NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
उत्तराखंड में धरने पर क्यों बैठी हुई हैं आशा कार्यकर्ता? सरकार से कहां तक पहुंची बातचीत!
2 अगस्त से ही सभी स्वास्थ्य केन्द्रों पर आशा कार्यकर्ता धरने पर बैठी हुई हैं। मुख्यमंत्री से लेकर स्वास्थ्य सचिव तथा स्वास्थ्य महानिदेशक के साथ कई दौर की वार्ता हो चुकी है, परंतु इन सभी वार्ताओं का परिणाम बेनतीजा रहा। अब 15 अगस्त तक मांगें न माने जाने पर आंदोलन तेज़ करने की चेतावनी दी गई है।
सत्यम कुमार
14 Aug 2021
देहरादून में अपनी मांगों को लेकर रैली निकालती आशाएं, फोटो- सत्यम कुमार 
देहरादून में अपनी मांगों को लेकर रैली निकालती आशाएं, फोटो- सत्यम कुमार 

उत्तराखंड में आशा कार्यकर्ता कर्मचारी यूनियन का विभिन्न मांगों को लेकर 23 जुलाई से धरना और 2 अगस्त से कार्य बहिष्कार जारी है, आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए राज्य की राजधानी देहरादून में 10 अगस्त को सीआईटीयू और एक्टू के नेतृत्व में रैली के द्वारा मुख्यमंत्री आवास कूच कर अपना मांग पत्र प्रशासनिक अधिकारी को सौंपा गया। 

रैली को मुख़्यमंत्री आवास से पहले हाथीबडकला में पुलिस के द्वारा बैरीकेडिंग कर रोक दिया गया, इस पर आशाओं ने वहीं बैठ कर आमसभा की और आगे की रणनीति बनाते हुए यह निर्णय लिया कि धरना लगातार जारी रहेगा और यदि 15 अगस्त तक हमारी मांगे नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और तेज करते हुए एक बड़ी राज्यस्तरीय रैली की जायेगी, जिसमें बड़ी संख्या में राज्य के दोनों मंडलो कुमाऊं और गढ़वाल से आशाएं शामिल होंगी और यदि सरकार फिर भी नही मानती है तो फिर राज्य की राजधानी में महानिदेशक स्वास्थ्य के कार्यालय पर महापड़ाव शुरू किया जाएगा।

आशा कार्यकर्ताओं की मुख्य मांगे 

  • आशाओं को कर्मचारी घोषित करने तथा घोषित होने तक 21 हजार का मानदेय दिया जाए

  • सेवानिवृत्त होने पर पेंशन का प्रावधान हो

  • प्रत्येक केंद्र में आशा रूम स्थापित किये जाये

  • अटल पेंशन योजना में उम्र की सीमा समाप्त करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाएगा

  • आशाओं के सभी प्रकार के उत्पीड़न एवं कमीशनखोरी पर कार्यवाही हो

  • वार्ता में स्वास्थ्य सचिव के प्रस्ताव जिसमें कि पांच हजार की पेशकश की गयी है, उसको अन्य देय को सम्मिलित करते हुए 7,000 रुपये किया जाए

23 जुलाई से जारी है धरना 

पूरे उत्तराखंड में 9 हजार से भी अधिक आशाएं कार्य बहिष्कार पर हैं, सीआईटीयू व एक्टू से जुड़ी आशा कार्यकत्री यूनियन अपनी मांगो को लेकर 23 जुलाई से प्रदेश भर में आंदोलनरत है, 23 जुलाई को प्रदेश के सभी ब्लॉक मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने के बाद 30 जुलाई को सभी जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन आयोजित किये गये, सरकार द्वारा आशाओ की मांगों की अनदेखी करने पर 2 अगस्त से सभी स्वास्थ्य केन्द्रों पर आशा कार्यकत्रियां लगातार धरने पर बैठी हैं। मुख्यमंत्री से लेकर स्वास्थ्य सचिव तथा स्वास्थ्य महानिदेशक के साथ कई दौर की वार्ता यूनियन नेताओं की हो चुकी है, परंतु इन सभी वार्ताओं का परिणाम बेनतीजा रहा. 

हल्द्वानी में बारिश में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करतीं आशाएं फोटो - कैलाश पांडे 

9 अगस्त को स्वास्थ्य सचिव, स्वास्थ्य महानिदेशक व परियोजना निदेशक एनआरएचएम तथा सीटू से संबंधित आशा कार्यकत्री यूनियन की प्रदेश अध्यक्ष शिवा दुवे, देहरादून की अध्यक्ष सुनीता चौहान व सीटू के प्रांतीय सचिव लेखराज के बीच दो घंटे की लंबी वार्ता के बाद कुछ मांगों पर सहमति बनी, जिसमें महत्वपूर्ण मांग आशाओं को वर्तमान में मिल रहे प्रोत्साहन राशि के अलावा पांच हजार रुपये मानदेय देने का प्रस्ताव सरकार को अभिलम्ब भेजने का आश्वासन स्वास्थ्य सचिव ने प्रतिनिधिमंडल को दिया।

आप को बताते चलें कि 9 अगस्त को ही बीएमएस से जुड़ी आशा यूनियन ने भी राज्य की राजधानी में प्रदर्शन किया, जिसमें आशाओ के अलावा आंगनबाड़ी व भाजपा महिला मोर्चा को भी शामिल किया गया, बीएमएस के इस प्रदर्शन के बारे में आशा कार्यकत्री यूनियन अध्यक्ष शिवा दुबे का कहना है कि राज्य सरकार ने इस रैली की पूरी मदद की, जिसका सीधा मकसद बड़ी संख्या में शामिल आशाओं के आंदोलन को तोड़ना था, किन्तु हमारे द्वारा 10 अगस्त को हुए रैली प्रदर्शन ने उनके मंसूबो को कामयाब नही होने दिया, साथ ही वो आगे कहती हैं कि हम अपनी मांगों पर अडिग हैं और जब तक वह पूरी नहीं होंगी हमारा प्रदर्शन चलता रहेगा। 

मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय देहरादून पर धरना देती आशाएं फोटो- सत्यम कुमार 

एक्टू के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ.कैलाश पांडेय का कहना है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य मातृ शिशु मृत्यु दर में कमी लाना था, जिस में आशा का कार्य लोगों को जागरूक करना और जच्चा बच्चा की देखभाल के साथ यह सुनिश्चित करना की प्रसव घर में न होकर अस्पताल में हो, ताकि जच्चा और बच्चा दोनों को जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें, सरकार का यह प्रयास सफल रहा परन्तु आज आशाओं के ऊपर जिम्मेदारी बढ़ा दी गई है, यदि कोरोना की बात करें तो आशाओं ने फ्रंट वॉरियर की तरह कार्य किया, जबकी आशाओं के पास सुरक्षा उपकरणों की कमी भी थी, जिस कारण कोरोना से कुछ आशाओं की मृत्यु भी हुई. डॉ. कैलाश पांडेय आगे कहते हैं कि एक आशा नौ महीने तक गर्भवती महिला की देखभाल करती है उसके बाद सरकारी अस्पताल में प्रसव होने पर उसको मात्र 600 रुपये मिलते हैं, लेकिन यदि जच्चा के घर वाले उस का प्रसव प्राइवेट अस्पताल में कराते हैं तो ये प्रोत्साहन राशि भी उसको नहीं मिल पाती। इसके आलावा स्वास्थ्य विभाग के बहुत से कामों का जिम्मा आशा को उठाना पड़ता है, गावों के स्वास्थ्य से सम्बंधित सभी मामलों की जिम्मेदारी आशा पर ही होती हैं. वो आगे कहते हैं हमारी मांग है कि आशाओं को प्रतिमाह 21 हजार रुपये मानदेय दिया जाये और सरकार यदि ऐसा करने में असमर्थ है तो कम से कम इतना मानदेय तो दिया जाये जिससे एक आशा अपने परिवार का सही प्रकार से वहन कर सके. 

कुमाऊं में धरना प्रदर्शन करती आशाएं, फोटो- कैलाश पांडे 

उत्तराखंड में आशाओं की स्थिति 

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (RHS) 2019-20 के आकड़ो से साफ हो जाता है कि राज्य के स्वस्थ्य विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी है, जिस कारण कोरोना काल में राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का सारा जिम्मा आशाओं के ऊपर है. 9 फ़रबरी 2021 को राज्यसभा में पूछे गये प्रश्न के उत्तर में बताया गया है कि उत्तराखंड राज्य में कुल 11,899 आशा हैं और इन सभी की नियुक्ति कोरोना प्रभावित क्षेत्र में लगायी गई, उत्तराखंड में मात्र 1,000 रुपये प्रोत्साहन राशि के रूप में दिये जाते हैं, जबकि सिक्किम में यह राशि 6,000 रुपये प्रतिमाह और हरियाणा में 4,000 प्रतिमाह है. इस बारे में देहरादून में नियुक्त आशा कलावती चंदौला का कहना है कि आशा को कोरोना ड्यूटी के साथ-साथ अपने के सभी कार्य जैसे गर्भवती की देखभाल,बच्चो का टीकाकरण, फील्ड सर्वे आदि सभी कार्य करने होते थे, ऐसे में आशाओं के पास अपने परिवार के लिए भी समय नहीं होता। इतने ज्यादा काम करने बावजूद भी हमें सरकार द्वारा प्रोत्साहन राशि के रूप में केवल 2,000 रूपये दिए जाते हैं. महंगाई के इस दौर में जहां एक गैस सिलेंडर की कीमत भी 800 रुपये से अधिक है ऐसे में सरकार द्वारा जो रकम हमें दी जाती है, उससे बहुत ही मुश्किल से अपना घर चला पाते हैं. 

इसे भी पढ़े: हिमालयी राज्यों के बीच स्वास्थ्य पर सबसे कम ख़र्च करने वाला राज्य है उत्तराखंड

चकराता ब्लॉक से आशा रौशनी राणा का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सबसे अधिक समस्या का सामना करना पड़ता है, यदि किसी महिला का प्रसव करना हो तो उसके लिए रात के समय में भी जाना पड़ता है, रात में जंगली जानवरों से भी जान का खतरा बना रहता है, इन सब के अतरिक्त यदि हमारी ड्यूटी अपने गांव से कहीं दूर लगा दी जाती है तो वहां तक जाने के लिए किराया भी अपने पास से ही लगाना पड़ता है, इसके आलावा सरकार से जो पैसा मिलता है वह भी समय पर नहीं आता है. 

प्रशासन का रुख 

आशाओं के द्वारा लगातार जारी कार्य बहिष्कार व धरना प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन की ओर से आंदोलनरत आशाओं को 12 अगस्त को बातचीत के लिये बुलाया गया, जिसमें प्रशासन की ओर से मिशन डायरेक्टर सोनिका और महानिदेशक तृप्ति बहुगुणा के साथ ही आशा यूनियन की ओर से शिवा दुवे, कलावती चंदौला और अनीता भट्ट (गढ़वाल मंडल) और कुमाऊ मंडल से कमला कुंजवाल और कैलाश पांडे को फोन के द्वारा जोड़ा गया. शिवा दुवे ने हमें बताया कि प्रशासन की ओर से प्रोत्साहन राशि में 3,000 रुपये की वृद्धि के साथ कुल 5,000 रुपये की पेशकश की गयी. लेकिन आशा यूनियन की इस पर सहमति नहीं बनी, आशाओं का कहना है कि प्रोत्साहन राशि को 5,000 रुपये बढ़ाया जाये, मतलब जो 2,000 रुपये पहले दिये जाते थे उस के अतिरिक्त 5,000 (2,000+5,000 =7,000) रुपये दिये जाएं, जिससे एक आशा को 7,000 रुपये प्रतिमाह प्रोत्साहन राशि मिले, लेकिन इस प्रस्ताव पर प्रशासन के साथ कोई सहमति अभी नहीं बन पायी है. 

इस संदर्भ में मिशन डायरेक्टर सोनिका ने हमें बताया कि हमारे द्वारा प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेज दिया गया है, सरकार की इस पर क्या प्रतिक्रिया है जल्द ही सभी को इसकी जानकारी दे दी जाएगी। आगे उन्होंने बताया कि आशाओं का कार्य काबिले तारीफ़ है हमारी ओर से जो भी संभव होगा किया जायेगा। कोविड काल में हुई आशाओं की मृत्यु पर जो 50 लाख रुपये दिये जाते हैं उसके बारे में मिशन डायरेक्टर सोनिका का कहना है कि उत्तराखंड में पांच आशाओं की मृत्यु कोविड काल में हुई है जिनमें से दो आशाओं के परिवार वालों को 50-50 लाख रुपये दे दिये गये हैं, बाकी के लिये भी प्रक्रिया अभी चल रही है. 

आशा आज स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग बन चुकी हैं, कोरोना काल में आशाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, क्वारंटाइन व्यक्ति की देखभाल हो या इलाके का सर्वेक्षण, आशाओं ने अपने कार्य को बखूबी किया है, लेकिन आज आशाएं अपने हक के लिये सड़कों पर हैं और सरकार की उदासीनता उनकी परेशानियों को और बढ़ा देती है, अतः सरकार को आशाओं के कार्य को देखते हुये उनकी बात को सुनना चाहिए। 

(लेखक देहरादून स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

UTTARAKHAND
asha workers
Asha Workers Strike
CITU
AICCTU
ASHA Workers Employees Union

Related Stories

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

मुंडका अग्निकांड के खिलाफ मुख्यमंत्री के समक्ष ऐक्टू का विरोध प्रदर्शन

मुंडका अग्निकांड: सरकारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रेड यूनियनों ने डिप्टी सीएम सिसोदिया के इस्तीफे की मांग उठाई

जेएनयू: अर्जित वेतन के लिए कर्मचारियों की हड़ताल जारी, आंदोलन का साथ देने पर छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष की एंट्री बैन!

दिल्ली : नौकरी से निकाले गए कोरोना योद्धाओं ने किया प्रदर्शन, सरकार से कहा अपने बरसाये फूल वापस ले और उनकी नौकरी वापस दे

दिल्ली: लेडी हार्डिंग अस्पताल के बाहर स्वास्थ्य कर्मचारियों का प्रदर्शन जारी, छंटनी के ख़िलाफ़ निकाला कैंडल मार्च

दिल्ली: कोविड वॉरियर्स कर्मचारियों को लेडी हार्डिंग अस्पताल ने निकाला, विरोध किया तो पुलिस ने किया गिरफ़्तार


बाकी खबरें

  • National Girl Child Day
    सोनिया यादव
    राष्ट्रीय बालिका दिवस : लड़कियों को अब मिल रहे हैं अधिकार, पर क्या सशक्त हुईं बेटियां?
    24 Jan 2022
    हमारे समाज में आज भी लड़की को अपने ही घर में पराये घर की अमानत की तरह पाला जाता है, अब जब सुप्रीम कोर्ट ने पिता की प्रॉपर्टी में बेटियों का हक़ सुनिश्चित कर दिया है, तो क्या लड़कियां पराया धन की बजाय…
  • social science
    प्रभात पटनायक
    हिंदुत्व नहीं, बल्कि नए दृष्टिकोण वाला सामाजिक विज्ञान ही दिमाग को उपनिवेश से मुक्त कर सकता है
    24 Jan 2022
    समाज विज्ञान, बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण होता है क्योंकि तीसरी दुनिया की समस्याएं, सबसे बढक़र सामाजिक समस्याएं हैं। और तीसरी दुनिया के दिमागों के उपनिवेशीकरण का नतीजा यह होता है कि औपनिवेशिक दौर के…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    सिर्फ साम्प्रदायिक उन्माद से प्रचार होगा बीजेपी?
    24 Jan 2022
    अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कहा है कि चुनाव से पहले टीवी चैनलों द्वारा दिखाए जा रहे सर्वे पर लगाम लगाई जाए। अभिसार शर्मा आज के एपिसोड में इस मुद्दे के साथ साथ भाजपा के सांप्रदायिक प्रचार…
  • Dera Ballan
    तृप्ता नारंग
    32% दलित आबादी होने के बावजूद पंजाब में अभी तक कोई कद्दावर एससी नेता नहीं उभर सका है: प्रोफेसर रोंकी राम 
    24 Jan 2022
    पंजाब की 32% अनुसूचित आबादी के भीतर जाति एवं धार्मिक आधार पर विभाजन मौजूद है- 5 धर्मों के 39 जातियों में बंटे होने ने उन्हें अनेकों वर्षों से अपने विशिष्ट एवं व्यवहार्य राज्य-स्तरीय नेतृत्व को विकसित…
  •  Bihar Legislative Council
    फ़र्रह शकेब
    बिहार विधान परिषद में सीट बंटवारे को लेकर दोनों गठबंधनों में मचा घमासान
    24 Jan 2022
    बिहार में इस वर्ष स्थानीय निकाय प्राधिकार क्षेत्र से आने वाले बिहार विधान परिषद के 24 सदस्यों यानी सीटों के लिए चुनाव होना है, जिसकी अधिसूचना अभी फ़िलहाल जारी नहीं हुई है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License