NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
तालिबान को आस-पास व दूर-दराज़ से मिल रहे मैत्री के प्रस्ताव 
तालिबान के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता देश पर शासन करने की है। फिलहाल इसका कोई भू-राजनीतिक अजेंडा नहीं है।
एम. के. भद्रकुमार
11 Oct 2021
taliban

हाल के दिनों में तालिबान के पास मैत्री के लिए कई प्रस्तावक आ रहे हैं। यह “बहिष्करण” से कोसों दूर है जिसके बारे में बाईडेन प्रशासन ने सोच रखा था कि ऐसा होना तय है। अकेले पिछले महीने के दौरान ही, तालिबान को इस क्षेत्र से प्रणय निवेदन से कहीं अधिक अर्थपूर्ण छह प्रस्तावक मिले थे, जिनमें क़तर के विदेश मंत्री; रूस, चीन और पाकिस्तान के विशेष दूत, ब्रिटिश प्रधानमंत्री के उच्च प्रतिनिधि; और उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री ने गुरुवार को काबुल का दौरा किया था।

इन सभी ने अपनी शुभकामनाएं व्यक्त कीं और निःस्वार्थ जुड़ाव का संकल्प लिया था। तालिबान नेतृत्व इन प्रस्तावों पर विचार कर रहा है। विडंबना यह है कि तालिबान के पास इन बाहरी शक्तियों के बीच में उभर रही कटु ईर्ष्या में फंसने का जोखिम है।

मोटे तौर कहें तो इन बाहरी शक्तियों ने दो गुटों का गठन किया है: क़तर ने ब्रिटेन एवं अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपनी खेमेबंदी कर रखी है, जबकि रूस, चीन और पाकिस्तान ज्यादातर एक दूसरे के साथ बंधन में नजर आते हैं। वहीँ उज्बेकिस्तान ने प्रत्येक शिविर में अपने एक-एक पाँव को डाल रखा है।

क़तर पश्चिम और तालिबान के बीच में एक पुल के तौर पर काम कर रहा है और यह न सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण है कि पेंटागन का मध्य कमांड दोहा में स्थित है, बल्कि इसलिए भी कि तालिबान नेताओं और उनके परिवारों ने वर्षों से कतरी राज्य की मेहमाननवाजी का आनंद लिया है और इसके लिए वे खाड़ी शासन के प्रति कृतज्ञता महसूस करते हैं।

अमेरिका के लिए विशेष तौर पर और पश्चिम के लिए सामान्य तौर पर इस चरण पर तालिबान सरकार को किसी प्रकार की मान्यता दे पाना बेहद कठिन है क्योंकि काबुल हवाईअड्डे से जिस प्रकार से अराजकतापूर्ण विदाई हुई थी, वह अभी भी सभी की स्मृतियों में ताजा है और अमेरिकी राजनीति में यह अभी भी एक जीवंत मुद्दा बना हुआ है। हालाँकि यह अलग बात है कि टीकाकरण, अर्थव्यवस्था, नौकरियां, बुनियादी ढांचा विधेयक और राष्ट्रपति बाईडेन का सामाजिक सुरक्षा जाल, जैसे घरेलू मुद्दों के अधिकाधिक केंद्रीय पटल पर आने के साथ ही यह मुद्दा तेजी से विलुप्त होता जा रहा है।

लेकिन “वैश्विक ब्रिटेन” निकलने के लिए बेताब है और उसने तालिबान अधिकारियों के साथ सीधे बातचीत की है। वास्तविकता यह है कि ब्रिटेन अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में “वापसी” करने और आज नहीं तो कल एक बार फिर से तालिबान सरकार के साथ सौदेबाजी को शुरू करने के लिए चीजों को आसान बनाने में जुट गया है। ब्रिटेन को इस बात का आभास है कि रूस-चीन-ईरान क्षेत्रीय धुरी का काबुल में वाहवाही लूटना कहीं से भी पश्चिमी हितों के पक्ष में नहीं है।

ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में नकदी के घोर अभाव के चलते पूरी तरह से बर्बाद हो जाने से रोकने के लिए पश्चिमी देशों की राजधानियों में अफगानिस्तान में, “नकदी को एयरलिफ्ट” कर आपाकालीन योजनाओं की व्यवस्था करने पर काम किया जा रहा है। इस आपतकालीन फंडिंग को मानवीय संकट को टालने के उद्देश्य से किया जा रहा है। भले ही यह सुनने में विचित्र लग सकता है, लेकिन इसका एक तरीका यह हो सकता है कि लोगों को सीधे तौर पर भुगतान करने के लिए हवाईजहाज में अमेरिकी डॉलर के नोट भरकर काबुल में बैंकों के जरिये वितरण के लिए भिजवा दिया जाये।

तालिबान सरकार को इस बारे में संवेदनशील बनाया गया है। यह बात पूरी तरह से समझ में आती है कि तालिबान एक ऐसे प्रबंधन को अपनी स्वीकृति दे सकता है जिससे पश्चिमी ताकतें (और संयुक्त राष्ट्र) सीधे तौर पर अफगान बैंकों की भरपाई कर दें।

इसके साथ ही साथ, कहने के लिए एक विश्वास मद के गठन के लिए एक समानांतर विचार भी है, जिसमें सरकारी कर्मचारियों को वेतन दिया जा सकता है और स्कूलों एवं अस्पतालों को चालू रखा जा सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका और अन्य पश्चिमी दानदाताओं की ओर से अपनी पिछली प्रतिबद्धता (सैनिकों की वापसी से पहले) के कुछ प्रारूपों को फिर से शुरू करने जा रहे हैं, जिसमें विश्व बैंक के अनुमानों के मुताबिक अफगान सरकार को फिर से चलाने के लिए कुल सरकारी खर्च का 75 प्रतिशत बैठता है (सभी अनुदानों में।)

यह कहना पर्याप्त होगा कि पश्चिमी राजधानियों में यह अहसास है कि नकदी का संकट अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बन सकता है, जिसके चलते अफगानिस्तान से पश्चिम में बड़े पैमाने पर पलायन को अग्रगति मिल सकती है। नकदी जीवनरेखा को कथित तौर पर पहले से ही एक परीक्षण के तौर पर पर स्थापित किया जा रहा है और अफगान अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह को प्रवाहित करने के लिए पाकिस्तान से हवाई माध्यम से भेजने पर विचार चल रहा है। अधिक पढ़ें 

निश्चित रूप से यह परियोजना आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव को उत्पन्न करने के साधन के रूप में मददगार साबित होगी। अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शेर्मन द्वारा ताशकंद और इस्लामाबाद का वर्तमान क्षेत्रीय दौरा ऐसा लगता है कि अफगान अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए परियोजना को अंतिम रूप देने से संबंधित है।

उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान दोनों ही अफगानिस्तान के लिए प्रवेश द्वार हैं। जहाँ तक नकदी प्रवाह का प्रश्न है तो इसके लिए पाकिस्तान से इसे करना सबसे मुफीद रहेगा, वहीँ मानवीय गलियारे के निर्माण के लिए उज्बेकिस्तान सबसे वाजिब प्रवेश द्वार है। इसके अलावा, वाशिंगटन ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण से संबंधित राहत आपूर्ति एवं अन्य सामग्रियों की प्राप्ति के स्रोत के रूप में मध्य एशियाई देशों में उत्पादन अड्डों से इसे हासिल के एक अभिनव विचार की कल्पना की है। 

मध्य एशियाई देशों को यह विचार खूब रास आ रहा है – विशेषतौर पर उज्बेकिस्तान को – जो हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और उनके मध्य एशियाई समकक्षों के बीच सी5+1 की विदेश मंत्री स्तर की बैठक में शामिल हुआ था। अधिक पढ़ें 

इस बात को कहने की आवश्यकता नहीं है कि पश्चिमी देश भू-अर्थशास्त्र पर आधारित मानवीय-सह-आर्थिक-सह-व्यापार परियोजना के पंखों पर सवार होकर अफगानिस्तान में अपनी वापसी कर रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा इसके गहन भू-राजनीतिक मकसद स्पष्ट होते जायेंगे। 

इन घटनाक्रमों ने रूस को तालिबान के साथ जुड़ने के लिए अपने मरणासन्न “मास्को प्रारूप” को फिर से क्रियाशील बनाने के लिए प्रेरित किया है। मास्को प्रारूप एक वार्ता तन्त्र है जिसे रूस द्वारा 2017 में अफगान मुद्दों को संबोधित करने के लिए स्थापित किया गया था। इसमें अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, ईरान, भारत सहित कुछ अन्य देश शामिल हैं।

इसने 2017 और 2018 में मास्को में कई दौर की बातचीत आयोजित की थी लेकिन इसके बाद जाकर यह निष्क्रिय पड़ गया। इसकी वजह यह थी कि रूस ने इस बीच ट्राइका प्लस नामक एक और ठोस विशिष्ट प्रारूप को विकसित कर लिया था, जिसमें रूस, अमेरिका, चीन और पाकिस्तान शामिल थे।

मास्को की प्राथमिकता अभी भी ट्राइका प्लस को लेकर है क्योंकि यह अफगानिस्तान पर अमेरिका के साथ काम करने के लिए अवसर की खिड़की को खोलता है। मास्को का विचार है कि अमेरिका के साथ किसी भी चुनिंदा जुड़ाव से अमेरिकी-रुसी तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है और यहाँ तक कि दोनों महाशक्तियों के बीच समग्र रिश्तों पर भी लाभकारी प्रभाव पड़ सकता है।

हालाँकि, ठीक इसी वजह से अमेरिका ट्राइका प्लस के प्रति उदासीन रवैया रखता है, अर्थात, जब वह यह सब कर पाने में खुद ही बेहतर है, क्योंकि तालिबान वैसे भी उसके लिए कोई अजनबी नहीं है तो वह इसमें मास्को के साथ वार्ता में जाकर बेकार में क्यों उलझे।

इतना तो तय है कि अफगान स्थिति पर रूस को दरकिनार करते हुए मध्य एशियाई मुल्कों का सीधे तौर पर लाभ उठाने की संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों का भूत निश्चित तौर पर सता रहा होगा। अफगान मुद्दे पर मध्य एशियाई मुल्कों के साथ किसी भी स्तर पर सहयोग के अवसर को अमेरिका निश्चित तौर पर यूरेशियाई क्षेत्र में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्से में अपने प्रभाव का विस्तार करने में अपने लाभ के लिए काम करने के रूप में देखता है, जहाँ वर्तमान में रूस और चीन अपनी अग्रणी उपस्थिति का उपभोग कर रहे हैं।

संक्षेप में कहें तो 20 अक्टूबर को मास्को प्रारूप (3 वर्षों के अंतराल के बाद) की बैठक आयोजित करने के रुसी प्रस्ताव का मकसद तालिबान के लिए अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के साथ बातचीत करने के लिए जगह बनाने की रही है। इसका दूसरा उद्देश्य तालिबान को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना है कि वह अपने रिश्तों में विविधता लाये, न कि अपने सभी अंडे पश्चिमी टोकरी में ही डाल दे।

लेकिन फिर, तालिबान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ एकीकरण को लेकर उत्सुक है और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले वित्तपोषण की गंभीरता के प्रति सचेत है। तालिबान को पता है कि इसकी चाभी वाशिंगटन के हाथ में है। दिलचस्प बात यह है कि विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तक़ी के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें वरिष्ठ ख़ुफ़िया अधिकारी भी शामिल हैं, ने आज काबुल से दोहा के लिए प्रस्थान किया है। अनुमान है कि मुत्ताकी की वहां पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत होगी।

जहाँ तक तालिबान का प्रश्न है उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता देश पर अपने शासन को स्थापित करने की है। इसका अपना कोई भू-राजनीतिक अजेंडा नहीं है। फिलहाल इसे भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि इसके कार्यकर्त्ता प्रशासन के प्रबंधन के मामले में अनुभवहीन हैं, और दूसरा यह कि देश को चलाने के लिए वित्तीय संसाधनों का घोर अभाव है। यहीं पर देश की अर्थव्यवस्था को बैंकों के जरिये प्रायोजित कर तालिबान सरकार के साथ नए संबंध बनाने की पश्चिमी रणनीति समझ में आती है।

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Taliban Receives Overtures From Near and Far

Afghanistan Crisis
Afghanistan
TALIBAN
USA

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

अमेरिकी आधिपत्य का मुकाबला करने के लिए प्रगतिशील नज़रिया देता पीपल्स समिट फ़ॉर डेमोक्रेसी

भोजन की भारी क़िल्लत का सामना कर रहे दो करोड़ अफ़ग़ानी : आईपीसी

छात्रों के ऋण को रद्द करना नस्लीय न्याय की दरकार है

अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात

तालिबान को सत्ता संभाले 200 से ज़्यादा दिन लेकिन लड़कियों को नहीं मिल पा रही शिक्षा

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

पश्चिम बनाम रूस मसले पर भारत की दुविधा

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?


बाकी खबरें

  • BJP Manifesto
    रवि शंकर दुबे
    भाजपा ने जारी किया ‘संकल्प पत्र’: पुराने वादे भुलाकर नए वादों की लिस्ट पकड़ाई
    08 Feb 2022
    पहले दौर के मतदान से दो दिन पहले भाजपा ने यूपी में अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया है। साल 2017 में जारी अपने घोषणा पत्र में किए हुए ज्यादातर वादों को पार्टी धरातल पर नहीं उतार सकी, जिनमें कुछ वादे तो…
  • postal ballot
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: बिगड़ते राजनीतिक मौसम को भाजपा पोस्टल बैलट से संभालने के जुगाड़ में
    08 Feb 2022
    इस चुनाव में पोस्टल बैलट में बड़े पैमाने के हेर फेर को लेकर लोग आशंकित हैं। बताते हैं नजदीकी लड़ाई वाली बिहार की कई सीटों पर पोस्टल बैलट के बहाने फैसला बदल दिया गया था और अंततः NDA सरकार बनने में उसकी…
  • bonda tribe
    श्याम सुंदर
    स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व
    08 Feb 2022
    पहाड़ी बोंडाओं की संस्कृति, भाषा और पहचान को बचाने की चिंता में डूबे लोगों को इतिहास और अनुभव से सीखने की ज़रूरत है। भाषा वही बचती है जिसे बोलने वाले लोग बचते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि अगर पहाड़ी…
  • Russia China
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस के लिए गेम चेंजर है चीन का समर्थन 
    08 Feb 2022
    वास्तव में मॉस्को के लिए जो सबसे ज्यादा मायने रखता है, वह यह कि पेइचिंग उसके विरुद्ध लगने वाले पश्चिम के कठोर प्रतिबंधों के दुष्प्रभावों को कई तरीकों से कम कर सकता है। 
  • Bihar Medicine
    एम.ओबैद
    बिहार की लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाः मुंगेर सदर अस्पताल से 50 लाख की दवाईयां सड़ी-गली हालत में मिली
    08 Feb 2022
    मुंगेर के सदर अस्पताल में एक्सपायर दवाईयों को लेकर घोर लापरवाही सामने आई है, जहां अस्पताल परिसर के बगल में स्थित स्टोर रूम में करीब 50 लाख रूपये से अधिक की कीमत की दवा फेंकी हुई पाई गई है, जो सड़ी-…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License