NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
पाकिस्तान के चुनावी समीकरण
जमींदारी और अमीर लोगों में सेना का दबदबा,सेना और इमरान खान के बीच का गठजोड़ और नवाज शरीफ के प्रति गढ़ी गयी लुटेरे डाकू की छवि मिलकर पाकिस्तान की राजनीति की रुपरेखा तय कर रहे हैं।
24 Jul 2018
pakistan elections 2018
Image Courtesy : PTV

'जब मैं हिन्दुस्तान से क्रिकेट खेलकर पाकिस्तान आता था तो लगता था कि मैं किसी गरीब मुल्क से क्रिकेट खेलकर अमीर मुल्क में आ गया हूँ,लेकिन आज हमसे  सब आगे निकल चुके हैं। हमें यहां तक लाने में शरीफ और जरदारी नाम के दो डाकुओं का बहुत बड़ा हाथ है।' अपनी हर चुनावी रैली में इमरान खान इस बात को दुहराते हैं। पाकिस्तान की  पुरानी हाल ए सूरत की बेहतरी से आज की हाल ए सूरत की कमतरी की तुलना करते हैं। अमेरिका के प्रति पाकिस्तान में मौजूद नफरत को उकसाया जाता है। देश में हो रही लूट को खत्म करने की बात की जाती है। शिक्षा और अस्पताल पर फोकस करने की बात की जाती है।  इस  तरीके से चुनावी लड़ाई लड़ते हुए पाकिस्तान के हालिया चुनाव में इमरान खान की पार्टी 'पाकिस्तान तहरीक ए इन्साफ' चुनावी घुड़दौड़ में सबसे अव्वल पार्टी मानी जा रही है। 

साल 2013 में  पाकिस्तान का आम चुनाव नवाज शरीफ ने जीता था। यह जीत पाकिस्तानी राजनीति में सेना के प्रभाव को बहुत कम करने जैसी जीत थी।  विश्लेषकों ने तो यहां तक कह दिया दिया था कि पाकिस्तान का राजनीतिक  समाज अब सेना से मुक्त होता चला जाएगा। लेकिन यह उतना आसान नहीं हुआ जितना आकलन किया जा रहा था।  ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तानी समाज के दबदबे वाले वर्ग जैसे कि जमींदार और अमीर लोगों में सेना और सेना के सगे संबंधियों का अच्छा खासा दबदबा है।साथ में संवैधानिक प्रावधान के तहत पाकिस्तान का राष्ट्रपति पाकिस्तानी  आर्मी का प्रमुख होता है। लेकिन पाकिस्तान की गवर्नमेंटल स्ट्रक्चर में डिफेंस पर फैसला लेने और बजट बनाने का हक पाकिस्तानी आर्मी का है। इस पर किसी का हस्तक्षेप नहीं  चलता है। जिसके वजह से पाकिस्तान की सरकार में सेना के प्रभाव को कमतर करना कभी भी आसान नहीं हो सकता। 

तकरीबन तीन दशक से नवाज शरीफ पाकिस्तान की राजनीति में रहे हैं। इन तीन दशकों में नवाज शरीफ और सेना के बीच का सम्बन्ध उबड़ खाबड़ रहा।  इसलिए साल 2013 में जब पूरी बहुमत के साथ नवाज शरीफ की सरकार बनी तो यह तय था कि सेना और शरीफ के बीच की दीवार बढ़ेगी लेकिन पाकिस्तानी राजनीति में सेना के प्रभाव के वजह से सेना की हैसियत कमजोर नहीं होगी। चूँकि सरकार सेना से नाराज रहने वाले नवाज की थी तो  भारत और पाकिस्तान के बीच सम्बन्ध  सुधार की भी आस भी थी। साल 2013 से लेकर अब तक की राजनीति में यह सब हुआ लेकिन इन सब के समनांतर कुछ और भी होता रहा। नवाज शरीफ पर जीत के बाद ही चुनावी धांधली के आरोप लगे, इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने नवाज़ शरीफ के खिलाफ लूट के आरोप का मोर्चा खोल दिया। पाकिस्तान आर्मी ने भी सरकार में अपना दबदबा फिर से कायम रखने के लिए इमरान खान की पार्टी का जबरदस्त साथ देना शुरू किया। इस तरह से पाकिस्तान के हालिया चुनाव की  स्थिति यह है कि नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के मामलें में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आजीवन चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है और भूतपूर्व चीफ जस्टिस के  कार्यकारी प्रधानमंत्री के पदभार में चुनाव करवाए जा रहे हैं। कुल-मिलाजुकार चुनावी समीकरण कुछ ऐसे हैं-  नवाज शरीफ की पार्टी बैकफुट पर है, इमरान खान की पीटीआई चुनावी दौड़ में सेना के सहारे बैटिंग कर रही है और चूँकि सेना के पास पैसे, प्रभाव और रुतबा तीनों है तो पाकिस्तानी मीडिया भी सेना के कंट्रोल में है।

यह भी पढ़ें: पाकिस्तान में चुनाव होना ही लोकतंत्र की जीत है

 

नवाज शरीफ को पकिस्तान में भारत के प्रति नरम रुख का नेता माना जाता है। इस छवि को बदलने के लिए नवाज शरीफ ने पाक अधिकृत कश्मीर के चुनाव में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहानी वानी की हत्या का विरोध किया था।  इस रुख से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के चुनाव  में तो जीत मिल गयी लेकिन भारत के प्रति बनी उनकी छवि में अभी कोई बदलाव नहीं आया है। नवाज की पार्टी के इस छवि को तोड़ने के लिए शाहबाज शरीफ ने अभी हाल में ही एक रैली में कहा कि 'पाकिस्तान,भारत से हल मामलें में अच्छा है।  मैं वजीर ए आजम बना तो पाकिस्तान को भारत से बेहतर बना दूंगा। अगर मैं अपने दुश्मन भारत से पाकिस्तान को आगे नहीं ले गया तो मेरा नाम बदल देना'। कहने का मतलब यह है कि पाकिस्तान के चुनाव में भी वही खेल होते हैं जो भारत  के चुनाव में होते हैं। पहले से चली आ रही नफरत की धारणाओं को और मजबूत कर वोट बटोरने की कोशिश की जाती है। जबकि  पीपीपी,पीटीआई और पीएमएल नवाज के चुनावी मेनिफेस्टो भारत के साथ बातचीत के आधार पर किसी भी तरह के झगड़े की सुलझाने की बात करते हैं। और कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त  राष्ट्र सुरक्षा परिषद के रिजोलुशन के ढांचे के अंतर्गत बातचीत करने की बात करते हैं। पीटीआई और पीएमएल नवाज के मेनिफेस्टो की एक खास बात यह है कि दोनों के मेनिफेस्टो में पाकिस्तान और चीन सम्बन्ध पर एक अलग सेक्शन बनाकर बात की गयी है। यह पाकिस्तान के लिए चीन के महत्व को दर्शाता है। पाकिस्तान में अमेरिका और सऊदी अरब  का दबदबा हमेशा से रहा है लेकिन अब चीन भी इस दबदबे का दावेदार चूका है। 

पाकिस्तान की नेशनल असेम्ब्ली की 342 सीटों में  272 सीटों पर सीधे जनता द्वारा प्रतिनिधि चुना जाता है। इसमें से पंजाब प्रोविन्स को 141,सिंध को 61,खैबर पख्तूनख्वा को 39 और बलूचिस्तान के हिस्से में 16  सीटें आती हैं।  बाकी 15 सीटों का बंटवारा दो राज्यक्षेत्र इस्लामाबाद(12  ) और फाटा(3) के बीच होता है। इससे यह साफ है कि पाकिस्तान  की चुनावी राजनीती का गढ़ पंजाब है।  जिसने पंजाब जीत लिया,उसने पाकिस्तान जीत लिया। 2013 के चुनाव में नवाज शरीफ की पार्टी ने अपने 126 जीती हुई सीटों में से 118 सीटें पंजाब से जीती थीं। लेकिन अबकी बार मामला थोड़ा अलग है। नवाज शरीफ की चुनावी अयोग्यता के बाद  शरीफ की पार्टी के कई शरीफजादें  पार्टी छोड़कर पीटीआई में शामिल हो चुके हैं।पंजाब के कुछ पॉकेट में पीटीआई मजबूत पार्टी बन रही है।  बाकी पाकिस्तान के तीनों प्रांतों में नवाज शरीफ की पार्टी के बजाए शेष और रीजनल लेवल की पार्टियों का दबदबा है। 

खैबरपख्तूनख्वा में पीटीआई और धार्मिक पार्टियों के सामने सेक्युलर लेफ्टिस्ट आवामी नेशनल पार्टी का जनाधार बहुत कमजोर है। हालांकि सेक्युलर लेफ्टिस्ट आवामी नेशनल पार्टी अबकी बार मजबूती से चुनाव लड़ रही है।  साल 2013 में पीटीआई ने यहां से नेशनल असेंबली  की 29 में से 17 सीटें जीतीं थीं और प्रोविंसियल असेंबली  में सरकार बनाया था। इस समय खैबरपख्तूनख्वा इमरान खान की पार्टी का गढ़ बन चूका है।  बिलावल भुट्टो की अगुवाई में चुनाव लड़ रही पीपीपी का जनाधार सिंध का ग्रामीण इलाका है। साल 2013 में इस इलाके से पीपीपी ने 31 सीटों में से 30 सीटें जीतीं थी। बलूचिस्तान में किसी भी नेशनल पार्टी का दबदबा नहीं है।  यहां पर हमेशा आर्मी का दबदबा रहता है।आर्मी के सहारे पनपी बलूचिस्तान आवामी पार्टी इस बार बलूचिस्तान की चुनावी दौड़ में आगे चल रही है। 

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित हाफिज सईद का संगठन जमात उद दावा भी अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहा है।  इनके चुनावी प्रचार में मुस्लिम धर्म की पवित्रता और भारत के प्रति नफरत का इस्तेमाल सबसे अधिक किया जा रहा है। यह पार्टी नेशनल असेम्ब्ली  के तकरीबन 80 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कुछ और धार्मिक आधार की पार्टियां जैसे पाकिस्तान राह-ए-हक पार्टी,कट्टर बरेलवी फ्रंट की पार्टी बरेलवी- तहरीके-लबाइक भी चुनाव लड़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये पार्टियां भले बहुत कम सीटें जीतें लेकिन दावेदार पार्टियों के लिए वोट कटवा पार्टी साबित होंगी। इन पार्टियों से सबसे अधिक खतरा इमरान खान की पार्टी को है। क्योंकि इन सभी का जनाधार पाकिस्तान के कट्टर समूह हैं।

इस लिहाज से पाकिस्तानी समाज के मजबूत वर्ग जैसे कि जमींदारी और अमीर लोगों में सेना का दबदबा,सेना और इमरान खान के बीच का गठजोड़ और नवाज शरीफ के प्रति गढ़ी गयी लुटेरे डाकू की छवि मिलकर पाकिस्तान की राजनीति की रुपरेखा तय कर रहे हैं। 

 

Elections in Pakistan
Pakistan
Imran Khan
Nawaz Sharif
Pakistan Army

Related Stories

जम्मू-कश्मीर के भीतर आरक्षित सीटों का एक संक्षिप्त इतिहास

पाकिस्तान में बलूच छात्रों पर बढ़ता उत्पीड़न, बार-बार जबरिया अपहरण के विरोध में हुआ प्रदर्शन

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

शहबाज़ शरीफ़ पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री निर्वाचित

कार्टून क्लिक: इमरान को हिन्दुस्तान पसंद है...

इमरान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के लिए पाक संसद का सत्र शुरू

पकिस्तान: उच्चतम न्यायालय से झटके के बाद इमरान ने बुलाई कैबिनेट की मीटिंग

पाकिस्तान के राजनीतिक संकट का ख़म्याज़ा समय से पहले चुनाव कराये जाने से कहीं बड़ा होगा

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?

पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के पीछे क्या कारण हैं?


बाकी खबरें

  • medical camp
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: सोनभद्र के सिंदूर मकरा में क़हर ढा रहा बुखार, मलेरिया से अब तक 40 आदिवासियों की मौत
    30 Nov 2021
    प्रशासन सिर्फ़ 20 मौतों की पुष्टि कर रहा है। सरकारी दावों के उलट रिहंद जलाशय की तलहटी में बसे सिंदूर मकरा गांव में उदासी और सन्नाटा है। बीमारी और मौत से आदिवासी ख़ासे भयभीत हैं। आदिवासियों की लगातार…
  • Honduras President
    उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: मध्य अमेरिका में एक और कास्त्रो का उदय
    30 Nov 2021
    वामपंथी पार्टी की शियोमारा कास्त्रो बनेंगी होंदुरास की पहली महिला राष्ट्रपति। रविवार को हुए राष्ट्रपति पद के चुनावों में कास्त्रो ने सत्तारूढ़ नेशनल पार्टी नासरी असफुरा को पीछे छोड़ दिया है।
  •  Mid Day Meal Workers
    सरोजिनी बिष्ट
    बंधुआ हालत में मिड डे मील योजना में कार्य करने वाली महिलाएं, अपनी मांगों को लेकर लखनऊ में भरी हुंकार
    30 Nov 2021
    मिड डे मील योजना में काम करने वाली रसोइयों का आक्रोश उस समय सामने आया जब वे अपनी मांगों के साथ 29 नवम्बर को लखनऊ के इको गार्डेन में "उत्तर प्रदेश मिड डे मील वर्कर्स यूनियन" के बैनर तले एक दिवसीय धरने…
  • workers
    मुकुंद झा
    निर्माण मज़दूरों की 2 -3 दिसम्बर को देशव्यापी हड़ताल,यूनियन ने कहा- करोड़ों मज़दूर होंगे शामिल
    30 Nov 2021
    भारत की निर्माण मज़दूर फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखबीर ने कहा कि इस हड़ताल में केंद्रीय मुद्दों के साथ साथ राज्य के अपने मुद्दे भी शामिल होंगे। इस हड़ताल में हरियाणा और राजस्थान के कई जिलों में…
  • UP farmers
    प्रज्ञा सिंह
    पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसान बनाम हिंदू पहचान बन सकती है चुनावी मुद्दा
    30 Nov 2021
    किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सामाजिक पहचान बदल दी है, उत्तरप्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में यहां से 122 सीटें हैं और अगले साल की शुरुआत में यहां चुनाव होने हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License