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चिंता भी, उम्मीद भी: किसान आंदोलन नाज़ुक दौर में
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क़ानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने और कमेटी बनाने के शोर में एक बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम दब सा गया है, जो सरकार के ख़तरनाक मंसूबों का संकेत देता है!
लाल बहादुर सिंह
15 Jan 2021
चिंता भी, उम्मीद भी: किसान आंदोलन नाज़ुक दौर में

किसान-आंदोलन के 50 दिन से ऊपर हो चुके हैं। आज, शुक्रवार को आंदोलन के नेताओं और सरकार के बीच वार्ता का 9वां राउंड है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप की जिस पृष्ठभूमि में यह वार्ता होने जा रही है, उसके बाद आज की वार्ता से शायद ही किसी को बड़ी उम्मीद हो।

उधर, सर्वोच्च न्यायालय में बहस के दौरान अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने जैसी बातें कीं, वे सरकार के खतरनाक मंसूबों का संकेत हैं। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने और कमेटी बनाने के शोर में एक बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम दब सा गया, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में इस संवेदनशील विषय पर टिप्पणी करते हुए शुरु में ही नोट किया गया है कि एक हस्तक्षेप याचिका के माध्यम से यह बात न्यायालय के संज्ञान में लायी गयी है कि  "Sikhs for Justice " नाम का भारत विरोधी अलगाववादी संगठन किसान आंदोलन को finance कर रहा है। इस पर जब अटॉर्नी जनरल से पूछा गया तो उन्होंने आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की घुसपैठ (infiltration) का दावा किया और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर अगले दिन शपथ पत्र दाखिल करने पर भी सहमति दी। 

यह propaganda सरकार व भाजपा के तमाम नुमाइंदों के द्वारा तो पहले से किया जा रहा था,  अब बाकायदा affidavit द्वारा देश की सर्वोच्च अदालत में इसे  सरकार के सबसे बड़े लॉ अफसर द्वारा कहा गया है। इसे  दिल्ली में किसानों को गणतन्त्र परेड से रोकने का आधार बनाया जा रहा है।

चर्चित स्तम्भकार प्रताप भानु मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विभिन्न पहलुओं की गम्भीर समालोचना की है, उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि, " (खालिस्तानी घुसपैठ की) अटॉर्नी जनरल की बात को गम्भीरतापूर्वक लेकर, सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर  पंच (arbitar ) की भूमिका में खड़ा हो गया। आंदोलन को गुमराह बताकर यह उसकी वैधता पर प्रश्न खड़ा करना (delegitimise ) करना है। यह किसान-आंदोलन को गैर-कानूनी घोषित किये जाने का आधार तैयार कर रहा है।"

जाहिर है, यह बेहद गम्भीर मामला है। अगर सरकार अपने इस आरोप के बारे में सचमुच गम्भीर है, तो फिर खालिस्तान का वाहक बन रहे आंदोलन के प्रतिनिधियों से वार्ता क्यों कर रही है?

क्या सरकार यह public perception बनाकर कि आंदोलनकारी सर्वोच्च न्यायालय की बात भी नहीं मान रहे हैं और वे खालिस्तानी तत्वों के हाथ में खेल रहे हैं, 26 जनवरी के पूर्व आंदोलन के दमन की ओर बढ़ रही है?

दरअसल सरकार आंदोलन को लम्बा खींचकर उस मुकाम पर ले जाना चाहती है जहां एक हिस्सा पस्त होकर पीछे हट जाय और दूसरा हिस्सा दुस्साहसिक कार्रवाइयों की ओर बढ़ जाये, जिसका बहाना बनाकर आंदोलन को कुचला जा सके। इसके लिए सरकारी पक्ष की ओर से लगातार उकसावेबाजी की कार्यवाही और बयानबाजी हो रही है।

इस सबसे बेहद चिंतित आंदोलन के सम्मानित नेता 77 वर्षीय बलबीर सिंह राजेवाल ने किसानों के नाम खुले पत्र   (14 जनवरी के पंजाबी ट्रिब्यून में प्रकाशित, पत्र का हिंदी अनुवाद - हरिंदर) में कहा है, 

" ......... दोस्तो, मैं हमेशा आपसे बार-बार अपील करता रहा हूँ, आंदोलन तभी सफल होता है जब वह पूरी तरह से शांत हो।  जब भी आंदोलन में हिंसा होती है, वह ढहने लगता है। ...26 जनवरी के आंदोलन के बारे में फैलाई जा रही भ्रांतियों को दूर करने के लिए मैं आपको विशेष रूप से संबोधित कर रहा हूं।  हम अगले हफ्ते घोषणा करेंगे कि किसानों की परेड कैसे की जाए।  लेकिन जिस तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं, उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत है।  यह इस तरह प्रचारित किया जा रहा है जैसे कि किसानों द्वारा विद्रोह का कार्यक्रम है और यह आंदोलन का अंतिम चरण है।  कुछ लोग कह रहे हैं कि उस दिन लाल किले पर झंडा फहराया जाना चाहिए।  कोई कह रहा है कि संसद पर कब्ज़ा किया जाएगा। कई तरह के निराधार भड़काऊ प्रचार प्रसार किया जा रहा है।"

" इस झूठे प्रचार ने मुझे ही नहीं, सभी आंदोलनकारी किसान संगठनों को गंभीर चिंता में डाल दिया है, इसने सभी को नींद से वंचित कर दिया है।  कुछ किसान विरोधी ताकतों ने किसानों और आम लोगों के शांतिपूर्ण आंदोलन को विफल करने के लिए इस झूठे प्रचार का सहारा लिया है।  ऐसे लोगों की मदद के लिए सरकारी एजेंसियां भी मौजूद हैं।  हर दिन विरोध स्थलों पर हमारे वॉलंटियर्स ऐसे लोगों को पकड़ कर जांच पड़ताल कर रहे हैं और उन्हें पुलिस को सौंपते हैं।  यह भी सुनने में आया है कि कुछ युवा पुलिस बैरिकेड तोड़ने के लिए ट्रैक्टरों से जुगाड़ भी कर रहे हैं।  यह न केवल निंदनीय है, बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण भी है। "

" .......क्या कोई किसान इसे हिंसक भीड़ में बदलकर आंदोलन को विफल करने के बारे में सोच सकता है?  कभी नहीं। ...फिर भी सरकारी एजेंसियां और किसान विरोधी ताकतें सक्रिय हैं।  मैं समझता हूं कि किसान की इतनी गलत सोच कभी हो ही नहीं सकती।  फिर भी सरकार हमारे आंदोलन में खालिस्तानियों और आतंकवादियो के होने का आरोप लगा रही है।  ऐसे समय में हर किसान की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।  दोस्तो, यह आंदोलन आपका है, आपके और आपके बच्चों के भविष्य से जुड़ा है। आइए सभी मिलकर इसे शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगाएं...।"

"  हर किसान को कार्यकर्ता बनना चाहिए और किसान विरोधी ताकतों पर नजर रखनी चाहिए। जिस आंदोलन की सफलता के लिए सारी दुनिया का दिल धड़कता है, उसे हर हाल में शांतमयी रखने का दृढ़ संकल्प ले। उन लोगों को बेनकाब करने में मदद करें जो झूठे प्रचार का प्रसार करते हैं। ताकि किसान विरोधी ताकतों को मुंह तोड़ जवाब मिल सके।  यदि हम आंदोलन को शांतिपूर्ण रखते हैं तो हम हर स्थिति में सफल होंगे।  उत्तेजक नारे और गर्म बयानबाजी आंदोलन को पटरी से उतार देगी।.......शांतमयी रहना ही इस आंदोलन की सफलता की कुंजी है और हिंसा इस आंदोलन के लिए फांसी के बराबर है।"

जाहिर है, आंदोलन अब बेहद नाजुक दौर में प्रवेश कर गया है। किसान नेतृत्व इस दौर की चुनौतियों को लेकर संजीदा और बेहद सतर्क है। पर, आने वाले दिनों में हालात क्या मोड़ लेंगे, इसका बहुत कुछ दारोमदार सरकार के रुख पर होगा।

किसानों ने उचित ही सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद अपने आन्दोलन को जारी रखने का एलान किया है, उनकी यह  अनुभूति गहराती जा रही है कि लोकतंत्र के सारे स्तम्भ आज सरकार के चंगुल में हैं,  यह सरकार भले उनके नाम पर राज कर रही है, पर काम उनके हित में नहीं कर रही है, यह गण का तंत्र  नहीं रह गया है, वरन तंत्र ने गण की आवाज, उसकी उम्मीदों-आकांक्षाओं का गला घोंट दिया है।

मन्तव्य और निहितार्थ जो हों, सर्वोच्च न्यायालय को भी कृषि कानूनों पर रोक लगाकर, सरकार के खिलाफ बेहद तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी कि किसान- आंदोलन से निपटने के सरकार के तौर-तरीक़े से वह बेहद निराश है, इसका हल निकालने में सरकार न सिर्फ विफल हो गयी है, वरन वह किसानों की पीड़ा के प्रति संवेदनहीन है और वह किसानों के साथ टकराव की खतरनाक सम्भावनाओं के प्रति बेपरवाह है।

जाहिर है न्यायालय द्वारा कानूनों पर रोक को लेकर किसान उत्साहित नहीं हैं, क्योंकि जैसा मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं स्पष्ट किया यह कानूनों पर रोक नहीं है, वरन उनके क्रियान्वयन पर रोक है, जो एक आदेश द्वारा कभी भी हटाई जा सकती है,  जिसका उद्देश्य बॉर्डर से किसानों को हटने के लिए माहौल बनाना है।

तमाम संविधान-विशेषज्ञों ने नोट किया है कि संविधान में निर्दिष्ट Separation of Powers के सिद्धांत के अनुसार  सर्वोच्च न्यायालय केवल उसी स्थिति में किसी कानून पर रोक लगा सकता है, जब उसे प्रथम दृष्टया ( prima facie ) ऐसा लगे कि यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है, अंततः ऐसे कानून को वह रद्द कर देगा। इससे इतर किसी प्रयोजन से रोक लगाना कानून बनाने में संसद की सर्वोच्चता को चुनौती है। और हमारे लोकतंत्र के लिए यह शुभ नहीं है। 

बहरहाल, विधि-विशेषज्ञों की प्रबल राय है कि कृषि कानून संविधान विरुद्ध हैं और सर्वोच्च न्यायालय अगर किसान आंदोलन को लेकर सचमुच चिंतित है तो इन कानूनों को संविधान की कसौटी पर परख कर रद्द कर सकता है। लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल PDT Achary के अनुसार, " वैसे तो इन कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती मुख्यतः इस आधार पर दी जा रही है कि संसद के पास इन कानूनों को बनाने की competence ही नहीं है क्योंकि यह मूलतः राज्य-सूची का विषय है, पर उससे भी ज्यादा बुनियादी कारण यह है कि राज्यसभा में इसे जिस तरह पारित किया गया वह संविधान की धारा 100 का खुला उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि " सदन में सभी मामलों पर फैसला, वहां उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के बहुमत के आधार पर किया जाएगा। बहुमत का फैसला संख्या से होगा। इसका फैसला, यदि कोई सदस्य मांग कर दे, तो ध्वनिमत से नहीं हो सकता, वरन  वास्तविक मतदान से होगा। "

जाहिर है किसी भी तर्क या बहाने से इस संवैधानिक व्यवस्था का निषेध संविधान का उल्लंघन है। कृषि कानूनों पर मतदान के समय राज्यसभा में ठीक यही हुआ है, मतविभाजन के लिए सदस्यों की स्प्ष्ट मांग के बावजूद ध्वनिमत से इसे पारित घोषित कर दिया गया। इसे सदन की कार्यवाही की महज  procedure सम्बन्धी अनियमितता का मामला बनाकर सरकार judicial review से नहीं बच सकती क्योंकि यह सीधे संविधान के प्रावधान का, धारा 100 का उल्लंघन है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गई कमेटी के चयन में तो निष्पक्षता का दिखावा तक नहीं किया गया। कमेटी के सदस्य सिर्फ इन कानूनों के समर्थक नहीं हैं, वरन अशोक गुलाटी जैसे लोग तो इन कानूनों के chief architect हैं। श्री गुलाटी मोदी सरकार द्वारा बनाये गए Agriculture Market Reforms के विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष तथा नीति आयोग के अंतर्गत कृषि पर टास्क फोर्स के सदस्य हैं। इन कानूनों को उन्होंने 1991 में मनमोहन सिंह द्वारा किये गए युगांतकारी ढांचागत बदलाव जैसा  'क्रांतिकारी कदम' घोषित किया है ( "1991 moment for Indian agriculture " )। आखिर ऐसे महापुरुषों से सुसज्जत कमेटी इन कानूनों को रद्द करने की मांग पर अडिग किसानों से भला क्या बात करेगी? यह तो एक तरह से किसानों को मुंह चिढ़ाने की बात हुई। 

बहरहाल, कमेटी स्वयं ही हास्यास्पद होती जा रही है, गठन के 2 दिन के अंदर ही कमेटी के सदस्य पूर्व किसान नेता भूपिंदर सिंह मान ने "किसान यूनियनों व जनता के बीच व्याप्त भावनाओं और आशंकाओं के मद्देनजर", " पंजाब और किसानों के हितों के साथ समझौता न करने का एलान करते हुए" अपने को कमेटी से अलग कर लिया । 

बेशक यह किसान आंदोलन के ताप का ही असर है।

किसान तो पहले से ही उसूली तौर पर कृषि कानून जैसे नीतिगत प्रश्न पर न्यायिक मध्यस्थता से असहमत थे और सीधे सरकार से वार्ता के माध्यम से  हल निकालने पर जोर दे रहे हैं, स्वाभाविक रूप से  इस कमेटी से किसी engagement से उन्होंने अपने को अलग कर लिया है।

किसान आंदोलन का अंजाम क्या होगा, यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, पर इतना तय है कि सरकार पिछले सात साल से जिस तरह राज कर रही थी, इसी तरह अब अगले तीन साल उसके लिए राज कर पाना सम्भव नहीं होगा। किसान आंदोलन ने सरकार के नैतिक प्राधिकार पर, सत्ता की हनक और इकबाल पर भारी चोट किया है तथा स्वयं मोदी जी के ‘आभा-मंडल’ को क्षत-विक्षत कर दिया है।

बेहतर हो कि सरकार अब भी अपनी अंध कॉरपोरेटपरस्ती का त्याग कर किसानों की न्यायोचित आवाज को सुने तथा दमन की  किसी भी दुस्साहसिक कार्रवाई से हर हाल में बाज आये। 

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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