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रोहिणी सेप्टिक टैंक: ‘जबरन सीवर में उतारा गया, हादसे के बाद मरने के लिए छोड़ दिया’
ग्राउंड रिपोर्ट: दिल्ली के रोहिणी इलाके में स्थित भाग्य विहार में मंगलवार को सेप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे दो मजदूरों की मौत हो गई जबकि तीन अन्य बुरी तरह घायल हैं।
अमित सिंह
09 May 2019
रोहिणी सेप्टिक टैंक
(सीवर टैंक की सफाई के दौरान हुए हादसे के शिकार लोगों के परिजन )

‘मेरे पति गणेश को सीवर में जबर्दस्ती उतारा गया। वह दिहाड़ी मजदूर थे। सीवर के बारे में उसे ज्यादा पता नहीं था। प्लाट के मालिक ने दिहाड़ी रोकने की बात कहकर उसे उतारा था। जब सीवर में वह बेहोश हो गया तो उसे निकालने में घंटे भर की देरी हुई। लोग सीवर में बेहोश थे लेकिन किसी ने उन्हें बाहर नहीं निकाला। उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया।’ 

ये कहते हुए संगीता का गला भर आया...।

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                                (मृतक गणेश शाह की पत्नी संगीता व परिजन)

संगीता की आंखों में आंसू छलक रहे थे। संगीता के पति गणेश शाह की मंगलवार को दिल्ली के रोहिणी इलाके के भाग्य विहार में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हो गई थी।

इस दु:खद घटना में भाग्य विहार में रहने वाले गणेश शाह के अलावा दीपक उर्फ लंबू की भी मौत हो गई थी। इसके अलावा रामवीर सिंह, बबलू और शेर सिंह बुरी तरह से घायल हो गए हैं। ये सभी संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल के आईसीयू में भर्ती हैं। ये लोग भी दिहाड़ी पर काम कर रहे थे।  

खास बात ये है कि इस हादसे में मरने वालों में कोई भी सीवर सफाईकर्मी नहीं था। पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि उन्हें जबर्दस्ती सीवर में उतारा गया और उनकी सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा गया।

संगीता निर्माण कार्य चल रही जगह के मालिक गुलाम मुस्तफा से खासी नाराज दिखीं। उन्होंने कहा, 'सीवर में जब हादसा हो गया और जब लोग बेहोश होने लगे। उसके करीब घंटे भर बाद उन्हें बाहर निकाला गया। इससे उनकी जान को खतरा ज्यादा हो गया था। हॉस्पिटल में डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाए।'

गणेश शाह अपने परिवार में इकलौते कमाने वाले थे। वे संगीता के साथ भाग्य विहार इलाके में ही किराये पर एक कमरा लेकर रहते थे। उनके तीन छोटे बच्चे हैं। सास ससुर ने पति के साथ उन्हें पहले ही घर से निकाल दिया था। उनकी मौत के बाद अब संगीता को कोई सहारा देने वाला नहीं हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी लंबू उर्फ दीपक की है। उनका भी घर भाग्य विहार में ही है। उनकी मां सोनिया ने बताया, 'दीपक चार भाईयों में सबसे बड़ा था। ज्यादा पढ़ाई लिखाई न कर पाने के कारण वह दिहाड़ी मजदूरी करता था लेकिन आप किसी से भी पूछ लीजिए मेहनत करने से वह कभी भी पीछे नहीं हटा। वह सभी का ख्याल रखता था। मेरे लिए उसकी मौत असहनीय हैं। पिछले साल मेरे एक बेटे की मौत भी एक दुर्घटना में हो गई थी।' इतना कहते कहते सोनिया अचेत हो जाती हैं।

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                                                                      ( मृतक दीपक की मां सोनिया )

इन सारे लोगों का घर जिस इलाके में है। वहां की गंदगी सरकारी व्यवस्था पर तमाम सवाल खड़ा करती है। दिल्ली के विभिन्न इलाकों में सफाई से लेकर तमाम काम करने वाले इन लोगों के मोहल्ले में जगह जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। कई जगहों में खुली गंदी नालियां सड़क पर बह रही थी और सड़कों का हाल बहुत ही खराब था।

इस हादसे में घायल शेर सिंह अभी आईसीयू में हैं। वे भी इसी मोहल्ले में किराये का कमरा लेकर रहते हैं। शेर सिंह ने ज्यादा पढ़ाई लिखाई नहीं की है और वे भी दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उनकी पत्नी सोनी शेर सिंह के बारे में बात करते हुए रोने लगती हैं। आठवीं तक पढ़ी सोनी के तीन बच्चे हैं। एक बच्चे को गोद में लिए सोनी बस इतना कहती हैं कि वे चाहती हैं कि उनका पति जिंदा वापस लौट आए।

उन्होंने कहा, 'पहले तो मुझे गुस्सा था कि उन्हें जबर्दस्ती सीवर में उतारा गया और जब वो बेहोश हो गए तो घंटे भर बाद अस्पताल ले जाया गया लेकिन अब लगता है कि वो जिंदा वापस आ जाएं तो बहुत है। मैं इन तीन बच्चों को अकेले नहीं पाल सकती।'

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                                                                 ( शेर सिंह की पत्नी सोनी व उनके बच्चे)

आपको बता दें कि भाग्य विहार इलाके में 40 स्क्वायर यार्ड प्लॉट के मालिक गुलाम मुस्तफा ने हाल ही में मरम्मत का काम शुरू कराया था। वह पुराने मकान को तोड़कर भूतल और पहली मंजिल पर निर्माण करा रहा था। इस मकान में कई साल पुराना सेप्टिक टैंक बना हुआ था, जो करीब दस फुट गहरा था। टैंक की कभी सफाई नहीं हुई थी। 

मंगलवार को मिस्त्री रामवीर और मकान मालिक मुस्तफा ने दोनों मज़दूरों को सफाई के लिए टैंक में उतरने के लिए कहा। पुलिस के अनुसार, मज़दूरों ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे इस काम के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं।

इसके बाद मुस्तफा और रामवीर ने कथित रूप से उनकी तीन दिन की मजदूरी काटने की धमकी दी। पुलिस ने बताया कि जब मज़दूर टैंक में अचेत हो गए तब मिस्त्री भी अंदर घुसा और वह बेहोश हो गया।

गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज

इस मामले को लेकर पुलिस ने आईपीसी की धारा 304 (गैर इरादतन हत्या), अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम की धारा 3 और मैनुअल स्केवेंजर्स और उनके पुनर्वास अधिनियम के रूप में रोजगार का निषेध की धाराओं के तहत प्रेम नगर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कर लिया। मुस्तफा को गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस के मुताबिक प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि मजदूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे।

लगातार मौतें

गौरतलब है कि सीवर में उतरकर इस तरह जान गंवाने की यह पहली घटना नहीं है। देश की राजधानी में ही इस तरह की घटनाएं आए दिन हो रही हैं।

हाल ही में इससे पहले 2 मई को नोएडा सेक्टर 107 में स्थित सलारपुर में देर रात सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी। दोनों के शव पानी के साथ निकली मिट्टी से दब गए थे।

मृतकों की पहचान हामिद और असलम के रूप में की गई थी। दोनों मजदूर मूल रूप से बदायूं के रहने वाले थे और वहां जहांगीरपुरी में किराये के मकान में रहते थे। दोनों नोएडा अथॉरिटी में संविदा कर्मचारी थे, जो एक ठेकेदार के अधीन सलारपुर गांव में प्राधिकरण द्वारा कराए जा रहे सीवर लाइन की खुदाई का काम कर रहे थे।

बीते 15 अप्रैल को दिल्ली से सटे गुड़गांव के नरसिंहपुर में एक ऑटोमोबाइल कंपनी में सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई थी। इससे पहले जनवरी महीने में उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर में सीवर लाइन साफ करने गए एक सफाईकर्मी की दम घुटने से मौत हो गई थी।

प्रतिबंधित है मैनुअल स्कैवेंजिंग

आपको बता दें कि 2013 में बने कानून के मुताबिक मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोना प्रतिबंधित है। बिना किसी सुरक्षा के साधनों के लोगों को सीवर या सेप्टिक टैंक में उतारकर सफाई करवाना मैनुअल स्कैवेंजिंग के तहत आता है। लेकिन इसके बावजूद पूरे देश से इस तरह की खबरें आती रहती हैं। अगर इनके आंकड़ों पर जाएं तो यह सूरत और भयावह नजर आती है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में सीवर में दम घुटने से 172 लोगों की मौत हुई थी। वहीं साल 2017 में इस तरह के 323 मौत के मामले सामने आए। तो वहीं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग यानी एनसीएसके के मुताबिक 2017 के शुरुआत के बाद हर पांचवें दिन एक सफाईकर्मी सेप्टिक टैंक सफाई करते हुए मर रहा है।

हालांकि इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है लेकिन पिछले दिनों मैला ढोने की प्रथा खत्म करने के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के गठबंधन राष्ट्रीय गरिमा अभियान द्वारा 11 राज्यों में कराए गए सर्वेक्षण में यह सामने आया कि ज्यादातर मामलों में न तो एफआईआर दर्ज की गई है और न ही पीड़ित के परिजनों को कोई मुआवजा दिया गया था। 

रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह के 59 प्रतिशत मामलों में कोई भी एफआईआर दायर नहीं की गई है। वहीं 6 प्रतिशत मामलों में परिजनों को ये जानकारी नहीं है कि एफआईआर दायर हुई है या नहीं। कुल मिलाकर सिर्फ 35 प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर दायर की गई है। वहीं सिर्फ 31 प्रतिशत मामलों में पीड़ित को मुआवजा दिया गया।

सरकारों का संवेदनहीन रवैया

सफाई कर्मचारियों को लेकर सरकार का रवैया भी असंवेदनशील रहा है। 27 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत सरकार मामले में आदेश दिया था कि 1993 से लेकर अब तक सीवर में दम घुटने की वजह से मरे लोगों और उनके परिवारों की पहचान की जाए और हर एक परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चार साल बीत जाने के बाद भी अभी तक आयोग के पास सिर्फ मृतकों की संख्या की ही जानकारी है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के पास यह जानकारी भी नहीं है कि देश में कुल कितने सफाईकर्मी हैं। 

आपको बता दें कि यूरोप और दूसरे विकसित देशों में सफाई के लिए आधुनिक यंत्रों का इस्तेमाल होता है और ऐसे में वहां सफाईकर्मियों की मौत की घटनाएं न के बराबर होती हैं। लेकिन हमारे यहां ‘स्वच्छ भारत’ का नारा तो है मगर केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक किसी को सफाई कर्मियों की चिंता नहीं है, जिसके चलते ऐसे हादसे लगातार हो रहे हैं। 

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