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क्या ग़ैर बराबरी को बराबरी में ढालने के लिए एससी/एसटी को उप-वर्गीकृत किया जा सकता है?
अभी हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने आरक्षित श्रेणियों के भीतर की जातियों को उप-वर्गीकरण (sub-classification) के जरिये कोटे के भीतर कोटा की व्यवस्था की अनुमति देने का फैसला किया है। इसमें एससी/ एसटी के लिए क्रीमी लेयर की पड़ताल के क्रियान्वयन की भी माँग की गई है। यह फैसला अपने आप में पूर्व पीठ के फैसले का विरोधाभासी था।
वी. वेंकटेशन
02 Sep 2020
sc

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इण्डिया ने अपने फैसले में आरक्षित श्रेणियों के भीतर मौजूद जातियों के उप-वर्गीकरण के जरिये पहले से आरक्षित कोटे के भीतर कोटा प्रदान करने को अपनी मंजूरी दी है। इसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए क्रीमी लेयर पड़ताल की भी जरूरत को बताया है। यह फैसला पहले की पीठ के फैसले से विरोधाभाषी सुनाया गया है। वी वेंकटेशन जो कि एक वरिष्ठ कानूनी पत्रकार हैं, ने इस डिबेट के पीछे की पृष्ठभूमि और फैसले से सम्बंधित मुद्दों की इस लेख में पड़ताल की है।

                                                                      ———-

27 अगस्त के दिन सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ द्वारा, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा की गई, ने एक अन्य पाँच जजों वाली बेंच के ई.वी.चिन्नैय्या बनाम स्टेट ऑफ़ आंध्र प्रदेश वाले मामले में दिए गए फैसले से असहमति जताई है, जिसे 2005 में सुनाया गया था, और इसपर पुनर्विचार के लिए एक बड़ी बेंच जिसमें सात या अधिक न्यायाधीश होंगे के लिए रेफ़र कर दिया है।

 असहमति का प्रश्न इस बिंदु पर उठा, जैसाकि ई.वी. चिन्नैय्या मामले में अदालत का मानना था कि अनुसूचित जाति (एससी) अपने आप में एक समरूप वर्ग है, और इसलिए इसका उप-वर्गीकरण संवैधानिक तौर पर स्वीकार्य नहीं है।

वहीँ दूसरी ओर स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम दविंदर सिंह मामले में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ का मानना है कि राज्य की एससी सूची में जातियों के जमावड़े में से मात्र चुनिन्दा जातियों को कोटा प्रदान करना एससी की अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपतीय सूची के साथ छेड़छाड़ करना नहीं है। 

पीठ ने इस बात का दावा किया है कि जो जातियां इसमें पहले से आ चुकी हैं और उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो चुका है, उन्होंने अनुसूचित जातियों के लिए मुहैय्या कराये गए आरक्षण के लाभों को हड़प लिया है।

 अदालत का इस बारे में कहना था कि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार एससी समुदाय के भीतर असमानता को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। बेंच ने अपने तर्क में कहा है कि दूसरों की कीमत पर फलों से भरी पूरी टोकरी को किसी ताकतवर को मात्र समरूप वर्ग में होने के आधार पर ही नहीं दिया जा सकता है।

 राज्य को चाहिए कि वह इसे उप-वर्गीकृत करे और समान आधार पर न्याय को अपनाए ताकि राज्य की दानशीलता कुछ लोगों के हाथों में ही सिमट कर न रह जाए, और सभी के लिए समान न्याय की व्यवस्था की जा सके।

 वहीँ जो लोग उप-वर्गीकरण की माँग कर रहे हैं, वे वास्तव में एसस/एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर टेस्ट को लागू किए जाने के खिलाफ हैं।

 अब तक की कहानी का सार-संक्षेप 

 1996 में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा न्यायमूर्ति पी. रामचंद्र राजू आयोग का गठन इस बात की जांच के लिए किया गया था कि क्या अनुसूचित जाति में किसी खास उप-जाति को ही आनुपातिक तौर पर भारी संख्या में सारा लाभ मिल रहा है। यदि ऐसा पाया जाता है तो आयोग को उन सभी उपायों को भी इस बात को सुनिश्चित करने के लिए इंगित करना आवश्यक था, जिससे कि उपरोक्त लाभ एससी वर्ग की विभिन्न उप-जातियों में समान रूप से वितरित किए जा सकें।

 राजू आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एससी वर्ग के बीच समान रूप से लाभ वितरित करने के लिए कदमों को  उठाने की सिफारिश की थी। उनके अनुसार इस 15 प्रतिशत आरक्षण को विभिन्न उप जातियों की आनुपातिक जनसंख्या में विभाजित करके इसे लागू किया जाना चाहिए।

  इसके आधार पर राज्य सरकार द्वारा उन्हें आम तौर पर रेल्ली, मडिगा, माला और आदि आंध्र समुदायों के समूह में वर्गीकृत कर दिया गया था। और इसी क्रम में एससी कोटे को क्रमशः ए, बी, सी और डी के तौर पर चार श्रेणियों में वर्गीकृत कर 1, 7, 6 और 1 प्रतिशत कोटे को तय कर दिया गया था।

 एससी और एसटी (एनसीएसटी) के राष्ट्रीय आयोग द्वारा 1998 में इस वर्गीकरण को अस्वीकृत कर दिया गया था, क्योंकि 59 जातियों के बीच मौजूद असमानताओं को दूर करने के लिए यह एक अप्रभावी तरीका था और इसलिए भी क्योंकि प्रत्येक समूह के भीतर भी साक्षरता और रोजगार के मामले में व्यापक विषमताएं पहले से मौजूद हैं।

 2000 में मल्लेला वेंकट राव एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ ने इस तथ्य को स्वीकारा कि एससी के भीतर मौजूद जातियां भी एक दूसरे के समान नहीं हैं। ऐसे में यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह जातियों की इस सूची में से विशिष्ट जातियों के उत्थान की जरूरतों और आवश्यकताओं के अनुरूप आरक्षण के वितरण को तय करे। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिबेरहान ने अपनी विवेचना में कहा था कि यह मुद्दा कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक है। समाज को और अधिक आपदा से बचाने के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक प्रतिनिधि इस मामले में समुचित कदम उठाएं।

 उच्च न्यायालय के मत में “जातियों के एक समुच्चय को एक जाति के तौर पर मानने का अर्थ है पूर्ण-रूपेण वंचित तबके को उन लोगों के पैरों तले प्रस्तुत करने का काम करना, जो उनकी तुलना में कम वंचित हैं और खासतौर पर वे जो पहले से ही बेहतर पेशेवर और बौद्धिक अवसरों से दो-चार हो चुके हैं। यह राज्य प्रदत्त उदारता को कुछ चुनिन्दा लोगों द्वारा हड़पने की प्रवित्ति को प्रोत्साहित करेगा, वहीँ अन्य के लिए यह अवसरों से वंचित करने का मार्ग प्रशस्त करता है।”

 न्यायमूर्ति बिलाल नाज़की द्वारा इसपर असंतोष दर्ज करते हुए कहा गया था कि उप-वर्गीकरण का आधार जातियां थीं, जोकि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 द्वारा निषिद्ध है। क्योंकि सिर्फ जातीय आधार पर किसी भी प्रकार का वर्गीकरण करना इस अनुच्छेद के नियम के विरुद्ध है।

 उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक का सफर 

इसके बाद यह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा, जिसने 2004 में ई.वी. चिन्निया बनाम स्टेट ऑफ़ आंध्र प्रदेश के फैसले को उलट दिया। इसके बारे में यह माना जाता है कि संविधान ने खुद ही एससी/एसटी सूची को राज्य सरकारों द्वारा हस्तक्षेप कर सकने की सूची से बाहर रखा है।

 जबकि पीठ का दावा है कि एससी, एसटी, और एसईबीसी के लिए अलग-अलग मानदण्डों को अपनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन ऐसे में यदि उप-वर्गीकरण को सिर्फ एसईबीसी के लिए स्वीकार्य बना दिया जाता है, तो पीठ इस प्रश्न का उत्तर नहीं देती है कि ऐसा क्यों नहीं।

 यदि आरक्षण का उद्देश्य किसी वर्ग के पक्ष में सकारात्मक कार्यवाही करने का है जो सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग से सम्बद्ध है तो इस तरह के वर्ग को एक बार और विभाजित नहीं किया जा सकता है, जिसमें एससी के बेहद छोटे से हिस्से को ज्यादा वरीयता देने का उपक्रम किया जा सके।

 संविधान की खंडपीठ ने अपने तर्क में कहा था कि विभिन्न जातियों या जनजातियों को एक समूह के तौर पर रखने के विचार के पीछे ही यह भावना निहित थी कि उन्हें इसके बाद उप-विभाजित या उप-वर्गीकृत नहीं किया जाएग। यदि उन सभी में आरक्षण का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो पा रहा है, तो इस सम्बंध में उचित उपाय उठाये जाने चाहिए, जिसमें कि उन्हें इतने पर्याप्त या अतिरिक्त प्रशिक्षण प्राप्त हो सकें ताकि वे दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा के योग्य बन सकें। खंडपीठ की निगाह में आरक्षण को और तर्कसंगत बनाने की प्रक्रिया में, अनुच्छेद 14 से 16 के संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।

 न्यायमूर्ति एस.बी.सिंह के मतानुसार संसद द्वारा पारित कानून के हिसाब से एससी की सूची में से केवल जातियों के निष्कासित करने के काम को ही क़ानूनी तौर पर लागू किया जा सकता है, नाकि जाति के आधार पर एससी समुदाय के उप-वर्गीकरण के काम को। वहीँ न्यायमूर्ति एच.के.सेमा के विचार में राज्य विधायिका द्वारा समरूप समूहों के और आगे वर्गीकरण या पुनर्गठन के काम को अनुच्छेद 341 के तहत जारी किए गए राष्ट्रपति अधिसूचना से छेड़छाड़ करना माना जाएगा, जो संवैधानिक तौर पर अनुचित है। इसे भेदभाव को उल्टी दिशा में मोड़ देने वाला करार देते हुए उनका कहना था कि यह अनुच्छेद 14 के प्रकोप को आकृष्ट करने वाला साबित होग। यह एक प्रचलित कानून है जिसमें यह मानकर चला जाता है कि सबको समान न्याय हासिल हो और अन्य ग्रुपों की कीमत पर एक ग्रुप को न्याय देना अन्याय को बरकरार रखने का ही एक और तरीका है। 

 ई वी चिन्निया और पंजाब केस  

 दविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति से आते थे। एक लेक्चरर के तौर पर उनकी नियुक्ति को प्रोबेशन पीरियड के बाद निरस्त कर दिया गया था, क्योंकि यह अनुसूचित जाति में पूर्व-निर्धारित व्यक्तिगत उप-जाति कोटे से अधिक लोगों की नियुक्ति का मामला था। उच्च न्यायालय ने पंजाब एससी और बीसी आरक्षण की धारा 4 (5) को सेवा अधिनियम, 2006 के तहत असंवैधानिक घोषित कर दिया। प्रावधान के अनुसार रिक्तियों को प्रथम वरीयता के आधार पर बाल्मीकि जाति द्वारा 50 प्रतिशत और मजहबी जाति से 50 प्रतिशत लोगों द्वारा भरा जाना था।

 हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले को एक बड़ी बेंच को रेफर किये जाने का फैसला वर्तमान परिस्थितियों के लिहाज से उचित है, लेकिन खंडपीठ ने जिन आधारों का हवाला दिया है वे बेहद कमजोर बुनियाद पर टिके हैं। 

 उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में राज्य सरकार को निर्देशित किया था कि वह आदेश के एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता के दावे पर फैसला लेना होगा। न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल ने बताया कि राज्य इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय के ई.वी. चिन्नैय्या वाले फैसले की उपादेयता को अलग करके नहीं देख पा रहा था।

 सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील में, पंजाब राज्य ने दावा किया कि इस मामले में ई.वी.चिन्नैय्या वाला फैसला लागू नहीं किया जा सकता है, और उसने ई.वी.चिन्नैय्या पर पुनर्विचार के लिए सात न्यायाधीशों वाली खंडपीठ नियुक्त किये जाने की मांग की। अब इस माँग को सुप्रीम कोर्ट की पाँच-जजों की बेंच द्वारा 27 अगस्त को एक संदर्भ के तौर पर पेशकर इसकी इजाजत दे दी है।

 वैसे अभी तक इस मामले में केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कोई स्पष्ट रुख नहीं रखा है। ई.वी. चिन्नैय्या में आये फैसले के बाद से आंध्र प्रदेश विधानसभा द्वारा 10 दिसंबर, 2004 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया थ, जिसमें केंद्र से सिफारिश की गई थी कि वह इसे मुद्दे को संसद के समक्ष पेश करे। उस दौरान केंद्र द्वारा 2006 में इस मुद्दे की जांच के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश ऊषा मेहरा की अध्यक्षता में एक आयोग को गठित किया गया था।

 उषा मेहरा आयोग ने 2008 की अपनी रिपोर्ट में पाया कि आंध्र प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित आरक्षण का प्रमुख हिस्सा माला, आदि द्रविड़ एवं आदि आंध्र जैसी कुछ चुनिन्दा जातियों के बीच ही सिमट कर रह गया था। इस आयोग ने एससी में उप-वर्गीकरण और डी-उप-वर्गीकरण को संभव बनाने के लिए अनुच्छेद 341 में उपधारा (3) को समाहित कर संविधान में संशोधन की सिफारिश की थी।

 केंद्र के अनुसार, 14 राज्यों ने संशोधन के पक्ष में अपना समर्थन नहीं दिया था, जबकि सात राज्यों ने इसका समर्थन किया था।

जिन सात राज्यों ने इसका समर्थन किया था उनमें आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, तेलंगाना और पंजाब हैं। चूंकि अभी भी पांच राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की प्रतिक्रियाओं का इन्तजार है, जिसमें बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश, और जम्मू-कश्मीर और पुद्दुचेर्री जैसे राज्य शामिल हैं, जिनमें अनुसूचित जातियों की अच्छी-खासी आबादी है। ऐसे में केंद्र को फिलहाल संशोधन के साथ आगे बढ़ने का विचार उचित नहीं लग रहा है।

इस बारे में केंद्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट को बताया गया है कि “विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जमीनी सच्चाई उनके सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास के लिहाज से अन्य राज्यों से भिन्न हैं। ऐसे में जो चीज आंध्र प्रदेश राज्य के संबंध में सही हो सकती है, वही अन्य राज्यों के संबंध में भी हो, ऐसा संभव नहीं है। पूर्वोल्लिखित परिस्थितियों के तत्वावधान में, भारत सरकार अभी तक इस मामले को लेकर एकमत नहीं है।”

 वहीँ अनुसूचित जाति के उप-वर्गीकरण के संदर्भ में खंडपीठ द्वारा किये किये गए कुछ अवलोकन पूरी तरह से अनावश्यक और अप्रासंगिक प्रतीत होते हैं।

 27 अगस्त के फैसले को लेकर प्रश्न 

 हालाँकि परिस्थितियों के लिहाज से देखें तो सुप्रीम कोर्ट का इस मामले को एक बड़ी बेंच के हवाले करने का फैसला सर्वथा उचित प्रतीत होता है, लेकिन पीठ द्वारा जिन आधारों का हवाला दिया गया है उसे विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। सबसे पहले तो इसने उप-वर्गीकरण के प्रश्न के साथ क्रीमी लेयर वाले मुद्दे का घालमेल कर डाला है, गोया दोनों मुद्दे समान हों। यहाँ तक कि जो लोग उप-वर्गीकरण की मांग कर रहे हैं, वास्तव में वे भी एससी और एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर परीक्षण को लागू किये जाने के खिलाफ हैं।

 इसलिए सुझाव देने के लिहाज से जैसा कि अरुण मिश्रा की खंडपीठ ने किया है, कि ई.वी.चिन्नैय्या का केस सुप्रीम कोर्ट के एम. नागराज (2006) और जरनैल सिंह (2018) के साथ असंगत बैठता है – और इनका फैसला भी पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठों द्वारा लिया गया था - क्योंकि बाद के फैसलों में एससी और एसटी वर्ग से क्रीमी लेयर के लाभार्थियों को बहिष्कृत करने का समर्थन किया गया था, जोकि त्रुटिपूर्ण है।

 दूसरा यह कि खंडपीठ ने सुझाया है कि ई.वी.चिन्नैया मामले में एक बड़ी पीठ द्वारा समीक्षा करने के लिए 2018 में 102वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के जरिये अनुच्छेद 342ए को शामिल किये जाने की आवश्यकता है। जबकि अनुच्छेद 342ए राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में सामाजिक और शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) को निर्दिष्ट करने के लिए राष्ट्रपति की शक्ति को संदर्भित करता है, और एसईबीसी की केंद्रीय सूची से शामिल करने या बाहर करने के लिए संसद की शक्ति को निर्दिष्ट करता है। जबकि पीठ का दावा है कि एससी, एसटी, और एसईबीसी के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन वहीँ यदि उप-वर्गीकरण सिर्फ एसईबीसी के लिए मान्य है, तो पीठ इस सवाल पर कोई जवाब नहीं देती है कि ऐसा क्यों नहीं है।

 वहीँ पीठ की ओर से अनुसूचित जाति के उप-वर्गीकरण के सन्दर्भ में कुछ समीक्षाएं निहायत गैर-जरुरी और अप्रासंगिक प्रतीत होती हैं। इसका कहना है कि संविधान निर्माताओं द्वारा आरक्षण को हमेशा के लिए ध्यान में रखकर इसे तय नहीं किया गया था। तो इस मामले में इसके क्या मायने बैठते हैं?

 तत्पश्चात इसमें दावा किया गया कि आरक्षण अपनेआप में आरक्षित जातियों के बीच में असमानता को पैदा करने का काम करता है। एक बार फिर से यह एक गलत परिकल्पना पर आधारित है। उप-वर्गीकरण की माँग इसलिए नहीं की जा रही है कि आरक्षण ने असमानताओं को जन्म दिया है, बल्कि इसका आधार यह है कि उप-वर्गीकरण के अभाव के चलते असमान को भी समान भाव से देखा जाता है, जबकि असामनता बनी हुई है।

 (लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

लेख सर्वप्रथम द लीफलेट में प्रकाशित किया गया था।

 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-


Treating Unequals as Equals: Can SCs/STs be Sub-Categorised?

Supreme Court
supreme court on sc/st reseration
e chinaiiya case
Reservation

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