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शिक्षा
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इंजीनियरिंग की डिग्री और नौकरी का संकट 
मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने सोमवार को लोकसभा में जानकारी दी कि इंजीनियरिंग संस्थानों से पास हो रहे आधे से अधिक छात्रों को नौकरी नहीं मिल रही है। 
अमित सिंह
16 Jul 2019
आईआईटी दिल्ली
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार: SkillOutlook.com

इंजीनियर बनाने के नाम पर देश में अरबों रुपये का कोचिंग कारोबार चल रहा है, बच्चों को पढ़ाने में मां-बाप कर्ज़दार हो रहे हैं, तनाव में बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन जब वह इंजीनियर बन जाते हैं तो उनके पास नौकरी नहीं है। 

जी हां, आपने सच सुना है। ये बात सरकार मान रही है। दरअसल इंजीनियरिंग संस्थानों से पढ़ाई करने के बाद आधे से अधिक छात्रों को नौकरी नहीं मिल पा रही है। यहां तक कि आईआईटी, एनआईटी और ट्रिपल आईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के भी 23 फीसदी छात्रों का प्लेसमेंट नहीं हो रहा।

हिन्दुस्तान में प्रकाशित खबर के मुताबिक इस बात की जानकारी मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने लोकसभा में दी। उन्होंने बताया कि साल 2017-18 में गैर-प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई पूरा करने वाले 7.93 लाख में से केवल 3.59 लाख छात्रों का ही प्लेसमेंट हो पाया। इस तरह की स्थिति साल 2018-19 में भी देखी गई। 

केंद्रीय मंत्री ने आगे बताया कि प्रतिष्ठित संस्थानों से पास होने वाले 23,298 छात्रों में 5,352 छात्रों को नौकरी नहीं मिली। उन्होंने सदन को बताया कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अगले सत्र में रोजगार की कम संभावना वाले पाठ्यक्रमों को अनुमति नहीं देगा। 

निशंक ने कहा कि अब आगे से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसे उभरते क्षेत्र से जुड़े पाठ्यक्रमों को मंजूरी दी जाएगी, क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में रोजगार की बहुत संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग के छात्रों को सरकार के 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए प्रशिक्षित भी किया जा रहा है। 

सदन में इससे पहले कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि अधिकतर इंजीनियरिंग के छात्र ऐसी नौकरियों में हैं जहां इंजीनियरिंग की डिग्री की जरूरत ही नहीं है। कांग्रेस नेता ने यह भी कहा  कि उद्योग क्षेत्र की मांग और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के प्रारूप में कोई भी समानता नहीं है। 

थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व में दिए गए एक बयान पर चुटकी लेते हुए कहा कि अगर मांग और पाठ्यक्रम में असमानता दूर कर दी जाए तो फिर युवाओं को पकौड़े तलने की सलाह नहीं देनी पड़ेगी। 

लोकसभा में इस मुद्दे पर हुई चर्चा के बाद ये साफ दिखता है कि आज के समय में इंजीनियरिंग क्षेत्र अपना महत्व खोता जा रहा है। भारत में एक समय ऐसा था जब इंजीनियरिंग को सफल व्यक्ति की पहचान के साथ जोड़ा जाता था। अभिभावकों का तो सपना ही यही होता था कि उनका बच्चा इंजीनियर बने। लेकिन ये स्थिति बदल गई है। 

इससे पहले पिछले पांच सालों के दौरान कम होते एडमिशन के चलते अप्रैल 2018 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने 800 इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने का फैसला किया था। यानी सच ये भी है कि नौकरियों की कमी की वजह से पहले से चल रहे कई उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र घट रहे हैं। 

अब सवाल यह है कि क्या भारत के इंजीनियरों में काबिलियत कम है जो उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है? या फिर देश में रोजगार के अवसरों में तेजी से कमी आई है इसके चलते इंजीनियरिंग के छात्रों को नौकरी नहीं मिल रही है?

तो इसका जवाब भी हमें आंकड़ों में मिल रहा है। प्रतिभा की पहचान और शोध से जुड़ी एक कंपनी एस्पाइरिंग माइंड्स की नेशनल इम्प्लायबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार मुताबिक 8% से भी कम भारतीय इंजीनियर, इंजीनियरिंग की ठोस भूमिकाओं यानी कोर एरियाज में नियुक्त किए जाने के लायक हैं। यानी 92 फीसदी इंजीनियर कोर एरिया के लायक नहीं हैं। कोर एरिया का मतलब हुआ मेकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल और केमिकल इंजीनियरिंग।

इस रिपोर्ट के अनुसार 80 फीसदी इंजीनियर रोजगार के काबिल नहीं है। रिपोर्ट में 650 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों के 1,50,000 इंजीनियरिंग छात्रों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसके लिए शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार लाने की जरूरत है ताकि वे श्रम बाजार की जरूरतों के हिसाब से काबिल हो सके।

इससे पहले भी 2011 में नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज़ कंपनी यानी नैसकॉम ने एक सर्वे में पाया कि सिर्फ़ 17.5% इंजीनियरिंग ग्रेजुएट ही नौकरी के लायक थे। इसके सर्वे के मुताबिक 82.5 प्रतिशत इंजीनियर नौकरी के लायक नहीं मिले थे। 

हालांकि इसमें इंजीनियरिंग करने वाले छात्रों का दोष नहीं है। जब कुकरमुत्तों की तरह खुल रहे इंजीनियरिंग कॉलेजों को मान्यता दी जा रही थी तब इस बात का ध्यान सत्ताधारियों को देना चाहिए था।  

अब हम अपने दूसरे सवाल नौकरी पर आते हैं। देश में नौकरियों की क्या स्थिति है? मोदी सरकार के दोबारा शपथ लेने के अगले ही दिन बेरोजगारी के आंकड़े जारी किए गए थे। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी इन आंकड़ों के अनुसार देश में 2017-18 में बेरोजगारी दर कुल उपलब्ध कार्यबल का 6.1 प्रतिशत रही, जो 45 साल में सर्वाधिक रही है।

इसके अलावा अगर हम रोजगार वृद्धि दर की चर्चा करें तो इसमें भी निरंतर गिरावट दर्ज की गई है। बिजनेस स्टैंडर्ड में महेश व्यास ने लिखा है कि 2017-18 मे कंपनियों में रोजगार वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत ही रही। 2016-17 में 2.6 प्रतिशत थी। जबकि यह बेहतर आंकड़ा है पिछले वर्षों की तुलना में। रोजगार घटा है। लेकिन मजदूरी थोड़ी बढ़ी है। महेश लिखते हैं कि मात्र 46 प्रतिशत कंपनियों ने ही रोजगार वृद्धि दर्ज की है। 41 प्रतिशत कंपनियों में रोजगार घटे हैं। 13 प्रतिशत कंपनियों में रोजगार में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

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