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मज़दूर वर्ग के लिए मंदी का क्या अर्थ है?
वेतन में ठहराव और बढ़ती बेरोज़गारी के बीच एक बेख़बर सरकार ग़लत दरवाज़ों पर दस्तक दे रही है। यह वह दृष्टिकोण है जिसके ज़रिये सरकार एक घातक ग़लती कर रही है, जिसके लिए लोगों को आने वाले महीनों में भारी नुकसान उठाना होगा।
सुबोध वर्मा
19 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
What the slowdown
प्रतियात्मक तस्वीर Image Courtesy : The Hindu

भारतीय अर्थव्यवस्था में चल गतिरोध और लड़खड़ाहट को लेकर भयंकर रूप से घबराए कॉर्पोरेट क्षेत्र में बहुत अधिक अफ़रा-तफ़री चल रही है। स्वतंत्रता दिवस के संबोधन के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री मोदी सीधे वित्त मंत्री और उनके मंत्रालय के सहयोगियों के साथ "विचार-मंथन" करने के लिए बैठक में गए। इससे पहले, सीतारमण – बैंकरों, उद्योग जगत के कप्तानों, पूंजी बाज़ार के खिलाड़ियों और रियल एस्टेट टायकून के साथ अंतहीनबैठकें करने में व्यस्त थीं। यहां तक कि विदेशी पोर्टफ़ोलियो वाले निवेशकों के साथ चर्चा की गई क्योंकि वे अपनी आय के बारे में चिंतित थे। जबकि इन हालात में भी, निश्चित रूप से मुख्यधारा का मीडिया, कर रियायत सहित एक प्रोत्साहन पैकेज (पढ़ें रियायतें) के बारे में अटकलों के साथ बैलिस्टिक हो गया।

आश्चर्य की बात नहीं है कि मोदी सरकार की अगुवाई में मीडिया जो कहानी बना रहा है, उसके मुताबिक़ धन निर्माता ही हैं जो पीड़ित हैं और जिन्हें मदद की आवश्यकता है। वास्तव में, मोदी ने लाल क़िले से अपने संबोधन में उनका बचाव किया।

लेकिन इस बात पर गहरी चुप्पी है कि लोगों का क्या होगा - कृषि और औद्योगिक श्रमिक, छोटे और सीमांत किसान, कर्मचारी, यहां तक कि मध्य वर्ग की तरफ़ भी कोई ध्यान नहीं है। आर्थिक संकट को हल करने की आपाधापी में, मोदी और उनके सहयोगियों ने इन वर्गों से किसी भी वर्ग को कोई भी परामर्श नहीं दिया है और न ही लोगों की मदद करने के उपायों के बारे में बात की है।

यह वह दृष्टिकोण है जिसके ज़रिये सरकार एक घातक ग़लती कर रही है, जिसके लिए लोगों को आने वाले महीनों में भारी नुकसान उठाना होगा। सरकार निजी क्षेत्र में निवेश को और अधिक रियायत देकर बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, जबकि वास्तविक समस्या यह है कि मांग में भयंकर कमी है। लोगों के हाथों में ख़रीदने के लिए पैसा नहीं है। इसका समाधान कृषि और ग़ैर-कृषि मज़दूरी में वृद्धि करके,किसानों की आय में वृद्धि करके सार्वजनिक कीमतों को मज़बूत करना और मांग को बढ़ावा देने से होगा। आर्थिक गतिविधि शुरू करने के लिए ख़र्च बढ़ाना होगा। हालाँकि, ये उपाय मोदी सरकार के लिए जैसा कि वे पिछले कांग्रेस के लिए उठाना कठिन काम की तरह है। (ध्यान दें कि पी. चिदंबरम, कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री ने मोदी द्वारा घोषित कुछ उपायों का स्वागत किया है!)

इस बीच, देश के लोग – जो वास्तविक धन अर्जित करने वाले हैं, न कि परजीवी कॉर्पोरेट दिग्गजों – बल्कि उस जनता के साथ क्या हो रहा है, इस पर एक नज़र डालते हैं।

बेरोज़गारी की लहर

मांग कम होने के कारण, कई औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी वजह से वे श्रमिकों की काम से छुट्टी कर रहे है। इसके ठोस आंकड़े अब तक केवल ऑटोमोबाइल क्षेत्र और उसकी सहायक कंपनियों से ही उपलब्ध हैं, जो बताते हैं कि ऑटोमोबाइल की बिक्री में गिरावट की वजह से 10 लाख तक नौकरियाँ खो सकती हैं, जिस की वजह ऑटो पार्ट्स निर्माताओं और विभिन्न सहायक इकाइयों में मंदी की स्थिति पैदा हो सकती है। 300 से अधिक डीलरशिप कथित तौर पर बंद हो गयी है।

इसके अलावा, तेज़ी से बढ़ने वाला उपभोक्ता बाज़ार (FMCG) क्षेत्र संकट का सामना कर रहा है। एक प्रमुख कंपनी हिंदुस्तान लीवर ने पिछले साल12 प्रतिशत की तुलना में इस साल पहली तिमाही में कुल 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जिनके परिणाम उपलब्ध हैं, जैसे ब्रिटानिया, डाबर, एशियन पेंट्स आदि कथित तौर पर समान स्थिति में है। वहाँ भी एक ही बात समान है - अधिक छंटनी और श्रमिकों की छंटनी जबकि थेकेदारी के तहत काम कर रहे श्रमिकों को तो बिना भाव के बाहर कर दिया जाएगा।

रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में लगभग 12 प्रतिशत कर्मचारी कार्यरत हैं और उन्होंने दरिद्र किसानों और कृषि श्रमिकों के लिए काम देने का काम किया है। लेकिन 42 महीनो (सामान्य 8-12 महीने) से बिक्री नहीं हुई है जो अपने आप में चौंका देने वाली बात है। यह क्षेत्र 250 प्रकार के सहायक उद्योगों से जुड़ा हुआ है। ज़ाहिर है यह क्षेत्र भी बड़े पैमाने पर मंदी के दौर से गुज़र रहा है जिसका मतलब होगा लाखों नौकरियों का नुकसान -जब तक कि सरकार सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा नहीं देती इसमें सुधार की गुंजाईश नहीं दिखाई देती है।

टाटा स्टील जैसी बड़ी स्टील कंपनियों ने मांग में कमी के कारण पूंजी निवेश में कटौती की घोषणा की है। रिपोर्टों के अनुसार, कई औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की छुट्टी करने की उम्मीद है।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र, एक बड़ा रोज़गार का स्रोत माना जाता है, जो आज़ तक भी  नोटबंदी/विमुद्रीकरण और जी.एस.टी. के दोहरे झटकों से उबर नहीं पाया है। हाल के महीनों में इसकी हालत और ख़राब हो गयी है। आर.बी.आई. के बैंक क्रेडिट डेटा से पता चलता है कि इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में एमएसएमई को उधार वास्तव में 2018 के 0.7 प्रतिशत से गिरकर 0.6 प्रतिशत हो गया है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में और नौकरियां ख़त्म होने वाली हैं।

यहां तक कि सेवा क्षेत्र पहले की तुलना में धीमा है। पर्यटन, होटल और रेस्तरां, आईटी, परिवहन, रियल एस्टेट और शिपिंग में बैंक क्रेडिट में गिरावटआई है। यह इस बात का संकेत है कि इन क्षेत्रों में रोज़गार घटने की संभावना है।

बढ़ती बेरोज़गारी

नौकरियों की हानि चल रहे बेरोजगारी संकट की पृष्ठभूमि में हो रही है जिसे मोदी सरकार पिछले पांच साल के कार्यकाल से ही अनसुना कर रही है -और ध्यान नहीं दे रही है। वर्तमान में, सी.एम.आई.ई. का अनुमान है कि बेरोज़गारी दर जुलाई 2019 में 7.5 प्रतिशत थी। दो साल पहले यह 4.1प्रतिशत थी। इस अवधि में बेरोज़गारी लगातार बढ़ी है। [नीचे चार्ट देखें]
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मौजूदा मंदी के चलते, पहले से ही ख़राब स्थिति अब विस्फ़ोटक हो जाएगी। आने वाले महीनों में बढ़ी बेरोज़गारी की संख्या स्पष्ट हो जाएगी। लेकिन मोदी सरकार अभी भी हालात में परिवर्तन के लिए अपने क्रोनियों, यानि निजी क्षेत्र पर निर्भर है। जब उद्योग पर संकट नहीं था, तब भी वे रोजगार पैदा नहीं कर रहे थे। फिर वे वर्तमान मंदी में नौकरियों को कैसे बचा सकते हैं?

मोदी सरकार सोचती है कि श्रम क़ानूनों को आसान बनाने से, नौकरियों पर जब चाहे रखने और जब चाहे निकालने से और कम मज़दूरी देने की अनुमति से मालिक लोग अधिक लोगों को रोज़गार दे देंगे। लेकिन ऐसा पहले नहीं हुआ, और न ही अब असंभव है। होगा यह कि हज़ारों श्रमिकों को काम से बाहर निकाल दिया जाएगा।

ग्रामीण संकट जारी है

विशाल ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि की क्या स्थिति है? इस पहले से ही संकटग्रस्त क्षेत्र में हालात और भी भयावह हैं जो भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी को रोज़गार देता है - और ख़रीदने की ताक़त प्रदान करता है।

कृषि मंत्रालय के नवीनतम अनुमानों के अनुसार, खरीफ़ की बुवाई पिछले साल की तुलना में लगभग 5.3 प्रतिशत कम हुई है और प्रमुख फसल धान में क़रीब 13 प्रतिशत तक लुढ़कन दर्ज़ की गई है। जारी बाढ़ ने हजारों हेक्टेयर की खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया है, साथ ही आगे भी भारी नुकसान की संभावना है क्योंकि आने वाले दिनों में पंजाब जैसे उत्तरी राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ का पूर्वानुमान है। इसलिए, उत्पादन/आउटपुट पर नकारात्मक रूप से प्रभाव पड़ने की संभावना है।

मोदी की कंजूस सरकार ने खरीफ़ उत्पादन के न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली सी वृद्धि की घोषणा की है। उदाहरण के लिए, धान एमएसपी में पिछले साल की तुलना में केवल 4 प्रतिशत की वृद्धि की है। कई राज्यों में उत्पादन की लागत वास्तव में इससे अधिक है। कुल मिलाकर, एमएसपी लागत+ 50 प्रतिशत लाभ के ज़रूरी बेंचमार्क को पूरा नहीं करता है, जहां लागत में न केवल इनपुट और पारिवारिक श्रम शामिल हैं, बल्कि लागत भी शामिल है।

इसलिए, सरकार किसानों को संसाधन हस्तांतरित करने के लिए तैयार नहीं है - एक ऐसी नीति जो निश्चित रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बढ़ाएगी और अर्थव्यवस्था को मदद करेगी।

जहां तक कृषि अर्थव्यवस्था के सबसे गरीब और सबसे ज्यादा शोषित तबक़े, खेतिहर मज़दूरों की बात है, वे सरकार की नज़र से बिल्कुल बाहर हैं। इस तथ्य के बावजूद कि देश में लगभग 15 करोड़ ऐसे श्रमिक हैं जो खेतिहर मज़दूर हैं। पिछले दो वर्षों में इन असहाय श्रमिकों के वेतन में मात्र 3.8प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में उसी अवधि में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जैसा कि आरबीआई के आंकड़ों से पता चला है। इसका मतलब यह है कि महंगाई मामुली से बढ़ी मज़दूरी को खा रही है - और वास्तविक रूप में मज़दूरी घट रही है। [नीचे चार्ट देखें]
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ग्रामीण क्षेत्रों में मज़दूरी बढ़ाने और उन्हें लागू करने के लिए ज़रूरी रूप में जिस धन को निवेश करने की ज़रूरत है नहीं कर रही है, ऐसा कर सरकार ने कृषि-श्रमिकों की दुर्दशा पर ध्यान देने से इनकार कर दिया है। कोई आश्चर्य की बात नहीं, कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग इतनी कम है।

औद्योगिक श्रमिकों की मज़दूरी

मोदी सरकार का रवैया श्रमिकों और कर्मचारियों के प्रति इतना शत्रुतापूर्ण है कि मज़दूरी और काम के घंटे तय करने के लिए हर तरह के उचित मानकों को हटाने के लिए श्रम क़ानूनों में संशोधन किया गया है। यह हाल ही में पारित हुए वेतन पर संहिता और सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों पर संहिता में स्पष्ट है।

वास्तव में, श्रम मंत्री ने घोषणा की कि नया संशोधित राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन 178 रूपए प्रति दिन होगा, जो पहले के प्रति दिन 176 से ऊपर है। यह स्तर सरकार के न्यूनतम वेतन से एक तिहाई से भी कम है जिसे भारतीय श्रम सम्मेलन सत्रों और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित, सभी तय मानदंडों के आधार पर, अपने कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन के रूप में स्वीकार किया गया है।

दो राज्यों को छोड़कर, देश के अन्य सभी राज्यों में, संबंधित राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी 18,000 के 50 प्रतिशत से भी कम है जिन्हे कि इन मानदंडों की आवश्यकता है। अब सरकार से ग्रीन सिग्नल के साथ, श्रमिकों के लिए वेतन बढ़ोतरी को भुलाया जा सकता है।

कामकाजी लोगों को भुखमरी के वेतन के साथ जीने के लिए मजबूर करने के दृष्टिकोण से, कॉर्पोरेट्स और बड़े व्यापारियों, और बड़े ज़मींदारों को सभी रियायतें दी जा रही हैं, जोकि अंतत किसी भी आर्थिक पुनरुत्थान में मदद नहीं करेंगा। वास्तव में, यह अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा डुबो देगा।

मोदी और उनके भरोसेमंद अमित शाह शायद यह उम्मीद कर रहे हैं कि धार्मिक उत्साह, छद्म राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रीयता लोगों को मौन रखेगा और कश्मीर, पाकिस्तान और राम मंदिर इत्यादि जैसे मसले में उलझे रहेंगे, लेकिन जिस तरह का आर्थिक संकट है, ये उनके लिए बड़ा झटका भी हो सकता है। लोग अब उस पुरानी हिन्दी कहावत के तहत काम नहीं करेंगे और भूखे पेट भजन नहीं गा सकेंगे। 

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