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बिहार में नियोजित शिक्षक की आत्महत्या ने खड़े किए कई सवाल
बिहार पंचायत नगर प्रारम्भिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष आनन्द कौशल सिंह ने इस दु:खद घटना पर चिन्ता व्यक्त करते हुए शिक्षकों से धैर्य धारण करने की सलाह दी है। प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि बहुत जल्द सरकार से संवैधानिक तरीके से निपटा जाएगा।
मुकुंद झा
14 May 2019
Bihar Protest
यह प्रतीकात्मक चित्र है

सुप्रीम कोर्ट के बिहार नियोजित शिक्षक पर दिए निर्णय से आहत एक नियोजित शिक्षक ने आत्महत्या कर ली। भागलपुर जिले के रन्नूचक में  उच्च विद्यालय  में भौतिक विज्ञान के शिक्षक के रूप में कार्यरत विमल कुमार यादव ने सोमवार को फाँसी लगा ली। बिहार पंचायत नगर प्रारम्भिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष आनन्द कौशल सिंह ने इस दु:खद घटना पर चिन्ता व्यक्त करते हुए धैर्य धारण करने की सलाह दी है। प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि बहुत जल्द सरकार से संवैधानिक तरीके से निपटा जाएगा। आगामी 2 जून को राज्य कार्यकारणी की बैठक में आगे की रणनीति बनाई जाएगी। आत्महत्या जैसा कोई भी कदम नहीं उठाने की अपील नियोजित शिक्षक से की है। शेष बचे लोकसभा चुनाव में सरकार को सबक सिखाने और महागठबंधन के पक्ष में मतदान करने की अपील बिहार के नियोजित शिक्षक से प्रदेश अध्यक्ष आनन्द कौशल सिंह ने की है।   

शिक्षक पिछले काफी लंबे समय से  प्रदर्शन कर रहे हैं। समय समय पर सरकारों ने वार्ता की और कई बार इनकी मांगे भी मानी लेकिन हर बार सरकार ने इनसे वादाखिलाफी की। अभी वर्तमान में नीतीश सरकार के शिक्षा मंत्री ने भी इनको आश्वस्त किया था। शासन में आने से पहले भाजपा नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री ने भी शिक्षकों से वादा किया था, वो सत्ता में आए तो शिक्षकों को नियमित करेंगे। लेकिन सत्ता में आने के बाद वो भूल गए इसी बात को  याद दिलाने के लिए फरवरी में हज़ारों की संख्या में शिक्षकों ने पटना में प्रदर्शन किया था, लेकिन सरकार ने उनकी समस्या का हल करने की बजाय लाठी और पानी की बैछार कर दी जिसमें कई शिक्षक गंभीर रूप से घायल हो गये थे | 

जदयू-बीजेपी गठबंधन को शिक्षक विरोधी कहते हुए आनन्द कौशल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य और केंद्र सरकार की साजिश से शिक्षकों को मायूस और निराशा करने वाले न्यायादेश मिला। इसलिए इन सरकारों को सबक सिखाना बहुत ज़रूरी है। इसलिए इस चुनाव में इसके खिलाफ वोट देना होगा। आपको बता दें कि इस फैसले के बाद 12 मई को बिहार की आठ सीटों पर वोट डाले गए और अब सातवें और अंतिम चरण में 19 मई को बिहार में कुल आठ सीटों पर चुनाव बाकी रह गया है।

हमारी सरकारों के लिए भी एक गंभीर सवाल है कि शिक्षक क्यों अपनी जान देने को मज़बूर हो रहे हैं? जिन शिक्षकों को भारत के भविष्य को मज़बूत करना है, वो खुद सरकार और शासन की गलत नीतियों से परेशान होकर अपनी जान गँवा रहे है। और सिर्फ बिहार ऐसा राज्य नहीं है जहाँ ऐसी घटनाएं हो रही हैं, इससे पहले हमने अभी कुछ समय पहले दिल्ली के गेस्ट टीचर्स को सड़कों पर संघर्ष करते देखा था। उत्तर प्रदेश के शिक्षक भी पिछले काफी समय से सड़कों पर हैं और पुलिस-प्रशासन की लाठियां खा रहे हैं।  लेकिन सरकारों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। 

 

क्या है पूरा मामला 

बिहार में पिछले काफी समय से  अपनी नौकरी को स्थायी करने और उचित वेतनमान की मांग को लेकर करीब चार लाख नियोजित शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं। इन शिक्षकों को शुक्रवार, 11  मई को उस समय झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सेवाएं नियमित करने से इनकार कर दिया। साथ ही शीर्ष अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले को भी दरकिनार कर दिया जिसमें कहा गया था कि ये शिक्षक समान कार्य के लिए समान वेतन पाने के पात्र हैं। न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और न्यायमूर्ति यू यू ललित की पीठ ने 31 अक्टूबर, 2017 के उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली बिहार सरकार की याचिका को स्वीकार करते हुए नियोजित शिक्षकों के साथ नियमित शिक्षकों जैसा व्यवहार करने से इनकार कर दिया।

हालांकि, अदालत ने नियोजित शिक्षकों को प्रारंभिक स्तर पर दिये जा रहे वेतनमान को लेकर चिंता जताई और सुझाव दिया कि राज्य ऐसे शिक्षकों के वेतनमान को कम से कम उस स्तर पर बढ़ाने पर विचार कर सकती है जिसका सुझाव तीन सदस्यीय समिति ने दिया है।

शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद थी कि वो शिक्षकों के पक्ष में निर्णय देगी जैसा कि उसने अपने पुराने  आदेश में कई बार  समान कार्य समान वेतन को लागू करने की बात कही थी | शिक्षकों ने उच्चतम न्यायालय के इस पहले को लेकर अपनी निराश व्यक्त की और कहा न्यायालय ने यह निर्णय सरकार को ध्यान में रखकर दिया है, सरकार नियोजित शिक्षकों के साथ घोर अन्याय कर रही है। 

मनीष जो बिहार पंचायत-नगर प्रारम्भिक शिक्षक संघ के सोशल मीडिया प्रभारी हैं, उन्होंने न्यूज़क्लिक  से बात करते हुए कहा कि न्यायालय कह रहा है कि नियोजित शिक्षकों के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ है लेकिन शोषण और प्रताड़ना ऐसी कि एक ही विद्यालय में एक ही तरह का कार्य करने वाले नियमित शिक्षक 40 हजार, तो नियोजित शिक्षक 12 हजार रुपये पाते हैं। सरकार कहती है कि नियोजित शिक्षक सरकारी कर्मचारी नहीं, अपितु पंचायत निकाय के कर्मचारी हैं। तो सरकारी विद्यालयों में नियोजित शिक्षकों की बहाली सरकार ने क्यों की? नियोजित शिक्षकों की नियमावली सरकार क्यों बनाती है? चुनाव कार्य, जनगणना कार्य सहित महत्वपूर्ण सरकारी कार्य में नियोजित शिक्षकों को सरकार क्यों लगाती है?

आगे वो कहते हैं कि अगर नियमित शिक्षकों के तरह सभी कार्य नियोजित शिक्षकों से लिया जाता है, तो समान कार्य समान वेतन देने से सरकार क्यों पीछे हट रही है? उन्होंने कहा कि न्याय के साथ समेकित विकास की बातें करने वाले सुशासन बाबू को ये बात क्यों नहीं समझ में आ रही है कि समान कार्य का समान वेतन भारतीय संविधान का भी हिस्सा है।

मनीष ने कहा कि सरकार के इस दोहरी नीति व शोषण के खिलाफ हम लड़ेंगे लेकिन शिक्षण कार्य बंद करने से बच्चों के भविष्य पर असर पड़ेगा, इसलिए हमने अपील की है कि सभी नियोजित शिक्षक अपने शिक्षण कार्य को छोडकर सरकार जितने भी कार्य उनसे कराती है वो न करें। अगर सरकार नहीं मानी तो अंत में मज़बूर होकर हम बिहार के सभी ज़िलों के स्कूलों में तालाबंदी करने को मज़बूर होंगे। इसके लिए सरकार ही जिम्मेदर होगी।

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