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बढ़ती कॉर्पोरेट कर्ज़ा माफ़ी और कम होता सामाजिक खर्च
पी. साईनाथ
20 Mar 2015

इस वर्ष का बजट सोने, हीरों और आभूषणों पर कस्टम ड्यूटी ख़त्म कर देगा (जोकि निश्चित तौर पर ‘आम आदमी’ द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीजें हैं) जिसकी कीमत 75, 592 करोड़ है। यह राशि महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना को दी गयी ‘रिकॉर्ड’ राशि का दुगना है। जैसा की प्रोफेसर जयति घोष रेखांकित करती हैं, पिछले दशक में मनरेगा के जरिए एक करोड़ ग्रामीण परिवारों को रोज़गार मिला है। इस योजना को 34,699 करोड़ का ही आवंटन किया गया है। (आप 2015-16 के बजट में सोने के आंकड़ों को देख सकते हैं। आप परिशिष्ट में जाकर करों में दी गयी छूट के ब्यान पर गौर करें:http://indiabudget.nic.in/ub2015-16/statrevfor/annex12.pdf.) सोने और बेशकीमती हीरों की कस्टम ड्यूटी में दी गयी छूट सभी कस्टम ड्यूटी में दी गयी छूट का एक चौथाई बैठता है। कुल मिलाकर पिछले वर्ष की तुलना में कृषि के लिए बजट में पिछले वर्ष के मुकाबले 5000 करोड़ रुपए का आवन्टन कम है। सोने पर कस्टम ड्यूटी में छूट हालांकि पिछले 12 महीनों में पांच गुना बढ़ गयी है।

                                                                                                                     

जबकि कॉर्पोरेट को दी जा रही छूट और रियायतें 42 ख़रब रुपए (678 अरब अमरिकी डॉलर) को पार कर गयी है, अगर आप उन लोगों में से हैं जो पैसा बाहर के देशों में छिपाते हैं तो नरेन्द्र मोदी सरकार ने शपथ ली है कि वे इस पैसे को देश में वापस लायेंगे)। ओह, 42 ख़रब, जिसमें 12 शून्य होते हैं। कॉर्पोरेट की जरूरतों (और अन्य सभ्रांत जो रियायतों के भूखे हैं ) के हिसाब से जो रियायतें दी जायेंगी, उन्हें इस बजट में जब दर्ज किया गया तो वह राशि 5,89,285,2 करोड़ बैठी या 5.49 लाख करोड़ (जोकि मोटे तौर पर 88 अरब अमरिकन डॉलर बैठती है)। अगर आप व्यक्तिगत आय कर को गायब कर देते हैं जोकि लोगों के बड़े हिस्से को राहत पहुंचाएगा, और आप इसमें मुफ्त के सौदे वालों को जोड़ लेते हैं जोकि निम्न तीन वर्ग में आते हैं: कॉर्पोरेट आय कर, उत्पाद शुल्क और कस्टम ड्यूटी। तो 5.49 लाख करोड़ के आकड़ें के मुताबिक़ जो 42.08 ख़राब की रियायत दी गयी को लाने में 10 वर्ष लगेंगे। यानी इस बड़ी राशि का भुगतान आम जनता कर रही है। और मेहमान मस्त है। यानी जनता भरे और पूंजीपति मज़े करे।

क्या मैने 10 साल का तांडव कहा? वास्तविक तौर पर इसमें और इससे भी ज्यादा वक्त लगा। क्योंकि सरकार ने कर रियायतों के सम्बन्ध में आंकड़ों का प्रकाशन केवल 2005-06 से ही शुरू किया है। यह कितना बैठता अगर हमारे पास पिछले वर्षों का भी आंकड़ा होता? ओह जाने भी दो। यही काफी बड़ा है। अभी तक मौजूद आंकड़ों के आधार पर पिछले वर्षों में दी गयी सभी रियायतों में इस वर्ष की दी गयी कर्ज़ा माफ़ी की राशि 5.49 लाख करोड़ सबसे बड़ी राशि है। यह 2005-06 में दी गयी रियायत के मुकाबले 140 प्रतिशत ज्यादा है, यह वही वर्ष है जिसमें हमें रियायतों के आंकड़े मिलने शुरू हुए (तालिका 1 देखें)।

सभ्रांत के लिए रियायतें रुपए

                                                                                                             

42,000,000,000,000

सोने, हीरों और आभूषणों पर कर रियायत

2005-06 to 2014-15

                                                                                                                    

हालांकि इस वर्ष की रियायतें एक नए वस्त्र धारण करके आई है। उदाहरण के लिए कॉर्पोरेट आय कर, सूचना के रूप में 2013-14 के बजट तक, तालिका में इसे कॉर्पोरेट कर दाताओं पर बड़े कर खर्च के रूप में दिया जाता था। इस वर्ष के बजट में यह अभिजात वर्ग के अर्थ विज्ञान के रूप में उभर कर आया है। इसे अब (खास जोर देकर) कॉर्पोरेट कर दाताओं को प्रमुख प्रोत्साहनों का राजस्व पर प्रभाव के रूप में पेश किया जाता है। क्या कमाल है। अब सब ठीक है। ये प्रोत्साहन हैं न कि कोई रियायत है। इसलिए हंगामा किस लिए?

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक अतिउत्साहित टीवी एंकर से पिछले साल कहा कि उसे “उम्मीद” है कि एन.डी.ए के शासनकाल में फालतू सब्सिडी नहीं दी जायेंगी। आगे उन्होंने कहा कि यह हालात पर निर्भर करता है कि उस समय कैसी स्थिति उत्पन्न होती है। कॉर्पोरेट को कर रियायत के बारे में यू.पी.ए के बजट ब्यान में 57,793 लाख करोड़ का उल्लेख था। मोदी के शासन के पहले वर्ष में ही यह 62,399 लाख करोड़ है जोकि 8 प्रतिशत जयादा है। यह शायद इससे भी ज्यादा होगा क्योंकि अभी तो "अनुमान" ही लगाया जा रहा है या फिर आंकड़े अंतिम रूप में नहीं हैं।

लेकिन हम अगर इन कच्चे आंकड़ों को भी लें, इसका मतलब है कि केवल आय कर पर ही 2014-15 में कॉर्पोरेट जगत को हर 24 घंटे में 171 करोड़ रुपए की सौगात मिली है। या फिर हर 60 मिनट में 7 करोड़। अगर आप उत्पाद शुल्क में दी गयी 1.84 लाख करोड़ की छूट और कस्टम ड्यूटी में दी गयी 3.01 लाख करोड़ की छूट को जोड़ें तो आंकड़ा 5.49 लाख करोड़ ही बैठेगा।

खरबों रुपए का बड़ा हिस्सा हमारे बैंकों के नॉन परफोर्मिंग एकाउंट्स के जरिए उड़ा लिया गया है और हमारे बैंक दिखाते हैं कि ये बैंक बड़े अमीर लोगों की बनिस्पत चल रहा है जबकि वे ही बैंकों से माल उड़ा रहे हैं और उनके नाम गोपनीयता कानून के आड़ में छुपा रखे हैं।

मीडिया ने बताया कि अरुण जेटली ने ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम के लिए अब तक सबसे ज्यादा धन मुहिया कराया है। जेटली ने कहा कि वे इस कार्यकर्म में 5000 करोड़ ओर जोड़ेंगे वह भी तब अगर टैक्स में कुछ उछाल आता है। यह कोई वायदा तो न हुआ की आप किसी अन्य संभावना के आधार पर वादा कर रहे हैं। इसके अलावा, मंरेगा के लिए 34,699 करोड़ रुपए का आवंटन ज्यादा नहीं बल्कि अपने आप में काफी कम है। केंद्र सरकार को राज्यों को इस वर्ष का मनरेगा के तहत 6000 करोड़ रुपया देना बाकी है, जो उन्होंने अभी तक अदा नहीं किया है। तो जैसा कि प्रोफेसर घोष रेखांकित करती हैं, इस वर्ष के लिए नया आवंटन 3000 करोड़ रुपए कम होगा। और वैसे भी मनरेगा के बजट को को 33,000 करोड़ पर सिमित कर दिया गया है जोकि तीन उच्च मुद्रास्फीति वर्षों के लिए इसका शायद कुछ अलग ही मायने रखता था। लेकिन इसके लिए केवल जेटली को निशाना बनाना सही नहीं होगा। ग्रामीण गरीबों के लिए इस अहम् कार्यकर्म को तहस-नहस करने में पहले पी। चिदम्बरम का भी हाथ है।

मौजूदा आवंटन के आधार पर आप मनरेगा को 42 ख़राब रुपए में 121 वर्षों तक चला सकते हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि संसद में देश के प्रधानमंत्री इस कार्यक्रम के खिलाफ में बोलते हैं।

आप 42 ख़राब रुपए में मौजूदा स्तर पर जारी खाद्य सब्सिडी को 34 वर्षों तक चला सकते हैं। उदाहरण के लिए आप स्वास्थ्य और बच्चो से सम्बंधित कार्यकर्मों में की कटौती को रोक सकते हैं। जैसा कि HAQ – शिशु अधिकार केंद्र रेखांकित करता है कि “ बच्चों से सम्बंधित स्वास्थ्य योजनाओं में 22 प्रतिशत की कटौती की गयी”, और उससे भी खराब बच्चों के शिक्षा सम्बंधित कार्यक्रम में 25 प्रतिशत की कटौती की गयी।”

लेकिन ‘कर रियायतों पर बयान’ (जिसे कि वास्तविक रूप में कर्ज़ा माफ़ी) कहना चाहिए, और जिसकी वजह से कॉर्पोरेट में बड़ा उछाल नज़र आता है, इस वर्ष यानी 2014-15 में सोने और अन्य बेशकीमती पत्थरों पर दी गयी छूट कुल छूट का 10 प्रतिशत बैठता है। अगर आप 2005-06 से जोड़े तो सोने, हीरों और आभूषणों पर जो कर खोया है वह करीब 4.3 ख़राब बैठता है। बच्चों को तबाह करो और सोने को उगाओ, यह ऐसा ही कुछ है ना?

इस 42 ख़रब के तांडव के बारे में काफी कुत्सित सी बात है। ऐसा ही कुत्सित जैसा कि कॉर्पोरेट मीडिया के बारे में है जोकि कोर्पोरेट को दी जा रही “छूट” को सही बता रहा है। वहां कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इसे 'काल्पनिक' या ' हैंडआउट्स नहीं " बताएँगे। वे कहेंगे “यह तो सबके लिए है, और इससे सब लाभान्वित होंगे”। तथ्य: इन रियायतों/सब्सिडी/कर्ज़ा माफ़ी/ हैंडआउट्स का बड़ा हिस्सा सभ्रांत लोगो को ही जाएगा। इतना तो किसी से नहीं छुपेगा। और यह याद रखना: अरबपतियों के लिए बजट की बख्शीश के तहत ये हैंडआउट्स इस प्रक्रिया का एक हिस्सा भर है जिसके जरिए सार्वजनिक पैसे को उन अमीर और प्रसिद्द लोगों को दिया जा रहा है(जोकि बैंक और मीडिया के लिए ज्यादातर गुमनाम हैं)।

दूसरा बिंदु: ये सब रियायतें और बख्शीश जिन्हें की तालिका में दिया गया है वे सब बजट से परे हैं, जिसकी तस्वीर अभी जनता की नज़रों में अदृश्य है। उदाहरण के तौर पर, सार्वजनिक बैंकों का “नॉन परफोर्मिंग एसेट” के नाम पर खरबों रुपया मिटटी हुआ पड़ा है। इस पैसे का बड़ा हिस्सा अमीर लोगों ने हड़पा हुआ है जिनके नाम “गोपनीयता के कानून” के नाम पर बताये नहीं जा रहे हैं। कॉर्पोरेट मीडिया को इससे कोई आपत्ति नहीं है। सम्पादक बड़े दर्द के साथ ये मानते हैं कि अगर इसे उजागर किया गया तो कभी-कभी यह उनके मालिकों के लिए मुसीबत बन सकता है। इसका एक एक नैतिक युक्तिकरण भी है। जैसे बैंकिंग कानून, गोपनीयता, गुप्त रखना आदि का सहारा लेना। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए जब कोई कम विशेषाधिकार वाला व्यक्ति ऐसा करता है तो बैंक उसके के खिलाफ अखबारों में सार्वजनिक तौर पर विज्ञापन जारी करता है (जिसकी पिछले दशक में इस तरह के लोगो के साथ किया गया है), छोटे बकाएदारों का सार्वाजनिक तौर पर नाम लेना और कुछ हज़ार की वसूली के लिए बैंक उनके आभूषणों की सार्वजनिक तौर पर नीलामी करता है। उनके लिए बैंक के एथिक्स को कोई मिसाल नहीं दी जाती है। मीडिया को इसमें भी कोई आपत्ति नहीं है, हालांकि वे उस वक़्त भी चुप रहते हैं जब अखिल भारतीय बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन (AIBEA) ने पिछले साल बड़े बकायेदारों के नाम सार्वजनिक किये थे। यह चुप्पी तब तक नहीं टूटी तब उनमे से किसी एक ने यह सोचा कि इस पर चुप नहीं रहा जा सकता है और इसे कोई बड़े मोड़ दिए बिना शांत कर दिया गया(और तब विजय माल्या को वही प्रेस मीडिया ख़राब लगने लगता है)।

संसद में राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने एक सवाल के जवाब में कहा एन.पी.ए काफी बढ़ गया है (लगभग तिगुना हो गया है) “वह भी पिछले कुछ सालों में”। सिन्हा ने बताया यह राशि 2 खरब से भी ज्यादा है। इसका मतलब है कि बड़ी राशि ‘कोर्पोरेट क़र्ज़ पुनर्गठन’ में फंस गयी है। और इससे भी ज्यादा उनमें जिसे वे “रुकी हुयी परियोजनाएं” कहते हैं (और जो शीघ्र ही एन.पी.ए में शामिल हो जायेंगी। इस तरह के घोटाले के जरिए खरबों रुपया घूम रहा है (जोकि 88 अरब अमरिकी डॉलर की बजट बख्शीश से कहीं जयादा है)। और अब हज़ारों किसानों से भूमि छिनी जा रही है ताकि सस्ते दामों पर उसे बड़े निगमों को दिया जा सके। और अन्य सब्सिडी, कौन कहता है कि मुफ्त खाना नहीं है? ज़रा इस भीड़ को और उनके जीवनभर के खाने के टिकट की तरफ देखें। मेज़ पर उनके लिए किस तरह के लज़ीज़ खाने की फेहरिस्त है।

(अनुवाद:महेश कुमार)

सौजन्य : psaintha.org

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

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