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तालिबान को आस-पास व दूर-दराज़ से मिल रहे मैत्री के प्रस्ताव 
तालिबान के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता देश पर शासन करने की है। फिलहाल इसका कोई भू-राजनीतिक अजेंडा नहीं है।
एम. के. भद्रकुमार
11 Oct 2021
taliban

हाल के दिनों में तालिबान के पास मैत्री के लिए कई प्रस्तावक आ रहे हैं। यह “बहिष्करण” से कोसों दूर है जिसके बारे में बाईडेन प्रशासन ने सोच रखा था कि ऐसा होना तय है। अकेले पिछले महीने के दौरान ही, तालिबान को इस क्षेत्र से प्रणय निवेदन से कहीं अधिक अर्थपूर्ण छह प्रस्तावक मिले थे, जिनमें क़तर के विदेश मंत्री; रूस, चीन और पाकिस्तान के विशेष दूत, ब्रिटिश प्रधानमंत्री के उच्च प्रतिनिधि; और उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री ने गुरुवार को काबुल का दौरा किया था।

इन सभी ने अपनी शुभकामनाएं व्यक्त कीं और निःस्वार्थ जुड़ाव का संकल्प लिया था। तालिबान नेतृत्व इन प्रस्तावों पर विचार कर रहा है। विडंबना यह है कि तालिबान के पास इन बाहरी शक्तियों के बीच में उभर रही कटु ईर्ष्या में फंसने का जोखिम है।

मोटे तौर कहें तो इन बाहरी शक्तियों ने दो गुटों का गठन किया है: क़तर ने ब्रिटेन एवं अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपनी खेमेबंदी कर रखी है, जबकि रूस, चीन और पाकिस्तान ज्यादातर एक दूसरे के साथ बंधन में नजर आते हैं। वहीँ उज्बेकिस्तान ने प्रत्येक शिविर में अपने एक-एक पाँव को डाल रखा है।

क़तर पश्चिम और तालिबान के बीच में एक पुल के तौर पर काम कर रहा है और यह न सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण है कि पेंटागन का मध्य कमांड दोहा में स्थित है, बल्कि इसलिए भी कि तालिबान नेताओं और उनके परिवारों ने वर्षों से कतरी राज्य की मेहमाननवाजी का आनंद लिया है और इसके लिए वे खाड़ी शासन के प्रति कृतज्ञता महसूस करते हैं।

अमेरिका के लिए विशेष तौर पर और पश्चिम के लिए सामान्य तौर पर इस चरण पर तालिबान सरकार को किसी प्रकार की मान्यता दे पाना बेहद कठिन है क्योंकि काबुल हवाईअड्डे से जिस प्रकार से अराजकतापूर्ण विदाई हुई थी, वह अभी भी सभी की स्मृतियों में ताजा है और अमेरिकी राजनीति में यह अभी भी एक जीवंत मुद्दा बना हुआ है। हालाँकि यह अलग बात है कि टीकाकरण, अर्थव्यवस्था, नौकरियां, बुनियादी ढांचा विधेयक और राष्ट्रपति बाईडेन का सामाजिक सुरक्षा जाल, जैसे घरेलू मुद्दों के अधिकाधिक केंद्रीय पटल पर आने के साथ ही यह मुद्दा तेजी से विलुप्त होता जा रहा है।

लेकिन “वैश्विक ब्रिटेन” निकलने के लिए बेताब है और उसने तालिबान अधिकारियों के साथ सीधे बातचीत की है। वास्तविकता यह है कि ब्रिटेन अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में “वापसी” करने और आज नहीं तो कल एक बार फिर से तालिबान सरकार के साथ सौदेबाजी को शुरू करने के लिए चीजों को आसान बनाने में जुट गया है। ब्रिटेन को इस बात का आभास है कि रूस-चीन-ईरान क्षेत्रीय धुरी का काबुल में वाहवाही लूटना कहीं से भी पश्चिमी हितों के पक्ष में नहीं है।

ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में नकदी के घोर अभाव के चलते पूरी तरह से बर्बाद हो जाने से रोकने के लिए पश्चिमी देशों की राजधानियों में अफगानिस्तान में, “नकदी को एयरलिफ्ट” कर आपाकालीन योजनाओं की व्यवस्था करने पर काम किया जा रहा है। इस आपतकालीन फंडिंग को मानवीय संकट को टालने के उद्देश्य से किया जा रहा है। भले ही यह सुनने में विचित्र लग सकता है, लेकिन इसका एक तरीका यह हो सकता है कि लोगों को सीधे तौर पर भुगतान करने के लिए हवाईजहाज में अमेरिकी डॉलर के नोट भरकर काबुल में बैंकों के जरिये वितरण के लिए भिजवा दिया जाये।

तालिबान सरकार को इस बारे में संवेदनशील बनाया गया है। यह बात पूरी तरह से समझ में आती है कि तालिबान एक ऐसे प्रबंधन को अपनी स्वीकृति दे सकता है जिससे पश्चिमी ताकतें (और संयुक्त राष्ट्र) सीधे तौर पर अफगान बैंकों की भरपाई कर दें।

इसके साथ ही साथ, कहने के लिए एक विश्वास मद के गठन के लिए एक समानांतर विचार भी है, जिसमें सरकारी कर्मचारियों को वेतन दिया जा सकता है और स्कूलों एवं अस्पतालों को चालू रखा जा सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका और अन्य पश्चिमी दानदाताओं की ओर से अपनी पिछली प्रतिबद्धता (सैनिकों की वापसी से पहले) के कुछ प्रारूपों को फिर से शुरू करने जा रहे हैं, जिसमें विश्व बैंक के अनुमानों के मुताबिक अफगान सरकार को फिर से चलाने के लिए कुल सरकारी खर्च का 75 प्रतिशत बैठता है (सभी अनुदानों में।)

यह कहना पर्याप्त होगा कि पश्चिमी राजधानियों में यह अहसास है कि नकदी का संकट अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बन सकता है, जिसके चलते अफगानिस्तान से पश्चिम में बड़े पैमाने पर पलायन को अग्रगति मिल सकती है। नकदी जीवनरेखा को कथित तौर पर पहले से ही एक परीक्षण के तौर पर पर स्थापित किया जा रहा है और अफगान अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह को प्रवाहित करने के लिए पाकिस्तान से हवाई माध्यम से भेजने पर विचार चल रहा है। अधिक पढ़ें 

निश्चित रूप से यह परियोजना आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव को उत्पन्न करने के साधन के रूप में मददगार साबित होगी। अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शेर्मन द्वारा ताशकंद और इस्लामाबाद का वर्तमान क्षेत्रीय दौरा ऐसा लगता है कि अफगान अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए परियोजना को अंतिम रूप देने से संबंधित है।

उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान दोनों ही अफगानिस्तान के लिए प्रवेश द्वार हैं। जहाँ तक नकदी प्रवाह का प्रश्न है तो इसके लिए पाकिस्तान से इसे करना सबसे मुफीद रहेगा, वहीँ मानवीय गलियारे के निर्माण के लिए उज्बेकिस्तान सबसे वाजिब प्रवेश द्वार है। इसके अलावा, वाशिंगटन ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण से संबंधित राहत आपूर्ति एवं अन्य सामग्रियों की प्राप्ति के स्रोत के रूप में मध्य एशियाई देशों में उत्पादन अड्डों से इसे हासिल के एक अभिनव विचार की कल्पना की है। 

मध्य एशियाई देशों को यह विचार खूब रास आ रहा है – विशेषतौर पर उज्बेकिस्तान को – जो हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और उनके मध्य एशियाई समकक्षों के बीच सी5+1 की विदेश मंत्री स्तर की बैठक में शामिल हुआ था। अधिक पढ़ें 

इस बात को कहने की आवश्यकता नहीं है कि पश्चिमी देश भू-अर्थशास्त्र पर आधारित मानवीय-सह-आर्थिक-सह-व्यापार परियोजना के पंखों पर सवार होकर अफगानिस्तान में अपनी वापसी कर रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा इसके गहन भू-राजनीतिक मकसद स्पष्ट होते जायेंगे। 

इन घटनाक्रमों ने रूस को तालिबान के साथ जुड़ने के लिए अपने मरणासन्न “मास्को प्रारूप” को फिर से क्रियाशील बनाने के लिए प्रेरित किया है। मास्को प्रारूप एक वार्ता तन्त्र है जिसे रूस द्वारा 2017 में अफगान मुद्दों को संबोधित करने के लिए स्थापित किया गया था। इसमें अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, ईरान, भारत सहित कुछ अन्य देश शामिल हैं।

इसने 2017 और 2018 में मास्को में कई दौर की बातचीत आयोजित की थी लेकिन इसके बाद जाकर यह निष्क्रिय पड़ गया। इसकी वजह यह थी कि रूस ने इस बीच ट्राइका प्लस नामक एक और ठोस विशिष्ट प्रारूप को विकसित कर लिया था, जिसमें रूस, अमेरिका, चीन और पाकिस्तान शामिल थे।

मास्को की प्राथमिकता अभी भी ट्राइका प्लस को लेकर है क्योंकि यह अफगानिस्तान पर अमेरिका के साथ काम करने के लिए अवसर की खिड़की को खोलता है। मास्को का विचार है कि अमेरिका के साथ किसी भी चुनिंदा जुड़ाव से अमेरिकी-रुसी तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है और यहाँ तक कि दोनों महाशक्तियों के बीच समग्र रिश्तों पर भी लाभकारी प्रभाव पड़ सकता है।

हालाँकि, ठीक इसी वजह से अमेरिका ट्राइका प्लस के प्रति उदासीन रवैया रखता है, अर्थात, जब वह यह सब कर पाने में खुद ही बेहतर है, क्योंकि तालिबान वैसे भी उसके लिए कोई अजनबी नहीं है तो वह इसमें मास्को के साथ वार्ता में जाकर बेकार में क्यों उलझे।

इतना तो तय है कि अफगान स्थिति पर रूस को दरकिनार करते हुए मध्य एशियाई मुल्कों का सीधे तौर पर लाभ उठाने की संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों का भूत निश्चित तौर पर सता रहा होगा। अफगान मुद्दे पर मध्य एशियाई मुल्कों के साथ किसी भी स्तर पर सहयोग के अवसर को अमेरिका निश्चित तौर पर यूरेशियाई क्षेत्र में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्से में अपने प्रभाव का विस्तार करने में अपने लाभ के लिए काम करने के रूप में देखता है, जहाँ वर्तमान में रूस और चीन अपनी अग्रणी उपस्थिति का उपभोग कर रहे हैं।

संक्षेप में कहें तो 20 अक्टूबर को मास्को प्रारूप (3 वर्षों के अंतराल के बाद) की बैठक आयोजित करने के रुसी प्रस्ताव का मकसद तालिबान के लिए अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के साथ बातचीत करने के लिए जगह बनाने की रही है। इसका दूसरा उद्देश्य तालिबान को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना है कि वह अपने रिश्तों में विविधता लाये, न कि अपने सभी अंडे पश्चिमी टोकरी में ही डाल दे।

लेकिन फिर, तालिबान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ एकीकरण को लेकर उत्सुक है और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले वित्तपोषण की गंभीरता के प्रति सचेत है। तालिबान को पता है कि इसकी चाभी वाशिंगटन के हाथ में है। दिलचस्प बात यह है कि विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तक़ी के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें वरिष्ठ ख़ुफ़िया अधिकारी भी शामिल हैं, ने आज काबुल से दोहा के लिए प्रस्थान किया है। अनुमान है कि मुत्ताकी की वहां पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत होगी।

जहाँ तक तालिबान का प्रश्न है उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता देश पर अपने शासन को स्थापित करने की है। इसका अपना कोई भू-राजनीतिक अजेंडा नहीं है। फिलहाल इसे भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि इसके कार्यकर्त्ता प्रशासन के प्रबंधन के मामले में अनुभवहीन हैं, और दूसरा यह कि देश को चलाने के लिए वित्तीय संसाधनों का घोर अभाव है। यहीं पर देश की अर्थव्यवस्था को बैंकों के जरिये प्रायोजित कर तालिबान सरकार के साथ नए संबंध बनाने की पश्चिमी रणनीति समझ में आती है।

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Taliban Receives Overtures From Near and Far

Afghanistan Crisis
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