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कर्नाटक : देवदासियों ने सामाजिक सुरक्षा और आजीविका की मांगों को लेकर दिया धरना
कलबुर्गी, विजयपुरा, विजयनगर, रायचूर, दवेंगेरे, बागलकोट, बल्लारी, यादगीर और कोप्पल ज़िलों की लगभग 1500 देवदासियों ने पुनर्वास की मांग को लेकर बेंगलुरु शहर में धरना दिया।
सौरव कुमार
17 Mar 2022
Translated by महेश कुमार
Karnataka
फ्रीडम पार्क में प्रदर्शन करती देवदासियां 

14 मार्च को, देवदासी महिलाएं राज्य सरकार द्वारा उनके साथ बरते जा रहे भेदभाव और वित्तीय बहिष्कार का विरोध करने के लिए बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में जमा हुई। कर्नाटक विधानसभा में चल रहे बजट सत्र के दौरान, कर्नाटक राज्य देवदासी महिला विमोचन संघ (केआरडीएमएस) ने कर्नाटक राज्य देवदासी महिला और बाल संघर्ष समिति के साथ मिलकर राज्य के 10 जिलों में देवदासियों के मुद्दे पर दो दिवसीय विरोध प्रदर्शन किया। विरोध प्रदर्शन रात करीब 10 बजे तब समाप्त हुआ, जब राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री हलप्पा बसप्पा ने प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की।

कलबुर्गी, विजयपुरा, विजयनगर, रायचूर, दवेनगेरे, बागलकोट, बल्लारी, यादगीर और कोप्पल जिलों की लगभग 1500 देवदासी पुनर्वास की मांग को लेकर बेंगलुरु शहर के बीचों-बीच जमा हुई थीं।  केआरडीएमएस के मानद अध्यक्ष और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव यू. बसावराजू ने न्यूज़क्लिक को बताया कि वे लंबे समय से केंद्र और राज्य सरकार दोनों से कर्नाटक में देवदासियों के पुनर्वास की अपील कर रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों पर आज तक जूं नहीं रेंगी है। बसवराजू ने कहा, हालांकि उनके अथक संघर्ष के चलते समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक पीड़ितों के लिए राज्य सरकार को 2006 के मध्य से उपाय करने पर मजबूर होना पड़ा है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है।

कर्नाटक राज्य देवदासी महिलारा विमोचन संघ, जो 2006 से राज्य में देवदासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष का नेतृत्व कर रहा है, ने देवदासियों के अस्तित्व के संकट को लेकर सड़कों पर लड़ाई शुरू की थी। 2008 में, देवदासियों के लिए राज्य सरकार ने सहायता प्राप्त पेंशन 200 रुपये की पहली बार शुरू की थी, जो आज बढ़कर 1500 रुपये हो गई है।

  • सरकार को दिए गए ज्ञापन में निम्न मांगे शामिल हैं-
  • मासिक पेंशन को 1500 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करना
  • जिन देवदासियों को सहायता नहीं मिल पा रही है उन्हे जनगणना की नवीकृत सूची में शामिल करना
  • वित्तीय सहायता के साथ देवदासी महिलाओं और उनके बच्चों का तत्काल पुनर्वास करना।
  •  देवदासियों के बच्चों के लिए शिक्षा की सुविधा करना 
  • बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के मद्देनजर सभी को ऋण राहत देना 
  • कृषि गतिविधियों में संलग्न होने और आजीविका कमाने के लिए 5 एकड़ भूमि देना 
  • कृषि विभाग द्वारा देवदासियों को कृषि गतिविधियों में हर प्रकार की सहायता देना 
  • 300 वर्ग फुट का एक घर देना।
  • देवदासियों के बच्चों को मुफ्त उच्च शिक्षा देना 
  • बेरोजगारी भत्ता देना। 
  • आंगनबाडी केन्द्रों के काम में देवदासियों को शामिल करना
  • लाभार्थियों के चयन में भेदभाव और कदाचार को रोकना 

देवनगेरे और कलबुर्गिक से आई देवदासियाँ 

एक देवदासी जिनका नाम अंजनाम्मा (40) है, को अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए कलबुर्गी के एक गांव से बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क तक आने के लिए 650 किमी की दूरी तय करनी पड़ी और वे बैग में पैक एक चादर और भोजन साथ आई थीं। अनुसूचित जाति से संबंधित, अंजनाम्मा एक दशक से अधिक समय तक देवदासी रही हैं, जिसका बाद में उन्होंने विरोध किया और वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए देश में बने एकमात्र राज्य-स्तरीय संगठन केआरडीएमएस की सदस्य हैं जिन्होने उन्हे इस कुप्रथा से बचाया था। 

कर्नाटक में, पुरानी देवदासियों को 'जोगती' कहा जाता है, और युवा देवदासियों को 'बसवी' कहा जाता है। देवदासी शब्द का अनुवाद "भगवान के सेवक" के रूप में किया जाता है, और एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथा के रूप में, इसका एक लंबा इतिहास है।

डॉ एल श्रीनिवास और प्रसन्नकुमार शिवशरणप्पा द्वारा "कर्नाटक में देवदासी प्रथा" पर 2012 के एक शोध पत्र में लिखा है कि देवदासी एक धार्मिक प्रथा है जिसमें हिंदू मंदिरों में देवताओं को लड़कियों को मन्नत के रूप में भेंट किया जाना शामिल है। आमतौर पर लड़की के यौवन तक पहुंचने से पहले समर्पण किया जाता है और लड़की को समुदाय के सदस्यों के लिए यौन सुख देने के लिए उपलब्ध होना पड़ता है। परंपरागत रूप से, यह माना जाता है कि ये लड़कियां देवी द्वारा "नियुक्त" समाज की "सेवा" कर रही हैं। दूसरे शब्दों में, "देवदासी भगवान के दरबार में वेश्या हैं।" उसकी पवित्रता और देवत्व से संबंधित होने के कारण, किसी भी देवदासी का विवाह एक विशेष व्यक्ति से नहीं किया जा सकता है। विवाह के पारंपरिक विचार में, महिलाएं पतियों को उपहार में दी गई हस्तांतरणीय संपत्ति हैं। इसके बजाय, वह एक देवत्व की संपत्ति है जो उसे पूरे समुदाय के लिए उदारतापूर्वक स्वीकार करती है। इस अवधारणा को एक कहावत द्वारा अच्छी तरह से सारांशित किया गया है: "एक देवदासी भगवान की दासी होती है लेकिन पूरे शहर की पत्नी होती है"।

टीवी रेणुकम्मा (59) ने न्यूज़क्लिक के साथ एक विशेष बातचीत में कहा कि निम्न सामाजिक तबके से संबंधित हजारों देवदासी एक दर्दनाक जीवन जी रहीं और वे सरकार से अपने लंबित पड़ी मांगों को पूरा करने की मांग को लेकर विरोध कर रही हैं।

टीवी रेणुकम्मा, अध्यक्ष, कर्नाटक राज्य देवदासी महिलाया विमोचन संघ

कर्नाटक देवदासी (समर्पण निषेध) अधिनियम, 1982, जो 1984 में लागू हुआ था, प्रत्येक देवदासी को विवाह करने का अधिकार देता है। फिर भी, अंधविश्वास और सामाजिक-सांस्कृतिक दबाव उन्हें शादी करने की अनुमति नहीं देते क्योंकि समाज का मानना है कि इस किस्म की त्रासदी गांव और परिवार पर आफत ले आएगी। देवदासी से शादी के लिए राजी न होना सबसे बड़ी त्रासदी है। रेणुकम्मा की यात्रा की शुरुआत 18 साल की कम उम्र में देवदासी प्रथा के कष्टप्रद वर्षों से हुई थी। बाद में उन्होंने इसका हिस्सा बनने से इनकार करके गैरकानूनी अमानवीय प्रथा का विरोध किया था। वह यह भी मानती हैं कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को छोड़कर किसी भी राजनीतिक दल ने इस प्रतिगामी व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी है जो प्रथा अनिवार्य रूप से महिलाओं को जीवन भर यौन दासता के लिए मजबूर करती है। वह पार्टी की राज्य समिति की सदस्य हैं।

ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन (एआईडीडब्ल्यूए) की राज्य नेता विमला ने सांसदों का वेतन बढ़ाने के लिए विधेयक पारित करने और देवदासियों की मुक्ति पर धन आवंटन और खर्च को प्राथमिकता नहीं देने के लिए सरकार के नजरिए पर अफसोस जताया है।

यू. बसावराजू ने बताया कि राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री ने चालू बजट सत्र के अंत तक उनकी मांगों को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री से परामर्श करने का आश्वासन दिया है। अगर देवदासियों के लिए चीजें वांछित दिशा में नहीं चलती हैं, तो यूनियन 25-29 मार्च से तालुक स्तर पर विरोध फिर से शुरू करेगा।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे गए लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Karnataka: Devadasis Echo Demands for Social Security and Livelihood

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Bangalore Park
Karnataka Devadasi Act

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