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आंदोलन की क़ीमत: अभी तक अवमानना का सामना कर रहे हैं सीएए विरोधी आंदोलनकारी
विवादास्पद नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ सड़कों पर आकर विरोध करने वाले, जेल जाने वालों को अब तक अपने घरों से लेकर सोशल मीडिया तक अवमानना का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही कई के सामने आजीविका का भी संकट आ गया है।
असद रिज़वी
06 Jan 2021
ghantaghar

लखनऊ: नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को देश और समाज के एक बड़े हिस्से की सराहना मिली तो दूसरी तरफ़ समाज का एक हिस्सा उन्हें आज भी आंदोलनकारी नहीं बल्कि अपराधियों की तरह देख रहा है। लखनऊ के बारे में तो ये बात काफ़ी हद तक सच है। यहां इस क़ानून के ख़िलाफ़ सड़कों पर आकर विरोध करने वाले, जेल जाने वालों में बहुतों को आज भी पुलिस-प्रशासन के अलावा अपने घर-परिवार, रिश्तेदारों से लेकर सोशल मीडिया तक अवमानना का सामना करना पड़ रहा है।

आंदोलनकारी मानते हैं की सरकार और मीडिया में उनको अपराधी (खलनायक) बना कर पेश किया गया है। इसी कारण उनको अवमानना झेलना पड़ रही है। कभी उनको सड़क पर लोग घेर लेते हैं और कभी उनके ही घर के दूसरे सदस्य उनको ताने देते हैं।

सीएए विरोधी प्रदर्शनों में शामिल लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया पर उनको ट्रोल किया जाता है और उनके साथी तक उनका हालचाल नहीं पूछते हैं। महिलाओं का कहना है कि आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी को समाज स्वीकार नहीं करना चाहता है। इतना ही नहीं जेल जाने वालों के आजीविका पर भी नकारात्मक असर पड़ा है।

रिटायर्ड आईपीएस का दर्द

पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद समाज सेवा और राजनीति में आये एसआर दारापुरी (पूर्व आईपीएस) का कहना है, की सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान शासन-प्रशासन ने उनको बहुत परेशान किया। पुलिस विभाग में 1972-2003 तक बतौर एक आला अधिकारी के नौकरी करने के बावजूद, मुझे बिना किसी अपराध के जेल भेजा गया। लेकिन मेरे किसी सहकर्मी पुलिस वाले ने इसके विरुद्ध आवाज़ भी नहीं उठाई।

 पूर्व आईपीएस दारापुरी कहते हैं 32 वर्ष तक उनके साथ काम करने वाले सहकर्मियों ने अब उनसे दूरी बना ली है। उन्होंने बताया की उनके सहकर्मियों (रिटायर्ड-आईपीएस) में से किसी एक ने फ़ोन पर भी उनका हाल चाल नहीं लिया।

दारापुरी मानते हैं कि सरकार ने लोगों में इतना डर पैदा कर दिया है, कि लोग अपने साथियों से बात करते डर रहे हैं। हालाँकि वह कहते हैं कि इस सब से उनकी विचारधारा पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा और वह सीएए का विरोध जारी रखेंगे।

जीविका का प्रश्न

संशोधित नागरिकता क़ानून का विरोध कर जेल से लौटे लोगों को जीविका के संकट का सामना भी करना पड़ा रहा है। अब्दुल तौफ़ीक़ का नाम 19 दिसंबर 2019 को प्रदर्शन की हिंसा में सामने आया। पुलिस ने 23 दिसंबर 2019 को 18 वर्षीय अब्दुल को जेल भेज दिया और वह 27 अगस्त को ज़मानत पर रिहा हुए। उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया कि जेल से आने के बाद उनके दोस्त और रिश्तेदार उनसे दूर रहने लगे हैं।

अब्दुल तौफ़ीक़ ने बताया कि वह टैक्सी चला कर अपने घर का ख़र्च चलाते हैं। लेकिन उनके पास निजी टैक्सी नहीं है, इस लिए वह किराये पर टैक्सी चलाते थे। लेकिन जेल से आने के बाद उनको टैक्सी किराये पर नहीं मिली। सभी टैक्सी मालिकों ने यह कहकर टैक्सी देने से इंकार कर दिया कि वह जेल से आया है। उनके अनुसार टैक्सी मालिक आंदोलन में जेल जाने और अपराध कर के जेल जाने में अंतर नहीं कर पा रहे हैं।

वह कहते हैं “मैं जब टैक्सी लेने जाता हूं तो एक ही जवाब मिलता “तुम तो जेल जाओगे हमारी गाड़ी भी सीज़ हो जाएगी”।

सीएए विरोधी आंदोलन में मुखर रही ज़ैनब सिद्दीक़ी की जीविका पर भी संकट आ गया। घंटाघर (हुसैनाबाद) के धरने में भी सक्रिय रही हैं ज़ैनब, लेकिन हाल में 6 नवंबर 2020 को पुलिस ने उनके पिता को गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस का आरोप है कि उनके पिता “फ़्रान्स” के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे। इसलिए उनको गिरफ़्तार किया गया। लेकिन ज़ैनब का कहना है कि उनके पिता को इस लिए गिरफ़्तार किया गया क्योंकि वह सीएए विरोधी आंदोलन में प्रमुखता से शामिल हुईं थी।

ज़ैनब ने बताया की वह एक एनजीओ में पिछले तीन साल से काम करके अपने घर का गुज़ारा चलती थी। लेकिन पिता के जेल जाने के बाद उस एनजीओ ने उन्हें काम से निकाल दिया और कहा कि अब न कभी कार्यालय आना और न कभी फ़ोन करना। वह कहती हैं कि अब उनकी जीविका संकट में है, और अब उनको दूसरी जगह काम भी नहीं मिल रहा है।

बता दें कि सीएए के प्रदर्शन के दौरान जेल गए रॉबिन वर्मा को भी उनके संस्थान ने निलंबित कर दिया था। वह एक अल्पसंख्यक महाविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर थे। काफ़ी समय तक निलंबित रहने के बाद महाविद्यालय प्रशासन ने उन्हें बहाल किया।

गांव से घर तक विरोध

लखनऊ के गोमतीनगर इलाक़े में बसे उजरियांव में भी महिलाओं ने क़रीब दो महीने तक (19 जनवरी 2020-23 मार्च 2020) सीएए के विरोध में प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में सक्रिय रहीं, सहर फ़ातिमा ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि आंदोलन में शामिल महिलाओं को अपने घरवालों से लेकर गांव वालों तक के ताने सुनने पड़ते हैं।

 वह बताती हैं कि प्रदर्शन में शामिल महिलाओं में ज़्यादातर पहली बार घर से बाहर निकली थीं, जिसके लिए उनको सबसे ज़्यादा अपने घर वालों के विरोध का सामना करना पड़ा। क्योंकि ज़्यादातर महिलाओं के घर वाले रूढ़िवादी सोच के थे, वह नहीं चाहते थे की महिलाएं आगे बढ़ें। इसके अलावा गांव के अधिकतर लोग तो अभी तक आंदोलन प्रदर्शनकारी महिलाओं की अवमानना करते रहते हैं।

सहर फ़ातिमा के अनुसार गांव वालों का कहना था कि सीएए के विरुद्ध हुए प्रदर्शन कारण गांव में पुलिस आई और गांव के कई लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज हुए। उन्होंने बताया कि जो हमारा विरोध कर रहे थे, वह किसी भी हद तक गये, यहां तक कि उन्होंने धरने पर बैठने वालों का चरित्र हनन तक करने का प्रयास किया।

वे कहती हैं “संक्षेप में यह है कि उजरियांव की जिस दरगाह में धरना हो रहा था, मै अब वहां नहीं जा सकती हूं। लेकिन घर से अन्याय के विरुद्ध बाहर निकले हैं तो ऐसी समस्याओं का सामना तो करना पड़ेगा। इस सबके बावजूद हमारे हौसलों कमज़ोर नहीं हुए हैं।”

बेटियों के रिश्ते की फ़िक्र

शिबा परवीन का कहना है कि जबसे उनका बेटा जेल गया है उनको अपनी बेटियों के रिश्ते की फ़िक्र है। वह कहती हैं कि बाहर वालों के साथ घर वाले भी अब उनके परिवार से बचके रहते हैं। शिबा परवीन कहती हैं कि उनको फ़िक्र है कि अपनी 16 और 12 वर्षीय बेटियों की शादी कैसे होगी? क्योंकि उनका भाई जेल में रहकर आया है। उनके अनुसार रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी कोई यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनका बेटा अपराधी नहीं बल्कि सिर्फ़ एक ग़लत क़ानून का विरोधी है।

 सोशल मीडिया पर ट्रोल

केवल समाज में ही नहीं सोशल मीडिया पर भी आंदोलन में शामिल होने वालों को ट्रोल करके परेशान किया गया। नागरिकता संशोधन क़ानून के आंदोलन के दौरान “झाँसी की रानी” के नाम से प्रसिद्ध हुईं उज़्मा परवीन कहतीं हैं कि जितना पुलिस ने घंटाघर के मैदान में परेशान किया उससे ज़्यादा समाज के तथाकथित ठेकेदारों ने सोशल मीडिया पर परेशान किया।

सोशल मीडिया पर एक साल से ज़्यादा हो गया लोग अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। उज़्मा कहती हैं उनके पति के जेल जाने के बाद, उनके परिवार (सुसराल वालों) ने भी उनका विरोध शुरू हो गया। वह कहती हैं कि आज भी एक तरफ़ सोशल मीडिया पर हमले होते है और दूसरी तरफ़ परिवार वाले घर पर पुलिस आने से नाराज़ होते हैं।

समाज सेवा के लिए सम्मान से भी आपत्ति

यही नहीं कोरोना काल में बुर्क़ा पहन कर स्वच्छीकरण (सेनिटेशन) करने वाली उज़्मा परवीन को लखनऊ नगर निगम द्वारा सम्मान मिलने पर भाजपा नेता दिलीप श्रीवास्तव ने आपत्ति जतायी। दिलीप श्रीवास्तव ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर उज़्मा परवीन को सम्मान देने वाले सरकारी अधिकारियों की शिकायत की।

उज़्मा परवीन कोविड-19 महामारी के दौरान राशन बांटने और स्वच्छीकरण का काम कर रही थी। उज़्मा परवीन को नगर आयुक्त द्वारा उनको सम्मानस्वरूप 28 मई 2020 को एक प्रशंसा प्रमाणपत्र के साथ सुरक्षा किट और सेनिटेशन किट दी गई थी।

उज़्मा परवीन के सम्मानित होने की ख़बर आते ही भाजपा नेता दिलीप श्रीवास्तव ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उन्होंने 30 मई 2020 मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा और  कहा कि समाजसेवा के नाम पर सरकारी अधिकारियों ने उस महिला को सम्मानित किया है, जो मोदी सरकार द्वारा बनाए गए सीएए की मुख़र विरोधी है।

अपने पत्र में भाजपा नेता ने यह भी लिखा कि उज़्मा परवीन ने  सीएए के विरूद्ध प्रदर्शन के दौरान मोदी और योगी सरकारों के विरुद्ध बयान भी दिए और आवाम को गुमराह किया।

मीडिया ने आंदोलनकरियों को अपराधी बनाकर पेश किया

घंटाघर (हुसैनाबाद) के प्रदर्शन के दौरान सक्रिय रही इरम रिज़वी (30) कहती हैं कि समाज अभी तक यह स्वीकार नहीं कर सका है कि महिलाओं को भी अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने का हक़ है। वह कहती हैं सीएए विरोधी प्रदर्शन में शामिल होने के कारण उनके विरुद्ध 12 मुक़दमे दर्ज हुए। लेकिन उस से ज़्यादा कष्टदायक यह है कि रिश्तेदारो का नज़रिया उनके बारे में बदल गया।

समाज इस आंदोलन में शामिल होने वालों को अच्छी नज़र से नहीं देखता है। उनको आंदोलनकरी नहीं अपराधी की तरह देखा जा रहा है। इसकी वजह बताते हुए इरम कहती हैं, मीडिया ने सीएए विरोधी आंदोलन को हिंसा बनाकर पेश किया और आंदोलनकरियों को अपराधी बना दिया। इसके अलवा सरकार ने भी आंदोलनकरियों को समाज की नज़र में अपराधी बनाने की पूरी कोशिश की है।

“लोगों को लगता की इरम रिज़वी” महिला होकर सक्रियता के साथ आंदोलन में क्यों शामिल हुई?”  वह कहती हैं बाहर के विरोध से ज़्यादा घर में विरोध का सामाना करना पड़ता है। इरम रिज़वी कहती हैं जबकि आपत्ति करने वालों को नहीं मालूम देश की आधी आबादी महिलाओं की है और महिलाओं को नज़र अन्दाज़ करने का मतलब आधी आबादी को नज़रअंदाज़ करना है।

सड़क पर लोगों की भीड़ घेर लेती है

अम्बेडकरवादी लेखक पीवी अम्बेडकर कहते हैं कि मीडिया और सरकार ने जिस तरह इस आंदोलन को दिखाया है उससे इसमें शामिल हर प्रदर्शनकारी को लोग अपराधी समझने लगे हैं। आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले प्रो. अम्बेडकर बताते हैं, उनको सड़क पर दो बार भीड़ ने घेरकर मारने की कोशिश की।

उन्होंने बताया कि एकबार हज़रतगंज इलाक़े में विधानभवन के पास उनके साथ ऐसा हुआ और दोबारा लालबाग़ इलाक़े में उनको भीड़ ने घेरा लिया। अमेठी के संजय गांधी कॉलेज में गणित के प्रोफ़ेसर रह चुके पीवी अंबेडकर बताते हैं कि लोग उनको एक अपराधी की तरह देख रहे थे।

आरोप है कि हज़रतगंज में डॉ. पीवी अम्बेडकर को घेरने वालों में पुलिसकर्मी भी शामिल थे। तौफ़ीक़ अहमद ने भी आरोप लगाया कि अलामबाग़ इलाक़े में कुछ हिंदुवादी संगठनों ने उनको घेर के मारा है। यह प्रश्न करने पर कि क्या उन्होंने पुलिस से इसकी शिकायत की है? उन्होंने कहा, “मैं अब दोबारा पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता हूँ।”

समाजशास्त्री क्या कहते हैं

समाजशास्त्री भी मानते हैं कि हमारे समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता है। समाजशास्त्री राजेश मिश्रा कहते हैं की सिर्फ़ सीएए के आंदोलन में नहीं हर मैदान में महिलाओं को आगे बढ़ने से रोका जाता है। लेकिन अगर महिलाएं आगे बढ़ती हैं और कामयाब होती हैं तो उसका फ़ायदा उठाने, श्रेय लेने वही लोग सबसे पहले आगे आते हैं, जो उनका विरोध कर रहे होते हैं।

समाजशास्त्री राजेश मिश्रा कहते हैं कि पिछले 6 सालों में भारतीय समाज में बड़ा परिवर्तन आया है। यहां सत्ता के ख़िलाफ़ बोलने वाले को तुरंत अपराधी बना दिया जाता है। अल्पसंख्यक ख़ासकर मुस्लिम समाज को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश हो रही है। जो अल्पसंख्यक समाज के पक्ष में खड़ा होता है, सरकारी तंत्र और मीडिया मिलकर उनको समाज की नज़र में एक खलनायक या अपराधी बना देते हैं।

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