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भारत
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आरआईसी के छिपे आकर्षण को लेकर भारत जाग रहा है
रूस, भारत, चीन के बीच होने वाली बैठक का वास्तविक महत्व इस बात को लेकर है कि यह एक ऐसे समय में होने जा रही है जब दुनिया ऐतिहासिक संक्रमण के दौर के बीच में है।
एम. के. भद्रकुमार
24 Jun 2020
Vladimir Putin (L), Narendra Modi (C) and Xi Jinping (R)
ब्लादिमीर पुतिन (बायें), नरेंद्र मोदी (बीच में ) और शी जिनपिंग (दायें), 18 जून 2019 को ओसका में जी-20 समूह की एक त्रिपक्षीय बैठक के दौरान।

रूस-भारत-चीन के विदेश मंत्रियों के बीच होने वाली वीडियो कांफ्रेंसिंग को लेकर भारतीय विश्लेषकों में बेहद उत्सुकता देखी जा सकती है। यहां तक कि इस प्रकार की प्रक्रियाओं से आमतौर पर पीछा छुड़ाने वाले समूह; आरसीआई, ब्रिक्स और एससीओ जिनसे अमेरिका को अलग रखा गया है, वे तक इसमें रूचि दिखा रहे हैं।

यहाँ गौरतलब यह है कि आरआईसी प्रक्रिया यहां पर केंद्र बिंदु में नहीं है, बल्कि इसका महत्व भारत-चीन में सीमा को लेकर चल रहे तनाव की तात्कालिक पृष्ठभूमि के अजीबोगरीब संयोग के चलते है। वैसे आरआईसी की प्रक्रिया समय के साथ-साथ भारतीय विदेश नीति के एक गतिशील मार्ग के तौर पर विकसित होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा कभी हो नहीं सका।

कई कारणों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, लेकिन मुख्य रूप से इसके पीछे की चार वजहें रही हैं:

• भारत एक अच्छा टीम प्लेयर नहीं रहा है और जब कभी यह द्विपक्षीय चैनलों के जरिये अपने हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है तो पहले से ही खुद के प्रति आत्म-विश्वास से भरा रहता है;

• भारत की हमेशा से कोशिश रही है कि उसके प्रति ऐसी कोई धारणा ने बने जिमसें वह दो बड़े ‘संशोधनवादी’ ताकतों- रूस और चीन के साथ वैश्विक शतरंज की बिसात में अमेरिका के बरक्श ‘गुटबाजी करता’ नजर आये;

• रूस-भारत-चीन त्रिकोण में भारत को चीन के साथ के अपने संकटग्रस्त रिश्ते की वजह से असहज बने रहने का अहसास बना रहता है, और सबसे महत्वपूर्ण,

• भारत इस तथ्य को लेकर बेहद सतर्क रहा है कि वाशिंगटन आरआईसी को एक शत्रुतापूर्ण ईकाई के तौर पर देखता है, जो एशिया और वैश्विक स्तर पर अमेरिकी रणनीतियों को कमजोर करने या नकारने तक के काम आ सकता है। पूर्णरूपेण सक्रिय आरआईसी का होना भारत के लिए एक बेहतर विकल्प नहीं हो सकता, इस बात को देखते हुए कि यह लाक्षणिक तौर पर खुद को चीन-विरोधी ‘गुट’ के रूप में परिलक्षित कराना पसंद करता है।

आज की वीडियोकांफ्रेंस एक आभासी सम्मेलन है और इसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके चीनी समकक्ष वांग यी के बीच कोई ‘खींच-तान’ नहीं होने जा रही है। यह कार्यक्रम सामान्य से कहीं अधिक औपचारिक होने जा रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस कार्यक्रम से किसी को यह उम्मीद नहीं पाल लेनी चाहिए कि इसके बाद से भारत-चीन संबंध मानो रोज गार्डन की और जाने वाले मार्ग के द्वार खुलने जा रहे हैं।

इसके विपरीत जो कुछ दांव पर है वह यह कि भारत-चीन संबंध में के दुबारा सेटिंग की प्रक्रिया काफी लंबी, पीड़ादायक द्विपक्षीय होने जा रही है। हाल-फिलहाल भारत में किसी भी सार्थक रणनीतिक बातचीत की परिस्तिथितियां बनती नजर नहीं आतीं। गिद्ध दृष्टि अभी भी आसमान पर टिकी हुई हैं और नजरें धरती माँ की ओर देखने से इंकार कर रही हैं।

बेफिजूल की बातें भारतीय आख्यानों पर हावी है और पूर्व रक्षा मंत्री सहित कई - ने बेतुकी धारणाएं व्यक्त की हैं कि हिमालय में भारतीय सैन्य क्षमता पीएलए से कहीं बेहतर है। यहां तक कि कुछ हलकों में विजयी भाव तक को देखा जा सकता है कि भारतीय सेना ने पीएलए के एक कमांडिंग ऑफिसर को गलवान घाटी में मार गिराया था।  इस बीच जो अति-राष्ट्रवादी हैं उन्होंने शी जिनपिंग की तस्वीरों को आग के हवाले कर दिया है। सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग में से कई लोग हैं जो चाहते हैं कि चीन के साथ किसी भी प्रकार के व्यापार और वाणिज्यिक रिश्ते का 'बहिष्कार' किया जाये।

इसके साथ ही कई आदिम फंतासियों जिसमें कल्पनालोक में कोरोनवायरस और आर्थिक उठापटक के चलते चीन पहले से काफी कमजोर हो चुका है और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी बमुश्किल से अपने लिए समर्थन का आधार जुटा पा रही है।सैमुअल बैकेट के नाटक वेटिंग फॉर गोदोत में निरुदेश्य इधर से उधर भटकते पात्र की ही तरह भारतीय भी इस इन्तजार में हैं कि कब अमेरिका चीन से 'छिटक' जाये, वहीं जापान सेनकाकू द्वीपों पर चीन के खिलाफ ‘दूसरा मोर्चा’ खोल दे और ऑस्ट्रेलिया अपने स्नाइपर राइफलों से चीन के खून का आखिरी कतरा तक बहा दे।

जाहिर सी बात है कि यह अजीबोगरीब व्यवस्था जयशंकर के गले में भीमकाय अल्बाट्रोस पक्षी की तरह लटकी हुई है। लेकिन इस सबके बावजूद जयशंकर जिस प्रकार के कट्टर यथार्थवादी हैं, उनसे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस आभासी बैठक की गंभीर बाधाओं के दायरे में होने के बावजूद वांग के साथ अपनी वार्ता को एक कदम और आगे बढ़ाने में कामयाब होंगे।आरआईसी बैठक का असल महत्व तो इसमें है कि यह होने जा रही है।

16 जून को पीएम मोदी के साथ हुई वन-ऑन-वन भेंट के बाद जयशंकर ने वांग से बातचीत करने लिए अनुरोध किया था (जिस पर अगले ने झटपट अपनी मंजूरी दे दी थी)। और 17 जून को वांग के साथ हुई बातचीत के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोनों शीर्षस्थ राजनयिक गलवान घाटी से बन चुके लोमड़ी के मांद से किसी तरह बाहर निकलने के रास्ते के तौर पर कुछ सांझी जमीन तलाश चुके थे। और इसी वजह से जयशंकर ने 23 जून को आरआईसी बैठक में भाग लेने के लिए अपनी सहमति दी होगी।

यह एक सकारात्मक संकेत था। स्पष्ट तौर कहें तो प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति के साथ जयशंकर ने बीजिंग के साथ राजनीतिक रास्ते को खोलने के प्रयास तेज कर दिए थे। इसलिए इसके बाद से जयशंकर और चीनी नेतृत्व के बीच की कोई भी बातचीत अपनेआप में एक सार्थक कदम के तौर पर देखी जानी चाहिए। आज की आरआईसी बैठक को महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानना चाहिए यदि निकट भविष्य में किसी प्रकार की द्विपक्षीय बैठक को सुनिश्चित कर लिया जाता है।

भारतीय विश्लेषक अपने अनुमानों में कहीं न कहीं गच्चा खा रहे हैं जब वे भारत-चीन संबंधों में रूस  के प्रयासों को उसकी पैठ बनाने के तौर पर चिन्हित करते हैं। लेकिन यह गलत अवधारण है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कोई फायर फाइटर नहीं हैं, हालांकि विश्व राजनेता के तौर पर उनके पास वह दुर्लभ प्रतिभा है जो समझदारी भरी बातें करता है और साथ ही संघर्ष की स्थिति में भी तार्किकता को तरजीह देता है।

दूसरी बात यह कि रुसी-चीनी सौहार्द्य की कीमियागिरी को समझने की जरूरत है: दोनों पक्षों के पास स्वतंत्र रूप से अपने प्रमुख हितों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त स्थान मौजूद है – और  मास्को इस तथ्य से भली-भांति अवगत होगा कि क्षेत्रीय संप्रभुता चीन के लिए एक मुख्य मुद्दा है। और तीसरा यह कि जरुरी नहीं कि रूस और चीन सभी मौजूदा विषयों पर एकमत ही हों।लेकिन इस सबके बावजूद आरआईसी प्रारूप में मास्को और बीजिंग के खजाने में ऐसा काफी कुछ है जो अंतरराष्ट्रीय तौर तरीकों को और अधिक लोकतान्त्रिक बनाने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सख्ती से पालन की अनिवार्यता को लेकर विश्व जनमत को तैयार करने और अंतर-राज्य स्तर पर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुपालन को एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में रखते हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो रूसी और चीनी दृष्टिकोण के लिहाज से आरआईसी, ब्रिक्स और एससीओ के पूरक के तौर पर है. जबकि आरआईसी में एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इसमें भारत के होने से उसके साथ का यही एकमात्र एक्सक्लूसिव मंच उपलब्ध है, और दोनों ही ताकतें भारत को बहुपक्षीय क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी और एशिया के एक उभरते सितारे के तौर पर देखती हैं, जिसका यूरेशियाई एकीकरण उनके हितों के अनुरूप है।

बेशक रूस और चीन अपने द्विपक्षीय संबंधों को समृद्ध और मजबूत बनाने के लिए बहुपक्षीय प्रारूपों से बेहतर तालमेल स्थापित करने, भिन्नताओं के सामंजस्य करने यदि कोई हों तो और क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर अपनी रणनीतिक समानता को गहरा करने के लिए जेन के अध्यवसाय में लगे हैं।भारत का रवैया ‘सबकुछ-या-कुछ भी नहीं’ वाला रहा है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। शायद आज आरआईसी की बैठक में भारत की भागीदारी से एक अच्छी बात ये निकलकर सामने आ सकती है कि दुनिया आज जिस ऐतिहासिक संक्रमण के दौर से गुजर रही है, ऐसे में उसे इस अनोखे प्रारूप के पीछे छिपे आकर्षण के प्रति बढती जागरूकता के संकेत नजर आ रहे हैं।

निःसंदेह इन तीनों आरआईसी देशों के समक्ष आगे की जो राह है उसमें कुछ साझा कार्यक्रमों को लिए जाने की आवश्यकता है जिनमें ये तीनों अपने साझा भविष्य के प्रति एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार के रूप उभरकर सामने आ सकें।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

India Awakens to Hidden Charms of RIC

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