैं। जंगल के साथ लोगों के रिश्ते बदले हैं। जंगल में समुदाय का हक बढ़ाना होगा। पहले जंगल पर हर गांव का कोटा होता था। लोगों को उनके घर की छत, गौशाला या अन्य इस्तेमाल के लिए जंगल से लड़की मिलती थी। इससे जंगल का प्रबंधन भी होता था। लोग भी अपने जंगल की देखभाल करते थे। लेकिन अब जंगल में घुसने पर भी जुर्माना लगता है।

जंगल में आग को बढ़ने से रोकने के लिए फायर लाइन भी बनायी जाती है। ईश्वर दत्त सवाल उठाते हैं “अगर ये फायर लाइन जंगल में मौजूद होती तो आग कैसे फैलती”। वह बताते हैं कि वन विभाग के साथ बैठकों में ये मुद्दा उठाया है। पहले जहां फायर लाइन होती थी वहां अब बड़े-बड़े पेड़ उग आए हैं। ईश्वर दत्त कहते हैं “अगर वन विभाग इन अग्नि बटिया (फायर लाइन) की सफाई करता, उसे मेनटेन करता तो वहां पेड़ कैसे उगते? फायर लाइन की सफाई के लिए हर साल बजट आता है। वन विभाग ने नई फायर लाइन तो बनाई नहीं। अंग्रेजों के ज़माने की बनी फायर लाइन भी खत्म कर दी”।

जंगल की आग बुझाने के लिए वन पंचायतें रहती हैं सक्रिय। फोटो साभार : पूरन सिंह रावल

वन पंचायतों को दिया जाए जंगल का जिम्मा

पर्यावरणविद् अनिल जोशी कहते हैं “अगर जंगल पर अब भी समुदाय का हक होता तो जंगल की आग की इतनी भीषण स्थिति नहीं होती। समूचे जंगलात को एक महकमे के हवाले कर दिया गया कि ये जंगल का ख्याल रखेंगे। वनों की तुलना में ये महकमा एक तिनके के बराबर है। जंगल के इतने मुद्दे हैं कि वो एक विभाग के बस की बात नहीं है”।

उत्तराखंड में 12 हज़ार से अधिक वन पंचायतें हैं। अनिल जोशी कहते हैं “इतनी वन पंचायतें गांव के चारों ओर मुठ्ठी भर जंगल की देखभाल के लिए क्यों बनाई हैं। वन पंचायतों को उनके आसपास के समूचे जंगल का जिम्मा दीजिए। वे जंगल की सुरक्षा करेंगे बदले में उन्हें इंसेटिव दीजिए। इसके लिए सभी वन पंचायतों को रिचार्ज करना होगा”।

वह बताते हैं “हाल ही में सभी वन पंचायतों को आग से बचाव के लिए 15-15 हजार रुपये भेजे गए। 15 हज़ार रुपये में आग से क्या बचाव होगा। आप वन पंचायतों का दायरा बढ़ाइये और उनकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ाइये। इससे पहले भी गांव ही जंगल को बचाते थे। हमारे पास जंगल बचाने का और कोई समाधान नहीं है। जलवायु परिवर्तन हो रहा है। बारिश के पैटर्न में बदलाव आ रहा है”।

जंगल की आग की एक अन्य बड़ी वजह ज़मीन पर फैली सूखी पत्तियां हैं। अनिल जोशी कहते हैं, “बड़े पैमाने पर जंगल के अंदर से सूखी पत्तियों को हटाना होगा। इसके लिए ग्रामीणों की मदद ली जा सकती है। यही सूखी पत्तियां जंगल की आग की वजह बन रही हैं। इनका इस्तेमाल खाद बनाने में किया जा सकता है। इससे पर्वतीय खेती-बाड़ी बेहतर होगी। इस तरह वन विभाग की ज़िम्मेदारी बंट जाएगी”।

ग्रीन बोनस की मांग करने वाला राज्य के जंगल जलने की क़ीमत इतनी कम क्यों

आग से जंगल के पूरे पारिस्थतकीय तंत्र को नुकसान हो रहा है। कीड़े-मकोड़ों का संसार, चिड़ियों के घोंसले से लेकर हवा के प्रदूषण तक होने वाले नुकसान का आकलन करना बेहद मुश्किल है। लेकिन लकड़ी, लीसा और अन्य सामाग्री के जलने के आधार पर वन विभाग इस नुकसान का आकलन करता है।

रविवार शाम 4 बजे तक 1359.83 हेक्टेअर जंगल (1 अक्टूबर से 4 अप्रैल तक) जलने पर 39 लाख 46 हज़ार 986 रुपये नुकसान का आकलन किया गया। एक हेक्टेअर क्षेत्र का जंगल जलने पर उत्तराखंड वन विभाग 2500-3000 रुपये की क्षति मानता है। इसी के अनुसार समूचे नुकसान का आकलन किया जाता है।

अक्टूबर 2018 में उत्तराखंड सरकार ने राज्य के जंगल और उससे मिलने वाली सेवाओं का आर्थिक मूल्यांकन कराया था। यह रिपोर्ट भोपाल के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट ने तैयार की थी। 248 पन्नों की इस रिपोर्ट में बताया गया कि हमारे जंगलों से मिलने वाली इको सर्विस की कीमत प्रति वर्ष 95 हज़ार 112 करोड़ है।

सोशल डेवलपमेंट ऑफ कम्यूनिटीज़ फाउंडेशन के अनूप नौटियाल कहते हैं कि उत्तराखंड सरकार जब केंद्र सरकार से ग्रीन बोनस की मांग करती है तो उसका आधार यही रिपोर्ट है। इसमें यह भी बताया गया है कि प्रति हेक्टेअर 3 लाख 88 हज़ार रुपये जंगल का सालाना फ्लो वैल्यू तय किया गया। यानी एक  हेक्टेअर जंगल से एक वर्ष में मिलने वाली इको सर्विस (हवा, मिट्टी, पानी, पर्यावरण व अन्य) की कीमत 3 लाख 88 हज़ार है। लेकिन जब यही एक हेक्टेअर जंगल जलता है तो इससे होने वाले नुकसान का आकलन ढाई से तीन हज़ार रुपये।  दोनों ही रकम में बड़ा अंतर है।

हालांकि जलते जंगल की कीमत से ज्यादा पर्यावरण को पहुंच रहा नुकसान है। जंगल के भीतर का संसार तो जल ही रहा है। इसके धुएं से न सिर्फ हवा प्रदूषित हो रही है बल्कि ये ग्लेशियरों की सेहत को भी नुकसान पहुंचाता है। ये तय है कि एक वन महकमा जंगल बचाने के लिए काफी नहीं है। समुदाय को शामिल करना ही होगा। समुदाय शामिल भी है। लेकिन जंगल से जुड़े कानून समुदाय को दूर कर रहे हैं। ग्रामीणों को साथ लेकर जंगल की सेहत सुधारने की दूरगामी रणनीति की जरूरत है।  

(देहरादून स्थित वर्षा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

UTTARAKHAND
Uttarakhand Fire
NDRF teams
Tirath Singh Rawat
Uttarakhand government

Related Stories

इको-एन्ज़ाइटी: व्यासी बांध की झील में डूबे लोहारी गांव के लोगों की निराशा और तनाव कौन दूर करेगा

देहरादून: सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के कारण ज़हरीली हवा में जीने को मजबूर ग्रामीण

उत्तराखंड के नेताओं ने कैसे अपने राज्य की नाज़ुक पारिस्थितिकी को चोट पहुंचाई

उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में वन गुर्जर महिलाओं के 'अधिकार' और उनकी नुमाइंदगी की जांच-पड़ताल

उत्तराखंड: जलवायु परिवर्तन की वजह से लौटते मानसून ने मचाया क़हर

उत्तराखंड: बारिश ने तोड़े पिछले सारे रिकॉर्ड, जगह-जगह भूस्खलन से मुश्किल हालात, आई 2013 आपदा की याद

उत्तराखंड: विकास के नाम पर 16 घरों पर चला दिया बुलडोजर, ग्रामीणों ने कहा- नहीं चाहिए ऐसा ‘विकास’

'विनाशकारी विकास' के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है देहरादून, पेड़ों के बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग

उत्तराखंड: विकास के नाम पर विध्वंस की इबारत लिखतीं सरकारें

अनियंत्रित ‘विकास’ से कराहते हिमालयी क्षेत्र, सात बिजली परियोजनों को मंज़ूरी! 


बाकी खबरें

  • LAW AND LIFE
    सत्यम श्रीवास्तव
    मानवाधिकारों और न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाता उत्तर प्रदेश : मानवाधिकार समूहों की संयुक्त रिपोर्ट
    30 Oct 2021
    29 अक्तूबर को जारी हुई एक रिपोर्ट ‘कानून और ज़िंदगियों की संस्थागत मौत: उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा हत्याएं और उन्हें छिपाने की साजिशें’ हमें उत्तर प्रदेश में मौजूदा कानून व्यवस्था के हालात को बेहद…
  • migrant
    सोनिया यादव
    महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या
    30 Oct 2021
    एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल भारत में तकरीबन 1 लाख 53 हज़ार लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें से सबसे ज़्यादा तकरीबन 37 हज़ार दिहाड़ी मजदूर थे।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    आंदोलन की ताकतें व वाम-लोकतांत्रिक शक्तियां ही भाजपा-विरोधी मोर्चेबन्दी को विश्वसनीय विकल्प बना सकती है, जाति-गठजोड़ नहीं
    30 Oct 2021
    पिछले 3 चुनावों का अनुभव गवाह है कि महज जातियों के जोड़ गणित से भाजपा का बाल भी बांका नहीं हुआ, इतिहास साक्षी है कि जोड़-तोड़ से सरकार बदल भी जाय तो जनता के जीवन में तो कोई बड़ी तब्दीली नहीं ही आती, संकट…
  • Children playing in front of the Dhepagudi UP school in their village in Muniguda
    राखी घोष
    ओडिशा: रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न-आय वाले परिवारों के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि जब अगस्त 2021 में सर्वेक्षण किया गया था तो ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 28% बच्चे ही नियमित तौर पर पठन-पाठन कर रहे थे, जबकि 37% बच्चों ने अध्ययन बंद कर दिया था।…
  • climate change
    संदीपन तालुकदार
    जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट : अमीर देशों ने नहीं की ग़रीब देशों की मदद, विस्थापन रोकने पर किये करोड़ों ख़र्च
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देश भारी हथियारों से लैस एजेंटों को तैनात करके, परिष्कृत और महंगी निगरानी प्रणाली, मानव रहित हवाई प्रणाली आदि विकसित करके पलायन को रोकने के लिए एक ''जलवायु दीवार'' का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License