NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
विज्ञान
भारत
अर्थव्यवस्था
क्यों न हो लूट, भ्रष्टाचार, जब बाज़ार के हवाले कर दी गई पूरे भारत की सेहत!
भारत में सबसे अधिक प्राइवेट हॉस्पिटल हैं। तकरीबन 80 फीसदी प्राइमरी हेल्थ सेंटर प्राइवेट सेक्टर में है। यही वजह है कि हमारे आस-पास दुकनों में बैठे डॉक्टरों के पास मरीजों की लाइन अधिक दिखती है
अजय कुमार
25 Jun 2019
corruption in health
image courtesy- MIMS

भारत की आबादी का बहुत बड़ा भाग इलाज करवाने के लिए सरकारी क्षेत्र की स्वास्थ्य इकाइयों पर निर्भर रहता है। प्राइवेट हॉस्पिटलों में इलाज में वही करवा पाते हैं जिनके पास पैसा होता है। और भारत में जेब में पैसा होने की हकीकत यह है कि यह घनघोर आर्थिक गैरबराबरी वाला देश बनता जा रहा है। ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्ट के तहत सबसे नीचे मौजूद 50 फीसदी आबादी के पास भारत की पूरी आमदनी का केवल 5.6फीसदी हिस्सा है। ऐसे गैर बराबरी वाले समाज में क्या पहली प्रथमिकता यह नहीं होना क्या चाहिए कि जिंदगी से जूझने और बीमारियों से लड़ने का इंतज़ाम सरकार करे। लेकिन भारत में उल्टा हुआ है। भारत में सबसे अधिक प्राइवेट हॉस्पिटल हैं। तकरीबन 80 फीसदी प्राइमरी हेल्थ सेंटर प्राइवेट सेक्टर में है। यही वजह है कि हमारे आस-पास दुकनों में बैठे डॉक्टरों और मरीजों की लाइन अधिक दिखती है। यानी किसी भी तरह की बीमारी का पहली बार इलाज तभी हो सकता है, जब जेब में पैसे हों। मतलब यह है कि पब्लिक सेक्टर के हेल्थ इकाइयों की घनघोर कमी है। 

इसलिए भारत की तकरीबन 75 फीसदी से अधिक जनता प्राइवेट हॉस्पिटलों में इलाज करवाने जाती है। मरीजों के लिए मौजूदा समय में 60 फीसदी से अधिक बेड प्राइवेट हॉस्पिटल के पास है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट के तहत भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में से 67.78   फीसदी ख़र्च लोगों को अपनी जेब से करना पड़ता है। जबकि  वैश्विक औसत 18.2 फीसदी है। स्वास्थ्य पर कम सरकारी खर्चा होने की वजह से गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली 7 फीसदी आबादी और 23 फीसदी बीमार लोग स्वास्थ्य सेवाओं का भार स्वयं उठाने में असमर्थ हैं। अभी केंद्र सरकार जीडीपी का तकरीबन 1.1 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करती है। केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि साल 2025 तक वह स्वास्थ्य क्षेत्र में कुल जीडीपी का तकरीबन 2.2 फीसदी खर्च करेगी। जबकि वैश्विक औसत तकरीबन 6 फीसदी का है। दुःख की बात यह है कि कर्जदार होने की वजह से हर चार में से एक परिवार इलाज करवाने के लिए या तो दूसरे से कर्ज लेते हैं या उन्हें अपनी सम्पति बेचनी पड़ती हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो एक तो समाज हमें गरीबी देता है और दूसरा उस गरीबी से लड़ने के लिए जिंदगी तक छीन लेता है। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के तहत मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्य स्वास्थ्य पर सालाना तकरीबन 5000 हजार रुपये प्रति व्यक्ति से ऊपर खर्च करते हैं। वहीं बिहार सालाना 491 रुपये, मध्य प्रदेश716 और उत्तर प्रदेश सलाना 733 रुपये खर्च करता है। इस कमजोर वित्त पोषण के साथ पब्लिक सेक्टर से मिलने वाले इलाज की हालत भी बहुत बुरी है।

नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के तहत साल 2001 से लेकर 2015 तक स्वास्थ्य सेवाओं के उपचार से परेशान होकर तकरीबन 38 हजार लोगों ने आत्महत्या कर ली। गांवों के प्राथमिक सरकारी अस्पतालों की स्थिति बहुत अधिक खराब है। अस्पतालों में डॉक्टरों के पद खाली हैं। बिहार में तकरीबन 64 फीसदी, मध्य प्रदेश में  तकरीबन 60 फीसदी सरकारी प्राथमिक अस्पतालों में डॉक्टरों के पद खाली हैं। जो डॉक्टर आते हैं, उन्होंने अपने प्राइवेट क्लीनिक भी खोल रखे हैं। अपना ज्यादातर समय वह प्राइवेट क्लीनिक को देते हैं। भारत में केवल छह राज्य ऐसे हैं, जहां 24 घंटे मिलनी वाली जनस्वास्थ्य सेवाएं मौजूद हैं। 

स्वास्थ्य क्षेत्र में इतने कम संसाधन होने के बावजूद जमकर लूट होती है। इस लूट का सबसे बड़ा कारण यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र की भीतरी संरचनाओं पर बहुत कम बातचीत होती है। जबकि हर किसी का जीवन सेहत और इलाज से जुड़ा होता है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार एक मेडिकल प्रोफेशनल के पास भ्रष्ट आचरण करने के दो तरीके  मौजूद होते हैं। पहला, वह अपनी जानकारी और विशेषज्ञता के साथ खेलकर भ्रष्ट आचरण का हिस्सा बन सकता है। जैसे बहुत बार हम सुनते  हैं कि डॉक्टर ने कई तरह के टेस्ट लिख दिये, जबकि उसकी जरूरत नहीं थी। इसी तरह आपको आनंद फिल्म का एक दृश्य याद होगा जिसमें एक डॉक्टर रोकथाम की सलाह देने के बजाय दवाओं की बहुत लम्बी चौड़ी लिस्ट बना देता है। दूसरा, एक मेडिकल प्रोफेशनल अपनी सेवाओं के लिए कितना मेहनताना लेता है? इसका निर्धारण भी वह खुद ही करता है। आम जीवन में हम देखते ही हैं कि हर साल डॉक्टर की फीस में कितना बड़ा इजाफा होता रहता है। यह सिलसिला आम है। सबकी आँखों से दिखता है। लेकिन डॉक्टरों की जिम्मेदारी तय करने वाली किसी भी तरह की संस्था सरकार ने अभी तक नहीं बनाई है। इसलिए मनमर्जी से जमकर लूट मची रहती है। जिसका पता सबको होते हुए भी जिम्मेदार कोई नहीं बनता।

भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र का डिज़ाइन आधुनिक एलोपैथी पर आधारित है। जिसकी सुविधाओं के केंद्र में डॉक्टर और हॉस्पिटल होते हैं। हम इस मामले में अपनी सांस्कृतिक विरासत से पूरी तरह दूर किए जा चुके हैं। हम पूरी तरह से आधुनिक एलोपैथी पर निर्भर रहते हैं। चूँकि सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र पर बहुत कम खर्च करती हैं और भारत की बहुत बड़ी आबादी कम आय वाली है। इसलिए यहाँ पर स्वास्थ्य सुविधाएँ जीवन का जरूरी हिस्सा न बनकर किसी  वस्तु की तरह हो गयी हैं। जिनकी खरीद बिक्री होती है। जिनका बाजार है और जिनमें वैसे ही लूट की बहुत अधिक सम्भावना मौजूद होती है जैसे किसी वैसे बाजार में मौजूद होती है,जिसमें ग्राहक को सेवाओं और वस्तुओं की बिल्कुल जानकारी नहीं होती। इसे आसानी से हम इस सम्बन्ध से समझ सकते हैं कि हमें न बीमारी का पता होता है और न दवाई का। इसलिए डॉक्टर जो कहता है, उसे मानना जरूरी होता है। जो दवा लिखता है, उसे खरीदना जरूरी होता है। जब ऐसी स्थिति है तो नैतिकता से बहुत दूर हो चुकी हमारी दुनिया में भ्रष्ट होने की कितनी संभावनाएं होती हैं, इसका अंदाजा हम लगा सकते हैं।

corruption in health
health sector in India
expenses in health sector in india
primary hospital
private hospital
government policies

Related Stories

कोरोना महामारी अनुभव: प्राइवेट अस्पताल की मुनाफ़ाखोरी पर अंकुश कब?

पहाड़ों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी, कैसे तीसरी लहर का मुकाबला करेगा उत्तराखंड?

अस्पताल न पहुंचने से ज़्यादा अस्पताल पहुंचकर भारत में मरते हैं लोग!

देश में पोषण के हालात बदतर फिर भी पोषण से जुड़ी अहम कमेटियों ने नहीं की मीटिंग!

क्या भारत कोरोना का नया हॉटस्पॉट बन गया है?

ज़रूरत: स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता बने

क्या निजी अस्पताल कोविड-19 मरीज़ों का आयुष्मान भारत योजना में इलाज को तैयार हैं : न्यायालय

स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव में जा सकती है देश में लाखों बच्चों की जान!

कोरोना वायरस से कम गंभीर नहीं है, उससे निपटने में होने वाला भ्रष्टाचार

कोरोना संकट: महिला स्वास्थ्य कर्मियों के सामने दोहरी चुनौती


बाकी खबरें

  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक : …अब साइकिल भी आतंकवादी हो गई...और कूकर...और मोटरसाइकिल!
    21 Feb 2022
    एक चुनाव की ख़ातिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साइकिल को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश आमतौर पर पसंद नहीं की जा रही है। मज़दूर-कामगार के लिए तो आज भी साइकिल ही उनकी मोटरसाइकिल और कार है। सोशल…
  • lalu
    भाषा
    चारा घोटाला : डोरंडा कोषागार गबन मामले में दोषी लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद की सज़ा
    21 Feb 2022
    रांची स्थित विशेष सीबीआई अदालत  ने डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये के गबन के मामले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद और 60 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनायी।
  • up
    अजय कुमार
    यूपी से बाहर का मतलब केवल बंबई और दिल्ली नहीं है बल्कि सऊदी, ओमान और कतर भी है!
    21 Feb 2022
    "योगी के समर्थक योगी के पांच काम गिनवा देंगे तो मेरा वोट योगी को चला जाएगा।"
  • hum bharat ke log
    नाज़मा ख़ान
    हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है
    21 Feb 2022
    नफ़रत के माहौल में तराने बदल गए, जिस दौर में सवाल पूछना गुनाह बना दिया गया उस दौर में मुसलमानों से मुग़लों का बदला तो लिया जा रहा है। लेकिन रोटी, रोज़गार, महंगाई के लिए कौन ज़िम्मेदार है ये पूछना तो…
  • European Union
    अब्दुल रहमान
    यूरोपीय संघ दुनियाभर के लोगों के स्वास्थ्य से बढ़कर कॉर्पोरेट मुनाफे को प्राथमिकता देता है 
    21 Feb 2022
    अपनी आबादी के अधिकांश हिस्से का टीकाकरण हो जाने के बावजूद कोविड-19 संबंधित उत्पादों पर पेटेंट छूट को लेकर अनिच्छा दिखाते हुए यूरोपीय संघ के नेतृत्व ने एक बार फिर से बिग फार्मा का पक्ष लिया है और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License