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बेरोज़गारी की मार: 50 लाख औद्योगिक कामगारों और 62 लाख प्रोफेशनल कर्मचारियों की नौकरियां ख़त्म
पिछले एक साल में 50 लाख औद्योगिक कामगारों और 62 लाख प्रोफेशनल कर्मचारियों के साथ 1.1 करोड़ दिहाड़ी मजदूरों का भी रोज़गार छिन गया है.
सुबोध वर्मा
21 Sep 2020
बेरोज़गारी की मार

देश में पिछले एक साल के दौरान 62 लाख व्हाइट कॉलर कर्मचारियों और 50 लाख औद्योगिक कामगारों से उनकी नौकरियां ले ली गई हैं। व्हॉइट कॉलर पेशेवर कर्मचारियों में सरकारी और निजी संगठनों में काम करने वाले इंजीनियर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, फिजिशियन, टीचर, अकाउंटेंट्स और एनालिस्ट शामिल हैं। इनमें स्वरोज़गार  करने वाले डॉक्टर और प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले वकील और चार्टर्ड अकाउंटेंट शामिल नहीं हैं। जिन कामगारों को काम से निकाला गया है उनमें बड़े-छोटे सभी तरह के उद्योग में काम करने वाले लोग शामिल हैं।

लेकिन सबसे ज्यादा काम दिहाड़ी मजदूरों का छिना है। चाहे शहर में दिहाड़ी करने वालों या गांवों में, सब जगह एक रफ्तार से लोग बेरोज़गार हुए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के मुताबिक पिछले साल की तुलना में इस साल अगस्त तक ऐसे 1.1 करोड़ रोज़गार छिन चुके हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी की यह भयावह तस्वीर CMIE की ओर से जारी नए आंकड़ों से सामने आई है। CMIE  का यह आंकड़ा उनके चार महीनों में किए जाने वाले ‘Waves’ या घर-घर में जाकर किए जाने वाले सर्वे पर आधारित हैं। इसमें इस साल मई से लेकर अगस्त तक का समय कवर किया गया है। (देखें नीचे दिया गया चार्ट)

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इससे पहले CMIE ने रिपोर्ट दी थी कि अगस्त 2019 से लेकर अगस्त 2020 तक वेतन पाने वाले 2.1 करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। इनमें न सिर्फ व्हाइट कॉलर प्रोफेशनल हैं, बल्कि अनौपचारिक सेक्टर में सर्विस देने वाले लोग जैसे रसोइये, मेड, सिक्योरिटी गार्ड आदि भी शामिल हैं। मासिक वेतन पाने वाले कितने लोगों की नौकरियां गई हैं, इसका आंकड़ा अब आया है। एक गौर करने वाली बात यह है कि जुलाई और अगस्त में आंशिक तौर पर लॉकडाउन हटने के बावजूद लोगों की नौकरियां गई हैं। वेतन पाने वाले 48 लाख लोग जुलाई और 33 लाख लोग अगस्त में अपनी-अपनी नौकरियों से हाथ धो बैठे।

1.1 करोड़ दिहाड़ी मजदूरों का रोज़गार खत्म

CMIE के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि खेती में रोज़गार बढ़ा है। 2019-20 में खेती में औसतन 11 करोड़ लोगों को रोज़गार मिल रहा था। जबकि अगस्त में ये बढ़ कर 12.5 करोड़ हो गए। यानी 1.4 करोड़ रोज़गार का इजाफा। लेकिन पिछले साल दिहाड़ी खेत मजदूरों की संख्या 12.8 कृषि रोजगारों से 1.1 करोड़ कम ही रही। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें कहीं और रोज़गार नहीं मिल सकता। लिहाजा वे कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मैनुअल काम करने को बाध्य हैं। ये लोडिंग-अनलोडिंग, मौसम के मुताबिक खेत मजदूरी या कृषि प्रंसस्करण यूनिटों में मजदूरी करते हैं। इनमें औद्योगिक इलाकों और प्राइवेट सेक्टर में रोजाना मजदूरी के हिसाब से काम करने वाले लोगों की बड़ी तादाद भी शामिल है, जिनकी मार्च में पहला लॉकडाउन घोषित होते ही छुट्टी कर दी गई। अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार (स्लोडाउन) ने कंस्ट्रक्शन सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित किया है और इससे रोज़गार में भारी कमी आई है।

लॉकडाउन के झटके से उबर कर रोज़गार के पिछले साल के स्तर तक पहुंचने वाले लोगों में दो वर्ग के लोग ही शामिल हैं। ये हैं- एंटरप्रेन्योर और क्लर्की का काम करने वाले कर्मचारी ( इनमें डेस्क पर काम करने वाले सेक्रेट्री, बीपीओ/केपीओ वर्कर, डेटा एंट्री ऑपरेटर शामिल हैं)। हो सकता है कि वर्क फ्रॉम होम सिस्टम से निचले स्तर के व्हाइट कॉलर कर्मचारियों की नौकरियां बच जाएं, लेकिन इस तरह के दूसरे पेशेवरों से उनकी स्थिति इस मामले में अलग है। सिर्फ निचले स्तर के व्हाइट कॉलर कर्मचारियों की नौकरियां फिलहाल बची रहने से यह नहीं कहा जा सकता है कि सभी की नौकरियां सुरक्षित हैं।

एंटरप्रेन्योर की तादाद बढ़ने के मामले की दूसरे देशों की स्थिति के साथ तुलना करने की जरूरत नहीं है। दरअसल पिछले कुछ सालों में एंटरप्रेन्योर की तादाद बढ़ी है, भले ही बेरोज़गारी में इजाफा क्यों नहीं हो रहा हो। हुआ यह है कि एंटरप्रेन्योर स्वरोज़गार करने वाले ऐसे लोग हैं, जिनके पास कोई कर्मचारी नहीं है। ये सिर्फ सर्विस देते हैं या रिटेल कारोबार में लगे हुए हैं। अपना काम करने वाले लोग ये लोग एंटरप्रेन्योर में गिने जाने लगे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा है, वह 24-25 मार्च को अचानक लगाए गए लॉकडाउन का नतीजा है। दो महीने के लॉकडाउन के बाद इसमें कुछ छूट दी गई लेकिन लगता है कि इसका नकारात्मक असर अर्थव्यवस्था पर लंबे वक्त तक रहने वाला है। यह याद रहे कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले साल ही काफी धीमी हो गई थी। यह कोरोना संक्रमण से पहले का वक्त था। अब लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था और ज्यादा तेजी से नीचे जाती हुई लग रही है।

कौन हैं नौकरियों से निकाले गए ये औद्योगिक कामगार?

CMIE के एक अन्य डेटा के विश्लेषणों के मुताबिक नौकरी गंवाने वाले ज्यादातर औद्योगिक कामगार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग यानी MSME में काम करने वाले कामगार हो सकते हैं। शेयर बाजार में सूचीबद् 1300 कंपनियों के तिमाही वित्तीय नतीजों के विश्लेषण के बाद CMIE का कहना था कि अप्रैल-जून तिमाही में मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों का GVA ( Gross value Added)  41 फीसदी घट गया। इस दौरान इन कंपनियों का वास्तविक मजदूरी का खर्चा ( Real wage bill) 15 फीसदी घट गया। इससे ऐसा लगता है कि बड़ी कंपनियों में नौकरियां कम हो गई हैं या फिर लोगों को वेतन मिलना बंद हो गया है। हो सकता है कुछ जगह पर दोनों स्थितियां पैदा हो गई हों। कुछ उद्योगों में ज्यादा नौकरियां गई होंगी। जैसे, एफएमसीजी कंपनियों में काम करने वाले लोगों की नौकरियां ज्यादा गई होंगी और फर्टिलाइजर कंपनियों में कम लोगों को हटाया गया होगा। एफएमसीजी कंपनियों में काम करने वाले लोग ज्यादा संख्या में इसलिए घटाए गए होंगे क्योंकि पिछले साल से ही परिवारों में उपभोक्ता खर्च घटा है। लोग जरूरी सामानों के अलावा दूसरी चीजें खरीदने से बच रहे हैं।

लिहाजा, इस बात की काफी संभावना है कि पिछले साल जो 50 लाख नौकरियां खत्म हुई हैं वे ज्यादातर छोटे औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले लोगों की होंगी। दरअसल एमएसएमई सेक्टर को पिछले कुछ साल से झटके दर झटके लग रहे हैं। इसकी शुरुआत 2016 में नोटबंदी से हुई थी। इसके बाद, 2017 में आया गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी GST भी इसके लिए मुसीबत बन गया। देश के दो तिहाई श्रम बल को रोज़गार देने वाले इस सेक्टर को इन दोनों फैसलों ने हिला कर रख दिया। पिछले साल जब अर्थव्यवस्था में गिरावट शुरू हुई तब तक यह सेक्टर नोटबंदी और जीएसटी की मार से थोड़ा-थोड़ा उबरता हुआ दिख रहा था। लेकिन ठीक इसी समय कोरोना संक्रमण का कहर शुरू हो गया। इसने इस सेक्टर को पूरी तरह तबाह कर दिया। कहा जा रहा है कि इस सेक्टर की आधी से ज्यादा इकाइयां शायद ही लॉकडाउन की मार से कभी उबर सकें। 

जो लोग लॉकडाउन लगने के बाद मार्च के आखिर और अप्रैल-मई में सड़कों पर चल कर हजारों किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचने की जद्दोजहद में दिखे, वे ज्यादातर इसी संकटग्रस्त MSME सेक्टर की नौकरियों से निकाले गए लोग थे।

सरकार का खुद का आकलन है कि लगभग एक करोड़ प्रवासी कामगार लॉकडाउन के दौरान घर लौटे होंगे। इनमें से कइयों को रूरल जॉब गारंटी स्कीम यानी मनरेगा के तहत कुछ दिनों का काम मिला होगा। या फिर रबी की कटाई (अप्रैल-जून) और खरीफ की बोआई के दौरान मजदूरी मिली होगी। लेकिन यह काफी कम मजदूरी वाले अस्थायी रोज़गार हैं। इनकी मजदूरी शहरों की औद्योगिक इकाइयों में मिलने वाली मजदूरी से काफी कम होती है।

देश में जिस तेजी से जन असंतोष बढ़ रहा है, उसकी सबसे बड़ी वजह पीछे महामारी को रोकने में मोदी सरकार की नाकामी और भयावह आर्थिक हालात हैं। लेकिन लगता है सरकार हिंदू राष्ट्रवाद की अपनी अपील पर भरोसा कर रही है। उसे लगता है कि हिंदुत्व की लहर उसका बेड़ा पार करा देगी। लेकिन देश में कोरोना संक्रमण और आर्थिक भयावह का यह दोहरा संकट अभूतपूर्व है। न सिर्फ देश के सामने एक अनजाना भविष्य है बल्कि पीएम मोदी और उनके मेंटर संघ परिवार का भी आने वाला कल डगमग लग रहा है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Sacked -- 50 lakh Industrial Workers, 62 Lakh Professional Employees

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