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अधिकारों का उल्लंघन और मुआवज़ा: अंतरराष्ट्रीय पैमानों को लागू करने में असफल भारत
जब मानवाधिकारों के उल्लंघन का शिकार बने लोगों की क्षतिपूर्ति और पुनर्वास की बात होती है, तो मुआवज़े के अनिवार्य अधिकार के बिना, भारत अंतरराष्ट्रीय पैमानों से बहुत दूर नज़र आता है।
रवि नायर
06 Oct 2020
human rights
Courtesy: Business Standard

'साउथ एशिया ह्यूमन राइट डॉक्यूमेंटशन सेंटर' के रवि नायर लिखते हैं, मुआवज़े के अधिकार को अनिवार्य बनाए बिना, अधिकारों के उल्लंघन का शिकार होने वाले लोगों के पुनर्वास और मुआवज़े के मामले में भारत अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बराबरी नहीं कर सकता। इससे लोकतंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान लगता है।

——–

भारत कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधियों का हिस्सा हो सकता है, लेकिन वैश्विक समुदाय से किए गए बहुत से वायदों को भारत में पूरा नहीं किया गया। इनकी वज़ह भारतीय न्यायशास्त्र में स्पष्ट दिशा-निर्देश की कमी है।

यहां मानवाधिकार के उल्लंघन की स्थिति, खासतौर पर राज्य द्वारा गैरकानूनी हिरासत, यातना और हिरासत में मौत की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए पीड़ित को मुआवज़े की बात केंद्र में है। फिलहाल, मुआवज़ा दिया जाने का फ़ैसला पूरी तरह से जज के विवेक पर छोड़ दिया गया है। 

लेकिन कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौते और रिपोर्ट्स हैं, जो सरकार को पर्याप्त मात्रा में मुआवज़े दिए जाने की जरूरत की तरफ ध्यान दिलाते हैं।

1993 में संयुक्त राष्ट्रसंघ में बड़े स्तर के मानवाधिकार और बुनियादी स्वतंत्रता के उल्लंघन के पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति, मुआवज़े और पुनर्वास पर तत्कालीन विशेष दूत प्रोफेसर थियो वान बोवेन ने 1993 की रिपोर्ट में लिखा, "जब कोई राज्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है, तब राज्य की जवाबदेही (स्टेट रिस्पांसिबिलिटी) का मुद्दा सामने आता है। इस तरह के मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय समझौतों खासतौर से मानवाधिकार संधियों या फिर पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानून से पैदा होते हैं।"

अंतरराष्ट्रीय समझौते

भारत, राज्य की जवाबदेही से संबंधित कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हस्ताक्षकर्ता है। साथ में भारत उस अंतरराष्ट्रीय समुदाय का हिस्सा भी है, जो पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानूनों से बंधा है, बशर्ते यह कानून किसी भारतीय कानून से टकराव पैदा नहीं करता हो। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51(स) खासतौर पर कहता है, "राज्य को अलग-अलग नागरिकों से व्यवहार के क्रम में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधि बाध्यताओं के लिए सम्मान बढ़ाने की कोशिशें करनी चाहिए।"

इसके बावजूद भारत पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अंतरराष्ट्रीय पैमानों को बनाए रखने में नाकामयाब रहा है। भारत "इंटरनेशनल कंवेंशन ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (ICCPR)" जैसी अहम संधियों के खास अनुच्छेदों के प्रति भी आग्रह रखता रहा है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट रुदुल शाह मामले में राज्य द्वारा बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में मुआवज़े के संवैधानिक अधिकार की व्याख्या कर चुका है। लेकिन ICCPR के अनुच्छेद 9 का भारत द्वारा विरोध करने के चलते "मुआवज़े के कानूनी अधिकार को आभासी तरीके से रोक दिया गया है।" इस अनुच्छेद के मुताबिक़, "कोई भी व्यक्ति जो राज्य द्वारा गैरकानूनी गिरफ्तारी या हिरासत का शिकार हुआ है, वह अनिवार्य तौर पर मुआवज़े का अधिकारी है।" भारत ICCPR के अनुच्छेद 9 पर कहता है, "भारतीय कानूनी व्यवस्था में राज्य द्वारा गैरकानूनी गिरफ्तारी या हिरासत का दावा कर रहे व्यक्ति को मुआवज़ा दिए जाने के बारे में कोई उपबंध नहीं है।" इसके चलते भारत में बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा पर खतरा बना हुआ है।

यातना के खिलाफ़ समझौता

ICCPR के अलावा "कंवेशन अंगेस्ट टॉर्चर (CAT)" तय करता है कि पीड़ित को मुआवज़ा दिया जाए। इस कंवेंशन के मुताबिक़, "कंवेंशन में शामिल हर राज्य को उसके न्याय तंत्र में यह निश्चित करना चाहिए कि यातना का शिकार हुए पीड़ित की समस्याओं का समाधान किया जाए और उसके पास पर्याप्त मात्रा में मुआवज़े का अधिकार हो और जहां तक संभव हो, उसका वहां तक पुनर्वास किया जाए। यातना द्वारा पीड़ित की मृत्यु की दशा में उस पर निर्भर रहने वाले लोगों को मुआवज़ा दिया जाए।"

भारत पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अंतरराष्ट्रीय पैमानों को बनाए रखने में नाकामयाब रहा है। भारत इंटरनेशनल कंवेंशन ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (ICCPR) जैसी अहम संधियों के खास अनुच्छेदों के प्रति आग्रह रखता रहा है।

भारत ने 14 अक्टूबर, 1997 को CAT पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन देश में अब भी इस संधि को लागू किया जाना बाकी है। इसे लागू किए जाने में हो रही देरी की कई एनजीओ और राजनीतिक तत्वों ने पिछले 23 साल में खूब आलोचना की है।

"किसी भी तरह की हिरासत या जेल में बंद लोगों की सुरक्षा के लिए बनाए गए सिद्धांत", जिन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा ने 9 दिसंबर, 1988 को अपनाया था, उनका 35 वां सिद्धांत कहता है, "किसी सार्वजनिक अधिकारी द्वारा इन सिद्धातों में उल्लेखित अधिकारों को नुकसान पहुंचाने की दशा में जवाबदेही के नियमों के हिसाब से मुआवज़ा दिया जाना चाहिए।"

यह प्रस्ताव एक और उदाहरण है, जो बताता है कि अवैधानिक गिरफ़्तारियों और हिरासत की दशा में मुआवज़े की स्थिति और टॉर्ट लॉ (अपकृत्य कानून), भारत में अंतरराष्ट्रीय पैमानों से कितना पीछे है।

मुआवज़े का अधिकार

न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्याय के प्रशासन, दंड मुक्ति के सवाल पर बात करने वाली UN आयोग की नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की एक मानवाधिकार रिपोर्ट भी है। यह रिपोर्ट भी पीड़ित के मुआवज़े के अधिकार को दोहराती है। रिपोर्ट में कहा गया है, "एक राज्य को अपने क्रियाकलापों, या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और मानवीय कानूनों पर हुई चूक का शिकार बने पीड़ित की भरपाई करनी चाहिए" और जब "पीड़ित अपने कष्ट निवारण के अधिकार का क्रियान्वयन कर रहा हो, तब उन्हें धमकियों और बदले की कार्रवाई के प्रति सुरक्षा निश्चित की जानी चाहिए।"

आखिरी बात भारतीय परिप्रेक्ष्य और भ्रष्टाचार के साथ ताकत के गलत इस्तेमाल किए जाने वाले माहौल में अहम हो जाती है। जैसा सुप्रीम कोर्ट ने "मध्यप्रदेश बनाम् श्यामसुंदर त्रिवेदी और अन्य" केस में कहा, "इस तरह के मामलों में पुलिस अधिकारियों को सजा देना मुश्किल है, क्योंकि आमतौर पर उनके खिलाफ कोई सीधा सबूत नहीं मिलता, साथ में पुलिस अधिकारी एक-दूसरे की मदद करते हैं।" इसे कहने की कोई जरूरत नहीं है कि अगर पीड़ित को पुलिस अधिकारियों से डर या बदले की कार्रवाई का भय होता है, तो मुआवज़े की मांग उसे कभी उचित नहीं जान पड़ेगी।

युगोस्लाविया राज्य के मामले में अंतरराष्ट्रीय अपराध प्राधिकरण द्वारा बनाए गए नियमों और प्रक्रियाओं से भी साफ़ होता है कि पीड़ित को मुआवज़े का अधिकार है, भले ही प्राधिकरण खुद मुआवज़ा ना दे सके।

बल्कि नियम संख्या 106, पीड़ितों के लिए स्थानीय कोर्ट में मुआवज़ा लेने की बात कहती है, जो राष्ट्रीय कानून के हिसाब से तय हों। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में स्थानीय कोर्ट और मुआवज़े पर राष्ट्रीय कानूनों में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

भारत ने 14 अक्टूबर, 1997 को CAT पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन देश में अब भी इस संधि को लागू होना बाकी है। संधि को लागू किए जाने में हुई देरी की पिछले 23 साल से कई एनजीओ और राजनीतिक तत्व आलोचना करते रहे हैं।

मानवाधिकारों पर इंटर-अमेरिकन कोर्ट भी लगातार कहता रहा है कि "पीड़ित को 'मुआवज़ा देने का राज्य का कर्तव्य' और 'उन्हें पाने का पीड़ित का अधिकार' पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानून हैं। यह राज्य जवाबदेही पर मौजूदा पारंपरिक अतंरराष्ट्रीय कानूनों में से एक है।" 

अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के रोम विधान भी "पीड़ित को भरपाई, मुआवज़े और पुनर्वास के तौर पर क्षतिपूर्ति के नियमों को बनाने का अह्वान करते हैं।"

संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवाधिकार

2002 में "मानवाधिकारों पर UN आयोग" ने मुआवज़े के लिए स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय पैमाने बनाने की जरूरत बताई। आयोग ने कहा, "यह साफ़ है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों में मानवाधिकार उल्लंघन का शिकार हुए पीड़ितों को उनके नुकसान और दर्द के लिए मुआवज़े का अधिकार एक स्थापित कानून है।"

लेकिन इस कानून का आधार छिन्न-भिन्न हैं। इस विषय में कई तरह की व्याख्याएं और शब्दावलियां हैं, जिनके चलते अंतरराष्ट्रीय पैमानों को पूरी तरह से लागू नहीं किया जाता और पीड़ित पूरा मुआवज़ा मिलने से वंचित हो जाता है।

आयोग ने तर्क दिया कि "इस तरह का उपकरण राज्यों को उनकी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और प्रभावी समाधान देने के क्रम में अहम होगा।" इन सुझावों के आधार पर आयोग ने  "अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों-मानवीय कानूनों के उल्लंघन का शिकार पीड़ितों के लिए मुआवज़े-क्षतिपूर्ति के अधिकार व दिशा-निर्देशों का बुनियादी प्रस्ताव" या "प्रस्तावित सिद्धांतों" को मान्यता देने की अनुशंसा की।

इन "प्रस्तावित सिद्धांतों" को पहले मानवाधिकार पर इंटर-अमेरिकन कोर्ट ने उद्धृत किए थे। कई सरकारें भी नए राहत कार्यक्रम लागू करने के लिए इन्हें पैमाने के तौर पर इस्तेमाल करती हैं। 

16 दिसंबर, 2015 को संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा ने प्रस्ताव 60/147 (बड़े पैमाने पर मानवधिकार और गंभीर स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन का शिकार पीड़ितों के लिए मुआवज़े व क्षतिपूर्ति के अधिकार के लिए बुनियादी सिद्धांत और दिशा-निर्देश) को अपनाया, जो प्रस्तावित सिद्धातों पर आधारित था।

इस प्रस्ताव का अनुच्छेद 20 मुआवज़े पर विमर्श करता है, इसके मुताबिक़, "बड़े स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों और गंभीर स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानवीय नियमों के उल्लंघन से पैदा हुई किसी आर्थिक क्षति के लिए मुआवज़ा दिया जाना चाहिए, जो हर मामले में उल्लंघन की गंभीरता और स्थितियों पर निर्भर करेगी।" यह क्षति कुछ इस तरह हैं:

  1. शारीरिक या मानसिक क्षति
  2. खोए हुए मौके, जिनमें रोज़गार, शिक्षा और सामाजिक फायदे शामिल हैं
  3. सामग्री की क्षति और आय का नुकसान, जिसमें संभावित आय भी शामिल है
  4. नैतिक क्षति
  5. कानूनी और विशेषज्ञ मदद, दवाईयों और स्वास्थ्य सेवाओं, मानसिक और सामाजिक सेवाओं के लिए जरूरी कीमत।

प्रस्ताव का अनुच्छेद 11 पीड़ित के मुआवज़े के अधिकार को स्थापित करता है। यह "बड़े स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और गंभीर स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के उल्लंघन का शिकार हुए पीड़ित के लिए पर्याप्त मात्रा में प्रभावी और फौरी मुआवज़े का अधिकार" की बात करता है।

भारत में मुआवज़ों के लिए अंतरराष्ट्रीय पैमानों का पालन नहीं किया जाता, बिना अनिवार्य मुआवज़े के अधिकार के लोकतंत्र में भारत की प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में है।

हालांकि यह प्रस्ताव सदस्य देशों पर बाध्यकारी नहीं है। लेकिन यह पीड़ितों को मुआवज़े और क्षतिपूर्ति के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पैमानों की बहुत तारीफ़ करता है। साफ़ है कि भारत इस पैमाने पर खरा नहीं उतरता और बड़ी संख्या में पीड़ितों को मुआवज़ा दिलाने में नाकामयाब रहा है।

बाध्यकारी/अनिवार्य अधिकारों की जरूरत

कुलमिलाकर, भारत अंतरराष्ट्रीय पैमानों से बहुत दूर है और बिना अनिवार्य कानून के लोकतंत्र के लिए भारत की प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में है। बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन जारी नहीं रह सकता, दोषियों को सजा से बचाव मिलना बरकरार नहीं रह सकता और ना ही न्यायिक व्यवस्था में पीड़ितों की मुआवज़े मिलने की बहुत थोड़ी आशा होने जैसी चीजें आगे चल सकती हैं।

आदर्श तौर पर अब संविधान में संशोधन कर, राज्य द्वारा गैरकानूनी गिरफ़्तारी और हिरासत, यातना, अभिरक्षा में मौत जैसे मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में अनिवार्य मुआवज़े का प्रावधान किया जाना चाहिए।

एक दूसरा तरीका संसद द्वारा मुआवज़े की एक योजना को पारित किया जाना होगा, यह अतीत में आए प्रस्तावों की तरह होगा, जिसमें राज्य को अलग-अलग मामलों में विश्लेषण और संबंधित तथ्यों को ध्यान में रखते हुए पीड़ितों को मुआवज़ा देने की बात कही गई थी। 

कुछ विशेषज्ञों की सलाह है कि राज्य कोष के बजाए मुआवज़े को आरोपी अधिकारी के वेतन से चुकाया जाना चाहिए। इससे एक डर भी पैदा होगा। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत अधिकारी ही वित्तीय दंड के भागीदार बनेंगे, ना कि राज्य को कोई नुकसान होगा।

भारत में जारी न्यायशास्त्र में मौजूदा मुआवज़े का अधिकार अपर्याप्त और अप्रभावी है। किसी पीड़ित का मुआवज़े का अधिकार किसी जज के विवेक पर ही निर्भर नहीं रह सकता। इस अधिकार को संविधान और जरूरी विधायी कानूनों जोड़ने की जरूरत है।

(रवि नायर, साउथ एशिया ह्यूमन राइट्स डॉक्यूमेंटेशन सेंटर, नई दिल्ली के एक़्जीक्यूटिव डॉयरेक्टर हैं।)

इस लेख को पहले द लीफलेट ने प्रकाशित किया था।

लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Violations of Rights and Compensation: India’s Failure to Adhere to International Standards

Human Rights
Right to compensation
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Constitutional Law
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