बास मारते मोज़ों, जवान भारतीय गबरूओं और राजनीतिक चंदे में क्या समानता है? कुछ भी नहींI
बास मारते मोज़ों, जवान भारतीय गबरूओं और राजनीतिक चंदे में क्या समानता है? कुछ भी नहींI लेकिन इन्हें व्यंग्यकार संजय राजौरा ने इस तरह एक तार में पिरोया है कि आप भारत वर्ष को एक नए ही चश्में से देखने लगेंगे I और जो आपको नज़र आएगा वो उस भारत से बहुत अलग होगा जिसका सपना नेहरू ने ‘भारत एक ख़ोज’ में देखा था I