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भारत
राजनीति
गाय पर राजनीति
महेश कुमार
13 Oct 2015

दादरी के बिश्हाड़ा गाँव में घर में बीफ होने के शक के आधार पर मोहम्मद अखलाक की ह्त्या कर दी गयी. इस ह्त्या के बाद उत्तर प्रदेश के ही कानपूर और मैनपुरी में कुछ और साम्प्रदायिक  घटनाएं घटी. साम्प्रदायिक उन्माद की घटनाएँ उत्तर भारत में और खासतौर पर उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान ही शुरू हो गयी थी. देश का मतदाता या फिर वह तबका जो देश में आर्थिक तरक्की के साथ-साथ साम्प्रदायिक सदभाव चाहता है वह इन घटनाओं के पीछे की साजिश को समझ नहीं पाया. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सजता है कि जब में एक दिन साहित्यकारों की एक औपचारिक बैठक में गया तो मुझे वहां मौजूद एक लेखिका ने बताया कि उसने इस बार मोदी को वोट दिया है, में यह सुन कर थोडा चौंका और उनसे पूंछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. तो उन्होंने बताया कि मोदी साम्प्रदायिक राजनीति से मुहं मोड़ चुका है और केवल देश के विकास के लिए काम करेगा. में सोचता रहा कि अगर इस वरिष्ठ साहित्यकार के ऊपर मोदी के चुनाव प्रचार का इतना बड़ा असर है तो आम जनता पर इसका कितना बड़ा असर होगा जो पहले से ही कांग्रेसनीत नीतियों को झेल कर निराश हो चुकी थी. और ऐसे ना जाने कितने ही साहित्य और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोग होंगे जिन्होंने कांग्रेस की भ्रष्ट और जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ गुस्से में आकर मोदी को वोट दिया होगा. पहले अंदाजा लगाना मुश्किल था लेकिन अब पता चल रहा है कि ऐसे लोगो की संख्या काफी बड़ी है जिहोने मोदी के झूठे विकास के नारे के भ्रम में फंसकर वोट दिया.

निराशा और आशा

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों में भारी निराशा थी. क्योंकि यह वहा दौर था जब देश में आर्थिक मंदी चरम पर थी. बेरोज़गारी बढ़ रही थी, युवा तबका निराशा के जाल में घिरता जा रहा था, किसानों की ह्त्या में बढ़ोतरी हो रही थी, मनरेगा जैसे कानून को मज़बूत करने के बजाय कमज़ोर किये जाने की कोशिश की जा रही थी, व्यापार कम हो रहा था और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आ रही थी. ऐसी हालात में भाजपा को छोड़कर लोगो के सामने कोई भी ठोस विकल्प मौजूद नहीं था. उपरोक्त कारणों के चलते लोगों ने मोदी के न्रेतत्व में भाजपा को सता सौंप दी इस उम्मीद में कि शायद यह सरकार पिछली सरकार से अलग हटकर वैकल्पिक नीतियाँ लाएगी और देश को विकास की ओर ले जायेगी. समाज के हर तबके में यह उम्मीद जगी थी, कि शायद अब कुछ नया होगा, बच्चों की शिक्षा बेहतर होगी, युवाओं को रोज़गार मिलेगा, किसानों को रहत मिलेगी, महंगाई घटेगी, महिलाओं की सुरक्षा का ध्यान रखा जाएगा. साम्प्रदायिक सदभाव बढेगा क्योंकि सदभाव खराब करने वाले अब सत्ता में हैं तो शायद ये ऐसी हरकतें करके अपना नाम बर्बाद नहीं करेंगे. यह तिलस्म आम आदमी की आखों पर पड़ चुका था.

टूटता तिलस्म

अब लगने लगा है कि शायद लोगों की नज़रों से विकास और सदभाव का तिलस्म टूटना शुरू हो गया है. अब अचानक मीट पर प्रतिबन्ध, बीफ पर प्रतिबन्ध या इसे देश के कुछ में हिस्से में लागू करने से साम्प्रदायिक घटनाओं में तेज़ी से इजाफा हुआ है. भाजपा और संघ के स्थानीय नेताओं की सरपरस्ती में नए-नए संगठन बन रहे हैं. ये सभी संगठन या पुराने संगठन जिसमें बजरंग दल, विहिप, श्रीराम सेना और सनातन संस्था आदि शामिल हैं, देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं. मुजफ्फर नगर के दंगों, त्रिलोकपुरी के दंगों, बवाना में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश तथा नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे और डॉ. एम. एम. काल्बुर्गी की ह्त्या से देश अभी इस दर्द उभर भी नहीं पाया था कि मोहम्मद अखलाक की बेरहम ह्त्या ने सबके ज़मीर को हिला कर रख दिया. उदार और शांतिप्रिय हिन्दू यह सोचने पर मजबूर होने लगा है कि क्या हम इस व्यवस्था को बर्दास्त करें? या इसके प्रति अपना विरोध दर्ज करें.

गाय पर राजनीती  

हमारे देश में हिंदुत्व की ताकतें हमेशा से ही गाय के मुद्दे का राजनीतिकरण करती आई हैं. गाय की राजनीती का उद्दार तब-तब तेज़ हुआ जब उन्हें लगा कि जनता उनसे दूर जा रही है. वे सिर्फ गाय का ही नहीं अन्य मुद्दों को भी तारो-ताज़ा कर लेती हैं जो भी मुद्दा साम्प्रदायिक एकता को तोड़ने की क्षमता रखता है. इस दौरान मोहम्मद अखलाक की ह्त्या से गाय का मुद्दा गरमा गया तो हिंदुत्व की ताकतों ने इसे बिहार के चुनाव में डूबती नाव को पार लगाने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रधानमंत्री से लेकर आधा दर्ज़न मंत्री तक गाय के मुद्दे को लेकर बिहार के चुनावों से लेकर दादरी तक खुली बयानबाजी कर रहे हैं. वे स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि अगर गाय का मीट पाया गया तो इसके अंजाम बुरे होंगे और कुछ तो कह गए कि उसके अंजाम मोहम्मद अखलाक जैसे ही होंगे. यानी देश की राजसत्ता पर काबिज़ मंत्री और प्रधानमंत्री मुद्दों के अभाव में गाय को मुदा बना रहे हैं. इसके नतीजे बड़े खतरनाक निकल रहे हैं. यह आम ख़बरें आ रहीं हैं कि गौ ह्त्या की अफवा फैला कर दंगा व आगज़नी करवाने की घटनाओं में बेजा बढ़ोतरी हुयी है.

अब सवाल यह उठता है कि आखिर ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? मोदी और मोदी के मेनेजर सब जानते हैं कि वे लोग अपनी आर्थिक नीतियों के चलते आम जनता को राहत नहीं दे पायेंगे. और इसके नतीजे भी सामने हैं. जब से मोदी सता में आये हैं न तो रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी हुयी है, महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है, किसान बड़े स्तर पर आत्महत्याएं कर रहे हैं, महिलाओं की सुरक्षा खतरे में है, औद्योगिक उत्पादन काफी कम हो गया है, देश में आर्थिक मंदी छायी हुयी है. ये सब मुद्दे सरकार के खिलाफ असंतोष को पैदा करने का काम कर रहे हैं. इन सबसे बचने के लिए मोदी और उसकी पूरी टोली इन मुद्दों से आम जनता को गुमराह करने के लिए अचानक गौ रक्षा और हिन्दू धर्म की रक्षा की मिशन पर उतर गए हैं. भारत चूँकि एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए हर वर्ष देश में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं. और ये चुनाव साम्प्रादायिक ताकतों के लिए अपनी ताकत को बढाने का सबसे महत्वपूर्ण मौक़ा होता है. इसलिए हर चुनाव के इर्द-गिर्द इस तरह का विवाद पैदा करना उनके लिए हित में होता है.

विरोध के उभरते स्वर

विद्वेष से भरे इस माहौल के चलते लोगों में अब विरोध के स्वर उभरने लगे है. इसकी शुरुवात साहित्यकारों ने की है. अब तक करीब 23 साहित्यारों ने साहित्य अकादमी द्वारा दिए गए अवार्ड को लौटा दिया है. नेहरु की भतीजी और वरिष्ठ साहित्यकार नयनतारा सहगल का कहना है कि में यह सम्मान इसलिए लौटा रही हूँ क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला तेज हो रहा है और राजसत्ता पर काबिज़ सरकार उसका समर्थन कर रही है. बोलने और लिखने की आजादी पर हमला शासकीय विचाधारा को दर्शाती है और इसीलिए लेखकों पर हमले बढ़ रहे हैं, यहाँ तक कि उनकी आवाज़ को शांत किया जा रहा है. उन्होंने मोहम्मद अखलाक की ह्त्या का भी हवाला दिया और कहा इसके खिलाफ आवाज़ उठाना हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो देश के भीतर भाईचारे का समर्थक है. गणेश नारायण देवी, जोकि गुजरात से हैं और साहित्यकार के अलावा भाषा शोध में उनका योगदान काफी है, ने कहा कि जब लेखकों की आवाज़ को शांत किया जा रहा है तो साहित्य अकादमी को अपने लेखकों के समर्थन में खडा होना चाहिए. उन्होंने भी अपना अवार्ड लौटा दिया है. अवार्ड लौटाने की इस मुहीम में गोपाल गाँधी, राजेश जोशी, गुलामनबी ख़याल, अमन सेठी, राजेंद्र किशोर पांडा, अजमेर ओळख, आतामजीत, गुरबचन सिंह भुल्लर, वरयाम संधू आदि शामिल हैं.

आगे क्या?

सवाल यह उठता है कि आगे क्या? क्या अब हम अपनी सभी परेशानियों को भूलकर गौ ह्त्या, घर वापसी, हिन्दुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करना, लव-जिहाद, मीट प्रतिबन्ध, बीफ प्रतिबन्ध आदि पर ध्यान दे. क्या हम अब हिन्दू धर्म की रक्षा करने वाली गुंडा वाहिनी का नंगा नाच देखते रहें? नहीं अब ऐसा नहीं चलेगा. नयनतारा सहगल, राजेश जोशी, गोपाल गाँधी, जैसे साहित्यकारों ने विरोध का बिगुल बजा दिया है. आगे का रास्ता संघर्षपूर्ण है और अगर अभिव्यक्ति की आजादी, जीने की आजादी, खाने की आजादी, पहनने की आजादी, घूमने की आजादी की रक्षा करनी है तो हमें कहना पड़ेगा कि हमें हिदुत्वादी एजेंडे से सख्त नाराजगी है और हम इसे बर्दास्त नहीं करेंगे.

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

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सांप्रदायिक ताकतें
नयनतारा सहगल
राजेश जोशी
शशि देशपांडे

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