NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
महिला किसान दिवस: खेत से लेकर सड़क तक आवाज़ बुलंद करती महिलाएं
तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे आंदोलन के बीच आज महिला किसान दिवस मनाया गया। जिसमें कई अन्य महिला वादी संगठनों ने भी शिरकत की और प्रदर्शन के अलग-अलग जगह से मार्च निकाला।
सोनिया यादव
18 Jan 2021
महिला किसान दिवस

यूं तो महिला किसान दिवस की अपनी एक अलग अहमियत है लेकिन आज हज़ारों महिला किसान, जो देश की राजधानी की सीमाओं पर डटी हुई हैं उन्होंने इसकी अलग ही परिभाषा गढ़ दी है। वो ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन की महज़ समर्थक ही नहीं बल्कि उसमें बराबर की भागीदार भी हैं। वो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने हक़ की लिए लड़ाई लड़ रही हैं, नारे लगा रही हैं और सत्ता की आंखों में आंखें डाल उनकी नींद उड़ा रही हैं।

किसान आंदोलन में शामिल दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर बैठी औरतें सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को भी जवाब दे रही हैं, जिन्होंने इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को लेकर कई टिप्पणियां कीं। इन टिप्पणियों को महिला किसान रूढ़िवादी और समाज की पितृसत्तामक सोच की नुमाइश के तौर पर देख रही हैं।

आपको बता दें कि 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में चीफ़ जस्टिस बोबडे ने सवाल किया था कि 'इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं और बुज़ुर्गों को क्यों शामिल किया गया है?' जस्टिस बोबडे ने वरिष्ठ वकील एच एस फुल्का से कहा कि 'वो आंदोलन में शामिल महिलाओं और बुज़ुर्गों को प्रदर्शन स्थल से घर वापस जाने के लिए राज़ी करें।'

महिलावादी संगठनों का महिला किसान मार्च

महिला किसान दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन समेत कई महिलावादी कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर सोमवार, 18 जनवरी को प्रदर्शनकारी महिलाओं के समर्थन और केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ़ प्रदर्शन के अलग-अलग जगहों से एक मार्च निकाला। इस मार्च का नाम ‘हर महिला का हाथ, महिला किसानों के साथ’ दिया गया। इस दौरान सभी ने एक सुर में सरकार से नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की।

image

सिंघु बार्डर के मंच से महिला किसानों को संबोधित करते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णनन ने कहा, “आपके संघर्ष ने दिल्ली की सर्दी में गरमाहट ला दी है, मोदी सरकार के दंभ को भीतर से हिला दिया है और देश के लोकतंत्र को मज़बूत कर दिया है।”

चीफ़ जस्टिस बोबडे की टिप्पणी का जवाब देते हुए कविता ने कहा, “महिलाओं की जगह चारदिवारी में बंद नहीं है, हम पिंजरें में बंद नहीं रहेंगे। हम सड़कों पर आएंगे, संघर्षों में आएंगे, जुलूसों में आएंगे सभी युद्धों में आएंगे। सारी महिलाओँ की जगह सड़क पर है, संघर्ष में है।”

कविता ने कहा कि जब-जब देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ता है और लोग सोच में पड़ जाते हैं कि अब क्या होगा, तब-तब गरीब वर्ग और महिलाएँ ऐसी लड़ाई खड़ी कर देते हैं, जिससे देश के संविधान में नई जान आ जाती हैँ। ये लड़ाई खेती बचाने की है क्योंकि खेती बचेगी तभी राशन बचेगा और तभी देश का लोकतंत्र बचेगा।

कृषि क्षेत्र में महिलाओँ की भूमिका

भारत में कृषि क्षेत्र में आधी आबादी का अहम योगदान है। इन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ़ भी कहा जाता है। जनगणना 2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में छह करोड़ से ज़्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं।

हालांकि भारत में क़ानूनी रूप से सिर्फ़ उन्हीं महिला किसानों को किसान का दर्जा दिया जाता है जिनके नाम पर भूमि का पट्टा होता है और ये गिनती महज़ नामभर की है।

देश में भूमिहीन महिला किसानों का एक बड़ा तबक़ा है, जो छोटे से खेत को किराये पर लेकर अपने स्तर पर खेती करता है। इस खेती में वह अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए ज़रूरी अनाज को पैदा करने की कोशिश करती हैं। खेत नहीं मिलने की स्थिति में यही महिलाएं क़स्बों में जाकर मज़दूरी आदि भी करती हैं।

आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण साल 2018-19 के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 71.1 फ़ीसद महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं। वहीं, पुरुषों का प्रतिशत मात्र 53.2 फ़ीसद है। इसके साथ ही आँकड़े ये भी बताते हैं कि खेतिहर मज़दूर वर्ग में भी महिलाओं की भागीदारी काफ़ी ज़्यादा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या खेतों में काम करने वाली महिलाएँ अपने हित-अहित को समझते हुए आंदेलन में भीगदार नहीं हो सकती।

नेशनल काउंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकॉनमिक रिसर्च के मुताबिक़, वर्ष 2018 में देश के कृषि क्षेत्र के कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 42 फ़ीसद थी। लेकिन आज भी महिलाएं, खेती के लायक़ केवल दो फ़ीसद ज़मीन की ही मालिक हैं।

पंजाब किसान यूनियन से ताल्लुक़ रखने वाली जसबीर कौर नट अपनी साथी महिला किसानों के साथ अभी भी टिकरी बॉर्डर पर धरने पर डटी हुई हैं। वो कहती हैं कि जब तक सरकार ये क़ानून वापस नहीं लेती, वो घर नहीं लौटेंगी।

जसबीर के अनुसार, "महिलाओं को इस विरोध प्रदर्शन से अलग नहीं रखा जा सकता। हम भी बराबर के नागरिक हैं, हमें भी अपनी बात रखने और अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार है। महिलाएं इस आंदेलन में बराबर की भागिदारी हैं और हम सरकार को ये बता देना चाहते हैं कि जब तक ये काले कानून वापस लेने ही होंगे, हम यहीं डटे रहेंगे।"

महिलाओं का सड़कों पर संघर्ष

आज़ादी की लड़ाई से लेकर चिपको आंदोलन तक देश में महिलाओं के संघर्ष की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि साल 2020 में जिस तरह नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ महिलाएं बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरीं, सर्द रातों में अपनी आवाज़ बुलंद की, उसने आने वाले दिनों में महिला आंदोलनों की एक नई इबारत लिख दी।

बीते साल तस्वीरों में पुलिस से भिड़ती कॉलेज की लड़कियां हों या फिर हाड़ कंपाने वाली सर्दी में बैठी शाहीन बाग़ की दादियां, सबने ये जाहिर कर दिया कि अब वो चुपचाप सब कुछ होते नहीं देखेंगी, वो बदलाव के लिए संघर्ष करेंगी।

कृषि बिलों के ख़िलाफ़ किसान आंदोलनों में भागीदारी करती गांव-गांव से राष्ट्रीय राजधानी का सफ़र तय करने वालीं महिलाएं, इस बात का सबूत है कि वो समय आने पर कृषि क्षेत्र में अपने अदृश्य योगदान से पर्दा उठाकर, देश को ये एहसास करा सकती हैं कि खेती-बाड़ी में उनकी भूमिका कितनी बड़ी और महत्वपूर्ण है।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए अनहद की शबनम हाशमी कहती हैं कि आज का महिला किसान दिवस बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज पूरे देश की महिलाएं इस किसान आंदोलन से जुड़ रही हैं, जोर-शोर से इसमें शामिल हो रही हैं।

शबनम के अनुसार ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज से पहले महिला किसानों को लेकर हमारे देश में कभी इतनी व्यापक स्तर पर बातचीत नहीं हुई है। महिला किसानों की वास्तविक स्थिति को उज़ागर करने में आज का दिन अहम भूमिका निभाएगा।

Women Farmers Day
Mahila Kisan Diwas
farmers protest
Farm bills 2020
Women Organization's Protest
women empowerment
Kavita Krishnan
AIPWA
Shaheen Bagh
women farmers
Women Farmers Struggle

Related Stories

शाहीन बाग से खरगोन : मुस्लिम महिलाओं का शांतिपूर्ण संघर्ष !

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

बिहार: 6 दलित बच्चियों के ज़हर खाने का मुद्दा ऐपवा ने उठाया, अंबेडकर जयंती पर राज्यव्यापी विरोध दिवस मनाया

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

साल 2021 : खेत से लेकर सड़क और कोर्ट तक आवाज़ बुलंद करती महिलाएं

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला

लखीमपुर कांड की पूरी कहानी: नहीं छुप सका किसानों को रौंदने का सच- ''ये हत्या की साज़िश थी'’

इतवार की कविता : 'ईश्वर को किसान होना चाहिये...


बाकी खबरें

  • channi sidhu
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: ‘अनिवार्य’ वैक्सीन से सिद्धू-चन्नी के ‘विकल्प’ तक…
    23 Jan 2022
    देश के 5 राज्यों में चुनावों का मौसम है, इसलिए खबरें भी इन्हीं राज्यों से अधिक आ रही हैं। ऐसी तमाम खबरें जो प्रमुखता से सामने नहीं आ पातीं  “खबरों के आगे-पीछे” नाम के इस लेख में उन्हीं पर चर्चा होगी।
  • Marital rape
    सोनिया यादव
    मैरिटल रेप: घरेलू मसले से ज़्यादा एक जघन्य अपराध है, जिसकी अब तक कोई सज़ा नहीं
    23 Jan 2022
    भारतीय कानून की नज़र में मैरिटल रेप कोई अपराध नहीं है। यानी विवाह के बाद औरत सिर्फ पुरुष की संपत्ति के रूप में ही देखी जाती है, उसकी सहमति- असहमति कोई मायने नहीं रखती।
  • Hum Bharat Ke Log
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    महज़ मतदाता रह गए हैं हम भारत के लोग
    23 Jan 2022
    लोगों के दिमाग में लोकतंत्र और गणतंत्र का यही अर्थ समा पाया है कि एक समय के अंतराल पर राजा का चयन वोटों से होना चाहिए और उन्हें अपना वोट देने की कुछ क़ीमत मिलनी चाहिए।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    नये चुनाव-नियमों से भाजपा फायदे में और प्रियंका के बयान से विवाद
    22 Jan 2022
    कोरोना दौर में चुनाव के नये नियमों से क्या सत्ताधारी पार्टी-भाजपा को फ़ायदा हो रहा है? कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने प्रशांत किशोर पर जो बयान दिया; उससे कांग्रेस का वैचारिक-राजनीतिक दिवालियापन…
  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव चक्र: यूपी की योगी सरकार का फ़ैक्ट चेक, क्या हैं दावे, क्या है सच्चाई
    22 Jan 2022
    एनसीआरबी की रिपोर्ट है कि 2019 की अपेक्षा 2020 में ‘फ़ेक न्यूज़’ के मामलों में 214 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। फ़ेक न्यूज़ के जरिए एक युद्ध सा छेड़ दिया गया है, जिसके चलते हम सच्चाई से कोसो दूर होते…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License