NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
सरकार का टैक्स कलेक्शन तो बढ़ा है, लेकिन फिर भी ख़र्च में कटौती जारी
मोदी सरकार ने शिक्षा, सामाजिक न्याय, पर्यावरण समेत कई मंत्रालयों के ख़र्च पर रोक लगा दी है। 
सुबोध वर्मा
15 Nov 2021
Translated by महेश कुमार
tax
छवि सौजन्य: द इंडियन एक्सप्रेस

खर्च में कटौती की अपनी नीति को जारी रखते हुए, केंद्र सरकार ने सितंबर 2021 के अंत तक बजटीय राशि का केवल 47 प्रतिशत ही खर्च किया है। यह वित्तीय वर्ष 2021-22 का आधा हिस्सा है। यह एक नया और काफी निचला स्तर है (नीचे ग्राफ देखें), और विचित्र बात यह है कि यह ऐसे समय में हो रहा जब सरकार के कर-राजस्व में काफी वृद्धि हुई है।

जैसा कि लेखा महानियंत्रक (सीजीए) द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के ग्राफ से पता चलता है, कि महामारी के पहले वर्षों में आमतौर पर वित्तीय वर्षों की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) के दौरान लगभग 53 प्रतिशत का खर्च हुआ है। 2020-21 में, यह खर्च कुल बजटीय राशि का थोड़ा सा घटकर यानि करीब 49 प्रतिशत रह गया है। यह वह वर्ष था जब महामारी ने भारत को काफी प्रभावित किया था, और जिसके चलते कई महीनों तक पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन रहा जिसने आर्थिक गतिविधियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया था।

किसी भी सरकार के लिए यह स्वाभाविक और तार्किक होता कि वह विकट परिस्थितियों में खर्च बढ़ाती, खासकर जब अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही हो, बेरोजगारी व्याप्त हो और निजी निवेश कम हो रहा हो। हालांकि, मोदी सरकार ने पश्चिमी बैंकों और रेटिंग एजेंसियों द्वारा प्रचारित ज्ञान के आगे घुटने टेक दिए थे कि सरकार को अपने खर्च को नियंत्रित करना चाहिए, आय और व्यय (राजकोषीय घाटा) के बीच के अंतर को कम करना चाहिए और इस तरह निजी क्षेत्र को स्वतंत्र रूप से कदम उठाने की अनुमति देनी चाहिए। सरकार इस बदनाम सिद्धांत के इतने व्यापक प्रभाव में रही है कि चालू वित्त वर्ष (2021-22) में उसने खर्च को और भी कम कर दिया है।

यदि आपको लगता है कि 50 प्रतिशत और 47 प्रतिशत के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है, तो इसका मतलब यह है: चालू वर्ष के लिए खर्च का कुल बजट का अनुमान लगभग 34.8 लाख करोड़ रुपये है; इसलिए, 3 प्रतिशत अंक के अंतर का अमतलब है 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक रुपया। यह उतनी राशि है जो जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकती है यदि इसका निवेश जरूरतमंद लोगों को अनाज के वितरण में, या ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत अधिक काम देने में, या सभी लोगों को तेजी से टीके की दो खुराक सुनिश्चित करने से किया जा सकता है।

तो कटौती हो कहाँ रही है?

सीजीए द्वारा जारी बिना ऑडिट किए गए खातों के अनुसार, कुछ प्रमुख मंत्रालय/विभाग जो सीधे लोगों से संबंधित कार्यक्रमों का संचालन करते हैं, इस कटौती से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। [नीचे तालिका देखें] इनमें स्कूल शिक्षा विभाग (खर्च की गई बजट राशि का 29 प्रतिशत है) और पेयजल और स्वच्छता (22 प्रतिशत); सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय जो अनुसूचित जातियों और विकलांगों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का संचालन करते हैं (सिर्फ 8 प्रतिशत) खर्चा; आदिवासी मामले (28 प्रतिशत); अल्पसंख्यक मामले (17 प्रतिशत); उत्तर-पूर्वी क्षेत्र का विकास (46 प्रतिशत); और महिला एवं बाल विकास (47 प्रतिशत) का खर्च शामिल है।

ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) जैसे कुछ प्रमुख कल्याणकारी कार्यक्रमों का संचालन करने वाले ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अपने धन का मात्र 61 प्रतिशत ही खर्च किया है। हालाँकि, यह इस तथ्य को छुपाता है कि कथित तौर पर, इन सभी महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए पूरे वर्ष का आवंटन लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हर साल आवंटन का एक बड़ा हिस्सा पिछले साल की बकाया राशि का भुगतान करने में चला जाता है, और काम की मांग लगातार बढ़ रही है। सरकार के कम आवंटन से योजना को कम करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के कारण इसे अतिरिक्त धन देने के लिए मजबूर किया जाता है, जैसा कि पिछले साल हुआ था।

कल्याणकारी योजनाओं का संचालन करने वाले मंत्रालयों या विभागों के अलावा, जो संभावित रूप से आर्थिक संकट के इस समय में बहुत मददगार हो सकते हैं, वे पिछड़ते दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए, कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने अपने फंड का सिर्फ 24 प्रतिशत ही खर्च किया है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की देखभाल करने वाले मंत्रालय ने महामारी और पहले से चल रही आर्थिक उथल-पुथल के बावजूद अपनी बजट राशि का मात्र 45 प्रतिशत ही खर्च किया है।

कृषि से संबंधित दो मंत्रालय - कृषि और किसान कल्याण और मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी - ने अपेक्षा से काफी कम खर्च किया है। पहले वाले ने 45 प्रतिशत और बाद वाले ने अपनी संबंधित बजट राशि का 42 प्रतिशत ही खर्च किया है। देश में किसान पिछले एक साल से मोदी सरकार के उन तीन कुख्यात कृषि कानूनों के माध्यम से कृषि को निगमित करने के प्रयासों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, जो पिछले साल संसद में पारित हुए थे, और जो वर्तमान में निलंबित हैं। मोदी सरकार बार-बार कह रही है कि वह किसानों के कल्याण और समृद्धि के लिए खड़ी है। फिर भी, यह इस वर्ष अपने बजट में अपेक्षित राशि खर्च करने में भी असमर्थ रही है।

इसी तरह खर्च के रुझान पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने पर मोदी सरकार के दावों के खोखलेपन को उजागर करते हैं। इन ज्वलंत मुद्दों से जुड़े दोनों मंत्रालयों ने उम्मीद से काफी कम खर्च किया है। पर्यावरण मंत्रालय ने आवंटित धन का केवल 25 प्रतिशत खर्च किया है, जबकि अक्षय ऊर्जा मंत्रालय केवल 30 प्रतिशत ही खर्च करने में सफल रहा है।

पिछले कई सालों से मोदी सरकार की खर्चे कम करने और बड़े-बड़े वादे करने लेकिन साथ ही पर्याप्त धन आवंटित न करने की नीति का निर्दयतापूर्वक पालन किया जा रहा है। ऐसे समय में जब आर्थिक मंदी ने अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया और महामारी/लॉकडाउन जोकि  गिरावट का एक बड़ा कारण बना है, इस नीति को जारी रखने की जिद ने लोगों के संकट को प्रत्यक्ष रूप से और बढ़ा दिया है। यह संभव है कि आगामी महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों में, सभी संकटों की यादों को मिटाने के लिए, करोड़ों रुपये की परियोजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। दरअसल, यूपी और अन्य जगहों पर इसकी शुरुआत हो चुकी है। जनता इस धोखे को देख पाती है या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Govt. Squeezes Spending, Even Though Tax Collections Have Increased

indian economy
Modi government
Indian Budget
Budget allocation
Agriculture
Government Spending

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?


बाकी खबरें

  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 39,796 नए मामले, 723 मरीज़ों की मौत
    05 Jul 2021
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 39,796 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.57 फ़ीसदी यानी 4 लाख 82 हज़ार 71 हो गयी है।
  • खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
    सुबोध वर्मा
    खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
    05 Jul 2021
    प्रोटीन के बुनियादी स्रोत जैसे मांस, अंडे, दालें आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गए हैं और रसोई गैस की क़ीमत की तरह खाना पकाने के तेल की क़ीमतों में भी बड़ा उछाल आया है। 
  • लेखक को भविष्य की उम्मीद दिखानी चाहिए
    न्यूज़क्लिक टीम
    लेखक को भविष्य की उम्मीद दिखानी चाहिए
    04 Jul 2021
    न्यूज़क्लिक की ख़ास पेशकश में वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक अजय सिंह ने उपन्यासकार-गद्यकार गीता हरिहरन से उनके उपन्यास I have become the tide के बहाने मौजूदा दौर पर विस्तृत बातचीत की। अजय सिंह ने…
  • Economic Liberalisation: 30 साल में क्या बदला, क्या नहीं?
    न्यूज़क्लिक टीम
    Economic Liberalisation: 30 साल में क्या बदला, क्या नहीं?
    04 Jul 2021
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन 1991 Economic Liberalisation की बात कर रहे है. क्या है इसका इतिहास और इसे क्यों लागू किया गया था, आइये जानते हैं
  • नासिरा शर्मा‌‌
    श्याम कुलपत
    नासिरा शर्मा‌‌: मिट्टी और पानी की तासीर पर बात करने का न्योता
    04 Jul 2021
    भाषा के चहुं ओर जो दीवारें हमसे खड़ी हो रही हैं वह कोई साहित्यिक अमल नहीं ‌है। नासिरा शर्मा ने इसे उसकी गैर अदबी अभिव्यक्ति कहा, जो भाषा के पक्ष में नहीं विपक्ष में जाती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License