NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
क्या कंपनियां सरकारी छूट का फ़ायदा आम उपभोक्ता को भी देंगी?
बूस्टर डोज़ की असलियत : सैद्धांतिक रूप से कम कॉरपोरेट टैक्स के कारण औसत भारतीय उपभोक्ता को फ़ायदा मिलना चाहिए! सरकार को उम्मीद होगी कि कंपनियां अपने वस्तुओं और सेवाओं को सस्ती कर अपने बचत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं के साथ साझा करेंगी। लेकिन ऐसा होना अभी मुश्किल नज़र आ रहा है।
गिरीश मालवीय
21 Sep 2019
Economy
प्रतीकात्मक तस्वीर : sarassalil

'कारपोरेट टैक्स में कटौती से झूमा बाजार', 'दस साल की सबसे बड़ी बढ़त' जैसी सुर्खियों के बीच एक छोटी सी बात दबकर रह गयी कि, सरकार की इस घोषणा से सरकार को सालाना 1.45 लाख करोड़ का राजस्व घाटा होगा।

यह कमाल की बात है कि दो दिन पहले यही सरकार ऑटो इंडस्ट्री को जीएसटी के अंतर्गत लगने वाले 28 प्रतिशत टैक्स को घटा कर 18 प्रतिशत करने पर इसलिए तैयार नही हो रही थी क्योंकि कर संग्रह की वर्तमान स्थिति में  यह टैक्स घटाने से करीब 45 हजार करोड़ के राजस्व की क्षति का अनुमान लगाया गया था...

इस घोषणा से ठीक एक दिन पहले की खबर है कि सरकार प्रत्यक्ष करों से राजस्व बढ़ाने के लिए नए सिरे से रणनीति बना रही है क्योंकि अभी तक प्रत्यक्ष कर संग्रह सरकार द्वारा तय लक्ष्य से काफी पीछे है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के सदस्य अखिलेश रंजन ने एसोचैम के एक कार्यक्रम के इतर कहा कि प्रत्यक्ष कर संग्रह में वृद्धि उम्मीद से कम है। सीबीडीटी इस बारे में अपनी रणनीति पर नए सिरे से काम करेगा। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में 13.35 लाख करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य रखा है।

आश्चर्य की बात है कि इस बात के ठीक अगले दिन निर्मला सीतारमण कॉरपोरेट टेक्स में छूट देकर इतना बड़ा घाटा सहन करने को तैयार हो जाती है जबकि सरकार अच्छी तरह से जानती है कि 2019-2020 के पहले साढ़े पांच महीने में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह (नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन) में भारी कमी देखने को मिली है। आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से 17 सितंबर की अवधि में सरकार का प्रत्यक्ष कर संग्रह 4.7 प्रतिशत बढ़कर 5.50 लाख करोड़ रुपये रहा है जो इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 5.25 लाख करोड़ रुपये रहा था।

जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिये सरकार ने कर संग्रह में 17.5 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य तय कर रखा है।
कम टैक्स कलेक्शन के कारण देश का राजकोषीय घाटा बढ़ गया है। जून माह की तिमाही में चालू वित्त वर्ष का राजकोषीय घाटा 5.47 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो सरकार के साल 2019-20 के अनुमानित बजट का करीब 77 प्रतिशत है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीने में ही पूरे कारोबारी साल के अनुमानित वित्तीय घाटे की 77 फीसदी सीमा पार कर ली है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में वित्तीय घाटा 3.3 फीसदी रहने का अनुमान रखा है जो हर हाल में बढ़ता हुआ नजर आ रहा है।

डायरेक्ट टैक्स में कमी आने के साथ ही सरकार की मुश्किलें और बढ़ गई है। सरकार ने बजट अनुमान में 13.35 लाख करोड़ रुपये अर्जित करने का अनुमानित लक्ष्य रखा है। अनुमानित रकम को हासिल करने के लिए बाकी बचे समय में सरकार को मौजूदा राशि से दुगना राशि राजस्व के रूप में अर्जित करनी होगी। आर्थिक मंदी के दौर में यह पहले ही बेहद मुश्किल काम लग रहा था लेकिन अब तो असम्भव ही है।
कर संग्रह में आने वाली कमी को लेकर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति (ईएसी-पीएम)  के सदस्य रथिन  रॉय कुछ महीने पहले ही सरकार से अनुरोध कर चुके हैं  कि मध्यावधि राजकोषीय खाके को लेकर एक श्वेत पत्र जारी किया जाए। उनका मानना है कि 2019-20 के लिए बजट में निर्धारित कर संग्रह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

इंडस्ट्री के लिए यह मुहमांगी मुराद पूरी होने जैसा है। एसोचैम जैसी बड़ी संस्था पिछले पांच सालों से हर साल बजट के पहले यह माँग दोहराती आई है कि कॉरपोरेट टैक्स में 5% की कटौती की जाए। बजट के पेश होने के बाद 600 से ज्यादा कंपनियों के शेयर मूल्य इस साल 52 सप्ताह के निचले स्तर पर चले गए थे।  ऐसे ही 125 शेयरों के मूल्य इस साल अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जिनमें से 90 से ज्यादा के शेयर मूल्यों में गिरावट बजट के बाद हुई है।

सबसे ज्यादा दिक्कत तो FPI को लेकर पैदा हुई है। जून महीने के बाद से निवेशकों ने 4.5 अरब डॉलर भारतीय बाज़ार से निकाल लिए हैं। 1999 के बाद पहली बार किसी एक तिमाही में इतना पैसा बाहर गया है।
इसलिए मजबूर होकर सरकार को यह घोषणा करनी ही पड़ी है, लेकिन देखने लायक बात यह है कि क्या कंपनियां अपना यह फायदा उपभोक्ता को ट्रांसफर करने को इच्छुक हैं?

सैद्धांतिक रूप से कम कॉरपोरेट टैक्स के कारण औसत भारतीय उपभोक्ता को फ़ायदा मिलना चाहिए! सरकार को उम्मीद होगी कि कंपनियां अपने वस्तुओं और सेवाओं को सस्ती कर अपने बचत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं के साथ साझा करेंगी। लेकिन ऐसा होना अभी मुश्किल नजर आ रहा है।

यह हमें मान कर चलना चाहिए कि इस साल सरकार का राजकोषीय संतुलन पटरी से उतरने वाला है। सरकार का अनुमान है कि कॉरपोरेट टैक्स में करीब 10 फीसदी कमी करने से राजस्व पर 1.45 लाख करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा, जो जीडीपी के 0.7 फीसदी के बराबर है। तमाम तरह के कर प्रोत्साहन और रियायतें बढ़ाने से राजस्व घट रहा है। ऐसा भी नही है कि इंडस्ट्री को पहले छूट नही दी जाती थी विभिन्न प्रकार की इंडस्ट्री को समय समय पर छूट दी जाती रही ऐसी छूट देने से सरकारी अनुमानों से 2016-17 में 12 प्रतिशत कम राजस्व आया था। सरकार को 2017-18 में 8.7 प्रतिशत और 2018-19 में 16 प्रतिशत राजस्व गंवाना पड़ा था, इस बार 2019-20 में  यह घाटा कही बड़ा होने जा रहा है।

दरअसल आर्थिक मंदी की आहटों और पांच फीसदी पर जीडीपी रेट पहुंचने के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आगामी दो महीने बेहद संकटपूर्ण हैं। यह अंदेशा 30 अगस्त 2019 को जारी किए GDP डेटा के आधार पर लगाया गया है। इकनॉमी में संभावित सुधार के लिहाज से आने वाले दो माह कई व्यापारों और कारोबारियों के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं। आमतौर पर फेस्टिव सीजन में कंज्यूमर डिमांड बढ़ जाती है, इसलिए कम्पनियों को एक बूस्टर डोज दिया गया है लेकिन देखना यह है कि कंपनियों की तो दीवाली मन गयी है लेकिन उपभोक्ताओं की दीवाली सही तरीके से मन पाती है या नही?

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

corporate tax
corporate news
Minister of Finance Nirmala Sitharaman
indian economy
economic crises
automobile production
GDP growth-rate

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

जब 'ज्ञानवापी' पर हो चर्चा, तब महंगाई की किसको परवाह?

मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर

क्या भारत महामारी के बाद के रोज़गार संकट का सामना कर रहा है?

क्या एफटीए की मौजूदा होड़ दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था परिपक्व हो चली है?

महंगाई के कुचक्र में पिसती आम जनता

श्रीलंका का संकट सभी दक्षिण एशियाई देशों के लिए चेतावनी

रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?


बाकी खबरें

  • water pump
    शिवम चतुर्वेदी
    हरियाणा: आज़ादी के 75 साल बाद भी दलितों को नलों से पानी भरने की अनुमति नहीं
    22 Nov 2021
    रोहतक के ककराणा गांव के दलित वर्ग के लोगों का कहना है कि ब्राह्मण समाज के खेतों एवं अन्य जगह पर लगे नल से दलित वर्ग के लोगों को पानी भरने की अनुमति नहीं है।
  • ATEWA
    सरोजिनी बिष्ट
    पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर अटेवा का लखनऊ में प्रदर्शन, निजीकरण का भी विरोध 
    22 Nov 2021
    21 नवंबर को लखनऊ के इको गार्डेन में नेशनल पेंशन स्कीम यानी एनपीएस को रद्द करने, पुरानी पेंशन सिस्टम यानी ओपीएस को पुनः बहाल करने और रेलवे के निजीकरण पर रोक लगाने की मांगों के साथऑल इंडिया टीचर्स एंड…
  • COP26
    डी रघुनंदन
    कोप-26: मामूली हासिल व भारत का विफल प्रयास
    22 Nov 2021
    इस शिखर सम्मेलन में एक ओर प्रधानमंत्री के और दूसरी ओर उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों तथा आला अफसरों के अलग-अलग रुख अपनाने से ऐसी छवि बनी लगती है कि या तो इस शिखर सम्मेलन के लिए भारत ने ठीक से तैयारी…
  • birsa
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘जनजातीय गौरव दिवस’ से सहमत नहीं हुआ आदिवासी समुदाय, संवैधानिक अधिकारों के लिए उठाई आवाज़! 
    22 Nov 2021
    बिरसा मुंडा जयंती के कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के मंचों से अधिकतर लोगों ने यही सवाल उठाया कि यदि बिरसा मुंडा और आदिवासियों की इतनी ही चिंता है तो आदिवासियों के प्रति अपने नकारात्मक नज़रिए और आचरण में…
  • kisan mahapanchayat
    लाल बहादुर सिंह
    मोदी को ‘माया मिली न राम’ : किसानों को भरोसा नहीं, कॉरपोरेट लॉबी में साख संकट में
    22 Nov 2021
    आज एक बार फिर कॉरपोरेट-राज के ख़िलाफ़ किसानों की लड़ाई लखनऊ होते हुए देश और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई और नीतिगत ढांचे में बदलाव की राजनीति का वाहक  बनने की ओर अग्रसर है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License