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राजनीति
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अमेरिका
दो क्वाडों की कथा
क्वाड-1 और क्वाड-2 दोनों का लक्ष्य चीन है। दोनों की कल्पना 'इच्छुकों के गठबंधन' के रूप में की जाती है। दोनों प्रारूपों में समुद्री शक्ति एक प्रमुख प्रतिमान के रूप में मौजूद है।
एम.के. भद्रकुमार
03 Nov 2021
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18 अक्टूबर, 2021 को भारत, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के विदेश मंत्रियों की एक आभासी बैठक हुई।

अफगानिस्तान से अफरा-तफरी में संयुक्त राज्य अमेरिका की वापसी ने उत्तर-अटलांटिक संबंधों की विश्वसनीयता को धूमिल कर दिया है और नाटो के सम्मान को भी एक बड़ा झटका दिया है। ये घटनाक्रम वाशिंगटन में पहले से ही मौजूदा हताशा को और बढ़ा देते हैं कि यूरोपीय सहयोगी अमेरिका की इस टकराव वाली हिंद-प्रशांत रणनीति का विरोध करते हैं। यूरोप चीन को एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी और 'प्रणालीगत प्रतिद्वंद्वी' के रूप में तो मानता है, लेकिन वह उसके साथ संलग्नता और बातचीत को वरीयता देता है। 

जबकि उत्तर-अटलांटिक गठबंधन का टूटना अकल्पनीय है, इस खेल में केन्द्र की तरफ जातीं दिख रही ताकतें अभूतपूर्व हैं। अमेरिका की चीन केंद्रित नीति पश्चिमी गठबंधन प्रणाली को उजागर कर रही है। क्वाड, जिसे ट्रम्प प्रशासन ने चीन के उदय से उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए पुनर्जीवित किया है, उसमें कोई यूरोपीय सामग्री नहीं है। 

पश्चिमी एशियाई क्वाड (क्वाड-2), जिसमें अमेरिका, इज़राइल, यूएई और भारत शामिल हैं। बाइडेन प्रशासन ने दो सप्ताह पहले ही इसका गठन किया था, वह भी उसी प्रारूप का अनुसरण करता है- क्षेत्रीय भागीदारों के साथ अमरेकी नेटवर्किंग के रूप में। 

क्वाड-1 और क्वाड-2 दोनों के निशाने पर चीन है। दोनों की कल्पना 'इच्छुकों के गठबंधन' के रूप में की जाती है। दोनों प्रारूपों में प्रमुख प्रतिमान के रूप में समुद्री शक्ति मौजूद है। दोनों समुद्री मार्गों में क्रमशः मलक्का जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य में अवरुदद्ध करने वाली जगह के नियंत्रण पर लंगर डाले हुए हैं। मलक्का जलडमरूमध्य दक्षिण चीन सागर से हिंद महासागर में जाने का रास्ता देता है; बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य अरब सागर और अदन की खाड़ी को लाल सागर और स्वेज नहर से जोड़ता है। 

अब, यह सोकोट्रा के यमनी द्वीप पर है, जो रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण बाब अल-मंडब जलडमरूमध्य की अनदेखी करता है, कि संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल ने इसे एक खुफिया जानकारी जुटाने के एक अड्डे के रूप में विकसित किया है। यूएई ने यमनी सरकार के विरोध की अवहेलना करते हुए मई 2018 से रणनीतिक द्वीप पर सैकड़ों सैनिकों को तैनात किया हुआ है। यह बेस चीनी आर्थिक गतिविधि को लेकर, विशेष रूप से यूरोप के साथ अपने व्यापार और चीनी नौसेना की गतिविधियों के संबंध में अमेरिका को महत्त्वपूर्ण सुरक्षा सेवाएं प्रदान कर सकता है। 

सोकोट्रा द्वीप को "एडेन की खाड़ी का गहने" के रूप में जाना जाता है और यह एक ही नाम के द्वीपसमूह में सबसे बड़ा है, जिसमें चार द्वीप और दो टापू शामिल हैं। यह हिंद महासागर में एक रणनीतिक स्थान पर स्थित हैं, जो कि अरब सागर में अफ्रीका के हॉर्न ऑफ तट से दूर है। स्वेज नहर और स्वेज-भूमध्यसागरीय पाइपलाइन को पार करने वाली फारस की खाड़ी से तेल और प्राकृतिक गैस का अधिकांश निर्यात बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। 

वर्षों से, संयुक्त अरब अमीरात इस द्वीप पर दखल करने की मांग कर रहा है, और वर्षों की अस्थिरता के कारण यमनी राज्य के पतन ने उसके इस अधिग्रहण का मार्ग प्रशस्त किया है।

यमन में सऊदी अरब के साथ संयुक्त अरब अमीरात की राजनयिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिस्पर्धा एक दिलचस्प पक्ष है। यूएई के लिए, सोकोट्रा को नियंत्रित करने का अर्थ हिंद महासागर में अपने वाणिज्यिक और सैन्य प्रक्षेपण को मजबूत करना है, इस तरह अपनी अंतर-क्षेत्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने पर जोर देना है। 

दूसरी ओर, सऊदी अरब की दिलचस्पी द्वीप पर अमीराती प्रभाव को कम करने में है, जिससे यमन में रियाद की श्रेष्ठता और साथ ही खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन की पुनः पुष्टि होती है।

सुरक्षा विश्लेषकों का अनुमान है कि सोकोट्रा में जासूसी अड्डे का इस्तेमाल पाकिस्तान, खासकर ग्वादर पोर्ट पर नजर रखने के लिए भी किया जाएगा। स्पष्ट है कि क्वाड-2 इस क्षेत्र में शक्ति की गतिशीलता को प्रभावित करता है। 

इज़राइली मीडिया के मुताबिक सोकोट्रा द्वीप "इजरायल की सुरक्षा सेवाओं के प्रति बहुत अधिक ध्यान खींच कर रहा है।" यह पूरी तरह से समझ में आने वाली बात है कि वास्तव में, यह बेस एक अमेरिकी-इजरायली परियोजना है। अमेरिका चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहा है, जो शिनजियांग में ग्वादर को काशगर से जोड़ता है। 

इजरायल की सैन्य खुफिया वेबसाइट देबका फाइल ने मई में बताया कि यूएई यमन के एक ज्वालामुखी द्वीप पर एक नया हवाई अड्डा भी बना रहा है, जिसे पेरिम द्वीप कहा जाता है, जो "लाल सागर के दक्षिणी चोकपॉइंट से लेकर स्वेज नहर तक तेल टैंकर और वाणिज्यिक शिपिंग को नियंत्रित करने का एक जरिया" बनेगा।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के जाने-माने पश्चिम एशिया विशेषज्ञ, ब्रूस रिडेल ने मई में प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक लेख में लिखा था कि सऊदी अरब और यूएई ने यमन के "सामरिक हिस्सों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है" और "महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय दबाव के बिना उनके इन हासिल लाभ को छोड़ने की संभावना नहीं है।" 

रीडेल ने लिखा कि सउदी ने यमन के दूसरे सबसे बड़े अल-महरा प्रांत पर कब्जा कर लिया है, जो ओमान की सीमा पर है और अब प्रांत में उसके 20 ठिकाने और चौकी हैं। अल-महरा बंदरगाह सऊदी अरब को हिंद महासागर तक सीधी पहुंच बनाता है। रीडेल के अनुसार, रियाद सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत से अल-महरा के माध्यम से समुद्र तक एक तेल पाइपलाइन बनाने की योजना बना रहा है, जो तेल निर्यात के लिए होर्मुज के जलडमरूमध्य पर सऊदी निर्भरता को कम करेगा। 

दूसरी ओर, यूएई का ध्यान यमन के रणनीतिक द्वीपों पर है। रीडेल ने लिखा: "संयुक्त राज्य अमेरिका को यमन के विघटन का एक पक्षकार नहीं होना चाहिए। चुपचाप एक मार्कर नीचे रखना जल्दी नहीं है कि अगर यमन में संघर्ष विराम की व्यवस्था की जाती है, तो सउदी और अमीरात को अल-महरा, मयुन और सोकोत्रा को खाली करने और यमनियों पर नियंत्रण वापस करने की आवश्यकता होगी।” 

दरअसल, चीन को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका की हिंद-प्रशांत महासागर की रणनीति को प्रभावित करने के उच्चे दांव को देखते हुए, यह असंभव है कि वाशिंगटन संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और सऊदी अरब को यमन को स्वतंत्र छोड़ देने के लिए कहेगा। 

सीधे शब्दों में कहें, क्वाड-1 और क्वाड-2 कूल्हों पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। चीन और पाकिस्तान पर नजर रखने के क्वाड-2 के एजेंडे को देखते हुए वाशिंगटन ने सोच-समझकर ही भारत को इसमें शामिल होने का न्योता दिया है। बेशक, इजरायल और यूएई के भी भारत के साथ बहुत दोस्ताना संबंध हैं।

हालांकि, इसमें कुछ चेतावनियां भी अवश्य ही जोड़ी जानी चाहिए। सबसे पहले, यह सौ प्रतिशत निश्चित है कि यमन और अरब सागर में संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल जो कुछ भी करेंगे, उसका एक कोण ईरान होगा। वास्तव में, ईरान उस बिंदु पर किसी भ्रम में नहीं है। ‘तेहरान टाइम्स’ ने हाल ही में ईरान में यमन के राजदूत के साथ एक साक्षात्कार प्रकाशित किया है। इसमें राजदूत ने कहा है कि यह एक एंग्लो-अमेरिकन कॉन्डोमिनियम (ब्रिटिश-अमेरिकी सहस्वामित्व) है, जो यमन में काम कर रहा है। यूएई और सऊदी अरब ने केवल अमेरिकी समर्थन की शह पर इस तरह की हस्तक्षेपवादी नीति अपनाई है। 

यमन में संघर्ष शीत युद्ध के बाद के युग में सबसे क्रूर युद्धों में से एक रहा है। भारत के हाथों पर यमनी का खून क्यों लगना चाहिए? समान रूप से, क्वाड-2 का एक ईरान विरोधी आयाम है। यदि दिल्ली ने ईरान के निकटस्थ पड़ोस में अमेरिका और इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात के साथ इस मकसद से हाथ मिलाती तो है तो भारत-ईरान के संबंध कभी भी उस लाभ को हासिल नहीं कर सकते। 

तीसरा, क्वाड-2 अमेरिका-भारत के बीच अर्ध-गठबंधन को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। जैसा कि सूडान में नवीनतम घटनाओं से पता चलता है, अफ्रीका के हॉर्न और लाल सागर के नियंत्रण के लिए एक बुरा भू-राजनीतिक संघर्ष छिड़ रहा है। इज़राइल के लिए, यह बड़ा खेल अरब राजनीति में घुसने का एक आदर्श ढ़ांचा प्रदान करता है। लेकिन भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।

तुर्की, ईरान, कतर, चीन, पाकिस्तान और यहां तक कि रूस जैसे इस क्षेत्र के और क्षेत्र के बाहर के कई देशों को बेवजह परेशान करना भारत के हित में नहीं है। लब्बोलुआब यह है कि सरकार को यह बताना चाहिए कि क्वाड-2 में इस सवारी करने के आनंद से भारत को कैसे फायदा होता है।. 

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें 

https://www.newsclick.in/a-tale-two-quads

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