NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
किसान आंदोलन ने दंगों का दंश झेल चुके मुज़फ़्फ़रनगर में दिलों की दूरियों को कम किया, पर आगे लंबा रास्ता बाक़ी
हालांकि अब भी इस बात पर संशय बना हुआ है कि दंगों के 7 साल गुज़रने के बाद क्या दोनों समुदायों को क़रीब लाने में कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे आंदोलन ने कोई भूमिका निभाई है?
सौरभ शर्मा
12 Feb 2021
किसान आंदोलन

जौला, मुज़फ़्फ़रनगर: मोहम्मद सज्जाद मुज़फ़्फ़रनगर जिले में स्थित बुढ़ाना प्रखंड के जौला गांव के रहने वाले हैं। वहीं राकेश बालियान इसी प्रखंड के सिसौली गांव से ताल्लुक रखते हैं। दोनों, किसान प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए जनवरी में 2 दिन गाजीपुर बॉर्डर पर गुजार चुके हैं। 

सज्जाद और राकेश एक ही ट्रैक्टर से प्रदर्शन स्थल पहुंचे, इस दौरान दोनों ने अपना खाना भी एक-दूसरे के साथ बांटा। प्रदर्शन स्थल से लौटने के बाद भी दोनों एक दूसरे के संपर्क में रहे हैं। सज्जाद और राकेश के परिवारों ने मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में अपने किसी ना किसी सदस्य को खोया है। उन भयावह दंगों में 50 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, वहीं 50,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए थे। राकेश और सज्जाद अपनी उम्र के चौथे दशक में चल रहे हैं। 

शामली रोड पर एक अंडे की दुकान के पास बैठे सज्जाद अपने दोस्तों से कह रहे हैं कि अब जाट और मुस्लिमों को एक होकर कृषि कानूनों के खिलाफ़ संघर्ष करने की जरूरत है।

सज्जाद अपने आसपास के लोगों से कहते हैं, "हम पहले किसान हैं। जब तक सरकार कानून वापस नहीं लेती, हमें यह भूल जाना चाहिए कि हम मुस्लिम, जाट, गुर्जर, बनिया या सिख हैं। हम किसान हैं और हम देश के अन्नदाता हैं। जो लोग रोटी या सब्ज़ी खा रहे होते हैं, वे कभी फ़सल लगाने वाले किसान के धर्म के बारे में नहीं सोचते। अब वक़्त आ गया है कि हम अपनी दुश्मनी को किनारे कर दें। बल्कि हमें एक-दूसरे को भाई मानना चाहिए और अतीत के लिए एक-दूसरे से माफ़ी मांगकर एक बेहतर भविष्य की दिशा में काम करना चाहिए।"

इस बीच उन्हें कोई बीच में टोकते हुए पूछता है, "हम अपने अतीत के दुखों को कैसे भूल जाएं। क्या हमसे अब भी समझौता करने और दंगों के मामले वापस लेने के लिए नहीं कहा जा रहा है।"

इसके बाद कुछ वक़्त के लिए चुप्पी छा जाती है। फिर सज्जाद कहते हैं, "अगर हमने खोया है, तो उन्होंने भी खोया है। मत भूलो कि दो हाथ से ताली बजती है। आखिर हम अपने दिलों में नफ़रत लेकर कब तक चलेंगे? क्या हमें इन काले कानूनों के खिलाफ़ जंग नहीं लड़नी और खेती-किसानी पर वापस नहीं लौटना है? क्या हमें समृद्ध नहीं होना?"

सज्जाद को सुनने वाले केवल आधे लोगों ने ही इस बात पर गौर फरमाया। अपनी उम्र के तीसरे दशक में चल रहे युवा असलम ने जवाब में कहा, "एकता कभी एक ही समुदाय या व्यक्ति की कोशिश से नहीं बनाई जा सकती। दूसरे पक्ष को भी झुकना पड़ता है और अपने घमंड को किनारे रखना होता है।"

असलम ने अपना पूरा नाम और अपने गांव का नाम बताने से इंकार कर दिया।

वह कहते हैं, "हम यह कैसे मान लें कि यहां सबकुछ अच्छा हो गया है? अब तो किसानों का आंदोलन भी राजनीतिक हो रहा है, क्या हम नहीं जानते कि बलियानों ने पहली पंचायत आयोजित की थी, जिसके बाद दंगे हुए थे। अब कहा जा रहा है कि सबकुछ सामान्य हो रहा है। घाव भर जाते हैं, लेकिन इसमें वक़्त लगता है। लोगों से आंदोलन में शामिल होने और दंगों को भूलने के लिए नहीं कहना चाहिए।"

अब इस दुनिया से विदा ले चुके चौधरी महेंद्र टिकैत के गांव में बमुश्किल ही कोई मर्द बाहर दिखाई दिया। ज़्यादातर लोग भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत के लिए आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए गए हैं। वहीं बाकी लोग कृषि कार्यों में व्यस्त हैं।

बालियान खाप से आने वाले राकेश बालियान कहते हैं कि दंगों को सात साल गुजर चुके हैं और अब दोनों समुदायों को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए ऐसी ही किसी चीज की जरूरत थी। 

वह कहते हैं, "देखिए 2013 में जो भी हुआ, वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था, वह नहीं होना चाहिए था। लेकिन अब मुझे लगता है कि यह मतभेद दूर होने चाहिए। अब सात साल गुजर चुके हैं, अच्छी बात यह है कि इस बीच कुछ भी अनचाही घटना नहीं हुई। हमारा हुक्का पानी तो एक-दूसरे के बिना कभी चला ही नहीं है, तो इस बार इतना बड़ा आंदोलन कैसे हो जाता। हम सब चौधरी जी के साथ है। जाट समुदाय के कुतबा गांव में भी लोगों ने कहा कि उनके खिलाफ़ मामले खत्म होने चाहिए और चीजें सामान्य होनी चाहिए।"

मेरठ में रहने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कमल भार्गव ने न्यूज़क्लिक को बताया कि जब भी क्षेत्र के किसानों को किसी भी चीज से ख़तरा महसूस हुआ है, इसने अलग-अलग समुदायों को एक किया है।

वह कहते हैं, "वह लोग किसान हैं और किसान आंदोलन दोनों समुदायों को एक दूसरे के करीब़ लेकर आया है। लेकिन यह लोग कितने वक़्त तक एक साथ रहते हैं क्षेत्र में यह शांति कब तक जारी रहती है, यह चिंता की बात है। जाट, मुस्लिम और गुर्जरों के बीच की तनातनी खत्म होनी चाहिए, लेकिन 2013 के घाव अब तक भरे नहीं हैं, इन्हें भरने में बहुत वक़्त और बहुत कोशिश लगेगी। आंदोलन का एक और नतीज़ा यह हुआ है कि जाट और गुर्जर समुदाय, जाट और मुस्लिम समुदाय की तुलना में एक-दूसरे के ज़्यादा करीब़ आया है।"

भार्गव आगे कहते हैं, "मैदान पर मौजूद लोगों और नेताओं से बात करते हुए मुझे महसूस हुआ है कि इन लोगों को यह चिंता है कि राकेश टिकैत राजनीतिक महत्वकांक्षाएं पाले हुए हैं और जिस तरह के भाषण वह दे रहे हैं, उसे सुनकर लगता है कि वह इस आंदोलन को राजनीतिक बना सकते हैं।"

मुज़फ़्फ़रनगर के समाजसेवी आसिफ राही कहते हैं, "यह आंदोलन वाकई दोनों समुदायों को करीब़ लेकर आया है। किसान अपने सांप्रदायिक मतभेद भूल रहे हैं और एकसाथ आ रहे हैं, क्योंकि किसानी तो खुद अपने-आप में एक धर्म है। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत का रो देना इस गन्ना पट्टी के सभी किसानों के लिए बड़ी बात थी।"

क्षेत्र में सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए काम करने वाले राष्ट्रीय लोकदल के नेता विपिन सिंह बालियान कहते हैं, "वक़्त बहुत बड़ा मरहम है, लेकिन किसान आंदोलन और टिकैत के आंसुओं ने मुझफ्फरनगर दंगों के घाव भरने में बहुत सकारात्मक भूमिका निभाई है। जीवन पहले ही सामान्य हो रहा था, लेकिन मुहम्मद जौला के वक्तव्यों ने जाट और मुस्लिमों को एक साथ ला दिया है। अब जाट और मुस्लिम एकसाथ आ रहे हैं, क्योंकि वे अपने सबसे बड़े नेता को रोते हुए नहीं देख सकते।"

यहां यह बताने की जरूरत है कि मुज़फ़्फ़रनगर दंगों से विस्थापित हुए लोग, जो राहत शिविरों में रह रहे हैं, उन्हे अब भी देश में चल रहे घटनाक्रमों की ख़बर नहीं है और वह लोग अब भी एक सम्मानजनक जीवन पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Farmers’ Protests Bridge Gaps in Riot-Affected Muzaffarnagar but Long Road Ahead

muzaffarnagar
muzaffarnagar riots
Farm Laws
Farmers Protests
Jats
Muslims
rakesh tikait
Mohammad Jaula

Related Stories

युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

किसान आंदोलन: मुस्तैदी से करनी होगी अपनी 'जीत' की रक्षा

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

कृषि क़ानूनों के निरस्त हो जाने के बाद किसानों को क्या रास्ता अख़्तियार करना चाहिए

किसानों की ऐतिहासिक जीत के मायने


बाकी खबरें

  • liquor
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: शराब भली चीज है, जी भर के पीजिए!
    30 Jan 2022
    शराब जब वोट डालने से एक दो दिन पहले पिलाई जाये तो वह वोटर पटाने के लिए होती है पर जब उसका बंदोबस्त पूरे पांच साल के लिए किया जाये तो वह शराब और शराबियों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ही होता है।
  • pegasus
    अजय कुमार
    क्या पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर के लिए भारत की संप्रभुता को गिरवी रख दिया गया है?
    30 Jan 2022
    न्यूयॉर्क टाइम्स का खुलासा कि मोदी सरकार ने पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर इजराइल से खरीदा है। यह खुलासा मोदी सरकार के इस इंकार को झूठा साबित करता है कि पेगासस से मोदी सरकार का कोई लेना-देना नहीं।
  • Sabina Martin
    राज कुमार
    सबिना मार्टिन से ख़ास बातचीत: गोवा चुनाव और महिलाओं का एजेंडा
    30 Jan 2022
    लोगों के जो वास्तविक मुद्दे हैं वो चुनाव चर्चा में अपनी जगह बनाने की जद्दो-जहद कर रहे हैं। ऐसा ही एक अहम मुद्दा है जेंडर का। महिलाओं के अधिकार, सुरक्षा, न्याय और गोवा में महिलाओं से जुड़े अन्य…
  • Mahatma Gandhi
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    शहीद दिवस: मारकर भी गांधी से क्यों डरते हैं हत्यारे
    30 Jan 2022
    गांधी की शहादत के दिन क्यों उनकी हत्या और हत्यारों के समर्थक सक्रिय हो जाते हैं और विभिन्न मंचों पर अपनी विचारधारा और कृत्य का प्रदर्शन करते हैं?
  • HafteKiBaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पेगासस का पेंच, रेलवे नौकरी के परीक्षार्थियों की पीड़ा और चुनावी ख़बरें
    29 Jan 2022
    हफ्ते की बात के नये एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश चर्चा कर रहे हैं चार बड़ी खबरों पर. ये हैं: पेगासस जासूसी कांड में न्यूयॉर्क टाइम्स का रहस्योद्घाटन, RRB-NTPC नौकरी के परीक्षार्थियों पर भयानक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License