NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
कर्नाटक : कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों से प्लास्टिक उत्पादक इकाईयों को करना पड़ रहा है दिक़्क़तों का सामना
गलाकाट प्रतियोगिता और कच्चे माल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी ने लघु औद्योगिक इकाईयों को बहुत ज़्यादा दबाव में डाल दिया है।
निखिल करिअप्पा
02 May 2022
plastic thumb

बैंगलोर: 59 साल के महेश चिक्का बसवैया काव्याश्री प्लास्टिक के प्रबंध निदेशक हैं। उनकी बैंगलोर के पीनया औद्योगिक क्षेत्र में तीन निर्माण इकाईयां मौजूद हैं। महंतेश अपने ग्राहकों के लिए प्लास्टिक पैकेज का निर्माण करते हैं। इसमें मेडिकल स्कूलों और सरकारी अस्पतालों से निकलने वाले बॉयोमेडिकल कचरे को इकट्ठा करने में इस्तेमाल होने वाली पैकेट, कर्नाटक दुग्ध संघ के लिए दूध के पैकेट और सरकार की मध्यान्ह भोजन योजनाओं के पैकेट शामिल हैं। लेकिन उन्हें कई ऑर्डर नुकसान पर पूरे करने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी ठेके ई-उपार्जन प्रक्रिया के ज़रिए पंजीकृत हो रहे हैं और इनकी दरें इसमें तय हो चुकी हैं, जिनमें बदलाव नहीं हो सकता।  इस बीच कच्चे माल की कीमतों में हुए इज़ाफे ने भी उनके मुनाफ़े को कम कर दिया है। वह कहते हैं वित्त वर्ष 2020 और 2021 उनके व्यापार के लिए बहुत बुरे रहे। बड़ी मुश्किल से वे अपनी लागत को वापस पा सके। लेकिन वित्त वर्ष 2022 तो और भी ज़्यादा बदतर रहा, जिसके चलते उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।

उनके धंधे में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में पोलिप्रोपायलीन (पीपी), कम घनत्व वाला पोलिएथलीन (एलडीपी) और उच्च घनत्व वाला पोलिएथलीन (एचडीपी) शामिल है। उनके आपूर्तिकर्ता रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (आरआईएल), भारतीय गैस प्राधिकरण (जीएआईएल), मैंगलोर रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (एमआरपीएल), आईओसी और ओएनजीसी शामिल हैं।

पिछले साल एक किलोग्राम पोलिप्रोपायलीन की कीमत 80 से 100 रुपये थी। अब इसकी कीमत 130 से 136 रुपये (जीएसटी को हटाए बिना) है। कच्चे माल की कीमत में हुए इजाफे के लिए यूक्रेन के युद्ध को वज़ह बताया जा रहा है। चूंकि यह एक वैश्विक बाज़ार है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में पूरी दुनिया में बढ़ोत्तरी हुई है।

महंतेश कहते हैं, "हमारे पास 50 कामग़ार हैं। उन्हें भुगतान करने की जरूरत होती है। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हमें अपनी मशीनरी को चलाना और इसके चलते नुकसान उठाना जारी रखना पड़ता है। इस क्षेत्र में बहुत प्रतिस्पर्धा है और कोई मुनाफ़ा नहीं है। अगर मैं ठेके की दर पर सामग्री की आपूर्ति नहीं करवा पाया, तो मेरा भुगतान जब्त कर लिया जाएगा, मैंने जो सुरक्षा निधि जमा की है, वह हाथ से निकल जाएगी और मुझे भविष्य के ठेकों से ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।"

2019 में प्लास्टिक के थैले पर लगाए गए प्रतिबंध से भी इस व्यापार को घाटा लगा है। 2019 में कर्नाटक सरकार ने एक बार ही उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक के थैलों पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि पर्यावरण प्रदूषण कम हो सके। जिन चीजों पर प्रतिबंध लगाया गया, उनमें प्लास्टिक कप, चम्मच, प्लेट, फ्लेक्स, क्लिंग फिल्म, थर्माकोल से बने सामान और बिना बुने हुए पोलिप्रोपायलीन के थैले शामिल थे। महंतेश कहते हैं, "केंद्र सरकार ने 75 माइक्रॉन के प्लास्टिक थैले बनाने की अनुमति दी है। केवल कुछ ही राज्यों ने इन थैलों पर प्रतिबंध लगाया है। नतीजतन इन चीजों की राज्य में बड़े स्तर पर तस्करी होती है। आज हर बेकरी और सुपरमार्केट में आसानी से प्लास्टिक के थैले उपलब्ध हैं और सरकार ने अपनी आंखें बंद कर रखी हैं।"

कच्चे माल की कीमतों ने बैंगलोर स्थित शिवा पोलिकैप्स के प्रबंध निदेशक अश्वथ नारायण राव को भी प्रभावित किया है। पीनया में उनके धंधे में चार कर्मचारी काम करते हैं, वे ऑटोमोबाइल के स्पेयर पार्ट और रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों के लिए प्रिंटिंग और पैकेजिंग उपलब्ध करवाते हैं। उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड से 100 टन एलडीपी और पीपी खरीदी थी, ताकि वे प्लास्टिक पैकेजिंग तैयार कर सकें। छपाई के लिए उन्हें ब्यूटेनॉल और प्रिंटिंग इंक की जरूरत होती है। वे इन्हें स्थानीय बाज़ार से खरीदते हैं।

एक किलोग्राम एलडीपी पिछले साल 90 से 100 रुपये की आती थी, लेकिन अब इसकी कीमत 135 रुपये है।

वह नाराज़ होते हुए कहते हैं, "अगर हम अपने उत्पादों की कीमत 5 रुपये भी बढ़ा देते हैं, तो हमारे ग्राहक छटक जाएंगे। वे दूसरी जगह सस्ते विकल्प खोजेंगे। कोविड के बाद से ही खपत में भी गिरावट आई है।"

इस बीचत कच्चे माल की कीमतों का बढ़ना जारी है। एक किलोग्राम छपाई की स्याही पहले 2021 में 170 रुपये की आती थी, लेकिन अब इसकी कीमत 245 रुपये प्रति किलोग्राम है। इसी तरह एक किलोग्राम ब्यूटोनॉल की कीमत पहले 110 रुपये प्रति किलोग्राम होती थी, जो अब 160 रुपये प्रति किलोग्राम है। 

कच्चे माल में इस इजाफे ने उनके राजस्व और मुनाफ़े दोनों को ही प्रभावित किया है। वह कहते हैं कि वह बड़ी मुश्किल से पिछले दो सालों से अपनी लागत ही निकाल पा रहे हैं। वित्त वर्ष 2021 के लिए उनका राजस्व 1.3 करोड़ रुपये था, जो अगले साल घटकर 1 करोड़ रुपये रह गया। उनका मुनाफ़ा 2023 में और भी कम होने की संभावना है, क्योंकि कच्चे माल की कीमतों में और भी ज़्यादा तेजी आती जा रही है।

बढ़ती प्रतिस्पर्धा

महंतेश ने बताया कि पीन्या में करीब़ 100 से 150 एमएसएमई यूनिट प्लास्टिक उत्पाद बनाने का काम कर रही हैँ. वे कहते हैं, "बाज़ार के बड़े खिलाड़ी प्रतियोगिता कम करने की कोशिश करते हैं और हमें बाज़ार से कीमतों का सहारा लेकर बाहर करने की कोशिश करते हैं। यह लोग बड़ी मात्रा में कच्चा माल खरीदते हैं और उस हिसाब से अपने उत्पादों की कीमत तय कर सकते हैं। हम आरआईएल जैसे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर हैं, क्योंकि हम एक वक़्त पर कम मात्रा में ही माल ले सकते हैं।

बड़े खिलाड़ियों को है लाभ

बैंगलोर में प्लास्टोबैग के प्रबंध निदेशक मोहम्मद अशफाक कहते हैं, "आयातक अगर सऊदी अरब या कतर से बड़ी मात्रा में माल आयात करते हैं, तो वे कच्चे माल पर 7-8 फ़ीसदी तक का पैसा बचा सकते हैं। इससे उन्हें लघु और कुटीर उद्योगों के ऊपर बढ़त हासिल हो जाती है।"

यह चीज भी नीति निर्माताओं के लिए चुनौती है, जो सभी के लिए एक जैसी प्रतिस्पर्धा की ज़मीन तैयार करना चाहते हैं। अगर वे कच्चे माल पर ज़्यादा आयात शुल्क लगाते हैं, तो इससे स्थानीय बाज़ार में कीमतें बढ़ सकती हैं। अशफाक कहते हैं, "बाज़ार बढ़ रहा है, इसलिए कच्चे माल की जरूरत भी बढ़ रही है। अगर आप निर्माता को आयात करने की छूट नहीं दोगे, तो हम अपने उत्पादों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के बारे में नहीं सोच सकते। और मांग व आपूर्ति का नियम कहता है कि अगर कच्चे माल की कमी है, तो उत्पाद की कीमतें बढ़ेंगी। अगर आप आयात रोक देते हो, तो घरेलू आपूर्तिकर्ताओं को अकेले ही पहले जितनी जरूरत का कच्चा माल उपलब्ध करवाना होगा। अगर उनके पास जरूरी मात्रा में कच्चा माल नहीं होगा, तो जमाखोरी शुरु हो जाएगी।"

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Karnataka: Plastic Processing Units Take a Hit From Soaring Raw Material Costs

plastic
MSME
Raw Material Prices
Economy
Peenya Industrial Area
RIL
GAIL
ONGC
IOC
MRPL
Consumption

Related Stories

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

अर्जेंटीना कांग्रेस में अमेरिकन एक्सप्रेस की बेशुमार ख़रीदारी

COP26: नीतियों या उपभोक्ता व्यवहारों से मेल नहीं खाता जलवायु संकल्प 

क्या इंसानों को सूर्य से आने वाले प्रकाश की मात्रा में बदलाव करना चाहिए?

सीओपी26: क्या धरती को बचाने की मानवता की यह ‘अंतिम और सर्वश्रेष्ठ कोशिश’ सफल हो सकेगी?

प्रतिबंधित होने के बावजूद एक्सॉनमोबिल का जलवायु विज्ञान को ख़ारिज करने वालों को फंड देना जारी


बाकी खबरें

  • bhasha
    न्यूज़क्लिक टीम
    पांच राज्यों में मोदी की नीतियों पर गुस्सा परिणाम में दिखेगाः मनोज कुमार झा
    07 Dec 2021
    वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा से संसद के भीतर विपक्ष पर हो रहे हमले से लेकर पांच विधानसभा चुनावों के राजनीतिक समीकरण पर बातचीत की। मनोज कुमार झा ने…
  • chunav
    अजय कुमार
    बिहार के दो पंचायत क्षेत्रों के चुनावी दांवपेच और भावुकता की कहानी
    07 Dec 2021
    संसद और विधायकी के चुनावी माहौल पर बहुत ज्यादा बहस होती है लेकिन पंचायती चुनाव के माहौल पर बहुत कम। तो चलिए बिहार के दो पंचायत क्षेत्रों के चुनावी माहौल को भांपने की कोशिश करते हैं।
  • Medical staff
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः ओमिक्रॉन के बढ़ते मामलों के बीच सभी छुट्टियां रद्द होने के चलते नाराज़ मेडिकल स्टाफ़
    07 Dec 2021
    बिहार में कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का ख़तरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। विदेश से लौटे कुछ लोग कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं। इसको लेकर राज्य में चिंता बढ़ गई है।
  • MGNREGA
    प्रभात पटनायक
    क्यों घोंटा जा रहा है मनरेगा का गला! 
    07 Dec 2021
    यूपीए-2 के दौरान ही मनरेगा से पीछे खिसकने की शुरूआत हो चुकी थी। कई साल तक इसके लिए बजट आवंटन 60,000 करोड़ रुपए के करीब ही बनाए रखा गया।
  • up
    न्यूज़क्लिक टीम
    शिक्षक उम्मीदवारों ने योगी सरकार को दी 2022 के लिए चुनौती
    07 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक ने इस ग्राउंड रिपोर्ट में लखनऊ में जून 2021 से चल शिक्षक उमीदवारों के विरोध प्रदर्शन में शामिल उमीदवारों से बात की| दरअसल, 2019 उत्तर प्रदेश शिक्षक प्रवेश परीक्षा में 69,000 सहायक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License