NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
शिक्षा
भारत
राजनीति
ग्रामीण इलाकों में सिर्फ़ 8 फ़ीसदी बच्चे ही नियमित ढंग से ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं: अध्ययन
अध्ययन से पता चलता है कि दूसरे सामाजिक वर्गों की तुलना में, यहां तक कि वंचित तबकों में भी दलित और आदिवासी परिवारों की स्थिति ज़्यादा खराब है।
दित्सा भट्टाचार्य
08 Sep 2021
report

हाल में 1400 स्कूली बच्चों पर किए गए एक सर्वे से पता चला है कि पिछले डेढ़ साल से कक्षाएं बंद रहने का बच्चों पर कितना भयावह असर हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक़, ग्रामीण इलाकों में सिर्फ़ 8 फ़ीसदी बच्चे ही नियमित तौर पर पढ़ रहे हैं। वहीं 37 फ़ीसदी बिल्कुल भी नहीं पढ़ रहे हैं। करीब़ आधे बच्चे कुछ शब्दों से ज़्यादा का पाठन नहीं कर पाए। ज़्यादातर अभिभावक चाहते हैं कि जल्द से जल्द स्कूल खुलें। 

"लॉक्ड आउट, इमरजेंसी रिपोर्ट ऑन स्कूल एजुकेशन" नाम की इस रिपोर्ट को ज्यां द्रे, निराली बाखला, विपुल पैकरा, रीतिका खेरा ने बनाया है और इसमें स्कूल सर्वे (SCHOOL- स्कूल चिल्ड्रेनज़ ऑनलाइन एंड ऑफ़लाइन लर्निंग) में खोजी गई मुख्य बातों को बताया है। यह सर्वे अगस्त, 2021 में 15 राज्यों में हुआ था और इसमें सामान्यत: सरकारी स्कूलों को शामिल किया गया था। कुल मिलाकर 1362 परिवारों को सैंपल के तौर पर लिया गया था। हर परिवार में प्राथमिक या उच्च-प्रथामिक स्तर पर दर्ज बच्चे का साक्षात्कार किया गया। इन सैंपल में से करीब़ 60 फ़ीसदी ग्रामीण इलाकों से हैं, वहीं 60 फ़ीसदी बच्चे दलित या आदिवासी समुदाय से भी ताल्लुक रखते थे। दिल्ली, झारखंड, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश- चार राज्यों से करीब़ आधे सैंपल लिए गए हैं। मोटे तौर पर इन बच्चों में समान ठंग से लैंगिक और कक्षागत् वितरण रखा गया है।  

रिपोर्ट कहती है, "स्कूल सर्वे ने यह साफ़ कर दिया है कि ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच बहुत सीमित है; जो बच्चे नियमित तौर पर ऑनलाइन पढ़ रहे थे, उनकी हिस्सेदारी ग्रामीण और शहरी इलाकों में क्रमश: सिर्फ़ 8 फ़ीसदी और 24 फ़ीसदी ही है।" इसकी एक वज़ह यह है कि जिन परिवारों से सैंपल लिए गए उनमें से कई के पास स्मार्ट फोन ही नहीं थे। ग्रामीण इलाकों में यह संख्या करीब़ आधी थी। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि यह सिर्फ़ पहली बाधा थी, जिन परिवारों के पास स्मार्ट फोन हैं, उनमें भी नियमित ढंग से ऑनलाइन पढ़ने वाले बच्चों की संख्या शहरी क्षेत्रों में 31 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाकों में 15 फ़ीसदी ही है।
रिपोर्ट कहती है, "एक दूसरी बाधा, खासकर ग्रामीण इलाकों में स्कूल द्वारा ऑनलाइन पठन सामग्री का ना भेजा जाना है। या फिर पालक इसके बारे में जागरुक नहीं हैं। कुछ बच्चे, खासकर छोटे बच्चे, उनमें ऑनलाइन अध्ययन के लिए समझ की कमी है और उनका ध्यान भी बहुत कम केंद्रित हो पाता है।"
स्कूल सर्वे ने बताया कि जो बच्चे सर्वे के दौरान ऑनलाइन नहीं पढ़ रहे थे, वहां उन बच्चों के नियमित पढ़ने की संभावना भी बहुत कम है। बच्चों का बड़ा हिस्सा या तो बिल्कुल नहीं पढ़ रहा है, या फिर अपने वक़्त पर अपने हिसाब से घरों में पढ़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में सर्वे के दौरान करीब़ आधे बच्चे तो पढ़ ही नहीं रहे थे। 

रिपोर्ट कहती है कि असम, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में लॉकडाउन के दौरान बच्चों को ऑफ़लाइन मदद के तौररप कोई कदम नहीं उठाए गए। कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में कुछ कोशिशें की गईं। जैसे बच्चों को घर पर भरने के लिए ऑफ़लाइन वर्कशीट दी गईं। या फिर शिक्षकों को बच्चों के घरों पर वक़्त-वक़्त पर जाने के निर्देश दिए गए, ताकि वे ऊचित सलाह दे सकें। लेकिन रिपोर्ट कहती है कि "लेकिन यह सारे प्रयास संतोष से बहुत दूर हैं, ना केवल इसका पता माता-पिता द्वारा बताई गई बातों से चलता है, बल्कि बच्चों की पढ़ने और लिखने की क्षमताओं के बेहद कमज़ोर होने से भी यह दिखता है। कक्षा-1 और कक्षा-1 के सबसे छोटे बच्चों को खासतौर पर कोई मदद उपलब्ध नहीं हो सकी।"

दूरदर्शन पर बच्चों के लिए नियमित शैक्षणिक प्रसारण किए जाते, लेकिन सिर्फ़ 1 फ़ीसदी ग्रामीण बच्चों और 8 फ़ीसदी शहरी बच्चों ने ही टीवी कार्यक्रमों को अध्ययन का नियमित या अनियमित माध्यम माना। 

अध्ययन में यह तथ्य भी पता चला कि सैंपल हासिल किए गए राज्यों में मध्यान्ह भोजन भी स्कूल बंद होने के साथ बंद कर दिया गया। रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूल में दाखिल किए गए बच्चों के मध्यान्ह भोजन बंद होने के बाद, करीब 80 फ़ीसदी बच्चों के माता-पिता को तीन महीने तक कुछ खाद्यान्न (चावल और गेहूं प्रमुखत:) मिलता रहा, लेकिन बहुत कम को नग़द मिला। बड़ी संख्या में तो लोगों को उस अवधि में किसी भी तरह की मदद नहीं मिली। जिन लोगों को कुछ खाद्यान्न मिला, उनमें से बहुतों ने शिकायत में कहा कि उन्हें उनके हिस्से से बेहद कम दिया गया (प्राथमिक स्तर पर एक बच्चे को एक दिन में 100 ग्राम खाद्यान्न मिलता है)।

सर्वे में बुनियादी पठन परीक्षण को शामिल किया गया था, जिसके तहत बच्चों से बड़े शब्दों में छापे गए एक वाक्य को पढ़वाना था। लेकिन इसमें जो बातें सामने आईं, वे चौकाने वाली थीं: फिलहाल 3 से 5वीं कक्षा तक के आधे बच्चों तो कुछ शब्दों से ज़्यादा नहीं पढ़ पाए। ग्रामीण इलाकों में करीब़ 42 फीसदी बच्चे एक भी शब्द नहीं पढ़ पाए। 

रिपोर्ट कहती है, "कुछ हद तक तो पाठन परीक्षण के खराब़ नतीज़े लॉकडाउन से पहले दोयम दर्ज की पढ़ाई को दिखाते हैं। लेकिन बच्चों ने तब वहां जो कुछ सीखा था, वे वो भी अब भूल चुके हैं। बड़ी संख्या में पालकों को लगता है कि लॉकआउट के दौरान उनके बच्चों की पाठन और लेखन क्षमता में बहुत गिरावट आई है।"

अध्ययन ने यह भी बताया कि स्कूल सैंपल में शामिल किए गए आदिवासी और दलित परिवारों की स्थिति औसत से ज़्यादा बुरी है। रिपोर्ट के मुताबिक़, "चाहे हम ऑनलाइन शिक्षा या नियमित अध्ययन या पाठन क्षमताओं की बात करें, वंचित परिवारों में भी, दलित और आदिवासी परिवारों में दूसरों के मुकाबले स्थिति ज़्यादा बुरी है। जैसे- ग्रामीण दलित और आदिवासियों में सिर्फ़ 4 फ़़ीसदी बच्चे ही ऑनलाइन पढ़ाई नियमित ठंग से कर रहे हैं। जबकि ग्रामीण इलाकों में दूसरे बच्चों में यह हिस्सेदारी 15 फ़ीसदी है।"

लेखकों ने ध्यान दिलाया कि लॉकडाउन का एक अहम नतीज़ा बाल मज़दूरी में बढ़ोत्तरी है। रिपोर्ट कहती है, "कई बच्चे मज़दूर बन चुके हैं, तो कई बच्चे आलस्य, शारीरिक व्यायाम की कमी, फोन के नशे, पारिवारिक तनाव और लॉकडाउन के दूसरे प्रभावों से जूझ रहे हैं। यह स्कूल सर्वे का मुख्य मुद्दा नहीं था, लेकिन बात करते वक़्त पालकों ने इस संबंध में अपनी चिंताएं जताईं। जैसे कुछ पालकों ने शिकायत में कहा कि उनके बच्चे अब अनुशासनहीन, आक्रामक, यहां तक कि हिंसक भी हो गए हैं।"

अध्ययन आखिर में कहता है, "इस नुकसान की भरपाई के लिए कई सालों तक धैर्य से काम करना होगा। स्कूल को खोलना सिर्फ़ पहला कदम है, इस पर अब भी बहस चल रही है। बल्कि शुरुआती कदम (जैसे स्कूल बिल्डिंगों की मरम्मत, सुरक्षा निर्देश जारी किए जाना, शिक्षक प्रशिक्षण, पंजीकरण कार्यक्रम) ही कई राज्यों में पूरी तरह नदारद हैं। इसके बाद स्कूली तंत्र को एक लंबे बदलाव के दौर से गुजरना होगा, ताकि बच्चे पाठ्यक्रम के स्तर पर आ सकें, साथ ही खुद के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पोषण स्थिति को भी वापस पा सकें। लेकिन अभी जैसे चीजें चल रही हैं, ऐसा लग रहा है जैसे स्कूल खुलने के बाद पुराने ढर्रे पर ही व्यवस्था आ जाएगी- यह आपदा की वज़ह हो सकती है।"

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Only 8% of Children in Rural Areas are Studying Online Regularly, Reveals study 

lock out emergency report on school education
Online Education
corona and education
zean drauz

Related Stories

लॉकडाउन में लड़कियां हुई शिक्षा से दूर, 67% नहीं ले पाईं ऑनलाइन क्लास : रिपोर्ट

उत्तराखंड में ऑनलाइन शिक्षा: डिजिटल डिवाइड की समस्या से जूझते गरीब बच्चे, कैसे कर पाएंगे बराबरी?

वैश्विक महामारी कोरोना में शिक्षा से जुड़ी इन चर्चित घटनाओं ने खींचा दुनिया का ध्यान

रचनात्मकता और कल्पनाशीलता बनाम ‘बहुविकल्पीय प्रश्न’ आधारित परीक्षा 

कोविड-19 और स्कूली शिक्षा का संकट: सब पढ़ा-लिखा भूलते जा रहे हैं बच्चे

ऑनलाइन पढ़ाई ने छात्रों के कामकाज का तरीका बदला, अब ‘नकल’ की परिभाषा भी बदलनी होगी

ऐश्वर्या रेड्डी की ख़ुदक़ुशी के बहुत पहले ही छात्रों ने सामने रख दिये थे मुद्दे,प्रशासन ने की थी अनदेखी

ओडिशा: स्कूलों को बंद करने का नोटिस, अब वापस लौटे प्रवासियों को अंधेरे में दिख रहा भविष्य

दलितों को शिक्षा से वंचित करता ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 15,786 नए मामले, 231 मरीज़ों की मौत
    22 Oct 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 41 लाख 43 हज़ार 236 हो गयी है।
  • coal energy
    नीलाबंरन ए
    नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली ख़रीद पर निर्भर तमिलनाडु ने कोयले की कमी का किया मुक़ाबला 
    22 Oct 2021
    तमिलनाडु राज्य की थर्मल पावर स्टेशनों पर निर्भरता कम है, लेकिन निजी विक्रेताओं से महंगी बिजली ख़रीदने के कारण टैंजेडको 1.07 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ में धस गई है।
  • Ashfaqulla Khan
    हर्षवर्धन
    विशेष: अशफ़ाक़उल्ला को याद करना उनके विचारों को भी याद करना है
    22 Oct 2021
    आज शहीद क्रांतिकारी अशफ़ाक़ का 121 जन्मदिन है। आइये, इस मौके पर हम उनकी वैचारिकी की थोड़ी चर्चा करते हैं। 
  • Adam Gondvi
    न्यूज़क्लिक टीम
    अदम गोंडवी : “धरती की सतह पर” खड़े होकर “समय से मुठभेड़” करने वाला शायर
    22 Oct 2021
    जनता के शायर अदम गोंडवी (22 अक्टूबर, 1947-18 दिसंबर, 2011) के जन्मदिन पर न्यूज़क्लिक विशेष। यह वीडियो पैकेज 2018 में तैयार किया गया था, जो आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि आज अदम की ही तरह पुरज़ोर आवाज़…
  • ग्लोरिया ला रीवा
    आँखों देखी रिपोर्ट : क्यूबा के वैज्ञानिकों, स्वास्थ्यकर्मियों ने कोविड के ख़िलाफ़ संघर्ष तेज़ किया
    21 Oct 2021
    ग्लोरिया ला रीवा क्यूबा में थीं। वहां उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों से क्यूबा के प्रभावी टीकाकरण कार्यक्रम और डेल्टा वेरिएंट से निपटने के तरीकों पर बात की।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License