NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कला
संगीत
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
इतवार की कविता : माँओं के नाम कविताएं
मदर्स डे के मौक़े पर हम पेश कर रहे हैं माँओं के नाम और माँओं की जानिब से लिखी कविताएं।
न्यूज़क्लिक डेस्क
08 May 2022
kavita

माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी,

उनसे कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे

- उमैर नजमी

मदर्स डे के मौक़े पर हम पेश कर रहे हैं माँओं के नाम और माँओं की जानिब से लिखी कविताएं।

डाकू : ज़ेहरा निगाह

 

कल रात मिरा बेटा मिरे घर

चेहरे पे मुंढे ख़ाकी कपड़ा

बंदूक़ उठाए आ पहुँचा

नौ-उम्री की सुर्ख़ी से रची उस की आँखें

मैं जान गई

और बचपन के संदल से मंढा उस का चेहरा

पहचान गई

वो आया था ख़ुद अपने घर

घर की चीज़ें ले जाने को

अन-कही कही मनवाने को

बातों में दूध की ख़ुशबू थी

जो कुछ भी सैंत के रक्खा था

मैं सारी चीज़ें ले आई

इक लाल-ए-बदख़्शाँ की चिड़िया

सोने का हाथ छोटा सा

चाँदी की इक नन्ही तख़्ती

रेशम की फूल भरी टोपी

अतलस का नाम लिखा जुज़दान

जुज़दान में लिपटा इक क़ुरआँ

पर वो कैसा दीवाना था

कुछ छोड़ गया कुछ तोड़ गया

और ले भी गया है वो तो क्या

लोहे की बद-सूरत गाड़ी

पेट्रोल की बू भी आएगी

जिस के पहिए भी रबर के हैं

जो बात नहीं कर पाएगी

बच्चा फिर आख़िर बच्चा है

 

माँ : हबीब जालिब

 

बच्चों पे चली गोली

माँ देख के ये बोली

ये दिल के मिरे टुकड़े

यूँ रोए मिरे होते

मैं दूर खड़ी देखूँ

ये मुझ से नहीं होगा

मैं दूर खड़ी देखूँ

 

और अहल-ए-सितम खेलें

ख़ूँ से मिरे बच्चों के

दिन रात यहाँ होली

बच्चों पे चली गोली

माँ देख के ये बोली

ये दिल के मिरे टुकड़े

यूँ रोएँ मिरे होते

मैं दूर खड़ी देखूँ

ये मुझ से नहीं होगा

 

मैदाँ में निकल आई

इक बर्क़ सी लहराई

हर दस्त-ए-सितम काँपा

बंदूक़ भी थर्राई

हर सम्त सदा गूँजी

मैं आती हूँ मैं आई

मैं आती हूँ मैं आई

 

हर ज़ुल्म हुआ बातिल

और सहम गए क़ातिल

जब उस ने ज़बाँ खोली

बच्चों पे चली गोली

 

उस ने कहा ख़ूँ-ख्वारो!

दौलत के परस्तारो

धरती है ये हम सब की

इस धरती को ना-दानो!

 

अंग्रेज़ के दरबानो

साहिब की अता-कर्दा

जागीर न तुम जानो

इस ज़ुल्म से बाज़ आओ

बैरक में चले जाओ

क्यूँ चंद लुटेरों की

फिरते हो लिए टोली

बच्चों पे चली गोल

 

माँ की डिग्रियां : अशोक कुमार पांडे

 

 

सबसे उपेक्षित कोने में

बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक

जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ

मथढक्की की साड़ी के नीचे

पैंतीस सालों से दबा पड़ा है

माँ की डिग्रियों का एक पुलिन्दा

 

बचपन में अक्सर देखा है माँ को

दोपहर के दुर्लभ एकांत में

बतियाते बक्से से

किसी पुरानी सखी की तरह

मरे हुए चूहे-सी एक ओर कर देतीं

वह चटख पीली लेकिन उदास साड़ी

और फिर हमारे ज्वरग्रस्त माथों-सा

देर तक सहलाती रहतीं वह पुलिंदा

 

कभी क्रोध, कभी खीझ

और कभी हताश रुदन के बीच

टुकड़े-टुकड़े सुनी बातों को जोड़कर

धीरे-धीरे बुनी मैंने साड़ी की कहानी

कि कैसे ठीक उस रस्म के पहले

घण्टों चीख़ते रहे थे बाबा

और नाना बस खड़े रह गए थे हाथ जोड़कर

माँ ने पहली बार देखे थे उन आँखों में आँसू

और फिर रोती रही थीं बरसों

अक्सर कहतीं यही पहनाकर भेजना चिता पर

और पिता बस मुस्कुराकर रह जाते...

 

डिग्रियों के बारे में तो चुप ही रहीं माँ

बस एक उकताई-सी मुस्कुराहट पसर जाती आँखों में

जब पिता किसी नए मेहमान के सामने दुहराते

’उस ज़माने की एम० ए० हैं साहब

चाहतीं तो कालेज में होतीं किसी

हमने तो रोका नहीं कभी

पर घर और बच्चे रहे इनकी पहली प्राथमिकता

इन्हीं के बदौलत तो है यह सब कुछ’

बहुत बाद में बताया नानी ने

कि सिर्फ कई रातों की नींद नहीं थी उनकी क़ीमत

अनेक छोटी-बडी लड़ाईयाँ दफ़्न थीं उन पुराने काग़ज़ों में...

 

आठवीं के बाद नहीं था आसपास कोई स्कूल

और पूरा गाँव एकजुट था शहर भेजे जाने के ख़िलाफ़

उनके दादा ने तो त्याग ही दिया था अन्न-जल

पर निरक्षर नानी अड़ गई थीं चट्टान-सी

और झुकना पड़ा था नाना को पहली बार

अन्न-जल तो ख़ैर कितने दिन त्यागते

पर गाँव की उस पहली ग्रेजुएट का

फिर मुँह तक नहीं देखा दादा ने

 

डिग्रियों से याद आया

ननिहाल की बैठक में टँगा

वह धूल-धूसरित चित्र

जिसमें काली टोपी लगाए

लम्बे से चोगे में

बेटन-सी थामे हुए डिग्री

माँ जैसी शक्लोसूरत वाली एक लड़की मुस्कुराती रहती है

माँ के चेहरे पर तो कभी नहीं देखी वह अलमस्त मुस्कान

कॉलेज के चहचहाते लेक्चर थियेटर में

तमाम हम-उम्रों के बीच कैसी लगती होगी वह लड़की ?

 

क्या सोचती होगी रात के तीसरे पहर में

इतिहास के पन्ने पलटते हुए?

क्या उसके आने के भी ठीक पहले तक

कालेज की चहारदीवारी पर बैठा कोई करता होगा इंतजार?

(जैसे मैं करता था तुम्हारा)

क्या उसकी क़िताबों में भी कोई रख जाता होगा कोई

सपनों का महकता गुलाब?

परिणामों के ठीक पहले वाली रात क्या

हमारी ही तरह धड़कता होगा उसका दिल?

और अगली रात पंख लगाए डिग्रियों के उड़ता होगा उन्मुक्त...

 

जबकि तमाम दूसरी लड़कियों की तरह एहसास होगा ही उसे

अपनी उम्र के साथ गहराती जा रही पिता की चिन्ताओं का

तो क्या परीक्षा के बाद क़िताबों के साथ

ख़ुद ही समेटने लगी होगी स्वप्न?

या सचमुच इतनी सम्मोहक होती है

मंगलसूत्र की चमक और सोहर की खनक कि

आँखों में जगह ही न बचे किसी अन्य दृश्य के लिए?

पूछ तो नहीं सका कभी

पर प्रेम के एक भरपूर दशक के बाद

कह सकता हूँ पूरे विश्वास से

कि उस चटख़ पीली लेकिन उदास साडी के नीचे

दब जाने के लिए नहीं थीं

उस लड़की की डिग्रियाँ !!!

mothers day
itwaar ki kavita
Najeeb mother
jnu student najeeb
poetry on mothers day
zehra nigah
habib jalib
kashmir ashok kumar pandey kashmrinama

Related Stories

इतवार की कविता : एरिन हेंसन की कविता 'नॉट' का तर्जुमा

इतवार की कविता : 'कल शब मौसम की पहली बारिश थी...'

इतवार की कविता : आग़ा हश्र कश्मीरी की दो ग़ज़लें

इतवार की कविता : पहले कितने ख़त आते थे...

इतवार की कविता : "मैंने रिहर्सल की है ख़ुद को दुनियादार बनाने की..."


बाकी खबरें

  • Kamala Nehru Hospital,
    न्यूज़क्लिक टीम
    कमला नेहरू अस्पताल, भोपाल: हादसे की रात क्या हुआ?
    11 Nov 2021
    भोपाल के सरकारी हमीदिया अस्पताल परिसर के कमला नेहरू अस्पताल में सोमवार को भीषण आग लगने के बाद से अब तक करीब 12 बच्चों की मौत हो गयी हैI
  • covid
    काशिफ़ काकवी
    मप्र : 90,000 से अधिक आशाकर्मियों को नहीं मिला वेतन
    11 Nov 2021
    स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम द्वारा टीकाकरण के लिए आउटसोर्स किये गए सैकड़ों एएनएम कर्मियों और पैरामेडिकल टीकाप्रदाताओं को प्रतिदिन के हिसाब से 500 रूपये का भुगतान किया जाना था। लेकिन वास्तविकता यह है कि…
  • sun
    डेनियल रॉस
    क्या इंसानों को सूर्य से आने वाले प्रकाश की मात्रा में बदलाव करना चाहिए?
    11 Nov 2021
    सूर्य विकरण को तकनीक के ज़रिए प्रबंधित करना संभव है। लेकिन यहां नैतिक और राजनीतिक चिंताएं हैं।
  • Mafia makes poison by mixing pesticides in alcohol
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    शराब में कीटनाशक मिलाकर ज़हरीला बनाते हैं माफ़िया!
    11 Nov 2021
    मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के सकरा इलाके में हुई छापेमारी के दौरान मौके से अधिकारियों को कीटनाशक मिला है जिससे लगता है कि शराब बनाने में इन कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता था।
  • Drugs worth Rs 313 crore seized from three people in Gujarat
    भाषा
    गुजरात में तीन लोगों के पास से 313 करोड़ रुपये मूल्य की मादक पदार्थ जब्त
    11 Nov 2021
    एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि इससे पहले पुलिस ने मंगलवार को महाराष्ट्र के ठाणे के रहनेवाले सज्जाद घोसी नाम के व्यक्ति को एक गुप्त सूचना के आधार पर खम्भलिया कस्बे के एक अतिथिगृह से गिरफ्तार किया…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License