जाड़े की गुनगुनी धूप या रात में महकने वाले बेला की तरह सुगंध देने वाला मंगलेश डबराल का गद्य भी कम लुभावना नहीं है। उनका ढेर सारा पत्रकारीय लेखन और उनका यात्रा वृतांत ` एक बार आयोवा’ इसका प्रमाण है।
शायर कैफ़ भोपाली ने कहा था, “आग का क्या है, पल दो पल में लगती है/ बुझते बुझते एक ज़माना लगता है”, देश की राजनीति में आज यही नज़ारा है। अब वो दिल्ली हो या बंगाल आग तो लग चुकी है...
मानवाधिकार दिवस के अवसर पर बेल्जियम के श्रमिकों ने 23 नवंबर को लीगे क्रिमिनल कोर्ट द्वारा सुनाए गए 17 ट्रेड यूनियनिस्टों के ख़िलाफ़ सज़ा को रद्द करने की अपील की।
सीरियाई ड्रूज़ गांव के लोगों ने अपने कृषि भूमि पर इज़रायल की पवन टरबाइन निर्माण के ख़िलाफ़ कल हड़ताल किया था। ये टर्बाइन अवैध इज़रायल बस्तियों को बिजली की आपूर्ति करेगा।