NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चहचहाटों में बदलती अभिव्यक्ति की आज़ादी
वीरेन्द्र जैन
30 Mar 2015

प्रेमचन्द ने आज से अस्सी साल पहले अपने एक लेख में लिखा था कि साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद का मुखौटा लगा कर आती है। सुप्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई की लघुकथाओं और आर के लक्ष्मण के कार्टूनों ने इन्हीं जैसे  बहुत सारे मुखौटों को नोंचने का काम किया है। स्वार्थी तत्व समाज में मान्य आदर्शों की ओट लेकर समाज विरोधी काम करते रहते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की आज़ादी की ओट में गलत बयानी करने, अफवाह फैलाने, और चरित्र हनन करने, का काम किया जा रहा है। जब किसी आदर्श की ओट में गलत काम किया जाता है तो वह आदर्श बदनाम होने लगता है जिससे नुकसान समाज का होता है। जब इस विकृति की ओर उंगलियां उठायी जाती हैं तो उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया जाने लगता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी, झूठ बोलने की आज़ादी में बदलती जा रही है, जबकि आदर्श सच की अभिव्यक्ति और उसकी आज़ादी का है।

सोशल मीडिया में बेनामी अभिव्यक्ति की सुविधा होने से इसकी ओट में ढेर सारे ऐसे काम किये जा रहे हैं जिन्हें लोकतंत्र विरोधी कहा जा सकता है। अभिव्यक्ति की आखिर ऐसी आज़ादी क्यों होनी चाहिए जिसमें इस अधिकार को प्रयोग करने वाले नागरिक की कोई पहचान न हो और उसके कथन की जिम्मेवारी लेने वाला कोई न हो। अभिव्यक्ति का अधिकार नागरिकों के लिए है भूतों के लिए नहीं। उसमें भी जब ऐसे अधिकांश कथन किसी व्यक्ति, समूह, आस्था, समाज हतैषी संस्थाओं या राजनीति विशेष को गलत आधार पर बदनाम करने और विद्वेष फैलाने के लिए व्यक्त किये जा रहे हों। उल्लेखनीय है कि ऐसी अभिव्यक्ति का दुरुपयोग 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में एक पार्टी विशेष के समर्थको, एजेंटों द्वारा ध्रुवीकरण करने के लिए व्यापक रूप से किया गया था और अब उसकी सत्ता की रक्षा में किया जा रहा है।

नागरिकों को सच्ची अभिव्यक्ति की आज़ादी की पूर्ण पक्षधरता करते हुए भी अदृश्य अमूर्त की आपराधिक अभिव्यक्ति की आज़ादी की वकालत नहीं की जा सकती जिसकी जिम्मेवारी लेने को कोई नजर नहीं आ रहा हो, और जिस में बनावटी नाम से अभिव्यक्ति की जा रही हो। यह बात स्पष्ट रूप से समझ ली जानी चाहिए कि किसी भी सशक्तीकरण कानून का दुरुपयोग उस समाज का दुगना नुकसान करता है जिसके हित में यह कानून लाया गया होता है क्योंकि उससे कानून पर से भरोसा उठता है। इसलिए जितना जरूरी उस कानून को लाना होता है उसका दुरुपयोग रोकना उससे ज्यादा जरूरी होता है। समाज के निहित स्वार्थ जब ओढी हुयी नैतिकितावश उस अधिकार का सीधे सीधे विरोध नहीं कर पाते तो उसे विकृत करने लगते हैं। दहेज विरोधी कानून का ऐसा ही परिणाम हुआ है जिनकी सुनवाई में विभिन्न अदालतों ने भी यह पाया है कि ज्यादातर मामले पारिवरिक कलह या खराब दाम्पत्य सम्बन्धों के होते हैं जिन्हें इस तरह प्रस्तुत कर के जनता के बीच इस कानून के प्रति नफरत पैदा की जा रही है। इस कानून से दहेज प्रथा रोकने में तो कोई प्रभावी मदद नहीं मिली है, किंतु इसके दुरुपयोग को देखते हुए अदालतों को आरोपियों के प्रति नरम होना पड़ा है। अब समाज में दहेज के आरोपियों के प्रति कोई नफरत देखने को नहीं मिलती। अगर दबंगों के भय, कमजोर और अपराधियों का सहयोगी शासन प्रशासन व न्याय व्यवस्था शिकायतकर्ताओं या व्हिसल ब्लोअरों को अपनी पहचान गुप्त न रह पाने के कारण खतरे में डालते हैं तो इसका हल वहाँ ही निकाला जाना चाहिए जहाँ ये कमजोरियां हैं। इन कमजोरियों के कारण बड़े अपराध की जनक झूठ बोलने की आज़ादी को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। मुज़फ्फरनगर का उदाहरण सबसे ताज़ा है।

                                                                                                                              

प्रैस की आज़ादी का सवाल भी ऐसा ही है। इस क्षेत्र में दलालों, चापलूसों, चाटुकारों की चाँदी है तो सच बोलने वाले पत्रकारों को हँसी का पात्र बनाया जाता है और वे हर तरह से पिछड़ते जा रहे हैं। हम आज जिस लोकतंत्र को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम से बताते हैं, वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा भ्रष्ट तंत्र है। अधिकतर मीडिया हाउसों के मुखिया यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं करते कि अगर हम सच्ची पत्रकारिता करेंगे तो अखबार को ज्यादा दिन नहीं चला सकते। सरकारी विज्ञापन लेने के लिए नब्बे प्रतिशत अखबार सरकुलेशन के गलत आंकड़े देते हैं, पर विज्ञापन की दरें बदलवाने के लिए कोई सामूहिक अभियान नहीं चलाते। हर तीसरे दिन कोई न कोई नेता यह कहता हुआ नज़र आता है कि हमारे बयान को उसकी भावना के विपरीत आधा अधूरा या तोड़ मोड़ कर छापा गया है और कई मामलों में ऐसा होता भी है। मीडिया के पास अपने विचार व्यक्त करने के लिए केवल सम्पादकीय पृष्ठ होते हैं, शेष में उसे जैसा देखा या कहा गया है वैसा ही छापना चाहिए। खेद है कि हम जिस मीडिया की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं वह वैसा मीडिया रहा ही नहीं है। इसका बड़ा हिस्सा किसी न किसी नेता, दल या कार्पोरेट हाउस का पिछ्लग्गू बन गया है, और खबरें देने की जगह, खबरें तोड़ने मरोड़ने, बदलने, अफवाहें उड़ाने, के साथ साथ खबरें दबाने का माध्यम बन कर रह गया है। होना तो यह चाहिए कि हर गलत खबर का खंडन शीघ्र से शीघ्र, उसी स्थल पर उतने ही बड़े आकार में छापने की अनिवार्यता हो और हर गलत खबर के लिए जिम्मेवार को रेखांकित किया जाये। भ्रष्टाचार और अपराध के हर बड़े भण्डाफोड़ के साथ इस बात को भी याद किया जाना चाहिए कि उस क्षेत्र में इतने सूचना प्रतिनिधि काम करते रहे और फिर भी इतने लम्बे समय तक अपराध कैसे चलता रहा। पत्रकारों को जितना सम्मान मिलता है और जितनी पूछ परख होती है उसके अनुपात में वे सामाजिक जिम्मेवारी महसूस नहीं करते। कुछ क्षेत्रों में तो उन्हें वेतन और सुविधाएं भी समुचित मिलती हैं। खेद की बात है कि पत्रकारों को जो सरकारी सुविधाएं उनके काम के लिए मिलना चाहिए वे अपनी जिम्मेवारियों से हटने के लिए मिलती हैं और अगर वे सरकारी अपराधियों के अनुरूप काम नहीं करते तो उन सुविधाओं के छिनने का खतरा बना रहता है। प्रदेश की राजधानियों में ही देखें तो आये दिन सीबीआई, इनकम टैक्स, लोकायुक्त, आर्थिक अपराध ब्यूरो आदि के छापे पड़ते रहते हैं जिनमें करोड़ों अरबों रुपयों के दुरुपयोग सामने आते रहते हैं, किंतु हजारों की संख्या में सरकारी सुविधाएं पाने वाले पत्रकारों में से किसी ने भी कभी भी ये मामले नहीं उठाये होते हैं। यदा कदा जब कोई ऐसा मामला आता भी है तो उसमें पत्रकारिता का कोई योगदान नहीं होता अपितु वह राजनीतिक या नौकरशाही की आपसी प्रतिद्वन्दिता का परिणाम होता है। इसमें पत्रकार का काम पोस्टमैन से अधिक नहीं होता। इनमें से कौन अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहता है और इनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कौन लड़ेगा!

इस नक्कारखाने में तूती की अभिव्यक्ति घुट रही है पर हम फिर भी सच्ची अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कोई संग्राम नहीं लड़ रहे और इस तरह खुद भी अपना गला घोंट रहे हैं। सोशल मीडिया केवल इन तूतियों की आवाजों की चहचहाटों को दर्ज करने का माध्यम बन रहा है, पर इसमें जो गलत चल रहा है उस पर कोई अंकुश नहीं है। इस कारण उससे बड़ी उम्मीदें नहीं पालना चाहिए। मुक्तिबोध ने कहा था- अब हमें अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे। जो खतरे उठाने से डरते हैं उनकी आज़ादी उनकी झूठ बोलने की सुविधा है।

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

अभिव्यक्ति की आज़ादी
सच्ची अभिव्यक्ति
समाज
सोशल मीडिया
66 A
भाजपा
सुप्रीम कोर्ट

Related Stories

वोट बैंक की पॉलिटिक्स से हल नहीं होगी पराली की समस्या

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

सर्वोच्च न्यायालय में दलितों पर अत्याचार रोकथाम अधिनियम में संसोधन के खिलाफ याचिका दायर

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

सुप्रीम कोर्ट: मॉब लिंचिंग पर जल्द कानून लाए केंद्र

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप


बाकी खबरें

  • hunger crisis
    डॉ. राजू पाण्डेय
    चिंता: ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर भी असहिष्णु सरकार
    29 Oct 2021
    पिछले कुछ समय से सरकार ऐसे हर आकलन को खारिज करती रही है जो उसकी असफलताओं को उजागर करता है।
  • climate
    टिकेंदर सिंह पंवार
    जलवायु परिवर्तन का संकट बहुत वास्तविक है
    29 Oct 2021
    भविष्य में आने वाली अधिक आपदाओं का मुक़ाबला करने के लिए आपदा जोखिम को कमतर करने वाले सिद्धांतों को मज़बूत करने की ज़रूरत है।
  • Supreme Court on Pegasus
    अजय कुमार
    पेगासस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी: 46 पन्नों के आदेश का निचोड़
    29 Oct 2021
    केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर सरकार को निजता के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े सवालों के जवाब देने से छूट नहीं मिल सकती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 14,348 नए मामले, 805 मरीज़ों की मौत
    29 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 0.47 फ़ीसदी यानी 1 लाख 61 हज़ार 334 हो गयी है।
  • exxon
    इलियट नेगिन
    प्रतिबंधित होने के बावजूद एक्सॉनमोबिल का जलवायु विज्ञान को ख़ारिज करने वालों को फंड देना जारी
    29 Oct 2021
    अमेरिकी तेल और गैस की प्रमुख कंपनी एक्सॉनमोबिल ने जलवायु विज्ञान को लेकर संदेह पैदा करने के लिए 39 मिलियन डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License