NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
वर्कर्स फ्रंट की पहली जीत: बैकफुट पर योगी सरकार, 12 नहीं अब 8 ही घंटे होगा काम
श्रमिकों के काम करने के घंटे बढ़ाए जाने संबंधी अधिसूचना के खिलाफ वर्कर्स फ्रंट की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई थी। जिसके बाद मुख्य न्यायधीश की खंडपीठ ने सरकार को नोटिस जारी किया था। अगली सुनवाई सोमवार, 18 मई को होनी थी। लेकिन इस सुनवाई से पहले ही सरकार अपने फैसले से पीछे हट गई है।
सोनिया यादव
16 May 2020
 योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार श्रम कानूनों में संशोधन को लेकर बैकफुट पर नज़र आ रही है। श्रमिकों के काम करने के घंटे बढ़ाए जाने संबंधी छूट की चौतरफा आलोचना होने के बाद प्रशासन ने इस संबंध में जारी अधिसूचना को हफ्ते भर बाद ही निरस्त कर दिया है।

संशोधन की अधिसूचना को खत्म किए जाने की जानकारी प्रमुख सचिव (श्रम) सुरेश चंद्रा ने शुक्रवार को पत्र के जरिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य स्थायी अधिवक्ता को दी है। पत्र में जानकारी दी गई है कि 8 मई को इस संबंध में जारी अधिसूचना को शुक्रवार (15 मई 20) को निरस्त कर दिया गया है।

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश श्रम विभाग की ओर से 8 मई को एक अधिसूचना जारी हुई। जिसके मुताबिक रजिस्टर्ड कारखानों में युवा श्रमिकों के काम करने की अवधि एक कामकाजी दिन में आठ घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे यानी एक हफ्ते में 72 घंटे किए जाने का फैसला किया गया। जबकि वर्तमान श्रम नियम के अनुसार एक दिन में किसी भी श्रमिक से अधिकतम आठ घंटे और एक हफ्ते में 48 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। अगर कोई नियोक्ता ऐसा करता है तो मज़दूरी की दोगुनी दर से प्रत्येक घंटे के लिए ओवरटाइम देना अनिवार्य होता है।

बता दें कि नयी अधिसूचना के खिलाफ वर्कर्स फ्रंट की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई थी, जिसके बाद गुरुवार, 14 मई को मुख्य न्यायधीश की खंडपीठ ने सरकार को नोटिस जारी किया था। अगली सुनवाई सोमवार, 18 मई को होनी थी। लेकिन इस सुनवाई से पहले ही सरकार अपने फैसले से पीछे हट गई है। सरकार द्वारा जारी इस अधिसूचना को वापस लिए जाने के बाद प्रदेश में एक बार फिर श्रमिकों से काम कराने की अवधि अधिकतम आठ घंटे हो गई है।

बता दें कि श्रम कानूनों में ढ़ील देने को लेकर योगी सरकार विपक्ष के निशाने पर है। मज़दूर संगठनों ने भी इसके खिलाफ हल्ला बोल दिया है। गुरूवार, 14 मई को सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) ने प्रदेश के तमाम जिला कार्यालयों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सरकार के फैसले के विरोध में प्रदर्शन किया। तो वहीं बुधवार, 20 मई को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा संगठन भारतीय मज़दूर संघ ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

लॉकडाउन के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने 6 मई को मंत्रिमंडल की बैठक में कुछ अहम फैसले किए। इनमें यूपी में लागू श्रम अधिनियमों से अस्थायी छूट प्रदान किए जाने संबंधी अध्यादेश, 2020 भी शामिल था। हालांकि अभी इस अध्यादेश को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी चाहिए।

योगी सरकार का तर्क है कि कोविड महामारी ने राज्य में औद्योगिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसे वापस पटरी पर लाने के लिए “उत्तर प्रदेश कतिपय श्रम विधियों से अस्थायी छूट अध्यादेश 2020” लाया गया है।

क्या है इस अध्यादेश में?

इस अध्यादेश के तहत यूपी सरकार ने आगामी तीन वर्षों के लिए राज्य में मौजूद सभी कारखानों और मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज को वर्तमान में लागू श्रम अधिनियमों में अस्थायी छूट प्रदान करने का फैसला किया है। 

राज्य सरकार द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि श्रम कानूनों में बच्चों और महिलाओं से संबंधित प्रावधान लागू होते रहेंगे। इसके तहत यह शर्त भी रखी गई है कि कंपनियों को बंधुआ श्रम प्रथा अधिनियम 1976, कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923, बिल्डिंग एंड अदर्स कंस्ट्रक्शन एक्ट 1996, पेमेंट ऑफ वेजेज सेटलमेंट एक्ट 1936 की धारा 5 और बच्चों एवं महिलाओं से संबंधित कानूनों को लागू करना जरूरी होगा।

अन्य सभी श्रम कानून जिसमें औद्योगिक विवादों को निपटाने, व्यावसायिक सुरक्षा, श्रमिकों के स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति तथा ट्रेड यूनियनों, कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर और प्रवासी मज़दूरों से संबंधित कानून निष्प्रभावी हो जाएंगे।  

यह मौजूदा व्यवसायों और राज्य में स्थापित होने वाले नए कारखानों दोनों पर लागू होगा। उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, गोवा जैसे राज्यों ने श्रम कानूनों को हटाने और उनमें बदलाव करने का फैसला लिया है। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्य में श्रम कानूनों में कोई बदलाव न करने की बात कही है।

मालूम हो कि श्रम कानूनों में संशोधन किये जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। झारखण्ड के सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने जनहित याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकारों द्वारा बनाए अध्यादेशों को रद्द करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकारें श्रम कानूनों में बदलाव कर उद्योग जगत को बढ़ावा दे रही हैं, ऐसे में मज़दूरों का शोषण बढ़ेगा।

क्यों हो रहा है विरोध?

देश भर के मज़दूर संगठनों ने राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों को कमज़ोर किए जाने के खिलाफ विरोध दर्ज करवाया है। संगठनों का कहना है कि सरकार औद्योगिक विकास के नाम पर मज़दूरों का शोषण करने की तैयारी कर रही है। मज़दूर संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर ये मज़दूर विरोधी फैसले जल्द वापस नहीं लिए जाते तो देश में एक बड़ा आंदोलन होगा। अगर फिर भी सुनवाई नहीं हुई तो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का भी दरवाजा खटखटाएंगे।

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के महासचिव तपन सेन का कहना है,  “सरकार द्वारा सभी फैसले कॉरपोरेट हितों को देखते हुए लिए जा रहे हैं। इस संकट के समय में मज़दूरों के साथ खड़े होने के बजाय सरकारें श्रम कानूनों को कमजोर उनके हक़ छिनने की तैयारी में लगी हैं। हम इसका पूरी सख्ती के साथ विरोध करते हैं। हम सभी लोगों से अपील करते हैं वे इन निर्दयी कानून के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों।”

कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रेसिडेंट डॉ- जी. संजीव रेड्डी ने भी राज्य सरकारों के फैसले को श्रमिकों के हितों के खिलाफ बताया है। उनके अनुसार राज्यों का ये फैसला अंतरराष्ट्रीय श्रम कानूनों का भी उल्लंघन है। नए बदलावों से हम 100 साल पीछे चले जाएंगे।

उन्होंने कहा, “हम इस फैसले के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास जाएंगे। अगर वहां बात नहीं सुनी जाती है, तो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन से शिकायत करेंगे। मुझे समझ में नहीं आता है कि इस संकट में सरकारें कैसे इस तरह के हास्यास्पद फैसले ले सकती हैं। यह कानून हमें गुलामी के दौर में ले जाएंगे।”

विपक्ष के साथ-साथ आरएसएस की अनुषंगी मज़दूर संगठन भारतीय मज़दूर संघ ने भी श्रम कानूनों में ढ़ील देने को मज़दूरों का शोषण बताया है। बीएमएस ने अपने बयान में कहा है कि प्रवासी मज़दूरों के मुद्दों में इजाफा देखने को मिला है क्योंकि अधिकांश राज्यों में प्रवासी श्रम कानून का घोर उल्लंघन किया जाता रहा है, इसलिए अब हमारे पास आंदोलन के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता है।

संगठन के महासचिव विर्जेश उपाध्याय ने बयान जारी करते हुए कहा, "कई राज्यों ने मज़दूर हितों के लिए नहीं, बल्कि मज़दूर हितों के खिलाफ कदम उठाए हैं, ऐसा इतिहास में कभी भी सुना नहीं गया, यहां तक कि अलोकतांत्रिक देशों में भी ऐसा कम ही देखने को मिलता है।"

पक्ष-विपक्ष की राजनीति

उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने श्रमिक कानून के बदलावों पर बोलते हुए कहा था कि श्रम कानूनों में बदलाव का यह अध्यादेश मज़दूर हित में है। सरकार ने मज़दूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए निवेश के रास्ते खोले हैं।

उधर, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, "मज़दूर विरोधी भाजपा सरकार श्रमिक क़ानून को 3 साल के लिए स्थगित करते समय तर्क दे रही है कि इससे निवेश आकर्षित होगा, जबकि इससे श्रमिक शोषण बढ़ेगा और साथ में श्रम असंतोष औद्योगिक वातावरण को अशांति की ओर ले जाएगा। सच तो ये है कि औद्योगिक-शांति निवेश की सबसे आकर्षक शर्त होती है।"

कई राज्यों में श्रम कानूनों में संशोधन किये जाने को लेकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्विट कर कहा, "अनेक राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन किया जा रहा है। हम कोरोना के खिलाफ मिलकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन यह मानवाधिकारों को रौंदने, असुरक्षित कार्यस्थलों की अनुमति, श्रमिकों के शोषण और उनकी आवाज दबाने का बहाना नहीं हो सकता।"

UttarPradesh
Workers
Workers and Labors
Allahabad High Court
yogi sarkar
BJP
Worker's Front
Anti Labour Policies
Labour Laws
trade unions
Congress

Related Stories

दक्षिण अफ्रीका में सिबन्ये स्टिलवाटर्स की सोने की खदानों में श्रमिक 70 दिनों से अधिक समय से हड़ताल पर हैं 

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

उनके बारे में सोचिये जो इस झुलसा देने वाली गर्मी में चारदीवारी के बाहर काम करने के लिए अभिशप्त हैं

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

आख़िर किसानों की जायज़ मांगों के आगे झुकी शिवराज सरकार

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

ग्राउंड रिपोर्ट: किसानों के सामने ही ख़ाक हो गई उनकी मेहनत, उनकी फसलें, प्रशासन से नहीं मिल पाई पर्याप्त मदद

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License